शनिवार, 23 जुलाई 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर चर्चा  की थी, इस बार हम वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और समाज की संरचना के अंतर्गत उसके परिणामों पर बात शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उसके परिणाम - १
( scientific and technological progress and its consequences - 1 )

अब वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की सामान्य विशेषताओं व लक्षणॊं से परिचित होने के बाद हम पूछ सकते हैं कि क्या प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया ( interaction ), समसामयिक ( contemporary ) वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर निर्भर करती है और अगर ऐसा है, तो किस हद तक, और इसके परिणाम तथा नतीज़ों को सामाजिक-आर्थिक प्रणाली ( socio-economic system ) किस तरह निश्चित करती है?

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की वज़ह से उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) का तूफ़ानी विकास मनुष्य की शक्ति में बढ़ती कर रहा है। किंतु इस शक्ति का किस तरह से उपयोग हो रहा है? किसके लिए हो रहा है? मनुष्य की लगातार बढ़ती हुई शक्ति से कौन लाभ उठा रहा है? इस विचार-विमर्श को अधिक सारवान बनाने के लिए हमें इस प्रगति की मुख्य दशा-दिशाओं पर दृष्टिपात करना चाहिए।

(१) हम इसकी चर्चा कर चुके हैं कि किस तरह एक विशेष तकनीक, सूचना तकनीक, वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की समसामयिक अवस्था पर उत्पादन तथा प्रबंध के कार्यकलाप के उत्प्रेरक की निर्धारक भूमिका अदा करती है। अब मानवजाति ऐसे सुपर कंप्यूटर बनाने की क्षमता से संपन्न है जो दसियों अरब संक्रियाएं प्रति सेकंड कर सकते हैं और उनकी स्मृति दसियों लाखों पुस्तकों में विद्यमान सूचना के बराबर जानकारी का भंडारण करने में समर्थ है और उनका आकार भी निरंतर कमतर होता जा रहा है।

आज कृत्रिम मस्तिष्क की रचना करने का काम जारी है। कृत्रिम मस्तिष्क युक्त कंप्यूटर अत्यंत जटिल तार्किक युक्तियां ( logical arguments ) संपन्न करने में समर्थ होंगे और उनकी मदद से वैज्ञानिक अनुसंधान, मशीनों की डिज़ाइनिंग तथा उद्यमों तक की डिज़ाइनिंग करना संभव हो सकेगा। वे लचीली ( flexible ) तकनीकों का नियंत्रण करने में समर्थ होंगे। और शायद व्यक्तिगत कंप्यूटरों की मदद से आधुनिक घरेलू उत्पादन इकाइयां बनाना, श्रम की उत्पादकता में तीव्र बढ़ती करना और शिक्षण के स्वरूप को बदलना संभव हो सकेगा। बच्चों और वयस्कों को नयी सूचना को दसियों गुना अधिक तेज़ी से आत्मसात करने का अवसर मिल सकता है, केवल विशेषज्ञों को उपलब्ध ज्ञान करोड़ों लोगों के लिए सुलभ किया जा सकता है। लोगों की जीवन पद्धति और पारस्परिक संसर्ग बदल जायेंगे और भाषा की बाधाएं भंग हो जायेंगी। कोशिश की जा रही हैं कि कंप्यूटर वैज्ञानिक साहित्य और दस्तावेज़ों को एक भाषा से दूसरी में क़रीब-क़रीब मनुष्य की सहायता के बिना ही अनूदित कर लेंगे। मनुष्य की भाषा को समझने में तथा रंगों व त्रि-आयामी दृश्य को देखने में समर्थ नयी पीढ़ी के रोबोटों का विकास जारी है। इस सबके क्या परिणाम होंगे?

पूंजीवादी समाज में, यहां तक कि विकसित देशों में भी ऐसे लोगों की विशाल संख्या है जो वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के कारण उत्पादन क्रियाकलाप के बाहर कर दिये गये हैं। कुछः नये रोज़गार उत्पन्न होने के बावजूद रोबोटीकरण तथा कंप्यूटरीकरण के कारण बननेवाली बेरोज़गारों की फ़ौज लगातार बढ़ती जा रही है। इसकी वज़ह यह है कि पूंजीवादी उद्यम, सूचना तकनीक को मुख्यतः मुनाफ़े कमाने का तरीक़ा समझते हैं। फलतः इस तकनीक के फैलाव के नकारात्मक परिणाम स्वयं कंप्यूटरों तथा रोबोटों के अनुप्रयोग ( application ) नहीं, बल्कि उनके पूंजीवादी उपयोग के दुष्परिणाम हैं। अतएव ज़रूरत इस बात की है कि इस वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के लक्ष्य को सर्वथा भिन्न बनाया जाये। इसका उपयोग मुनाफ़ा कमाने के अधीन नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के हित में नियोजित ( planned ) किया जाये। समाजवादी ढांचे के अंतर्गत नयी तकनीकों के विकास की योजनाएं इस तरह से बनायी जायें कि सारी श्रम समर्थ आबादी सामाजिक दृष्टि से उपयोगी काम करती रहे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 16 जुलाई 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उस चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - २
( what is scientific and technological progress - 2 )

