शनिवार, 21 मई 2016

नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - २
( races and nations - 2 )

१९वीं सदी के उत्तरार्ध में और २०वीं सदी के प्रारंभ में, जब विश्व की उपनिवेशी प्रणाली ( colonial system ) तथा दुनिया में पुनर्विभाजन ( redivide ) के लिए साम्राज्यवादियों ( imperialists ) का संघर्ष ज़ोर पर था, तब विविध नस्लवादी ( racist ) तथा राष्ट्रवादी ( nationalistic ) सिद्धांतों और दृष्टिकोणों का उत्पन्न होना शुरू हुआ और उनका व्यापक रूप से प्रचार होने लगा।

नस्लवादियों के दृष्टिकोण से लोगों की मुख्य विशेषता उनकी जैविक प्रकृति से निर्धारित होती है। नस्लों के जैविक अनुगुण शाश्वत ( eternal ) और अपरिवर्तनीय हैं, जो लोगों की मानसिक क्षमता, संस्कृति की रचना, आविष्कार तथा शासन करने, अन्य जातियों को अपने अधीन लाने की क्षमता, आदि का निर्धारण करते हैं। नस्लवादी यह सोचते हैं कि कुछ नस्लें ऊंची और कुछ नीची होती हैं और कि मनुष्यजाति के इतिहास तथा उसकी संस्कृति में हर मूल्यवान चीज़ की रचना उच्चतर नस्लों ने की है, जबकि नीची नस्लें उनको आत्मसात करने में भी अक्षम हैं और इसीलिए नीची नस्लों को ऊंची नस्लों द्वारा शासित होना चाहिए।

जर्मन फ़ासिज़्म ( fascism ) के विचारकों का ख़्याल था कि आर्य उच्चतम नस्ल हैं और आर्य भावना जर्मन राष्ट्र में सर्वाधिक पूर्णता से मूर्त है। अमरीकी और दक्षिण अफ़्रीकी नस्लवादी आज भी अश्वेतों ( नीग्रो ) पर श्वेत नस्ल ( यूरोपीय ) की श्रेष्ठता के गुण गाते हैं। नस्लवाद के दृष्टिकोण से नीची जातियां परजीवी ( parasitic ) हैं और प्रकृति तथा सभ्यता को विघटित करती हैं और इसीलिए उनके क्रियाकलाप को ऊंची नस्लों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए।

राष्ट्रवाद, नस्लवाद के साथ घनिष्ठता से संबंधित है। राष्ट्रवादी, एक राष्ट्र की दूसरे पर श्रेष्ठता की शिक्षा देते हैं। सारतः, वे राष्ट्रों को विभाजित करके तथा उन्हें एक दूसरे के मुक़ाबले में खड़ा करके प्रभुतासंपन्न वर्गों ( dominant classes ) द्वारा ग़ुलाम बनाये गये जनगण व राष्ट्रों के शोषण को प्रोत्साहित करते हैं।

फलतः नस्लवाद और राष्ट्रवाद प्रतिक्रियावादी ( reactionary ) भूमिका अदा करते हैं। मनुष्यजाति को ग़रीबी, अधिकारों के अभाव और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए वर्ग संघर्ष के क्रांतिकारी सिद्धांत के मुक़ाबले में, वे कुछ लोगों की अन्य पर श्रेष्ठता के जैविक आधारों के मत को, कुछ राष्ट्रों द्वारा अन्य को ग़ुलाम बनाने के अधिकार को, राष्ट्रीय अंतर्विरोधों और राष्ट्रीय झगड़ों के शाश्वत स्वभाव तथा उन पर क़ाबू पाने की असंभाव्यता के मत को ला खड़ा करते हैं। इन दृष्टिकोणों का मक़सद शोषित वर्ग की शक्तियों में फूट डालना, समान शत्रु के ख़िलाफ़ तथा समानता आधारित समाज की ख़ातिर उनके संघर्ष को कमज़ोर बनाना होता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 14 मई 2016

नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर विचार करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - १
( races and nations - 1 )

