शनिवार, 30 अप्रैल 2016

मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा की थी, इस बार हम मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक - १
( the biological and social in Man -1 )

प्राकृतिक निवास स्थल ( natural habitat ) में जीवन के विविध रूप शामिल हैं। मनुष्य स्वयं एक अत्यंत विकसित तर्कबुद्धिसंपन्न जानवर है जो श्रम की बदौलत प्रकृति से अलग हो गया। एक ओर, वह एक जीवित प्राणी ( living creature ) है और सजीव प्रकृति या जैवमंडल के विकास के सामान्य नियमों से संचालित होता है। दूसरी ओर, वह एक सामाजिक प्राणी ( social creature ) है जो निश्चित प्रकार के औज़ार और अपनी जरूरत की चीज़ें बनाता है और उनकी सहायता से खाद्य पदार्थ हासिल करता है तथा विशेष कृत्रिम निवास स्थल का निर्माण करता है। जैवमंडल जैविक विकास के नियमों द्वारा संचालित है। मनुष्य सामाजिक विकास के नियमों के अनुसार रहता है। इस तरह, स्वयं मनुष्य में दो स्रोत एकीकृत हैं, अर्थात प्राकृतिक ( जैविक ) और सामाजिक

जब बुर्जुआ दार्शनिक समाज के विकास तथा प्रकृति के साथ उसकी अंतर्क्रिया का अध्ययन करते हैं, तो वे अक्सर यह दावा करते हैं कि मनुष्य मुख्य रूप से जीवन क्रिया के जैविक नियमों से संचालित है। बेशक, वे यह समझते हैं कि लोग ऐसे सचेत, चिंतनशील प्राणी हैं, जो अपने लिए बुद्धिमत्तापूर्ण लक्ष्य निश्चित करते हैं। परंतु इसके बावजूद, उनकी राय में, मनुष्य मुख्यतः जानवरों की भांति कार्य करते हैं। आस्ट्रियाई मनोचिकित्सक फ़्रायड ( १८५६-१९३९ ) का दावा है कि नैतिकता और संस्कृति, मनुष्य की पाशविक सहजवृत्तियों ( animal instincts ) के ख़िलाफ़ प्रतिरक्षा के रूप में समाज द्वारा सर्जित निरोधक ( restraining ), नियंत्रक क्रियातंत्र ( controlling mechanism ) हैं। अधिकांश मामलों में ये सहजवृत्तियां, जिन्हें फ़्रायड ने ‘अवचेतन’ ( subconscious ) की संज्ञा दी, व्यक्ति और सारे समाज के व्यवहार में निर्णायक भूमिका अदा करती हैं। फ़्रायड के अनुयायियों की दृष्टि से, लोगों का व्यवहार अंततः मनुष्य के पुरखों से विरासत में प्राप्त सहजवृत्तियों से निर्धारित होता है और इनमें लैंगिक सहजवृत्ति ( sex instincts ) निर्धारक होती है। लोगों के व्यवहार में आक्रामकता, प्रतिद्वंद्विता या सहयोग जैसे रूप पशुओं के क्रियाकलाप का सिलसिला मात्र हैं।

पिछले दशकों में अमरीकी आनुवंशिकीविद ( geneticist ) विल्सन का सामाजिक जैविकी का एक सिद्धांत बहुत प्रचलित हुआ है। उनका दावा है कि संस्कृति स्वयं आनुवंशिकी के जैविक नियमों ( biological laws of inheritance ) से संचालित होती है और कि सांस्कृतिक आनुवंशिकी ( cultural genetics ) की रचना करना जरूरी है जो जैविकी ( biology ) के दृष्टिकोण से मानव संस्कृति के विकास का अध्ययन करेगी। किंतु वे और उनके समर्थक, वैज्ञानिक तथ्यों के कारण यह स्वीकार करने को बाध्य हो गये कि वस्तुतः मानव व्यवहार के केवल १५ प्रतिशत कृत्यों में शुद्ध जैविक स्वभाव अंतर्निहित होता है। परंतु प्रश्न यह नहीं है कि यह प्रतिशत सही है या नहीं अथवा सत्यापन की मांग करता है, बल्कि यह है कि ऐसे दृष्टिकोणों का अर्थ क्या है और वे किन लक्ष्यों का अनुसरण करते हैं।