किंतु आधुनिक अर्थ में तकनीक पद कोई भिन्न चीज़ है। इसकी विशिष्टता क्या है? बात यह है कि पिछले कुछ दशकों में हमें उन सब संसाधनों की सीमित प्रकृति का बोध हो गया है, जिन्हें मनुष्य अब तक इस्तेमाल करता रहा। प्राकृतिक, तकनीकी, ऊर्जा, खाद्य, भूमि के, मानवीय तथा वित्तीय संसाधन अत्यधिक, असंयमित उपयोग से समाप्त या नष्ट हो सकते हैं। इसके साथ ही विराट परिमाण में ऊर्जा तथा कच्चे माल व शक्तिशाली मशीनों का उपयोग करनेवाली नयी, शक्तिशाली उत्पादन प्रणालियों का विकास शुरू हो गया है। उत्पादन के ये सभी नये रूप मनुष्य की ज़रूरत के उपयोगी उत्पाद बनाने के साथ ही काफ़ी ज़्यादा अवांछित ( undesirable ) और हानिकारक फल भी उत्पन्न करते हैं। 

उदाहरण के लिए, परमाणविक बिजलीघरों का निर्माण जहां बड़े पैमाने पर सस्ती बिजली हासिल करना, तेल व कोयले की बचत करना संभव बनाता है, वहां इससे रेडियो सक्रिय अपशिष्ट ( waste ) भी बनते हैं और मनुष्य तथा प्रकृति दोनों के लिए ख़तरनाक रेडियो सक्रियता बढ़ जाती है। बड़े रासायनिक कारख़ाने मानव जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए मूल्यवान सामग्री व अन्य चीज़ों का उत्पादन करते हैं, लेकिन उनसे उत्पन्न होनेवाले अपशिष्टों को विशाल इलाक़ों में जमा कर दिया जाता है या नदियों में डाल दिया जाता है, उनसे ज़मीन और पानी दूषित हो जाते हैं जिससे मनुष्यों और जानवरों के लिए भारी ख़तरा पैदा हो जाता है।  इन सारे तथा अन्य अवांछित परिणामों से बचने के लिए, अपशिष्ट रहित उद्योग का निर्माण करने और स्वयं औद्योगिक अपशिष्टों को पुनर्प्रयोज्य ( re-usable ) सामग्री में रूपांतरित करने तथा नये उत्पादन चक्रों में इस्तेमाल करने के लिए हमारे लिए ज़रूरी है कि तकनीक को ही बदला जाये। अतः अब लोग महज़ नयी मशीनों और उपकरणों के बजाय नयी तकनीक की बातें करते हैं।

नई तकनीकों का विकास हर प्रकार के प्राकृतिक तथा सामाजिक संसाधनों के अधिकतम किफ़ायती ( economic ) उपयोग के ज़रिये समाज और उत्पादन के बीच सामंजस्यपूर्ण संबंधों की स्थापना में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इन तकनीकों में सबसे महत्वपूर्ण सूचना तकनीक ( information technology ) है जो अन्य सब पर निर्धारक प्रभाव डाल रही है। इसमें शामिल हैं प्रति सेकंड खरबों संक्रियाएं ( operations ) करने में समर्थ तथा विराट स्मृति ( memory ) से संपन्न आधुनिक कंप्यूटरों का डिज़ाइन बनाना तथा निर्माण करना, ऐसे माइक्रोप्रोसेसर बनाना जो कंप्यूटरों को संहत ( compact ) बनाते हैं, हर प्रकार के कार्यक्रम लिखना और ऐसी विशेष कार्यक्रमीय भाषाओं ( programming languages ) का विकास, जो सूचना के भंडारण, प्रोसेसिंग, पुनर्प्राप्ति ( retrieval ) तथा निबटान ( disposal ) से संबंधित अत्यंत जटिल समस्याओं के समाधान को सुविधापूर्ण बना देती है। इसकी वज़ह से सूचना तकनीक, वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की एक नयी तकनीकी अवस्था का मूलाधार और उत्प्रेरक बनती जा रही है और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए एक शक्तिशाली क्रांतिकारी कारक ( factor ) में तब्दील होती जा रही है। 