जैविक और सामाजिक के संबंध की सटीक समझ हमें समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय ( राष्ट्रीय ) विशेषताओं का निर्धारण करने में मदद देती है।

अपने व्यक्तिगत अनुभव से हर कोई यह जानता है कि लोग अपने विविध गुणों, चरित्र की विशेषताओं, शिक्षा के स्तर, सार्वजनिक हितों के प्रति रुख़, चमड़ी के रंग, ऊंचाई, चहरे की आकृति, भाषा, आदि में एक दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं। इनमें से कुछ गुण मनोवैज्ञानिक हैं, कुछ सामाजिक और कुछः अन्य जैविक हैं। जैविक में निम्नांकित शामिल हैं : रंग, क़द, शरीर की कुछ विशेषताएं, आदि। मनुष्य की उत्पत्ति ( origin ), क्रमविकास ( evolution ) तथा मनुष्य की जैविक संविरचना ( biological constitution ) का अध्ययन करनेवाला नृतत्वविज्ञान ( anthropology ) इन गुणों के अनुसार कई नस्लों ( races ) को विभेदित ( distinguish ) करता है।

नस्लें ऐसे विभिन्न मानव समुदायों ( क़बीलों, जातियों, राष्ट्रों ) के समूहन हैं जो कई समान जैविक गुणों की उपस्थिति द्वारा आपस में एक हैं। सामान्यतः तीन नस्लों को विभेदित किया जाता है : यूरोपीय ( सफ़ेद चमड़ीवाले लोग ) ; मंगोलियाई ( पीताभ चर्म तथा तिरछी आंखों वाले लोग ) ; और नीग्रों ( काली चमड़ी वाले लोग )। बेशक, ये सारी विशेषताएं सोपाधिक, यादृच्छिक तथा सापेक्ष हैं और साथ ही वे हमेशा सुस्पष्ट नहीं होती हैं। कभी-कभी मध्यवर्ती, ग़ैरबुनियादी, छोटी नस्लों की बात भी की जाती है। लोगों की नस्लीय विशेषताएं जैविक स्वभाव की होती हैं

नस्लीय विशेषताओं के विपरीत जातीय व राष्ट्रीय विशेषताएं, सामाजिक विशिष्टताओं में व्यक्त होती हैं और इतिहासानुसार विरचित जन-समुदायों ( communities of people ) के लक्षणों को चित्रित करती हैं। इन समुदायों में क़बीले ( tribes ), जातियां ( nationalities ) और राष्ट्र ( nations ) शामिल हैं। सबसे जटिल समुदाय राष्ट्र है, जो एक निश्चित युग में, पूंजीवाद में संक्रमण के युग में लंबे ऐतिहासिक विकास के फलस्वरूप बनते हैं।

एक क़बीले या जाति के सदस्य कुछ पारिवारिक रिश्तों, रक्त संबंधों और एक निश्चित समान मूल ( common origin ) के द्वारा एकीकृत ( united ) होते हैं। परंतु राष्ट्र, विभिन्न क़बीलों तथा जातियों ( कभी-कभी नज़दीकी मूल के ) के एकीकरण, ‘मेल’ ( merging ), ‘संलयन’ ( fusing ) से बनते हैं। एक राष्ट्र के लोग एक भाषा बोलते हैं। वे समान आर्थिक क्रियाकलाप, एक ही भूक्षेत्र पर अधिकार, संस्कॄति और सामाजिक मानसिकता की समरूपता तथा राष्ट्रीय चरित्र की विशेषताओं से परस्पर जुड़े होते हैं। यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि ये सब विशेषताएं सामाजिक विकास के क्रम में उत्पन्न तथा रूपायित ( moulded ) होती हैं और जैविक गुण नहीं होती हैं। राष्ट्र का बनना सामाजिक, ऐतिहासिक तथा आर्थिक विकास की एक नितांत निश्चित अवस्था के साथ जुड़ा होता है।

अब हम नस्लों और राष्ट्रों के बीच के रिश्ते पर, तथा इस बात पर विचार करेंगे कि इसका प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया से और मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक के संबंध से क्या नाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 8 मई 2016

मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - २
( the biological and social in Man -2 )

सामाजिक और जैविक के संबंध की वास्तविक वैज्ञानिक समझ, प्रकृति और समाज की भौतिकवादी संकल्पना ही दे सकती है। मनुष्य एक जीवित प्राणी है, किंतु ऐतिहासिक विकास के दौरान उसकी जैविक प्रकृति में, श्रम तथा सामाजिक जीवन के उन्नत रूपों के ज़रिये आमूल परिवर्तन हो गया। हालांकि रुधिर परिसंचरण, श्वसन, पाचन, आदि जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं सामान्य जैविक नियमों या शरीरक्रिया के नियमों के अनुसार चलती हैं, फिर भी कुछ हद तक वे भी सामाजिक जीवन की परिस्थितियों पर निर्भर होती हैं।

मनुष्य के व्यवहार और क्रियाकलाप के रूप जितने उच्चतर तथा जटिल होते हैं, सामाजिक नियमों की भूमिका उतनी ही बड़ी होती जाती है। लोगों की अंतर्क्रिया, उनके चिंतन का विकास तथा उनका सामाजिक जीवन अंततोगत्वा उनके भौतिक उत्पादन तथा सामाजिक क्रियाकलाप द्वारा निर्धारित होते हैं। सामाजिक वर्गों तथा समूहों में विभाजन, युद्ध व शांतिपूर्ण सहयोग, पारिवारिक लालन-पालन और संस्कृति का विकास, जैविक नहीं, सामाजिक नियमों के अनुसार होता है। मनुष्य के व्यवहार में सामाजिक क्रियातंत्र के नियम, जैविक क्रियातंत्र के नियमों पर हावी होते हैं, हालांकि वे उनका उन्मूलन ( abolish ) नहीं करते।

इन क्रियातंत्रों ( mechanism ) का विनाशक नहीं, बल्कि सृजनात्मक व रचनात्मक होने के लिए सबसे पहले स्वयं समाज का आमूल रूपांतरण ( radical transformation ) आवश्यक है, न कि मनुष्य की जैविक प्रकृति का पुनर्निर्माण होना

मनुष्य के चरित्र, क्षमताओं तथा व्यवहार के रूपों और उसके रुझानों एवं दिलचस्पियों का बनना उस सामाजिक माध्यम से निर्धारित होता है, जिसमें वह रहता है। रुडयार्ड किपलिंग की एक कहानी का ‘मावग्ली’ में एक ऐसे लड़के की कहानी बतायी गयी है जो भेड़ियों के बीच पला और कालांतर में सामान्य जीवन की ओर लौट आया। अपनी कहानी ‘टार्ज़न आफ़ एप्स’ में एडगर बेरौज़ ने एक ऐसे आदमी की कथा कही है जो वानरों के बीच पला और बाद में पूंजीवादी व्यापार की दुनिया में बहुत सफल सिद्ध हुआ। वास्तव में, जैसा कि पूर्णतः साबित कर दिया गया है, ऐसी बातें नितांत असंभव हैं। वास्तविक मामलों में जो बच्चे जानवरों के बीच जा पड़े और किसी तरह से जीवित बचे रह गये, वे बच्चे कालांतर में सामान्य मानव जीवन बिताने में कभी भी समर्थ नहीं हो पाये।

मनुष्य एक वास्तविक मानवीय प्राणी के रूप में केवल सामाजिक पर्यावरण में ही पल और बढ़ सकता है। केवल इसी के ज़रिये वह भाषा, चेतना, संस्कृति, सामाजिक व्यवहार की आदतों, काम करने तथा विश्व को बदलने में पारंगत हो सकता है। बेशक, किसी भी अन्य जीवित प्राणी की तरह मनुष्य में भी कुछ जैविक सहजवृत्तियां ( instincts ), अंतर्जात ( inborn ) गुण तथा वंशानुगत ( inherited ) विशेषताएं अंतर्निहित होती हैं, किंतु वे मात्र जैविक क्रमविकास का परिणाम नहीं, बल्कि लाखों वर्षों के सामाजिक विकास का फल भी हैं, यही कारण है कि भौतिकवादी दर्शन मनुष्य की जीवन क्रिया के जैविक आधार से इनकार न करते हुए आधुनिक समाज की सारी समस्याओं के समाधान की कुंजी, जैविक के बजाय सामाजिक में खोजता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 30 अप्रैल 2016

मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा की थी, इस बार हम मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - १
( the biological and social in Man -1 )

प्राकृतिक निवास स्थल ( natural habitat ) में जीवन के विविध रूप शामिल हैं। मनुष्य स्वयं एक अत्यंत विकसित तर्कबुद्धिसंपन्न जानवर है जो श्रम की बदौलत प्रकृति से अलग हो गया। एक ओर, वह एक जीवित प्राणी ( living creature ) है और सजीव प्रकृति या जैवमंडल के विकास के सामान्य नियमों से संचालित होता है। दूसरी ओर, वह एक सामाजिक प्राणी ( social creature ) है जो निश्चित प्रकार के औज़ार और अपनी जरूरत की चीज़ें बनाता है और उनकी सहायता से खाद्य पदार्थ हासिल करता है तथा विशेष कृत्रिम निवास स्थल का निर्माण करता है। जैवमंडल जैविक विकास के नियमों द्वारा संचालित है। मनुष्य सामाजिक विकास के नियमों के अनुसार रहता है। इस तरह, स्वयं मनुष्य में दो स्रोत एकीकृत हैं, अर्थात प्राकृतिक ( जैविक ) और सामाजिक

जब बुर्जुआ दार्शनिक समाज के विकास तथा प्रकृति के साथ उसकी अंतर्क्रिया का अध्ययन करते हैं, तो वे अक्सर यह दावा करते हैं कि मनुष्य मुख्य रूप से जीवन क्रिया के जैविक नियमों से संचालित है। बेशक, वे यह समझते हैं कि लोग ऐसे सचेत, चिंतनशील प्राणी हैं, जो अपने लिए बुद्धिमत्तापूर्ण लक्ष्य निश्चित करते हैं। परंतु इसके बावजूद, उनकी राय में, मनुष्य मुख्यतः जानवरों की भांति कार्य करते हैं। आस्ट्रियाई मनोचिकित्सक फ़्रायड ( १८५६-१९३९ ) का दावा है कि नैतिकता और संस्कृति, मनुष्य की पाशविक सहजवृत्तियों ( animal instincts ) के ख़िलाफ़ प्रतिरक्षा के रूप में समाज द्वारा सर्जित निरोधक ( restraining ), नियंत्रक क्रियातंत्र ( controlling mechanism ) हैं। अधिकांश मामलों में ये सहजवृत्तियां, जिन्हें फ़्रायड ने ‘अवचेतन’ ( subconscious ) की संज्ञा दी, व्यक्ति और सारे समाज के व्यवहार में निर्णायक भूमिका अदा करती हैं। फ़्रायड के अनुयायियों की दृष्टि से, लोगों का व्यवहार अंततः मनुष्य के पुरखों से विरासत में प्राप्त सहजवृत्तियों से निर्धारित होता है और इनमें लैंगिक सहजवृत्ति ( sex instincts ) निर्धारक होती है। लोगों के व्यवहार में आक्रामकता, प्रतिद्वंद्विता या सहयोग जैसे रूप पशुओं के क्रियाकलाप का सिलसिला मात्र हैं।

