शनिवार, 21 मार्च 2015

संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका पर चर्चा शु्रू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका - २
( the role of abstraction in knowing - 2 )

अपकर्षण/अमूर्तकरण ( abstraction ) या अपकर्षित संकल्पनाएं ( abstract concepts ) हमारे गिर्द की घटनाओं तथा प्रक्रियाओं के आंतरिक, गहरे संपर्कों को समझने में हमारी किस तरह से सहायता करती हैं ?

यथार्थ ( real ) भौतिक जगत की वस्तुओं में, अनुगुणों ( properties ), पहलुओं ( aspects ) तथा संयोजनों ( connections ) का एक असीम समुच्चय (set ) होता है। प्रत्येक अपकर्षण स्वयं में किसी संपर्क-सूत्र या संयोजन अथवा अनुगुण को परावर्तित करता है, मसलन, रंग, आकृति, एक घटना की दूसरे पर कारणात्मक निर्भरता ( causal dependence ), आदि। परंतु अलग-अलग लेने पर ये अनुगुण या संयोजन अधिकतम पूर्णता तथा सटीकता ( exactness ) से परावर्तित होते हैं। असीमित संयोजनों तथा अनुगुणों वाली यथार्थ भौतिक वस्तुओं को अधिक गहराई से जानने के लिए, यानी उन्हें अपनी चेतना में परावर्तित करने के लिए हमें पृथक-पृथक अपकर्षणों को एकजुट ( unite ) करना होता है और उन्हें एक ख़ास ढंग से एक नयी, मूर्त ( concrete ) संकल्पना में संयुक्त करना होता है, जो अपने काल तथा युग ( age ) के लिए एक मूर्त वस्तु के बारे में पूर्णतम ज्ञान प्रदान करती है। फलतः मूर्त संकल्पना, विविध अपकर्षणों का एक प्रकार का योग ( sum ) या समग्रता ( aggregate ) होती है, जो एक वस्तु के कुछ अनुगुणों, पहलुओं और संबंधों को परावर्तित करती है

बाह्य जगत को परावर्तित करनेवाले हमारे ज्ञान के विकास के साथ, संकल्पनाएं अधिकाधिक मूर्त बनती जाती है। मसलन, प्राचीन खगोलविद्या ( astronomy ) के जमाने में चंद्रमा की संकल्पना बहुत अपकर्षित/अमूर्त थी। उसमें कई लक्षण शामिल थे : चंद्रमा पृथ्वी के गिर्द घूमता है, उसकी चकत्ती हथेली से कुछ ही बड़ी है, वह रात को चमकता है। १९वीं सदी में खगोलविद्या के विकास की तथा दूरबीनों के अविष्कार की बदौलत चंद्रमा की सतह पर विद्यमान गड्ढ़ों तथा पर्वतों की जानकारी हो चुकी थी, उसके वास्तविक आकार की गणना कर ली गयी थी तथा पृथ्वी से उसकी दूरी का पता लगा लिया गया था और ज्वार-भाटों पर उसके प्रभाव, आदि का स्पष्टीकरण दिया जा चुका है। हमारे अपने युग में स्वचालित चंद्र-गाड़ियों तथा मनुष्य के चंद्रतल पर उतरने के बाद चंद्र मिट्टी के, उसकी रासायनिक बनावट तथा कई अन्य विशेषताओं के बारे में हमारी जानकारी में बहुत वृद्धि हो गयी। संकल्पना ‘चंद्रमा’ १००-१५० वर्ष पहले, बल्कि ५० ही वर्ष पहले कि संकल्पना से अधिक समृद्ध, अंतर्वस्तु ( content ) से परिपूर्ण तथा अधिक मूर्त हो गयी। विज्ञान के विकास के साथ ही साथ विज्ञान की संकल्पनाओं की मूर्तता में हमेशा वृद्धि होती है।

मूर्त वस्तुओं तथा मूर्त संकल्पनाओं के बीच अंतर करना तथा उन्हें गड्डमड्ड न करना जरूरी है। मूर्त वस्तुएं, वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) में चेतना ( consciousness ) के बाहर तथा उससे स्वतंत्र रूप से विद्यमान होती हैं, किंतु मूर्त संकल्पनाएं लोगों के संज्ञानात्मक क्रियाकलाप ( cognitive activity ) का परिणाम होती हैं। मूर्त सकल्पनाएं, मूर्त वस्तुओं के विविध पहलुओं तथा संयोजनों को परावर्तित करनेवाले पृथक अपकर्षणों के संगत ( consistent ), आनुक्रमिक संपूरण ( consecutive supplementing ) तथा परिष्करण ( refining ), विस्तारण ( extension ) और संश्लेषण ( synthesis ) के द्वारा उत्पन्न होती हैं।