इसका महत्व लगातार बढ़ रहा हैं, क्योंकि यह संसाधनों का एक ही ऐसा प्रकार है, जिसे मानवजाति अपने ऐतिहासिक विकास के दौरान ख़र्च नहीं करती, बल्कि इसके विपरीत उसे संवर्द्धित करती और बढ़ाती रहती है। यही नहीं, वैज्ञानिक सूचना के परिमाण की, प्रकृतिवैज्ञानिक, तकनीकी तथा मानवीय ज्ञान के सारे प्रकारों सहित वृद्धि, उन सारे ख़तरों को मिटाने की बुनियाद डाल रही है जिनका जिक्र निराशावादी और आशावादी के संवाद में किया गया है। एक ऐसी संभावना भी प्रकट हो रही है, जिससे उन संसाधनों को संरक्षित ही नहीं, बल्कि नवीकरण ( restoring ) तथा संवर्द्धित भी किया जा सकेगा, जिन्हें मनुष्यजाति ने अब तक इतने अविवेकपूर्ण ढंग से बर्बाद किया है। परंतु इस संभावना को व्यावहारतः कार्यान्वित करने के लिए कुछ विशेष दशाओं तथा निश्चित प्रकार के सामाजिक विकास की दरकार है

सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सभी प्रक्रियाओं की तरह वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति भी जटिल और अंतर्विरोधी ( contradictory ) है। सरल, असंदिग्ध समाधान ख़ुद-ब-ख़ुद हासिल नहीं होते। यह प्रगति, प्रकृति और समाज के बीच संबंधों में एक नयी अवस्था है। वैज्ञानिक-तकनीकी क्रांति की पृष्ठभूमि में श्रम प्रक्रिया, अधिकाधिक नयी प्राकृतिक संपदा, ऊर्जा साधनों, पृथ्वी के अविकसित भूक्षेत्रों, विश्व महासागरों और अंतरिक्ष से भी संबंधित होती है। इसलिए दो सर्वथा विरोधी संभावनाएं प्रकट हो रही हैं। इनमें से एक प्रकृति व समाज के बीच अधिकाधिक अंतर्विरोधों की तरफ़ ले जाती है; और दूसरी उनके बीच मूलतः नयी अंतर्क्रिया ( interaction ) की, उनके बीच अधिक सामंजस्यपूर्ण संबंधों तथा सर्वाधिक कठिन अंतर्विरोधों के उन्मूलन ( elimination ) की ओर ले जाती है। इनमें से कौनसी संभावना ऊपर उभरेगी तथा वास्तविकता बनेगी - यह प्रश्न भूमंडलीय पैमाने पर समाज के आमूल सामाजिक रूपांतरणों ( radical social transformations ) पर निर्भर है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 9 जुलाई 2016

वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल पर चर्चा की थी, इस बार से हम वर्तमान वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज के संबंधो को समझने की कोशिश शुरू करेंगे और इसी क्रम में आज देखेंगे कि वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति से क्या तात्पर्य है

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के युग में प्रकृति और समाज
वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति क्या है? - १
( what is scientific and technological progress - 1 )

आज भौतिक संपदा का उत्पादन तथा सेवा क्षेत्र इतनी तेज़ी से विकसित हो रहे हैं कि उत्पादित वस्तुओं की क़िस्में तथा उन्हें बनाने की तकनीक और लोगों की उत्पादन कुशलताएं एक ही पीढ़ी में तीव्रता से बदल जाती है। पूर्ववर्ती अवस्थाओं में से अनेक में स्थिति नितांत भिन्न थी। एक ही उत्पाद को तैयार करने के लिए एक ही तकनीक को कई पीढ़ियों तक इस्तेमाल किया जाता था और पीढ़ी-दर-पीढी काम के संगठन की एक ही विधि का उपयोग होता था। तकनीक में द्रुत ( rapid ) परिवर्तन के साथ होनेवाले उत्पादन के वर्तमान रूप को, वस्तुओं के उत्पादन के पारंपरिक रूप के विपरीत, अनवरत वैज्ञानिक-तकनीकी क्रांति कहा जा सकता है। इस अक्सर वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति भी कहा जाता है। इसके विशिष्ट लक्षण क्या हैं?

सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि उत्पादन में विज्ञान निर्णायक शक्ति और निर्धारक कारक है। पहले भी उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) की रचना करनेवाले लोगों का ज्ञान और अनुभव, औज़ारों को और उत्पादन क्रिया को परिष्कृत बनाने का एक महत्वपूर्ण प्रेरक हुआ करता था, किंतु ज्ञान और अनुभव स्वयं उत्पादन के स्वीकृत और स्थापित रूपों और विधियों के सामान्यीकरण ( generalization ) हुआ करते थे। उत्पादन की नयी खोजें तथा अविष्कार विरल घटनाएं थीं। यहां तक कि जब आधुनिक विज्ञान का उद्‍भव होना शुरू हुआ, तो भौतिक उत्पादन - उद्योग और कृषि - की निर्णायक भूमिका थी।