मनोविश्लेषण और सांस्कृतिक आनुवंशिकी के प्रतिपादक, आक्रामक युद्धों और विभिन्न सामाजिक झगड़ों की जिम्मेदारी मनुष्य की पाशविक सहजवृत्ति तथा आनुवंशिकता पर डाल देते हैं। इसी तरह से सामाजिक बुराइयों के विविध रूपों, युद्धों की अनिवार्यता, आदि के लिए ‘वैज्ञानिक’ प्रमाण जुटाने की कोशिश की जाती है। १९वीं सदी में डार्विन के सिद्धांत के प्रकाशित होने के बाद पूंजीवादी समाज में सामाजिक डार्विनवाद का बहुत प्रचलन हुआ ; इसने डार्विन द्वारा अन्वेषित जीवन के लिए जैविक संघर्ष के नियमों को समाज पर लागू करने का प्रयत्न किया। उस दृष्टिकोण से डार्विन द्वारा अन्वेषित अंतरा-प्रजाति संघर्ष ( जिसने जैविक प्रजातियों के परिष्करण तथा विकास को बढ़ावा दिया ), वर्ग संघर्ष ( class struggle ) में भी व्यक्त होता है। इसके अनुसार जब तक मानवजाति है, तब तक वर्ग संघर्ष भी रहेगा। इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि ऐसे विचारों के प्रतिपादक कथित जैविक उत्पत्ति के हवाले से पूंजीवाद तथा वर्ग संघर्ष को चिरस्थायी बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - २
( mankind and the natural environment - 2 )

मनुष्य के प्राकृतिक निवास स्थल ( habitat ) में, घटनाओं के दो समूहों को विभेदित ( distinguish ) किया जा सकता है : निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत ( जंगली पौधे, फल, जानवर, आदि ) और प्राकृतिक संपदा ( कोयला, तेल, जल-शक्ति, पवन, आदि जो श्रम की वस्तुएं हैं )। मानव समाज के क्रमविकास की प्रारंभिक अवस्था में, जब उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) विकास के निम्न स्तर पर थीं, लोग बहुत हद तक निर्वाह के प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर थे। अभी जब वे फ़सल उगाना, पालतू जानवरों का प्रजनन व पालन करना, गर्म आवास बनाना, आदि नहीं जानते थे, तब वे केवल गर्म जलवायु, प्रचुर वनस्पति, बड़े परिमाण में शिकार के जानवरोंवाले भूप्रदेशों में ही रह सकते थे। जब औज़ारों का विकास तथा परिष्करण कर लिया गया तब प्राकृतिक स्रोतों पर लोगों की निर्भरता कम हो गयी। परंतु प्राकृतिक संपदा, यानी खनिजों, ऊर्जा साधनों, आदि पर मनुष्य की निर्भरता बढ़ गयी

आधुनिक उद्योग और इंजीनियरी ने पृथ्वी उन क्षेत्रों को भी सुगम बना दिया, जो पहले अगम्य ( inaccessible ) थे। रासायनिक उर्वरकों ( chemical fertilizers ) से मनुष्य अनुर्वर ( infertile ) ज़मीनों को उर्वर बना सकता है। नयी निर्माण सामग्री तथा तापन प्रणाली के उपयोग से वह ध्रुवीय क्षेत्रों पर भी नियंत्रण क़ायम कर सकता है। ऊर्जा के विभिन्न प्रकारों के उपयोग से वह उस सामान्य ईंधन ( लकड़ी ) पर निर्भर नहीं रहता, जो पहले गर्मी का एकमात्र स्रोत था। परंतु इसके साथ ही तेल, लौह खनिज, यूरेनियम, खनिज, आदि जैसी प्राथमिक सामग्री पर उद्योग और कृषि की निर्भरता बढ़ रही है। इस प्रक्रिया के मूल में, उत्पादक शक्तियों का विकास निहित है और अपनी बारी में वह काफ़ी हद तक उत्पादन संबंधों ( सर्वोपरि स्वामित्व के प्रभावी रूप ) से निर्धारित होता है

ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) मनुष्य की जीवन क्रिया पर प्राकृतिक निवास स्थल के प्रभाव से इनकार नहीं करता, किंतु यह दर्शाता है कि यह प्रभाव भौतिक संपदा के उत्पादन की विधि के ज़रिये निष्पादित होता है। फलतः इस प्रभाव का स्वरूप और उसमें परिवर्तन स्वयं प्रकृति के बजाय सामाजिक कारकों पर और सर्वोपरि भौतिक उत्पादन पर निर्भर होता है, जो सारे सामाजिक जीवन का आधार है।