पृथक ( separate ) अपकर्षणों से मूर्त संकल्पनाओं में संक्रमण ( transition ) को अपकर्षित से मूर्त को आरोहण ( ascent ) की विधि कहते हैं। यह आरोहण बेतरतीब नहीं, बल्कि कुछ निश्चित क़ायदों और नियमों के अनुसार होता है। इनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यह अपेक्षा है कि अलग-अलग अपकर्षणों के ( जो अधिक पूर्ण, सटीक और अधिक मूर्त संकल्पना में शामिल है ) बीच संबंध, परावर्तित घटनाओं और प्रक्रियाओं के अनुगुणों तथा लक्षणों के बीच वस्तुगत, वास्तविक संयोजन को परावर्तित करे। यदि मूर्त संकल्पना के अंतर्गत, अपकर्षणों का संबंध, अध्ययनाधीन घटना या प्रक्रिया के अनुगुणों तथा लक्ष्यों के वास्तविक संयोजन के अनुरूप होता है, तो हमें स्वयं वस्तुगत यथार्थता के तदनुरूप ( corresponding ) अत्यंत सत्य, गहन ज्ञान की प्राप्ति होती है।

फलतः संकल्पनाएं मनुष्य में अंतर्जात ( inborn ) या किसी ईश्वर की बनायी हुई नहीं होती हैं, जैसा कि कुछ प्रत्ययवादी ( idealistic ) दार्शनिकों का विचार था। वे इतिहास आश्रित होती हैं और अपकर्षण के द्वारा रूप ग्रहण करती हैं। वे संवेदनों पर आधारित होती हैं और उनकी अभिव्यक्ति का भौतिक साधन भाषा है। अपकर्षण की प्रक्रिया में अतिकाल्पनिकता ( fantasy ) तथा रचनात्मकता ( creativity ) के भी कुछ तत्व होते हैं। जब हम कुछ लक्षणों को अपकर्षित करते हैं और अन्य का पृथक्करण तथा समूहन करते हैं, तो हम यथार्थता के प्रति एक निश्चित सक्रिय रवैये ( active attitude ) का प्रदर्शन करते हैं। मनुष्य जीवन, अपने उत्पादन, दैनिक तथा सामाजिक क्रियाकलाप में उत्पन्न होनेवाली वस्तुगत जरूरतों द्वारा प्रस्तुत लक्ष्यों व कार्यों द्वारा निर्देशित ( guided ) होता है। इसलिए एक संकल्पना केवल वस्तुगत यथार्थता को ही परावर्तित नहीं करती, बल्कि मानवीय सक्रियता, रचनात्मक क्रियाकलाप की छाप ( traces ) से प्रभावित भी होती है

जब संकल्पना के निर्माण करने में समर्थ रचनात्मक क्रियाकलाप, वस्तुओं के वस्तुगत गुणों तथा संबंधों के विरुद्ध आ टकराता है, तो अपकर्षण की प्रक्रिया के दौरान ऐसी असत्य संकल्पनाएं बन सकती हैं, जो वस्तुगत यथार्थता को विरूपित, त्रुटिपूर्ण ढंग से परावर्तित करती हैं। ऐसी संकल्पनाओं के पैदा होने की संभावना हमेशा मौजूद रहती है और कुछ दशाओं में यह प्रत्ययवा/भाववाद ( idealism ) की ओर पहुंचा सकती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 14 मार्च 2015

संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका पर विचार शु्रू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका - १
( the role of abstraction in knowing - 1 )

मनुष्य अपने क्रियाकलाप में केवल संवेदनों ( sensations ) तथा संवेद जन्य बिंबों ( sensory images ) का ही उपयोग नहीं कर सकता है। वे विश्व को समझने और, उससे भी अधिक, उसी रूपांतरित ( transform ) करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। लेकिन क्यों? पहला तो इसलिए कि, क्योंकि हम अपने संवेदन दूसरे लोगों को हस्तांतरित नहीं कर सकते, हांलांकि हम उनके बारे में बात कर सकते हैं ; हम दूसरे लोगों के मस्तिष्कों में मौजूद संवेद बिंबों का अनुभव नहीं कर सकते हैं, हालांकि हम उनके बारे में बातचीत से या पुस्तकें पढ़कर जान सकते हैं। दूसरा इसलिए भी कि, दैनिक जीवन तथा विज्ञान दोनों में हमारा वास्ता ऐसे ज्ञान से पड़ता है, जो संवेद प्रत्यक्ष ( sense perception ) के, यानी संवेदनों के ज़रिये हासिल या विकसित नहीं किया जा सकता है।

मसलन, हम एक संख्या, ऐतिहासिक प्रक्रिया, भूतद्रव्य ( matter ), आदि को देख, सुन, सूंघ या स्पर्श नहीं कर सकते, हालांकि हम दो सेबों को देख सकते हैं, युद्ध जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को या प्रथम भूउपग्रह के प्रक्षेपण को देख सकते हैं या किसी एक भौतिक वस्तु को छू और सूंघ सकते हैं, जैसे एक फूल को या कॉफ़ी के प्याले को। एक साकल्य ( whole ) के रूप में विश्व के तथा उसमें जारी प्रक्रियाओं के जटिल ज्ञान को विकसित करने और नये ज्ञान के अंतरण ( pass on or transfer ), भंडारण ( store ) तथा सर्जन ( creation ) के लिए हमें संकल्पनाओं ( concepts ) की तथा उनसे जुड़ी तार्किक प्रक्रियाओं ( logical processes ) की जरूरत होती है। ज्ञान के इन रूपों का संवेदनों के साथ क्या संबंध है? वे कैसे उत्पन्न होते हैं?