विज्ञान मुख्य रूप से व्यवहार की मांगों तथा अपेक्षाओं का जवाब देने का प्रयत्न करता था, किंतु यह काम हमेशा पूरा नहीं कर पाता था क्योंकि विज्ञान के विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में ज्ञान का संचय और परिष्करण बेहद मंद गति से होता था। २०वीं सदी के मध्य में इस स्थिति में आमूल परिवर्तन हो गया। ज्ञान के परिमाण में विराट बढ़ती हुई और यह बढ़ती तूफ़ानी वेग से जारी है। साठोत्तरी दशक के अंत और सत्तरोत्तरी दशक के प्रारंभ में वैज्ञानिक ज्ञान का परिमाण प्रति पांच-सात वर्षों में दो गुना होने लगा। अब यह लगभग हर साल दो गुना होता जाता है। इसकी वज़ह से स्वयं विज्ञान, उत्पादन का एक बहुत महत्वपूर्ण प्रेरक बल बन गया है। यह वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति का पहला विशिष्ट लक्षण है।

दूसरा विशिष्ट लक्षण यह है कि प्रकृति के गहनतम रहस्यों की खोज पर आधारित बुनियादी अन्वेषण ( research ) की भूमिका लगातार बढ़ रही है। नये प्रकार के उत्पाद व तकनीक, सतर्कतापूर्ण वैज्ञानिक प्रमाणन ( substantiation ) की मांग करते हैं और विज्ञान के सर्वाधिक जटिल बुनियादी नियमों पर आधारित हैं। मसलन, परमाणु ऊर्जा के उपयोग, जीन इंजीनियरी, कृत्रिम भूउपग्रहों, मूलतः नयी सामग्रियों, आदि की याद कीजिये। इनमें से किसी को भी मात्र पूर्ववर्ती अनुभव के आधार पर नहीं रचा जा सकता था, उनके लिए बुनियादी वैज्ञानिक ज्ञान की ज़रूरत थी।

तीसरा लक्षण यह है कि किसी वैज्ञानिक खोज या अविष्कार के होने तथा उद्योग में उसका उपयोग करने के बीच का समयांतराल घटता जा रहा है। जहां पहले नये वैज्ञानिक-तकनीकी विचारों के फैलाव तथा कार्यान्वयन में दसियों वर्ष नहीं, सदियों तक लग जाती थी, वहां अब यह अंतराल चंद वर्षों और यहां तक कि चंद महिनों में नापा जाता है।

अंतिम और चौथा विशिष्ट लक्षण पिछले कुछ वर्षों में वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की एक नयी अवस्था में संक्रमण ( transition ) से संबद्ध है। पारंपरिक उत्पादन में तकनीक क्या है? उत्पादन की किसी भे प्रक्रिया में केवल औज़ार, मशीनें, यांत्रिक विधियां ही आवश्यक नहीं हैं, बल्कि कार्य प्रक्रिया को सही ढंग से संगठित ( organize ) करना भी ज़रूरी है। इसके लिए यह निर्धारित करने में समर्थ होना महत्वपूर्ण है कि ठीक कौनसी संक्रिया ( operation ) कब संपन्न की जाये तथा किस क्रम में की जाये और विभिन्न संक्रियाएं किस रफ़्तार से की जानी चाहिए तथा अमुक-अमुक उत्पाद के विनिर्माण ( manufacturing ) में विभिन्न उपकरणों, यंत्रों और मध्यवर्ती अवस्थाओं द्वारा क्या अपेक्षाएं पूरी की जानी चाहिए। समुचित ज्ञान सहित इन सबको समग्र रूप में तकनीक कहा जाता है



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 25 जून 2016

मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - २

( the artificial habitat - 2 )

यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि कृत्रिम निवास स्थल का विकास और परिष्करण ( perfection ), सामाजिक संबंधों तथा समाज के संगठन के विकास तथा परिष्करण के साथ घनिष्ठता से जुड़ा है। जब समाज निजी स्वामित्व ( private property ) पर आधारित होता है और उसका कोई एकल लक्ष्य ( single aim ) नहीं होता, प्रतिरोधी अंतर्विरोधों ( antagonistic contradictions ) के कारण छिन्न-भिन्न हुआ रहता है और इसीलिए नियोजित ढंग ( planned way ) से विकसित नहीं हो सकता है, तब कृत्रिम निवास स्थल के निर्माण से प्राकृतिक पर्यावरण अनिवार्यतः अस्तव्यस्त हो जाता है क्योंकि इन हालतों में कृत्रिम निवास स्थल का निर्माण, मुनाफ़ों की होड़ के चलते परिवेशीय प्रकृति के निर्मम विनाश और शोषण के ज़रिये होता है।