मसलन, एक भावी संभावना पर विचार करते हैं। समाज पर अंतरिक्ष का प्रभाव आधुनिक अंतरिक्ष यानों के विकास के द्वारा संभव हो रहा है, जिससे निकट भविष्य में हमारी पार्थिव आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सौर मंडल के ग्रहों के खनिजों और ऊर्जा संसाधनों को उपयोग में लाना संभव हो जायेगा। इस कारक का प्रभाव इंजीनियरी तथा उस सामाजिक प्रणाली पर निर्भर होगा, जिसके अंतर्गत वह संक्रियाशील तथा विकसित होगा। सारे समाज के हित में अंतरिक्ष तकनीक का शांतिपूर्ण उपयोग, ऐसी सामाजिक प्रणाली के अस्तित्व की पूर्वापेक्षा करता है, जिसमें अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा को मनुष्यजाति की सेवा में लगाया जायेगा और पार्थिव प्रकृति के विकास तथा संरक्षण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया जायेगा। इसके विपरीत, अंतरिक्ष का सैन्यीकरण ( militarization ) अंतरिक्ष की प्राकृतिक संपदा के तर्क-सम्मत उपयोग में बाधा डाल सकता है। यही कारण है कि अंतरिक्ष के सैन्यीकरण को रोकने का संघर्ष विशेष ऐतिहासिक महत्व ग्रहण करता जायेगा।

अतः मानवजाति के विकास पर प्राकृतिक पर्यावरण के प्रभाव के बारे में निम्नांकित निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। (१) प्राकृतिक निवास स्थल मनुष्य की जीवन क्रिया का एक सबसे महत्वपूर्ण भौतिक पूर्वाधार है। (२) इसका प्रभाव न तो प्रमुख है और न निर्णायक। इसका स्वभाव समाज की उत्पादक शक्तियों के स्तर और उत्पादन संबंधों की क़िस्म पर निर्भर करता है। (३) निर्वाह साधनों के प्राकृतिक स्रोत मुख्य रूप से इतिहास की प्रारंभिक अवस्था में समाज पर उस समय असर डालते हैं, जब उत्पादक शक्तियों का विकास सापेक्षतः निम्न स्तर पर होता है, जबकि उत्पादक शक्तियों की अभिवृद्धि के साथ प्राकृतिक संपदा का प्रभाव बढ़ जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 16 अप्रैल 2016

मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाजपर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने पर्यावरण की संरचना पर विचार किया था, इस बार हम मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण की अंतर्क्रिया के इतिहास पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - १
( mankind and the natural environment - 1 )

जिस प्राकृतिक पर्यावरण में मनुष्यजाति रही और विकसित हुई, वह बहुत जटिल है। इसमें शामिल हैं : (१) पृथ्वी की सतह तथा उसकी विभिन्न मिट्टियां, पहाड़ियां और पर्वत, नदियां, सागर, रेगिस्तान, आदि ; (२) विभिन्न जलवायवीय क्षेत्र ( climatic zones ) ; (३) जानवरों तथा पौधों के विविध समुच्चय, आदि। इन सबकों मिलाकर आम तौर पर एक नाम दिया जाता है - भौगोलिक पर्यावरण ( geographical environment ) । दसियों और सैकड़ों हज़ारों वर्षों तक मनुष्यजाति, पृथ्वी के आभ्यंतर ( interior ) में प्रविष्ट हुए बिना तथा वायुमंडल ( atmosphere ) में उड़े बिना ( अंतरिक्ष की तो बात ही दूर ) पृथ्वी की सतह पर रही और विकसित हुई।

अतीतकाल के अनेक चिंतकों ने विभिन्न भौगोलिक दशाओं में विभिन्न क़बीलों, जनगणों तथा जातियों को रहते देखकर यह निष्कर्ष निकाला कि मानव जीवन के मुख्य लक्षण और संस्कृति का विकास तथा सामाजिक प्रणाली भौगोलिक पर्यावरण पर निर्भर है। उनमें से कुछ ने सोचा कि कठोर या नरम जलवायु सामाजिक विकास का निर्णायक कारक है ; अन्य ने विकास का मुख्य कारण ज़मीन की उर्वरता में, पौधों व जानवरों की प्रचुरता में देखा ; इनके अलावा, कुछ अन्य ने समाज के विकास को जलमार्गों ( नदियों, सागरों, झीलों, आदि ) पर निर्भर माना।