संकल्पनाओं की रचना की प्रक्रिया को अक्सर अपकर्षण या अमूर्तकरण ( abstraction ) कहा जाता है, इसलिए संकल्पनाओं को भी बहुधा अमूर्त या अपकर्षित कहा जाता है। अपकर्षण/अमूर्तकरण कई अवस्थाओं ( stages ) में होता है। सबसे पहले हममें, एक से संवेदनों तथा संवेद बिंबों को उत्पन्न करनेवाली विविध वस्तुओं का एक प्रकार का समूहन ( grouping ) होता है। एक पके हुए सेब, गाजर तथा स्तनपायी के रुधिर में उनके सारे अंतरों के बावजूद एक समान अनुगुण ( property ) होता है, जिसकी वज़ह से वे सब हम में एक समान रंग-संवेद, यानी लाल रंग का रंग-संवेद पैदा करते हैं। हम एक वस्तु को दूसरे से विभेदित ( distinguish ) करनेवाले सारे अंतरों को अपकर्षित करते हैं, यानी सारे अंतरों को छोड़ देते हैं। दूसरी अवस्था में हम एक ही विशेषता के विविध सूक्ष्म भेदों ( nuances ) या प्रकारांतरों का मानो समानीकरण ( equate ) करते हैं या उन्हें तद्रूप ( identify ) बनाते हैं। मसलन, हम एक ही रंग की सारी आभाओं ( shades ) को समरूप मान लेते हैं।

अगली अवस्था में हम ‘शुद्ध’, आदर्श रूप में विभेदित अनुगुणों व संबंधों को घनीभूत बनाते, समेकित ( consolidated ) करते हैं, इस रूप में वे शायद स्वयं प्रकृति या समाज में भी नहीं पाये जाते हैं। इसलिए इस अवस्था को अक्सर आदर्शीकरण ( idealisation ) कहा जाता है। अंत में, चौथी अवस्था पर विभेदित तथा अलग किये हुए अनुगुणों को भाषा में घनीभूत बनाया जाता है। यह नामकरण ( denomination ) की अवस्था है। प्रदत्त अनुगुण को एक पृथक ( separate ) शब्द या शब्दों के समूह के ज़रिये नाम दिया जाता है। इस तरह, शब्दों में व्यक्त एक संकल्पना पैदा होती है। वस्तुओं के जिस समूह का यह हवाला देती है, वह इसका आशय ( meaning ) है, जबकि संकल्पना में घनीभूत तथा परावर्तित अनुगुण या संबंध, उसके अभिप्राय ( sense ) का द्योतक है। संकल्पना ‘लाल’ का अभिप्राय, एक निश्चित ऊर्जा की प्रकाश किरणों की हममें एक निश्चित रंग-संवेद उत्पन्न करने की क्षमता ( capacity ) से है। इस संकल्पना का आशय वे वस्तुएं हैं, जो उस ऊर्जा की किरणों को परावर्तित करती हैं। संकल्पना ‘शोषण’ ( exploitation ) का अभिप्राय है अन्य लोगों के श्रम से मुनाफ़ा खसोटना, इसका आशय है उत्पादन संबंधों की एक निश्चित क़िस्म।

संवेदनों की ही भांति, अपकर्षण/अमूर्तकरण भी वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) का परावर्तन ( reflection ) है।  वास्तविक जीवन में वे एक दीर्घावधि में विकसित और परिष्कृत ( refined ) होते हैं। वे संवेदनों तथा संवेद बिंबों पर आधारित होते हैं। लेकिन संवेदनों के विपरीत, अपकर्षण भौतिक वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं के संवेद द्वारा अनुबोधित ( perceived ) केवल बाह्य पक्ष को और केवल उसी को उतना परावर्तित नहीं करते, जितना उनके उन आंतरिक संयोजनों ( inner connections ) तथा संबंधों को करते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से संवेद अनुबोधन/प्रत्यक्षण ( perception ) के लिए उपलब्ध नहीं होते हैं। इस तरह अपकर्षण, यथार्थता को अधिक गहराई से, अधिक सत्यता से और अधिक पूर्णता से परावर्तित करते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 7 मार्च 2015

संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका - २
( the role of sensations in knowing - 2 )