पिछले दशकों में अमरीकी आनुवंशिकीविद ( geneticist ) विल्सन का सामाजिक जैविकी का एक सिद्धांत बहुत प्रचलित हुआ है। उनका दावा है कि संस्कृति स्वयं आनुवंशिकी के जैविक नियमों ( biological laws of inheritance ) से संचालित होती है और कि सांस्कृतिक आनुवंशिकी ( cultural genetics ) की रचना करना जरूरी है जो जैविकी ( biology ) के दृष्टिकोण से मानव संस्कृति के विकास का अध्ययन करेगी। किंतु वे और उनके समर्थक, वैज्ञानिक तथ्यों के कारण यह स्वीकार करने को बाध्य हो गये कि वस्तुतः मानव व्यवहार के केवल १५ प्रतिशत कृत्यों में शुद्ध जैविक स्वभाव अंतर्निहित होता है। परंतु प्रश्न यह नहीं है कि यह प्रतिशत सही है या नहीं अथवा सत्यापन की मांग करता है, बल्कि यह है कि ऐसे दृष्टिकोणों का अर्थ क्या है और वे किन लक्ष्यों का अनुसरण करते हैं।

मनोविश्लेषण और सांस्कृतिक आनुवंशिकी के प्रतिपादक, आक्रामक युद्धों और विभिन्न सामाजिक झगड़ों की जिम्मेदारी मनुष्य की पाशविक सहजवृत्ति तथा आनुवंशिकता पर डाल देते हैं। इसी तरह से सामाजिक बुराइयों के विविध रूपों, युद्धों की अनिवार्यता, आदि के लिए ‘वैज्ञानिक’ प्रमाण जुटाने की कोशिश की जाती है। १९वीं सदी में डार्विन के सिद्धांत के प्रकाशित होने के बाद पूंजीवादी समाज में सामाजिक डार्विनवाद का बहुत प्रचलन हुआ ; इसने डार्विन द्वारा अन्वेषित जीवन के लिए जैविक संघर्ष के नियमों को समाज पर लागू करने का प्रयत्न किया। उस दृष्टिकोण से डार्विन द्वारा अन्वेषित अंतरा-प्रजाति संघर्ष ( जिसने जैविक प्रजातियों के परिष्करण तथा विकास को बढ़ावा दिया ), वर्ग संघर्ष ( class struggle ) में भी व्यक्त होता है। इसके अनुसार जब तक मानवजाति है, तब तक वर्ग संघर्ष भी रहेगा। इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि ऐसे विचारों के प्रतिपादक कथित जैविक उत्पत्ति के हवाले से पूंजीवाद तथा वर्ग संघर्ष को चिरस्थायी बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - २
( mankind and the natural environment - 2 )

मनुष्य के प्राकृतिक निवास स्थल ( habitat ) में, घटनाओं के दो समूहों को विभेदित ( distinguish ) किया जा सकता है : निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत ( जंगली पौधे, फल, जानवर, आदि ) और प्राकृतिक संपदा ( कोयला, तेल, जल-शक्ति, पवन, आदि जो श्रम की वस्तुएं हैं )। मानव समाज के क्रमविकास की प्रारंभिक अवस्था में, जब उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) विकास के निम्न स्तर पर थीं, लोग बहुत हद तक निर्वाह के प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर थे। अभी जब वे फ़सल उगाना, पालतू जानवरों का प्रजनन व पालन करना, गर्म आवास बनाना, आदि नहीं जानते थे, तब वे केवल गर्म जलवायु, प्रचुर वनस्पति, बड़े परिमाण में शिकार के जानवरोंवाले भूप्रदेशों में ही रह सकते थे। जब औज़ारों का विकास तथा परिष्करण कर लिया गया तब प्राकृतिक स्रोतों पर लोगों की निर्भरता कम हो गयी। परंतु प्राकृतिक संपदा, यानी खनिजों, ऊर्जा साधनों, आदि पर मनुष्य की निर्भरता बढ़ गयी