इन दृष्टिकोणों में किंचित औचित्य है। विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में लोग तथ्यतः उन देशों में अधिक सफलता से विकसित हुए जहां की जलवायु नरम थी तथा वनस्पति और जानवरों की प्रचुरता थी, जबकि कठोर जलवायु तथा अनुर्वर ज़मीनें बिना बसी रही। परंतु मनुष्यजाति के क्रमविकास ( evolution ) को केवल भौगोलिक पर्यावरण के प्रभाव से स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। कई हज़ार वर्षों की, और सैकड़ों की भी अवधि में एक ही भौगोलिक दशाओं के अंतर्गत विभिन्न सामाजिक विरचनाएं अनुक्रमिक रूप से बनीं। पिछली कई सदियों में, कई देशों के भौगोलिक पर्यावरण में कोई तीव्र परिवर्तन नहीं हुए हैं, फिर भी इन सदियों में इन देशों की सामाजिक विरचनाओं में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं।

यदि सब कुछ भौगोलिक दशाओं पर निर्भर होता, तो इस बात का क्या स्पष्टीकरण दिया जा सकता है कि वनस्पति व जानवरों की प्रचुरता तथा गर्म जलवायुवाले लैटिन अमरीकी तथा मध्य अफ़्रीकी देशों की अर्थव्यवस्था पिछड़ी हुई है और संस्कृति का स्तर सापेक्षतः नीचा है, जबकि कई अन्य देशों में कठोर जलवायु, मिट्टी तथा अन्य प्रतिकूल दशाओं के बावजूद उन्नत औद्योगिक अर्थव्यवस्था तथा विकसित संस्कृति का अस्तित्व है ? ये प्रश्न इस विचार को प्रेरित करते हैं कि भौगोलिक पर्यावरण से संबंध तथा उस पर निर्भरता सीधी-सरल बात नहीं है। यही नहीं, समाज के विकसित होने के साथ मानवजाति पृथ्वी के आभ्यंतर में अधिक गहराइयों में पैठी और वायुमंडल की सीमा के बाहर जा पहुंची और भौगोलिक पर्यावरण की संकल्पना बहुत संकीर्ण साबित हो गयी। यह मानवजाति के प्राकृतिक पर्यावरण का मात्र एक भाग है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

पर्यावरण की संरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधो के बारे में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के मत पर चर्चा की थी, इस बार हम पर्यावरण की संरचना पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



पर्यावरण की संरचना
( the structure of the environment )

किसी महानगर की ऊंची इमारत की छत से दृश्यावलोकन करने पर क्षितिज तक फैला छतों का सागर, सड़कों व वीथियों पर चलती मोटरगाडियों की धाराएं और पैदल पथों पर चलते लोगों की छोटी-छोटी आकृतियां दिखायी देती हैं। विशाल नगर और इनकी लाखों की आबादी, जटिल तकनीकी प्रणालियां और शहरी परिवहन प्रत्येक नागरिक को अपने घेरे में लपेटे हुए हैं। यहां प्रकृति केवल पार्कों, हरी घास तथा हरियाली के अलग-अलग खंडों के रूप में ही विद्यमान है। विकसित एवं विकासशील देशों में अधिकांश आबादी नगरों में रहती है और मनुष्य द्वारा निर्मित नगरीय संरचनाओं तथा तकनीकी प्रतिष्ठानों ( installations ) से घिरी होती है। प्रकृति से सीधे संपर्क में रहनेवाले जंगलों, खेतों, स्वच्छ नदियों व झीलों से घिरे देहातवासियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

पर्यावरण एक जटिल प्रणाली ( complex system ) है, जिसमें सब वस्तुएं एक निश्चित ढंग से अंतर्संबधित और तदनुसारी नियमों से संचालित होती हैं। इसकी प्रमुख उपप्रणालियां मनुष्य के प्राकृतिक तथा कृत्रिम निवास स्थल ( habitat ) हैं।

प्राकृतिक पर्यावरण ( natural environment ) प्रकृति का एक भाग है जिसके साथ समाज अपने विकास तथा क्रियाकलाप के दौरान अंतर्क्रिया ( interact ) करता है। मानवजाति की शुरुआत में उसका प्राकृतिक निवास स्थल पृथ्वी की सतह का एक छोटा-सा हिस्सा भर था। परंतु अब इसमें पृथ्वी की सतह के साथ ही उसका अभ्यांतर ( interior ), विश्व महासागर, पृथ्वी निकट अंतरिक्ष तथा सौर मंडल का भाग शामिल हैं। इंजीनियरी और विज्ञान के विकास के साथ ही मनुष्य का प्राकृतिक निवास स्थल भी विस्तृत होता गया है एवं और विस्तार लेता जाएगा।