दूसरा महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि संवेदनों ( sensations ) का स्वरूप केवल चाक्षुष उपकरण ( visual apparatus ) के, यानी आंख के संगठन पर और केवल वस्तु की विशेषताओं पर ही निर्भर नहीं होता, बल्कि उनकी अंतर्क्रिया ( interaction ) पर भी होता है, जो स्वयं भौतिक क्रियाकलाप द्वारा संपन्न होती है। इस अंतर्क्रिया के बिना वस्तु का समुचित या सटीक बिंब क़तई नहीं बनता। दृष्टि पटल ( retina ) पर एक ऊंची इमारत का बिंब चंद मिलीमीटर का होता है, जबकि हमारा मस्तिष्क इस ऊंची इमारत के दृष्टि बिंब की रचना करते समय उसे अपने आप तथा अचेतन रूप से अन्य वस्तुओं के साथ सहसंबंधित कर लेता है, और हम उसके आयामों ( dimensions ) का सही-सही अनुमान लगा लेते हैं।

मस्तिष्क की यह क्षमता अंतर्जात ( inborn ) नहीं होती। नवजात शिशु में यह क्षमता नहीं होती, यह व्यक्तिगत प्रयोगों तथा सामाजिक व्यवहार के द्वारा दीर्घकालिक अमली प्रशिक्षण ( practical training ) के दौरान विकसित होती है।

एक और उदाहरण प्रस्तुत है। अंधेरे कमरे में बैठे किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की चेतावनी दिये बिना एक उलटी-पुल्टी फ़िल्म की सहायता से जलती हुई बत्ती दिखलाई जाती है। बत्ती की लपट तथा उससे निकलनेवाला धुआं नीचे की तरफ़ जा रहे हैं, लेकिन उस व्यक्ति का मस्तिष्क, जिसमें आवश्यक सूचना पहले के अनुभवों से ही भंडारित ( stored ) होती है, फ़िल्म दिखानेवाले की ‘ग़लती’ को अपने आप ‘सही कर लेता’ है और ऊपर को उठती हुई एक आम लपटवाली सामान्य बत्ती की तस्वीर देखता है।

ऊंची मीनारों, आदि पर काम करनेवालों तथा पहली बार ऊंची जगह पर पहुंचाये गये लोगों की ज़मीनी सतह पर पड़ी वस्तुओं के आयामों का निर्धारण करने की क्षमता भिन्न-भिन्न होती है। जंगलों के निवासी तथा खुले मैदानों के रहनेवाले लोग देशिक दूरियों ( spatial distances ) का अनुबोध ( perceive ) भिन्न-भिन्न ढंग से करते हैं। यह क्षमता दृष्टि अंग की बनावट पर निर्भर नहीं होती, बल्कि व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवहार पर तथा प्रत्यक्षण ( perception ) की उस क्षमता तथा संस्कृति पर निर्भर होती है, जिसे उन्होंने शिक्षा तथा अपने जीवन के दौरान आत्मसात ( assimilated ) किया है

संज्ञान में संवेदनों की भूमिका के बारे में अब क्या कहा जा सकता है? संवेदन एक आत्मगत बिंब ( subjective image ) है, जो वस्तुगत जगत ( objective world ) को परावर्तित ( reflect ) करता है। यह एक सरल दर्पण सा बिंब नहीं है, जैसा कि अनुभववादी ( empiricist ) समझते हैं, बल्कि परावर्तन की एक ऐसी अतिजटिल प्रक्रिया है, जिसमें अनेक गुणात्मक रूपांतरण ( qualitative transformations ) तथा द्वंद्वात्मक निषेध ( dialectical negations ) शामिल होते हैं। संवेदनों से हमें परावर्तित वस्तुओं के बारे में प्रारंभिक सूचना प्राप्त होती है। किंतु यह सूचना केवल वस्तुओं की विशेषताओं तथा हमारे तंत्रिकातंत्र पर ही निर्भर नहीं होती। संवेदनों को ढालने में हमारे अनुभव, सामाजिक व्यवहार और ऐतिहासिक विकास का सामान्यीकरण करनेवाली इतिहासतः रचित हमारी सारी संस्कृति का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका को समझने के लिए द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) की इस स्थापना ( thesis ) का बुनियादी महत्त्व है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका - १


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका पर विचार शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका - १
( the role of sensations in knowing - 1 )

संवेदन ( sensation ) मनुष्य द्वारा विश्व के परावर्तन ( reflection ) के प्रारंभिक रूप हैं। ( इन पर मनोविज्ञान श्रृंखला में एक और पोस्ट यहां देखी जा सकती है। ) संवेदन हमारे संवेद अंगों ( sense organs ) पर बाह्य जगत की वस्तुओं के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं, इस प्रभाव का फल होते हैं, वस्तुओं के अत्यंत विविधतापूर्ण अनुगुणों ( properties ) से उत्पन्न हो सकते हैं। हम किसी वस्तु के कड़ेपन की, ध्वनियों की, रंगों, आदि की संवेदानुभूति प्राप्त कर सकते हैं। विभिन्न वस्तुएं और घटनाएं, हमारे संवेदी अंगों पर भिन्न-भिन्न ढंग से क्रिया कर सकती हैं।