आधुनिक उद्योग और इंजीनियरी ने पृथ्वी उन क्षेत्रों को भी सुगम बना दिया, जो पहले अगम्य ( inaccessible ) थे। रासायनिक उर्वरकों ( chemical fertilizers ) से मनुष्य अनुर्वर ( infertile ) ज़मीनों को उर्वर बना सकता है। नयी निर्माण सामग्री तथा तापन प्रणाली के उपयोग से वह ध्रुवीय क्षेत्रों पर भी नियंत्रण क़ायम कर सकता है। ऊर्जा के विभिन्न प्रकारों के उपयोग से वह उस सामान्य ईंधन ( लकड़ी ) पर निर्भर नहीं रहता, जो पहले गर्मी का एकमात्र स्रोत था। परंतु इसके साथ ही तेल, लौह खनिज, यूरेनियम, खनिज, आदि जैसी प्राथमिक सामग्री पर उद्योग और कृषि की निर्भरता बढ़ रही है। इस प्रक्रिया के मूल में, उत्पादक शक्तियों का विकास निहित है और अपनी बारी में वह काफ़ी हद तक उत्पादन संबंधों ( सर्वोपरि स्वामित्व के प्रभावी रूप ) से निर्धारित होता है

ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) मनुष्य की जीवन क्रिया पर प्राकृतिक निवास स्थल के प्रभाव से इनकार नहीं करता, किंतु यह दर्शाता है कि यह प्रभाव भौतिक संपदा के उत्पादन की विधि के ज़रिये निष्पादित होता है। फलतः इस प्रभाव का स्वरूप और उसमें परिवर्तन स्वयं प्रकृति के बजाय सामाजिक कारकों पर और सर्वोपरि भौतिक उत्पादन पर निर्भर होता है, जो सारे सामाजिक जीवन का आधार है।

मसलन, एक भावी संभावना पर विचार करते हैं। समाज पर अंतरिक्ष का प्रभाव आधुनिक अंतरिक्ष यानों के विकास के द्वारा संभव हो रहा है, जिससे निकट भविष्य में हमारी पार्थिव आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सौर मंडल के ग्रहों के खनिजों और ऊर्जा संसाधनों को उपयोग में लाना संभव हो जायेगा। इस कारक का प्रभाव इंजीनियरी तथा उस सामाजिक प्रणाली पर निर्भर होगा, जिसके अंतर्गत वह संक्रियाशील तथा विकसित होगा। सारे समाज के हित में अंतरिक्ष तकनीक का शांतिपूर्ण उपयोग, ऐसी सामाजिक प्रणाली के अस्तित्व की पूर्वापेक्षा करता है, जिसमें अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा को मनुष्यजाति की सेवा में लगाया जायेगा और पार्थिव प्रकृति के विकास तथा संरक्षण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया जायेगा। इसके विपरीत, अंतरिक्ष का सैन्यीकरण ( militarization ) अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा के तर्क-सम्मत उपयोग में बाधा डाल सकता है। यही कारण है कि अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को रोकने का संघर्ष विशेष ऐतिहासिक महत्व ग्रहण करता जायेगा।

अतः मानवजाति के विकास पर प्राकृतिक पर्यावरण के प्रभाव के बारे में निम्नांकित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। (१) प्राकृतिक निवास स्थल मनुष्य की जीवन क्रिया का एक सबसे महत्वपूर्ण भौतिक पूर्वाधार है। (२) इसका प्रभाव न तो प्रमुख है और न निर्णायक। इसका स्वभाव समाज की उत्पादक शक्तियों के स्तर और उत्पादन संबंधों की क़िस्म पर निर्भर करता है। (३) निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत मुख्य रूप से इतिहास की प्रारंभिक अवस्था में समाज पर उस समय असर डालते हैं, जब उत्पादक शक्तियों का विकास सापेक्षतः निम्न स्तर पर होता है, जबकि उत्पादक शक्तियों की अभिवृद्धि के साथ प्राकृतिक संपदा का प्रभाव बढ़ जाता है।



इस बार इतना ही।
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समय अविराम

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाजपर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने पर्यावरण की संरचना पर विचार किया था, इस बार हम मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - १
( mankind and the natural environment - 1 )