कृत्रिम पर्यावरण, ( artificial environment ) पर्यावरण का वह भाग है जिसे भौतिक उत्पादन के ऐतिहासिक विकास के दौरान मनुष्य ने बनाया ; यह उसकी जीवन क्रिया का उत्पाद है जो स्वयं अपने आप प्रकृति के रूप में विद्यमान नहीं है। कृत्रिम पर्यावरण में मनुष्य द्वारा निर्मित सारे मकानात, नगर, बस्तियां, सड़कें, परिवहन के साधन, औज़ार व उपकरण, तकनीकी यंत्र, कृत्रिम सामग्री, जिसका प्रकृति में अस्तित्व नहीं है, कारख़ाने और संयंत्र शामिल हैं।

इस प्रकार, समाज ऐसी जटिल भौतिक दशाओं ( complex material conditions ) में विकसित होता है, जिसमें मनुष्य के प्राकृतिक तथा कृत्रिम दोनों निवास स्थल शामिल हैं। इतिहास की भिन्न-भिन्न अवधियों में इन दो उपप्रणालियों की भूमिका और संबंध भिन्न-भिन्न थे और वे मनुष्य के जीवन के क्रियाकलाप को भिन्न-भिन्न ढंग से प्रभावित करते थे। मनुष्य ने स्वयं भी विभिन्न तरीक़ों से पर्यावरण को प्रभावित किया और उसे बदला ; इस समय उसके जीवन का एक काफ़ी बड़ा भाग उस कृत्रिम माध्यम में गुजरता है जो ख़ुद भी प्राकृतिक पर्यावरण के रूपांतरण ( transformation ) तथा बदलावों ( alteration ) का उत्पाद है।

अब हम यहां कुछ अधिक विस्तार के साथ इस बात की जांच करेंगे कि इतिहास के दौरान समाज तथा पर्यावरण की विभिन्न उपप्रणालियों के बीच अंतर्क्रिया किस प्रकार संपन्न हुई और कैसे बदली।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

प्रकृति और समाज पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाजपर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधो के बारे में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के मत पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रकृति और समाज पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद - २
( dialectical materialism on nature and society - 2 )

पर्यावरण पर इस प्रभाव के विनाशक परिणामों की रोकथाम करने के लिए, इसके प्रति मात्र जागरुक ( aware ) होने से कहीं अधिक की ज़रूरत है। यह जागरुकता, स्वयं सामाजिक सत्व ( social being ) से निर्धारित होती है और उस पर निर्भर करती है। इससे यह आवश्यक निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य और प्रकृति की समुचित, सामंजस्यपूर्ण अंतर्क्रिया, जो समाज के प्रगतिशील विकास की गारंटी करेगी और साथ ही उससे प्रकृति का विनाश नहीं होगा, केवल तभी संभव है जब सारे समाज का रूपांतरण ( transition ) और मुख्यतः उत्पादन पद्धति ( mode of production ) में परिवर्तन हो जायेगा, दूसरे शब्दों में, केवल तभी जब समाज का ढांचा समाजवादी-साम्यवादी तरीक़े से संगठित किया जाएगा।

परंतु प्रश्न यह है कि प्रकृति और मनुष्य के बीच उन अंतर्विरोधों ( contradictions ) के उन्मूलन ( elimination ) और समाधान ( resolution ) में समाजवादी-साम्यवादी ढांचा क्यों सहायक होगा, जो सारी पूर्ववर्ती सामाजिक विरचनाओं की संपूर्ण अवधि में उत्पन्न तथा गहन हुए हैं? क्योंकि निजी स्वामित्व ( private property ) का उन्मूलन, विज्ञानसम्मत नियोजित उत्पादन करना और भौतिक संसाधनों को अलग-अलग पूंजीपतियों या इजारेदारियों ( monopolies ) के हितों के बज़ाए सारे समाज, सारी मानवजाति के हित में इस्तेमाल करना संभव बना देता है