कुछ मामलों में संवेदी अंग वस्तुओं के प्रत्यक्ष संपर्क ( direct contact ) में आते हैं और उससे, मसलन, मिठास, कडुवा व खट्टापन, लोचपन, खुरदुरे व चिकनेपन, आदि के संवेदन पैदा होते हैं। अन्य मामलों में हम दूरी से किसी वस्तु का संवेद प्राप्त करते हैं, जैसे कि वस्तु द्वारा परावर्तित या विकीर्ण ( radiate ) प्रकाश से आंखों के दृष्टि पटल पर पड़ने-वाले प्रभाव से उस वस्तु का एक दृश्य बिंब ( image ) बन जाता है। परंतु संवेदी अंगों पर किसी वस्तु का कोई भी प्रभाव क्यों न पड़ता हो, संवेदन उन पर प्रभाव डालनेवाले किसी बाह्य उद्दीपक ( stimulus ) का ही फल होता है

हम चाक्षुष संवेदनों ( visual sensations ) की रचना के उदाहरण से इस प्रक्रिया पर और गहराई से विचार करते हैं। सौर प्रकाश विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों ( फ़ोटानों ) का अभिवाह ( flux ) होता है, जिनमें निश्चित ऊर्जा होती है। जब सौर प्रकाश किसी वस्तु पर ( मसलन, एक सेब पर ) पड़ता है, तो उसका एक अंश उसकी सतह से परावर्तित होता है और एक अंश अवशोषित ( absorbed ) हो जाता है। सेब से परावर्तित किरणें हमारी आंखों से टकराती हैं। परावर्तित किरणों में, परावर्तित करने वाली सतह की भौतिक तथा रासायनिक संरचना के अनुसार फेर-बदल हो जाते हैं। आंख के भीतर उनमें और भी कई संपरिवर्तन ( conversion ) तथा रूपांतरण ( transformation ) होते हैं। प्रकाश की तरंगे प्रकाशिकी ( optics ) के नियमों के अनुसार नेत्र-लेंस द्वारा अपवर्तित ( refracted ) होती हैं और उस वस्तु की सैकड़ों या हज़ारों गुना तक छोटी छाप ( impression ) दृष्टिपटल पर छोड़ देती हैं। दृष्टिपटल ( retina ) की कोशिकाएं तंत्रिका-तंत्रओं ( nerve fibers ) के ज़रिये जैव-विद्युत आवेग उत्पन्न करती हैं और ये मस्तिष्क के दृष्टिकेंद्र की कोशिकाओं में विशेष रूपांतरण कर देते हैं, उसका परिणाम प्रकाश और आकृति के विविध चाक्षुष संवेदन होते हैं। ये संवेदन एक साकल्य ( a whole ) में संयुक्त हो जाते हैं, या उस चीज़ में संश्लेषित ( synthesized ) हो जाते हैं, जिसे हम वस्तु का ( मसलन, सेब का ) दृश्य बिंब कहते हैं।

दृश्य बिंब के उत्पन्न होने के तरीक़े पर विचार करने पर हम निम्नांकित निष्कर्षों पर पहुंचते हैं : दृश्य बिंब देखनेवाले के मस्तिष्क में उत्पन्न और विद्यमान होता है, फलतः यह आत्मगत ( subjective ) है। यह वस्तु की सतह से परावर्तित भौतिक प्रकाश की तरंगों के अनेकानेक रूपांतरणों तथा संपरिवर्तनों के फलस्वरूप पैदा होता है। तरंगे विशेष जैव-विद्युत आवेगों में संकेंद्रित होती हैं जो पुनः मस्तिष्क की कोशिकाओं में रंग तथा देशिक ज्यामितिक ( spatial geometrical ) संवेदनों में रूपांतरित होते हैं। उसके फलस्वरूप, मस्तिष्क में उत्पन्न बिंब वस्तु के हूबहू अनुरूप ( correspond ) होता है और उसे अन्य सारी वस्तुओं से विभेदित ( distinguish ) करने में मदद देता है। इस अर्थ में हम कहते हैं कि एक दृश्य संवेद एक वस्तुगत वस्तु का परावर्तन होता है। वे वस्तुगत जगत ( objective world ) के आत्मगत बिंब ( subjective image ) हैं और साथ ही वे बाह्य उत्तेजना की ऊर्जा का चेतना के तथ्य ( fact ) में रूपांतरण हैं