परंतु यदि हम सामाजिक प्रणाली ( social system ) को प्रत्येक व्यक्ति तथा सारे समाज के हितों के अनुरूप और चहुंमुखी विकास के लिए अनुकूल दशाओं की व्यवस्था करने के अंतिम उद्देश्य के अनुसार संगठित करने की कोशिश करेंगे तभी यह संभव हो सकता है कि कृत्रिम निवास स्थल को भी इसी लक्ष्य के अनुसार निर्मित, विकसित, व्यवस्थित और रूपांतरित ( transform ) किया जा सकेगा। ऐसा विकास, प्राकृतिक निवास स्थल के रख-रखाव, संरक्षण और सुधार की अपेक्षा रखता है, क्योंकि उसके बिना मानव का चौतरफ़ा और सांमजस्यपूर्ण ( harmonious ) विकास असंभव है।

अतएव मनुष्य के प्राकृतिक व कृत्रिम निवास स्थल के बीच अंतर्विरोधों में व्यक्त, समाज और प्रकृति के बीच के अंतर्विरोधों पर क़ाबू पाना तथा उनका समाधान किया जाना, स्वयं समाज के आमूल, क्रांतिकारी रूपांतरण के साथ जुड़ा हुआ है। कृत्रिम निवास स्थल का चहुंमुखी विकास और व्यक्ति तथा मानवजाति के विकासार्थ उसका सर्वाधिक अनुकूल दशाओं की प्रणाली में परिवर्तन, प्रबल वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की मांग तथा आह्वान करता है।

आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक तथा अन्य समस्याओं के समाधान के तरीक़े विशेष प्राकृतिक, तकनीकी तथा सामाजिक विज्ञानों का काम हैं। इसका दार्शनिक पहलू इस समझ में निहित है कि प्रकृति और समाज के बीच और कृत्रिम व प्राकृतिक निवास स्थलों के बीच अंतर्विरोधों पर क़ाबू पाना और उनके मध्य सामंजस्य की स्थापना करना केवल तभी संभव है, जबकि निम्नांकित तीन वस्तुगत शर्तों को पूरा किया जाये : (१) समाज के विकास की प्रक्रिया का सचेत ( conscious ), नियोजित, सबके हित में नेतृत्व और प्रबंध करना; (२) सामाजिक प्रणाली में ऐसा आमूल ( radical ) परिवर्तन करना कि व्यक्तियों, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय इजारेदारियों ( monopolies ) के निजी हित, मनुष्य की विशाल जनसंख्या के हितों का दमन ना कर सकें; और (३) वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विस्तार तथा गहनीकरण ( deepening ) को हर तरह का संभव प्रोत्साहन देना क्योंकि इतिहास के स्वतःस्फूर्त ( spontaneous ) क्रम की पूर्ववर्ती अवस्थाओं में उत्पन्न कठिनाइयों को इसी आधार पर दूर किया जा सकता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 18 जून 2016

मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में आबादी की भूमिका पर चर्चा की थी, इस बार हम मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल को और गहराई से समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - १
( the artificial habitat - 1 )

हम पिछली प्रविष्टियों में यह भली-भांति देख चुके हैं कि प्राकृतिक निवास स्थल, प्रकृति के नियम ( जैविक नियमों सहित ) समाज पर सीधा प्रभाव नहीं डालते, बल्कि उत्पादन पद्धति ( mode of production) तथा उसके आधार पर उत्पन्न सामाजिक संबंधों के ज़रिये अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। भौतिक उत्पादन के विकास के साथ-साथ मनुष्य अपने आसपास की प्रकृति में फेर-बदल करता जाता है और एक कृत्रिम निवास स्थल की रचना करता है, जो उसके अपने जीवन के क्रियाकलाप का ही उत्पाद ( product ) होता है।

कृत्रिम निवास स्थल में केवल मनुष्य द्वारा निर्मित अजैव तथा प्रकृति में नहीं पायी जानेवाली वस्तुएं ही नहीं, बल्कि जीवित अंगी ( living organism ) - कृत्रिम वरण ( selection ) या जीन इंजीनियरी से मनुष्य द्वारा प्रजनित या रचित पौधे तथा जानवर - भी शामिल होते हैं। किंतु कृत्रिम निवास स्थल को केवल इस भौतिक आधार तक ही सीमित नहीं किया जा सकता है। मनुष्य केवल कुछ निश्चित सामाजिक संबंधों की प्रणाली ( system ) में ही रह और काम कर सकता है। ये सामाजिक संबंध, निश्चित भौतिक दशाओं में, मनुष्य द्वारा कृत्रिम रूप से निर्मित परिस्थितियों सहित प्रकट होते हैं और दोनों मिलकर मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल बनाते हैं।