सारे बुर्जुआ सिद्धांतों के विपरीत, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद यह समझता है कि प्रकृति और समाज के बीच अंतर्विरोधों का समाधान, प्रकृति पर मनुष्य के प्रभुत्व के ज़रिये नहीं, बल्कि हर प्रकार के प्रभुत्वों ( dominations ) का उन्मूलन करके किया जाना चाहिए। मनुष्य पर मनुष्य के प्रभुत्व का उन्मूलन करके ही, प्रकृति पर मनुष्य के प्रभुत्व का भी उन्मूलन किया जा सकता है, बशर्ते कि हम इस ‘प्रभुत्व’ का अर्थ मुनाफ़े की ख़ातिर प्राकृतिक संपदा का बेलगाम दोहन और उपयोग समझते हों।

अलंकारिक भाषा में, बुर्जुआ ‘प्रभुत्व के उसूल' ( principle of domination ) के स्थान पर ‘सहयोग के उसूल’ ( principle of co-operation ) की पुष्टि की जानी चाहिए, ताकि समाज के विकास और प्रकृति के संरक्षण तथा विकास दोनों के लिए अनुकूल दशाओं का निर्माण हो। प्रत्येक व्यक्ति तथा सारे समाज के सर्वतोमुखी विकास की दशाओं की व्यवस्था करके, समाजवादी-साम्यवादी ढांचा प्रकृति के सांमजस्यपूर्ण विकास की दशाओं का निर्माण भी करेगा। नयी दशाओं में, मनुष्य और उसके पर्यावरण के विकास के वस्तुगत नियमों के गहन ज्ञान पर भरोसा करते हुए, समाज और प्रकृति की अंतर्क्रिया पारस्परिक संवर्धन ( mutual enrichment ) और विकास के उसूल पर आधारित की जानी चाहिए

तो, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के ज़रिये इस मुख्य निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि प्रकृति और समाज के बीच अंतर्विरोधों का समाधान, केवल गहन क्रांतिकारी सामाजिक सुधारों को संपन्न करके ही किया जा सकता है। समाज और प्रकृति की, मनुष्य और पर्यावरण की सांमजस्यपूर्ण अंतर्क्रिया जन-जीवन को बेहतर बनाने के लिए अधिकाधिक महत्वपूर्ण है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 26 मार्च 2016

प्रकृति और समाज पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाजपर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधो के बारे में प्राचीन मतों पर संक्षेप में चर्चा की थी, इस बार हम इसी विषय पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का मत प्रस्तुत करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रकृति और समाज पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद - १
( dialectical materialism on nature and society - 1 )

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, समाज को प्रकृति के क्रमविकास ( evolution ) का एक परिणाम मानता है। परंतु साथ ही प्रकृति और समाज के बीच एक गहरा अंतर भी है। प्रकृति में केवल अंधी, अचेतन शक्तियां ही एक दूसरे पर क्रिया करती हैं और उनकी अंतर्क्रिया में सामान्य नियम अभिव्यक्त होते हैं। इसके विपरीत, समाज के इतिहास में चेतना से संपन्न लोग निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संक्रिया करते हैं। परंतु यह अंतर कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, इससे यह तथ्य नहीं बदलता है कि इतिहास का क्रमविकास, आंतरिक सामान्य नियमों से संचालित होता है

श्रम के दौरान लोग मात्र भौतिक मूल्यों की रचना ही नहीं करते, बल्कि सचेत, चिंतनशील प्राणियों के रूप में स्वयं को भी ढालते हैं। प्रकृति, भौतिक उत्पादन क्रिया के विषय ( object ) तथा उसकी मूल वस्तु के रूप में कार्य करती है। परंतु मनुष्य, अपनी चेतना में प्रकृति को परावर्तित करते तथा अपने लिए कुछ व्यक्तिगत व सामाजिक लक्ष्य निश्चित करते हुए, इस क्रिया का विषयी ( subject ) होता है। उसकी उत्पादन क्रिया प्राकृतिक पदार्थ पर नियंत्रण क़ायम करने और उसे संसाधित ( processed ) करने में एक ख़ास ढंग से मदद करती है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के संस्थापकों ने अपने आपको यह ध्यान दिलाने तक ही सीमित नहीं रखा कि प्रकृति के साथ मनुष्य के रिश्ते का मुख्य क्रियातंत्र श्रम प्रक्रिया है और कि वह श्रम के ज़रिये अपने को प्रकृति से विलगाता तथा स्वयं को उसके मुक़ाबले में खड़ा करता है। उन्होंने स्वामित्व के मुख्य रूपों तथा उसके द्वारा संनियमित ( governed ) समाज के संगठन पर, प्रकृति और मनुष्य की अंतर्क्रिया की निर्भरता ( dependence ) पर भी लगातार ज़ोर दिया।