संवेदन चूंकि वस्तुगत वास्तविकता ( reality ) के आत्मगत बिंब हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि आत्मगत मानसिक प्रक्रियाओं के लिए प्रारंभिक सामग्री हमें संवेदनों के ज़रिये ही प्राप्त होती है। यानी इससे यह स्पष्ट होता है कि संवेदन हमारे संपूर्ण ज्ञान का प्रारंभिक आधार-स्रोत हैं। संवेदन आत्मगत रूप में इसलिए होते हैं कि उनकी उत्पत्ति ( emergence ) संवेदी अंगों की क्रिया के साथ जुड़ी होती है। साथ ही साथ अपनी अंतर्वस्तु ( content ) में वे वस्तुगत होते हैं, क्योंकि वे वस्तुओं के वस्तुगत अनुगुणों को परावर्तित करते हैं। मसलन, वस्तुओ के सुगंध जैसे अनुगुणो व गुणों का प्रत्येक व्यक्ति, व्यष्टिक ( individually ) और आत्मगत रूप से अनुभव करता है परंतु फिर भी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को सामान्यतः यह एक जैसे ही संवेदित होते हैं। स्पष्ट है कि यह आत्मगत बिंब वस्तुओं की वस्तुगत प्रकृति के अनुरूप होता है। मसलन, किसी खाद्य की सुगंध उसके एक वस्तुगत अनुगुण को परावर्तित करती है।

अतः संवेदन वस्तुगत रूप से विद्यमान यथार्थता का सही परावर्तन होते हैं, वे हमें बाह्य जगत की चीज़ों और घटनाओं के बारे में सही सूचना देते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - ३
( practice - basis and criterion of cognition - 3 )

ज्ञात है कि परिवेशी विश्व की परिवर्तनशीलता और गतिशीलता विषयक कथन ( statement ) को पराकाष्ठा ( climax ) पर पहुंचानेवाले कुछ दार्शनिकों ने निष्कर्ष निकाला था कि विश्व का संज्ञान कर पाना असंभव है, क्योंकि, इन दार्शनिकों के अनुसार, हम वस्तुओं के गुणों को अभी पहचान ही रहे होंगे कि तब तक उनमें न जाने कितना परिवर्तन आ जायेगा। फिर भी व्यावहारिक कार्यकलाप ही जिसके दौरान दसियों, सैंकड़ो बार दोहरायी गयी क्रियाओं का न्यूनाधिक समान नतीजा निकलता है, विश्व के संज्ञान की संभावना के बारे में प्रत्ययवादियों/अज्ञेयवादियों ( idealistic/agnostics ) के दृष्टिकोण का सबसे कारगर खंडन करता है।

उदाहरण के लिए, सैकड़ों कृत्रिम उपग्रहों का पृथ्वी की कक्षा में पूर्वनिर्धारित प्रक्षेप-पथ पर उड़ना और कृत्रिम अंतरिक्षीय प्रयोगशालाओं का चन्द्र धरातल पर निश्चित स्थान पर उतरना और इसी क्रिया को बार-बार दोहराया जाना पूर्णतः सिद्ध कर देता है कि व्यवहार - चाहे वह उत्पादन संबंधी कार्यकलाप हो या कोई वैज्ञानिक प्रयोग - परिवेशी परिघटनाओं के स्थायी, आवृत्तिशील लक्षणों तथा गुणों का पता लगाने और उनके बारे में विश्वसनीय और सच्ची जानकारी पाने में मदद करता है।

इस तरह उपरोक्त तथ्यों से हम ये तीन निष्कर्ष निकाल सकते हैं : १) व्यवहार संज्ञान का यथार्थ आधार और साथ ही इसकी कसौटी है कि किसी परिघटना का हमारा ज्ञान कितना गहन और विश्वसनीय है ; २) व्यवहार में इतनी गतिशीलता, अनिश्चितता और परिवर्तनीयता है कि वह हमारे संज्ञान को जड़, स्थिर नहीं होने देता, वह संज्ञान के विकास का मूलभूत कारक है ; ३) व्यवहार में इतनी सुनिश्चितता है कि हम सही और ग़लत जानकारियों, भौतिकवादी तथा प्रत्ययवादी उपागमों के बीच भेद और संज्ञान के भौतिकवादी सिद्धांत की सत्यता की पुष्टि कर सकते हैं।

व्यवहार और सिद्धांत ( theory ), दोनों ही विकसित होते रहते हैं और उनके विकास में निर्णायक भूमिका, व्यवहार की होती है। सिद्धांत और व्यवहार संज्ञान के दो अविभाज्य पहलू ( indivisible aspect ) हैं। वे एक दूसरे को समृद्ध ( enriched ) बनाते हैं, जैसे कि विज्ञान और उत्पादन की एकता में देखा जा सकता है। सिद्धांत और व्यवहार को उनके एकत्व ( unity ) में देखना चाहिए, क्योंकि सिद्धांत, सामाजिक-ऐतिहासिक व्यवहार से मात्र समृद्धतर ही नहीं होता, बल्कि यह ख़ुद भी एक सबल रूपांतरणकारी शक्ति है, जो विश्व के क्रांतिकारी रूपांतरण ( revolutionary transformation ) के लिए, युगों पुराने पिछड़ेपन ( backwardness ) को मिटाने और नये जीवन का निर्माण करने के तरीक़े सुझाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - २
( practice - basis and criterion of cognition - 2 )