जिस प्राकृतिक पर्यावरण में मनुष्यजाति रही और विकसित हुई, वह बहुत जटिल है। इसमें शामिल हैं : (१) पृथ्वी की सतह तथा उसकी विभिन्न मिट्टियां, पहाड़ियां और पर्वत, नदियां, सागर, रेगिस्तान, आदि ; (२) विभिन्न जलवायवीय क्षेत्र ( climatic zones ) ; (३) जानवरों तथा पौधों के विविध समुच्चय, आदि। इन सबकों मिलाकर आम तौर पर एक नाम दिया जाता है - भौगोलिक पर्यावरण ( geographical environment ) । दसियों और सैकड़ों हज़ारों वर्षों तक मनुष्यजाति, पृथ्वी के आभ्यंतर ( interior ) में प्रविष्ट हुए बिना तथा वायुमंडल ( atmosphere ) में उड़े बिना ( अंतरिक्ष की तो बात ही दूर ) पृथ्वी की सतह पर रही और विकसित हुई।

अतीतकाल के अनेक चिंतकों ने विभिन्न भौगोलिक दशाओं में विभिन्न क़बीलों, जनगणों तथा जातियों को रहते देखकर यह निष्कर्ष निकाला कि मानव जीवन के मुख्य लक्षण और संस्कृति का विकास तथा सामाजिक प्रणाली भौगोलिक पर्यावरण पर निर्भर है। उनमें से कुछ ने सोचा कि कठोर या नरम जलवायु सामाजिक विकास का निर्णायक कारक है ; अन्य ने विकास का मुख्य कारण ज़मीन की उर्वरता में, पौधों व जानवरों की प्रचुरता में देखा ; इनके अलावा, कुछ अन्य ने समाज के विकास को जलमार्गों ( नदियों, सागरों, झीलों, आदि ) पर निर्भर माना।

इन दृष्टिकोणों में किंचित औचित्य है। विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में लोग तथ्यतः उन देशों में अधिक सफलता से विकसित हुए जहां की जलवायु नरम थी तथा वनस्पति और जानवरों की प्रचुरता थी, जबकि कठोर जलवायु तथा अनुर्वर ज़मीनें बिना बसी रही। परंतु मनुष्यजाति के क्रमविकास ( evolution ) को केवल भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव से स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। कई हज़ार वर्षों की, और सैकड़ों की भी अवधि में एक ही भौगोलिक दशाओं के अंतर्गत विभिन्न सामाजिक विरचनाएं अनुक्रमिक रूप से बनीं। पिछली कई सदियों में, कई देशों के भौगोलिक पर्यावरण में कोई तीव्र परिवर्तन नहीं हुए हैं, फिर भी इन सदियों में इन देशों की सामाजिक विरचनाओं में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं।

यदि सब कुछ भौगोलिक दशाओं पर निर्भर होता, तो इस बात का क्या स्पष्टीकरण दिया जा सकता है कि वनस्पति व जानवरों की प्रचुरता तथा गर्म जलवायुवाले लैटिन अमरीकी तथा मध्य अफ़्रीकी देशों की अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई है और संस्कृति का स्तर सापेक्षतः नीचा है, जबकि कई अन्य देशों में कठोर जलवायु, मिट्टी तथा अन्य प्रतिकूल दशाओं के बावजूद उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्था तथा विकसित संस्कृति का अस्तित्व है ? ये प्रश्न इस विचार को प्रेरित करते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण से संबंध तथा उस पर निर्भरता सीधी-सरल बात नहीं है। यही नहीं, समाज के विकसित होने के साथ मानवजाति पृथ्वी के आभ्यंतर में अधिक गहराइयों में पैठी और वायुमंडल की सीमा के बाहर जा पहुंची और भौगोलिक पर्यावरण की संकल्पना बहुत संकीर्ण साबित हो गयी। यह मानवजाति के प्राकृतिक पर्यावरण का मात्र एक भाग है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

पर्यावरण की संरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधो के बारे में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के मत पर चर्चा की थी, इस बार हम पर्यावरण की संरचना पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



पर्यावरण की संरचना
( the structure of the environment )