प्रकृति के प्रति मनुष्य का रुख़ अंतर्विरोधी ( contradictory ) है। एक ओर, वह स्वयं प्रकृति का उत्पाद है, उसकी जीवन क्रिया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पूर्वाधार प्रकृति है। प्राकृतिक संपदा, ऊर्जा संसाधन, उर्वर मिट्टी, पानी, वायु, जलवायु, आदि का अस्तित्व एक निश्चित ढंग से समाज के विकास को प्रभावित करता है। दूसरी ओर, मनुष्य श्रम प्रक्रिया के दौरान प्रकृति को बदलता है। अपने लिए ठोस लक्ष्य निश्चित करते तथा उन्हें हासिल करने के लिए काम करते हुए लोग, प्रकृति को इस तरह से बदल देते हैं कि उनके क्रियाकलाप का अंतिम परिणाम अक्सर उसके मूल लक्ष्यों तथा इरादों के विपरीत हो जाता है।

मालूम है कि जानवर भी अपने प्राकृतिक पर्यावरण को प्रभावित करते हैं और उसमें कमोबेश सुस्पष्ट परिवर्तन कर देते हैं। किंतु मनुष्य का प्रभाव सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों गुना अधिक प्रबल होता है। इस प्रभाव के विनाशक परिणामों की रोकथाम करने के लिए, इसके प्रति मात्र जागरुक होने से कहीं अधिक की ज़रूरत है। यह जागरुकता, स्वयं सामाजिक सत्व ( social being ) से निर्धारित होती है और उस पर निर्भर करती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 19 मार्च 2016

प्रकृति और समाज पर प्राचीन विचार

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने प्रकृति और समाज के बारे में एक संवाद प्रस्तुत किया था, इस बार हम प्रकृति और समाज के अंतर्संबंधो के बारे में प्राचीन मतों पर संक्षेप में चर्चा करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रकृति और समाज पर प्राचीन विचार
( ancient ideas on nature and society )

समाज के विकास के साथ, प्रकृति के प्रति मनुष्य का रुख़ ( attitude ) बदल गया है जो समाज और प्रकृति के संबंधों के बारे में विभिन्न मतों में परावर्तित ( reflect ) हुआ है।

आदिम मनुष्य प्राकृतिक संपदा के उपभोक्ता थे। सैकड़ों हज़ारों वर्षों तक वे जानवरों तथा पौधों का आहार करते, गुफाओं में सोते, चमड़े के वस्त्र पहनते, लकड़ी, पत्थर और हड्डियों के औज़ारों का इस्तेमाल करते रहे। वे केवल प्राकृतिक पदार्थ का स्वांगीकरण ( assimilation ) करते, किंतु ऐसी किसी वस्तु की रचना नहीं करते थे जो प्रकृति में नहीं पायी जाती। उत्पादक शक्तियों के विकास का वह स्तर तत्कालीन धार्मिक धारणाओं, मिथकों, पुराणकथाओं की एक प्रणाली में परावर्तित होता था, जिसमें अपने परिवेशीय जगत के प्रति मनुष्य के जटिल, अंतर्विरोधी ( contradictory ) रुख़ को अभिव्यक्ति मिलती थी।

एक तरफ़, प्रकृति जीवनदायी थी, मनुष्य को पोषित करती थी अतः वह पूजा की, दैवीकरण की पात्र थी। दूसरी तरफ़, वह प्रकृति की भयोत्पादक, अबोधगम्य शक्तियों के ख़िलाफ़ लगातार संघर्ष करता, उन पर काबू पाने तथा उन्हें अपने अधीन लाने का प्रयास करता और अक्सर कई प्राकृतिक घटनाओं को वैरभाव से देखता था। आदिम समाज के भंग होने और प्रारंभिक दास-प्रथावाले राज्यों के उद्‍भव की अवधि में लोगों ने खेती करना, फ़सल उगाना, घरेलू जानवरों को पालना व उनका प्रजनन करना शुरू कर दिया था। धातु के औज़ारों, कुम्हारी चक्के के अविष्कार तथा आग के उपयोग की क्षमता अर्जित करने के बाद मनुष्य ने वस्तुओं, खाद्य पदार्थों, मकानों तथा परिवहन साधनों का निर्माण करना शुरू कर दिया जो प्रकृति में विद्यमान नहीं थे। उत्पादन शक्तियों और तकनीक के विकास के फलस्वरूप प्रकृति का रूपांतरण ( transformation ) शुरू हो गया।