मनुष्य का कार्यकलाप ( activity ) दो प्रकार का होता है, जिनके बीच आपस में घनिष्ठ संबंध है - वस्तुपरक ( objective ) कार्यकलाप और आत्मपरक ( subjective ) कार्यकलाप। वस्तुपरक कार्यकलाप समस्त सामाजिक तथा उत्पादन संबंधी व्यवहार को कहते हैं, क्योंकि वह उन नियमों के आधार पर संपन्न किया जाता है, जो आत्मपरक इरादों ( intentions ) या लोगों की इच्छा पर निर्भर नहीं होते। मिसाल के लिए, हथौड़े से पानी को नहीं गढ़ा जा सकता है या स्पंज के टुकड़े से कील नहीं ठोकी जा सकती है। इसी तरह निजी स्वामित्व ( private ownership ) पर आधारित समाज में वर्ग संघर्ष को भी ख़त्म नहीं किया जा सकता है। अपने उत्पादन कार्यकलाप में मनुष्य प्रकृति के साथ अन्योन्यक्रिया ( mutual interaction ) करते हुए सबसे पहले उन वस्तुओं और औज़ारों के वस्तुगत गुणों पर आश्रित होता है, जिनसे उसे काम पड़ता है। निस्संदेह, वह सचेतन ढंग से अपने सामने कोई लक्ष्य रखता है, अपनी हरकतों और कामों के महत्त्व को जानता है, परंतु मुख्य और निर्णायक भूमिका उन परिस्थितियों और नियमों की ही होती है, जिनसे ये हरकतें और काम, इच्छा और चेतना के बावजूद, निदेशित ( directed ) होते हैं।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के प्रवर्तकों ने बल देते हुए कहा था कि लोगों का आत्मपरक ( subjective ), यानी संज्ञानकारी कार्यकलाप ( cognitive activity ) आरंभ में उनके वस्तुपरक ( objective ), वस्तुओं और औज़ारों से संबंधित व्यावहारिक कार्यकलाप से गुंथा हुआ था। विकास के काफ़ी परवर्ती चरण ( later stage ) में ही वह उससे अलग हुआ। जंगली मनुष्य और बच्चे की विचारशक्ति की तुलना करने पर हम पायेंगे कि चिन्तन के सामान्यतम रूप, प्रेक्षण की योग्यता और वस्तुओं की समानता या अंतर को पहचानने की क्षमता, वस्तुओं के प्रत्यक्ष इस्तेमाल ( direct use ) के आधार पर ही पैदा होते हैं। किंतु यह नहीं सोचना चाहिए कि व्यवहार ( practice ) का सहारा लेने मात्र से संज्ञान ( cognition ) से संबंधित जटिल समस्याएं पूरी तरह हल हो जायेंगी।

विज्ञान तथा दैनंदिन जीवन में पैदा होनेवाले बहुत ही विविध प्रश्नों का पूर्ण और अंतिम उत्तर खोजने का प्रयास संज्ञान के प्रति तत्वमीमांसीय उपागम ( approach ) की एक मूल विशेषता है। ऐसे बहुत से उत्तर हमें निर्विवाद प्रतीत हो सकते हैं और दैनंदिन, सीमित कार्यकलाप की कसौटी पर खरे भी उतर सकते हैं। किंतु जैसा कि कहा भी गया है, "मनुष्य की सामान्य बुद्धि ( common sense ), जो घर की चहारदीवारी में बहुत ही सम्माननीय साथी होती है, ज्यों ही अनुसंधान ( research ) की व्यापक दुनिया में क़दम रखने का साहस करती है, उसे बहुत ही तरह-तरह के अप्रत्याशित अनुभवों ( unexpected experiences ) से गुज़रना पड़ता है।"

हमारे संज्ञान के परिवर्तन का स्वरूप भी व्यवहार के रूपों की विशेषताओं पर निर्भर होता है। जहां ये रूप अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं और किन्हीं क्रियाओं में दशकों या सदियों तक दोहराये जाने की प्रवृत्ति पायी जाती है, वहां उनके आधार पर पैदा होनेवाला ज्ञान भी उसी तरह स्थायी और अपरिवर्तनीय सा प्रतीत होता है। मगर व्यावहारिक कार्यकलाप ( practical activity ) में गंभीर परिवर्तन आये नहीं कि लोगों के उससे संबंधित ज्ञान को बदलते भी देर न लगेगी। सच तो यह है कि व्यवहार बहुत ही बहुविध होता है, उसमें अनिश्चितता ( uncertainty ) का पुट होता है और इतने तरह-तरह के गुण, लक्षण और व्यक्तिगत विशेषताएं पायी जाती हैं कि हम लाख कोशिश करने पर भी उन सबका ज्ञान सदा के लिए हासिल नहीं कर सकते। व्यवहार की यह अनिश्चितता, परिवर्तनशीलता और गतिशीलता ही संज्ञान का एक सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। व्यवहार इतना अनिश्चित है कि वह हमारे ज्ञान को स्थिर होने या रुकने नहीं देता। तो क्या ऐसी स्थिति में वह ज्ञान की कसौटी ( criterion ) बन सकता है?