समाज के विकास के साथ ही कृत्रिम निवास स्थल की भूमिका लगातार बढ़ती जाती है और मनुष्य के जीवन में उसका महत्व निरंतर बढ़ता है। इस बात पर विश्वास दिलाने के लिए हम निम्नांकित तथ्य पर विचार कर सकते हैं। मानव निर्मित सारी अजैव चीज़ों तथा सजीव अंगियों के द्रव्यमान को तकनीकी द्रव्यमान ( technomass ) कहा जाता है जबकि प्राकृतिक दशाओं के अंतर्गत विद्यमान सारे जीवित अंगियों को जैव द्रव्यमान ( biomass ) कहते हैं। कुछ दशकों पहले अनुमान लगाया गया था कि मनुष्य द्वारा एक वर्ष में निर्मित तकनीकी द्रव्यमान क़रीब १०१३- १०१४ टन के और थल पर उत्पन्न जैव द्रव्यमान क़रीब १०१२ टन के बराबर होता है। इससे यह निष्कर्ष निकला कि मनुष्यजाति एक ऐसा कृत्रिम निवास स्थल बना चुकी है, जो प्राकृतिक निवास स्थल की तुलना में दसियों या सैकड़ों गुना अधिक उत्पादक है

बेशक इसका यह अर्थ नहीं है कि अब लोग प्रकृति और प्राकृतिक निवास स्थल के बिना ही काम चला सकते हैं। प्रकृति हमेशा मनुष्य समाज के अस्तित्व की पूर्वशर्त ( precondition ) व आधार ( foundation ) बनी रहेगी। स्वयं कृत्रिम निवास स्थल केवल तभी अस्तित्वमान और विकसित हो सकता है, जब प्राकृतिक पर्यावरण मौजूद हो। किंतु आज मानवजाति की भौतिक और आत्मिक जरूरतों के एक काफ़ी बड़े अंश की पूर्ति कृत्रिम निवास स्थल से होती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 11 जून 2016

समाज के विकास में आबादी की भूमिका - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में आबादी की भूमिका पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



समाज के विकास में आबादी की भूमिका - २
( the role of population in the development of society - 2 )

उत्पादन पद्धति तथा उसके संनियमन ( governing ) के प्रतिमान ( pattern ) ही आबादी की वृद्धि के प्रतिमानों तथा उसकी संरचना पर निर्धारक प्रभाव क्यों डालते हैं? ऐतिहासिक भौतिकवाद इस प्रश्न का उत्तर भी देता है। मुद्दा यह है कि मनुष्य मुख्य उत्पादक शक्ति है और सारे ऐतिहासिक युगों में आबादी की बहुसंख्या उत्पादक कार्य करती रही है। इसलिए सामाजिक क्रियाकलाप के सारे रूप, उत्पादक क्रियाकलाप के तदनुरूप बने, जिसके दौरान ख़ुद मानवजाति के अस्तित्व की भौतिक दशाओं का निर्माण व विकास हुआ। इसीकी वज़ह से उत्पादन क्रियाकलाप के प्रतिमान अंततः मानव क्रियाकलाप के अन्य सारे रूपों के संदर्भ में निर्धारक ( determinant ) होते हैं। आधुनिक समाज में इस बात का भी स्पष्टतः पता लगाया जा सकता है कि जनसंख्या के विकास तथा उसकी वृद्धि में उत्पादन पद्धति और इसके द्वारा निर्धारित उत्पादन संबंधों की भूमिका निर्णायक है।

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, यह विश्वास किया जाता है कि खेती के उपकरणों तथा कृषि विज्ञान की वर्तमान स्थिति में खेती की मौजूदा ज़मीनों पर दस अरब से भी अधिक लोगों को भरपेट खिलाने के लिए पर्याप्त खाद्य पैदा किया जा सकता है। यह तथ्य कि विश्व की आबादी इसकी आधी के बराबर है और कई पूंजीवादी तथा विकासमान देशों में सैकड़ों लाखों भुखमरी से पीड़ित हैं या भुखमरी के कगार पर हैं, इस बात का परिणाम है कि पूंजीवादी समाज में अत्यंत विकसित उत्पादक शक्तियों को पूरी तरह से काम में नहीं लगाया जा रहा है। इसकी वजह निजी स्वामित्व ( private property ) की प्रमुखता तथा उसके तदनुरूप ही विकसित सामाजिक प्रणाली में निहित है।