प्रागैतिहास के सैकड़ों हज़ारों वर्षों के दौरान लोगों ने प्रकृति को ज़ोरशोर से बदलना शुरू कर दिया था : उन्होंने जंगल काट दिये, जानवरों की कई प्रजातियों का मूलोच्छेदन कर दिया, सैकड़ों सड़कें और रास्ते बना दिये। मनुष्य के श्रम तथा सामाजिक क्रियाकलाप के दौरान प्रकृति को बदलने की प्रक्रिया वर्ग समाज में कई गुना अधिक त्वरित ( accelerated ) हो गयी। परंतु ये क्रियाकलाप नियमतः स्वतःस्फूर्त थे और उसके परिणाम नितांत अनपेक्षित थे, न कि वे, जिनके लिए लोग शुरू में प्रयत्नशील थे। यह पूर्ववर्ती विरचनाओं ( formations ) की तथा उनके अनुरूप संस्कृतियों की लाक्षणिक विशेषता थी।

प्राचीन काल के दर्शन, विशेषतः प्राचीन भौतिकवाद का लक्ष्य सकल विश्व को समझना था। इस विश्व ( ब्रह्मांड ) को एक विकासमान साकल्य मानते तथा इसके मूलाधारों और उद्‍गम को समझने का प्रयत्न करते हुए प्राचीन दार्शनिक परिवेशीय प्रकृति को रूपांतरित करने में मनुष्य की सक्रिय भूमिका को नहीं समझ पाये। वे उसे सचेत, सोद्देश्य, रूपांतरणकारी क्रियाकलाप का नहीं, बल्कि प्रेक्षण ( observation ) का विषय मानते रहे।

ईसाई धर्म तथा ईश्वरमीमांसा और मध्ययुग में प्रभावी अन्य विश्व धर्मों की लाक्षणिकता थी प्रकृति के प्रति नकारात्मक रुख़। मध्ययुग के दार्शनिकों की राय में ईश्वर ने मनुष्य की सेवा के लिए प्रकृति की रचना की। केवल मनुष्य में ही दैवी आत्मिक मूल का एक छोटा-सा अंश होता है जबकि प्रकृति में हीन मूल निहित होता है।

केवल पुनर्जागरण काल में तथा उसके बाद प्रकृतिविज्ञान के द्रुत विकास के समय, प्रकृति में वैज्ञानिक दिलचस्पी तेज़ी से बढ़ी। किंतु वह दिलचस्पी धनलोलुपता ( money-grubbing ) और मुनाफ़े की चाह के कारण धूमिल हो गयी। नये जमाने के दर्शन तथा विज्ञान के एक संस्थापक फ्रैंसिस बेकन  समाज के कल्याणार्थ प्रकृति के ज्ञान को आवश्यक समझते थे। उनका कहना था कि समाज में उत्पन्न होनेवाला कोई भी असंतोष ग़रीबी और कुशासन का फल होता है। ये दोनों खामियां केवल विज्ञान की मदद से ही मिटायी जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक ज्ञान एक बल है। विज्ञान का लक्ष्य प्रकृति को जानना और उस पर नियंत्रण को सुनिश्चित बनाना है। प्रकृति पर नियंत्रण से समाज में ख़ुशहाली और स्थायित्व लाया जा सकता है। बेशक, उनके मन में निजी स्वामित्व तथा मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण पर आधारित समाज था और प्रकृति के प्रति समाज के रुख़ की बुर्जुआ संकल्पना इन दृष्टिकोणों से अभिपुष्ट ही हुई।

वे प्रकृति से जितना संभव था उतना खसोट लेना चाहते थे, लेकिन किसी ने भी समाज के सामने प्रकृति के संरक्षण का लक्ष्य पेश नहीं किया। प्रकृति पर नियंत्रण का विचार बुर्जुआ दर्शन की आधारशिला बन गया। उसने प्रकृति के प्रति लूट-खसोट के रुख़ और प्राकृतिक संपदा के क्षयीकरण को उचित ठहराया। जब आधुनिक पूंजीवाद में अंतर्निहित मुनाफ़े की प्रबल पूंजीवादी चाह के कारण सारी मानवजाति के विनाश का ख़तरा पैदा करनेवाला पर्यावरणीय संकट उत्पन्न हो गया, तो इस रुख़ की तह में पहुंचने तथा इस पर क़ाबू पाने की जरूरत विशेष तीव्रता से महसूस की जाने लगी।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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