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार को समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - १
( practice - basis and criterion of cognition - 1 )

दर्शन में ‘व्यवहार’ ( practice ) संप्रत्यय का विशेष अर्थ है। मनुष्य के प्रकृति और समाज का रूपांतरण ( transformation ) करने वाले सोद्देश्य ( purposive ) सामाजिक क्रियाकलाप ही व्यवहार हैं। इसमें निम्नांकित चीज़ें शामिल हैं : पहली, भौतिक उत्पादन की प्रक्रिया ; दूसरी, वर्गों की, अवाम की सामाजिक-राजनीतिक, रूपांतरणात्मक क्रियाएं और तीसरी, वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रयोग। व्यावहारिक सामाजिक क्रियाकलाप ही संज्ञान के प्रमुख, सारभूत आधार ( basis ) हैं। बाह्य जगत के साथ व्यावहारिक अंतर्क्रिया ( practical interaction ) के दौरान ही सच्चा वैज्ञानिक संज्ञान संभव है और व्यावहारिक आवश्यकताएं, जीवन की जरूरतें ही संज्ञान, विज्ञान के विकास को प्रणोदित ( propelled ) करती हैं। साथ ही, व्यवहार ही हमारे ज्ञान की सत्यता की कसौटी ( criterion ) भी है। व्यवहार विभिन्न संकल्पनाओं और सिद्धांतों को परखने ( testing ), उनकी सत्यता या मिथ्यापन को साबित करने ( proving ), ज्ञान को परिभाषित तथा प्रणालीबद्ध ( define and systematize ) करने का काम करता है।

जीवन में मनुष्य का प्रकृति, समाज या स्वयं मानव चिंतन की बहुत ही विविध परिघटनाओं ( phenomenon ) से साक्षात्कार होता है। आधुनिक समाज का ही उदाहरण लें। उसकी जटिल परिस्थितियों में ठीक दिशा ढूंढ़ने और काम करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति को सामाजिक विकास के नियमों का ज्ञान हो। यह स्पष्ट है कि सामाजिक संरचनाओं ( social structures ) के कार्य और परिवर्तन, वर्ग संघर्ष ( class struggle ) के नियमों और संस्कृति के विकास के नियमों के अध्ययन में, उन श्रम औज़ारों और यंत्रों का प्रयोग नहीं किया जा सकता, जो प्रकृति की वस्तुओं के रूपांतरण एवं अध्ययन में प्रयुक्त होते हैं। तब तो यह कहा जा सकता है कि वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप सभी मामलों में संज्ञान का आधार और कसौटी नहीं बन सकता।

लेकिन हमें निष्कर्ष ( conclusion ) निकालने में इतनी उतावली दिखाने की कोई जरूरत नहीं। बात यह है कि श्रम और सारा वस्तु-औज़ार कार्यकलाप अपने आप में सामाजिक परिघटनाएं हैं। उन्हें संपन्न करने के लिए आवश्यक है कि लोग एक दूसरे के संपर्क में आयें, आत्मसंगठन के इन या उन रूपों का पालन करें, सूचनाओं का विनिमय ( exchange ) करें और संचित ( accumulated ) अनुभवों को सुरक्षित रखें, संप्रेषित ( communicate ) करें और बढ़ायें। इसलिए ‘व्यवहार’ या अधिक व्यापक संदर्भ में, ‘सामाजिक तथा उत्पादन संबंधी व्यवहार’ को हमें उन प्रक्रियाओं और कार्यों की समष्टि ( totality ) के अर्थ में लेना होगा, जो मनुष्य के वस्तु-औज़ार कार्यकलाप के आधार पर पैदा होते हैं और इस कार्यकलाप के अस्तित्व ( existence ) तथा विकास ( development ) के लिए आवश्यक परिस्थितियां बनाते हैं।

इस दृष्टि से विरोधपूर्ण ( antagonistic ) समाज में वर्ग संघर्ष, सामाजिक तथा उत्पादन संबंधी व्यवहार का एक महत्त्वपूर्णतम तत्व होता है, क्योंकि वह उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) तथा उत्पादन संबंधों के विकास के आधार पर पैदा होता है और उसकी प्रगति ( progress ) तथा परिणाम पर सामाजिक उत्पादन की आगे प्रगति निर्भर होती है। वर्ग संघर्ष के दौरान विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं ( political ideologies ) ही प्रतिपादित नहीं की जातीं, उसके दौरान इसकी परीक्षा भी होती है कि ये विचारधाराएं इस या उस वर्ग के हितों को किस हद तक व्यक्त करती हैं, घोषित लक्ष्य सामाजिक विकास की आवश्यकताओं के कितने अनुकूल हैं और संघर्ष के जो रूप तथा साधन प्रस्तावित किये गये हैं, वे कितने कारगर ( effective ) हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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