किसी महानगर की ऊंची इमारत की छत से दृश्यावलोकन करने पर क्षितिज तक फैला छतों का सागर, सड़कों व वीथियों पर चलती मोटरगाडियों की धाराएं और पैदल पथों पर चलते लोगों की छोटी-छोटी आकृतियां दिखायी देती हैं। विशाल नगर और इनकी लाखों की आबादी, जटिल तकनीकी प्रणालियां और शहरी परिवहन प्रत्येक नागरिक को अपने घेरे में लपेटे हुए हैं। यहां प्रकृति केवल पार्कों, हरी घास तथा हरियाली के अलग-अलग खंडों के रूप में ही विद्यमान है। विकसित एवं विकासशील देशों में अधिकांश आबादी नगरों में रहती है और मनुष्य द्वारा निर्मित नगरीय संरचनाओं तथा तकनीकी प्रतिष्ठानों ( installations ) से घिरी होती है। प्रकृति से सीधे संपर्क में रहनेवाले जंगलों, खेतों, स्वच्छ नदियों व झीलों से घिरे देहातवासियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

पर्यावरण एक जटिल प्रणाली ( complex system ) है, जिसमें सब वस्तुएं एक निश्चित ढंग से अंतर्संबधित और तदनुसारी नियमों से संचालित होती हैं। इसकी प्रमुख उपप्रणालियां मनुष्य के प्राकृतिक तथा कृत्रिम निवास स्थल ( habitat ) हैं।

प्राकृतिक पर्यावरण ( natural environment ) प्रकृति का एक भाग है जिसके साथ समाज अपने विकास तथा क्रियाकलाप के दौरान अंतर्क्रिया ( interact ) करता है। मानवजाति की शुरुआत में उसका प्राकृतिक निवास स्थल पृथ्वी की सतह का एक छोटा-सा हिस्सा भर था। परंतु अब इसमें पृथ्वी की सतह के साथ ही उसका अभ्यांतर ( interior ), विश्व महासागर, पृथ्वी निकट अंतरिक्ष तथा सौर मंडल का भाग शामिल हैं। इंजीनियरी और विज्ञान के विकास के साथ ही मनुष्य का प्राकृतिक निवास स्थल भी विस्तृत होता गया है एवं और विस्तार लेता जाएगा।

कृत्रिम पर्यावरण, ( artificial environment ) पर्यावरण का वह भाग है जिसे भौतिक उत्पादन के ऐतिहासिक विकास के दौरान मनुष्य ने बनाया ; यह उसकी जीवन क्रिया का उत्पाद है जो स्वयं अपने आप प्रकृति के रूप में विद्यमान नहीं है। कृत्रिम पर्यावरण में मनुष्य द्वारा निर्मित सारे मकानात, नगर, बस्तियां, सड़कें, परिवहन के साधन, औज़ार व उपकरण, तकनीकी यंत्र, कृत्रिम सामग्री, जिसका प्रकृति में अस्तित्व नहीं है, कारख़ाने और संयंत्र शामिल हैं।

इस प्रकार, समाज ऐसी जटिल भौतिक दशाओं ( complex material conditions ) में विकसित होता है, जिसमें मनुष्य के प्राकृतिक तथा कृत्रिम दोनों निवास स्थल शामिल हैं। इतिहास की भिन्न-भिन्न अवधियों में इन दो उपप्रणालियों की भूमिका और संबंध भिन्न-भिन्न थे और वे मनुष्य के जीवन के क्रियाकलाप को भिन्न-भिन्न ढंग से प्रभावित करते थे। मनुष्य ने स्वयं भी विभिन्न तरीक़ों से पर्यावरण को प्रभावित किया और उसे बदला ; इस समय उसके जीवन का एक काफ़ी बड़ा भाग उस कृत्रिम माध्यम में गुजरता है जो ख़ुद भी प्राकृतिक पर्यावरण के रूपांतरण ( transformation ) तथा बदलावों ( alteration ) का उत्पाद है।

अब हम यहां कुछ अधिक विस्तार के साथ इस बात की जांच करेंगे कि इतिहास के दौरान समाज तथा पर्यावरण की विभिन्न उपप्रणालियों के बीच अंतर्क्रिया किस प्रकार संपन्न हुई और कैसे बदली।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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