यही नहीं, ‘अतिरिक्त’ ( surplus ) आबादी, जनसंख्या की अत्यंत द्रुत वृद्धि ( rapid growth ) का परिणाम नहीं, बल्कि समाज के एक विशेष रूप का फल है। मालूम है कि सभी प्रमुख पूंजीवादी देशों में बेरोजगारों की एक भारी फ़ौज हमेशा विद्यमान रहती है। यह साबित किया जा चुका है कि बेरोजगारी मनुष्य की संतानोपत्ति के जैविक ( biological ) नियमों के कारण नहीं, बल्कि मुनाफ़ा ( profit ) आधारित पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के विशेष लक्षणों के कारण है। समाज के समाजवादी पुनर्निर्माण के जरिए आबादी वृद्धि को सामाजिक न्याय तथा मानववाद के जनवादी उसूलों के आधार पर संपूर्ण समाज की खुशहाली के लिए संनियमित किया जा सकता है, उसे प्रोत्साहित तथा नियंत्रित भी किया जा सकता है।

साथ ही साथ हमें इस द्वंद्व ( dialectics ) को भी समझ लेना चाहिए कि अत्यधिक आबादी की वृद्धि उत्पादन को धीमा कर सकती है और बड़ी सामाजिक कठिनाइयां पैदा कर सकती है। और दूसरी तरफ़, आबादी में बहुत कम बढ़ती और काम करने वाले हाथों की तंगी, उत्पादक शक्तियों के विकास पर नकारात्मक असर डाल सकती है। इसलिए आज की दशाओं में इस प्रक्रिया के वैज्ञानिक प्रबंध की वस्तुगत ( objective ) आवश्यकता पैदा हो रही है। अभी तक जनसंख्या वृद्धि, सामाजिक उत्पादन और सामाजिक विकास के आम नियमों के आधार पर ही सही पर अचेतन रूप से होती रही है। अब आबादी की वृद्धि के सचेत नियंत्रण की दशाएं और वस्तुगत आवश्यकता पैदा होने लगी है।

यह जन्मदर का जबरिया, अनिवार्य माल्थसवादी परिसीमन ( limitation ) का मामला नहीं, बल्कि कई सुविचारित उपायों ( measures ) का मामला है, जिनके ज़रिये देश के कुछ इलाकों में आबादी बढ़ेगी तथा कुछ अन्य अन्य में रफ़्तार घट जायेगी। इस प्रकार का नियंत्रण मुख्यतः मानवजाति की बहुत बड़ी संख्या की संस्कृति तथा चेतना ( consciousness ) के ऊंचे स्तर पर आधारित होगा। ऐसा केवल उन्हीं सामाजिक-राजनैतिक दशाओं में ही संभव है, जहां सारे श्रम संसाधनों ( labour resources ) का निजी हितों के लिए नहीं, वरन् सारे समाज के हित में नियोजित ( planned ) उपयोग करने की संभावनाएं मूर्त रूप लेंगी।

फलतः इस प्रश्न, कि मौजूदा जनसंख्या विस्फोट प्रकृति और समाज को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है और इसके ख़तरनाक परिणामों से कैसे बचा जा सकता है, का उत्तर जैविक नहीं, बल्कि समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) के सामाजिक नियमों में खोजा जाना चाहिए।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 4 जून 2016

समाज के विकास में आबादी की भूमिका - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के विकास में आबादी की भूमिका को समझने की शुरुआत करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



समाज के विकास में आबादी की भूमिका - १
( the role of population in the development of society - 1 )

पश्चिमी अध्येता सामाजिक विकास में सामाजिक नियमों की नहीं, जैविक ( biological ) नियमों की निर्णायकता को सिद्ध करने की कोशिश में आबादी की वृद्धि ( growth ) द्वारा अदा की जानेवाली विशेष भूमिका का नियमतः हवाला देते हैं। वे दावा करते हैं कि समाज की अवस्था, आबादी की वृद्धि पर निर्भर होती है और अपनी बारी में वृद्धि, पुनरुत्पादन ( reproduction ) के जैविक नियमों से निर्धारित होती है, अतः समाज की जीवन क्रिया तथा विकास, जैविक नियमों से संचालित होते हैं। क्या यह सच है? यह मुद्दा ठोस ऐतिहासिक विश्लेषण ( analysis ) की अपेक्षा करता है।

समाज के मामलों में आबादी तथा आबादी की वृद्धि की भूमिका को समझने के लिए हम कुछ तथ्यों पर विचार करेंगे। अब विश्व की आबादी छः अरब से अधिक हो गयी है और उसका तेजी से बढ़ना जारी है। यह वृद्धि कितनी तेज है, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए याद करें कि दस हजार साल पहले मानवजाति की संख्या लगभग ५० लाख थी, दो हजार वर्ष पूर्व करीब २० करोड़ थी, १६५० में कम से कम ५० करोड़, १९५० में लगभग ढाई अरब और १९८७ में पांच अरब। आबादी के हाल के वर्षों में देखी इस तीव्र वृद्धि दर को अक्सर ‘जनसंख्या विस्फोट’ कहा जाता है। पश्चिमी अध्येताओं की राय में, और आजकल उनकी यह राय सामान्य रूप से प्रचलन में आती जा रही है, इतने लोगों को आवश्यक वस्तुएं, आवास, वस्त्र, पीने का पानी और वायु मुहैया करने के लिए सारे के सारे प्राकृतिक संसाधन भी काफ़ी नहीं होंगे। अंततः मनुष्यजाति प्रकृति को नष्ट कर देगी और उसके फलस्वरूप स्वयं भी मर जायेगी। ये दलीले ( arguments ) नयी नहीं हैं।

अंग्रेजी अर्थशास्त्री टामस माल्थस ( १७६६-१८३४ ) ने १८वीं सदी के अंत में यह सिद्धांत पेश किया था कि दुनिया की आबादी बहुत तेजी से, ज्यामितिक श्रेढ़ी ( geometric progression ) में बढ़ रही है, जबकि खाद्य तथा अन्य वस्तुओं का उत्पादन अधिक मंद गति से, अंकगणितीय ( arithmetic ) श्रेढ़ी में बढ़ रहा है। उनके अनुयायियों का ख़्याल था कि युद्ध, महामारियां तथा आबादी का विनाश करनेवाली अन्य विपत्तियां आबादी की वृद्धि के नियमन ( regulation ) के आवश्यक साधन हैं। आज के नवमाल्थसवादी भी आबादी के नियंत्रण के लिए कमोबेश वैसे ही, परंतु किंचित छद्मरूप में बाध्यकारी उपाय सुझाते हैं और इस बात पर जोर देना जारी रखते हैं कि विश्व में हमेशा जनाधिक्य रहा है, ऐसे ‘अनावश्यक’ लोगों की अतिरिक्त ( surplus ) संख्या रही है, जो कि उनके कथनानुसार, सामाजिक विकास में बाधा डालते हैं और इसके बिना ही पर्याप्त प्राकृतिक संसाधनों ( resources ) को हड़प जाते हैं। क्या यह बात सच है?

पुरातत्वीय ( archaeological ) आधार सामग्री से पता चलता है कि मनुष्य के पुरखों और समाज की शुरुआती अवधि में, मानवों की संख्या में वृद्धि बहुत मंद थी। कठोर प्राकृतिक दशाओं तथा उत्पादक शक्तियों के निम्न स्तर की वजह से वह बढ़ नहीं पाती थी। जब-जब अधिक विकसित उत्पादन की तरफ़ पहुंचा जाता था, तब-तब जनसंख्या वृद्धि त्वरित ( accelerate ) हो जाती थी। मसलन, पत्थर के औज़ारों से धातु के औज़ारों में संक्रमण ( transition ) और आखेट ( hunting ) तथा खाना बटोरने के युग से पशुपालन व खेती में संक्रमण के साथ ही पृथ्वी पर मनुष्यों की आबादी में छंलागनुमा वृद्धि हुई। 

हालांकि भिन्न-भिन्न सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं ( socio-economic formation ) में उत्पादन शक्तियों के विकास स्तर और जनसंख्या वृद्धि की दर के बीच संबंध की हमेशा के लिए सटीकतः ( exactly ) स्थापना नहीं हुई है, फिर भी इतिहास की आधार सामग्री की मदद से विश्वसनीय ढंग से यह दर्शाना संभव हो जाता है की आबादी की वृद्धि अंततः उत्पादन के विकास पर निर्भर होती है। सामंतवादी उत्पादन पद्धति के लिए, जिसमें कि विकास सापेक्षतः मंद था, आबादी की वृद्धि भी नियमतः धीरे-धीरे होती थी। इसके विपरीत, मशीनी उत्पादन पर आधारित पूंजीवादी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) के द्रुत ( rapid ) विकास ने आबादी की वृद्धि को त्वरित कर दिया।

इस सिलसिले में यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि आबादी की वृद्धि में निर्णायक कारक ( determinant factor ) होने के बावजूद उत्पादन पद्धति उसका एकमात्र कारण नहीं है। आबादी की वृद्धि और संरचना ( structure ) केवल उत्पादक शक्तियों तथा उत्पादन संबंधों से ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि कई राष्ट्रीय परंपराओं, जनता की संस्कृति, विविध ऐतिहासिक घटनाओं, युद्धों आदि से भी होती है। इसके साथ-साथ जनसंख्या की वृद्धि दरें तथा इसकी संरचना, भौतिक उत्पादन की सारी प्रणाली पर एक उलट, प्रतिप्रभाव भी डालती है। कुछ मामलों में ये उत्पादन के विकास को बढ़ावा देती हैं, तो कुछ अन्य मामलों में उसके लिए बाधक भी हो जाती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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