शनिवार, 25 जून 2016

मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - २

( the artificial habitat - 2 )

यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि कृत्रिम निवास स्थल का विकास और परिष्करण ( perfection ), सामाजिक संबंधों तथा समाज के संगठन के विकास तथा परिष्करण के साथ घनिष्ठता से जुड़ा है। जब समाज निजी स्वामित्व ( private property ) पर आधारित होता है और उसका कोई एकल लक्ष्य ( single aim ) नहीं होता, प्रतिरोधी अंतर्विरोधों ( antagonistic contradictions ) के कारण छिन्न-भिन्न हुआ रहता है और इसीलिए नियोजित ढंग ( planned way ) से विकसित नहीं हो सकता है, तब कृत्रिम निवास स्थल के निर्माण से प्राकृतिक पर्यावरण अनिवार्यतः अस्तव्यस्त हो जाता है क्योंकि इन हालतों में कृत्रिम निवास स्थल का निर्माण, मुनाफ़ों की होड़ के चलते परिवेशीय प्रकृति के निर्मम विनाश और शोषण के ज़रिये होता है।

परंतु यदि हम सामाजिक प्रणाली ( social system ) को प्रत्येक व्यक्ति तथा सारे समाज के हितों के अनुरूप और चहुंमुखी विकास के लिए अनुकूल दशाओं की व्यवस्था करने के अंतिम उद्देश्य के अनुसार संगठित करने की कोशिश करेंगे तभी यह संभव हो सकता है कि कृत्रिम निवास स्थल को भी इसी लक्ष्य के अनुसार निर्मित, विकसित, व्यवस्थित और रूपांतरित ( transform ) किया जा सकेगा। ऐसा विकास, प्राकृतिक निवास स्थल के रख-रखाव, संरक्षण और सुधार की अपेक्षा रखता है, क्योंकि उसके बिना मानव का चौतरफ़ा और सांमजस्यपूर्ण ( harmonious ) विकास असंभव है।

अतएव मनुष्य के प्राकृतिक व कृत्रिम निवास स्थल के बीच अंतर्विरोधों में व्यक्त, समाज और प्रकृति के बीच के अंतर्विरोधों पर क़ाबू पाना तथा उनका समाधान किया जाना, स्वयं समाज के आमूल, क्रांतिकारी रूपांतरण के साथ जुड़ा हुआ है। कृत्रिम निवास स्थल का चहुंमुखी विकास और व्यक्ति तथा मानवजाति के विकासार्थ उसका सर्वाधिक अनुकूल दशाओं की प्रणाली में परिवर्तन, प्रबल वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की मांग तथा आह्वान करता है।

आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक तथा अन्य समस्याओं के समाधान के तरीक़े विशेष प्राकृतिक, तकनीकी तथा सामाजिक विज्ञानों का काम हैं। इसका दार्शनिक पहलू इस समझ में निहित है कि प्रकृति और समाज के बीच और कृत्रिम व प्राकृतिक निवास स्थलों के बीच अंतर्विरोधों पर क़ाबू पाना और उनके मध्य सामंजस्य की स्थापना करना केवल तभी संभव है, जबकि निम्नांकित तीन वस्तुगत शर्तों को पूरा किया जाये : (१) समाज के विकास की प्रक्रिया का सचेत ( conscious ), नियोजित, सबके हित में नेतृत्व और प्रबंध करना; (२) सामाजिक प्रणाली में ऐसा आमूल ( radical ) परिवर्तन करना कि व्यक्तियों, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय इजारेदारियों ( monopolies ) के निजी हित, मनुष्य की विशाल जनसंख्या के हितों का दमन ना कर सकें; और (३) वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति के विस्तार तथा गहनीकरण ( deepening ) को हर तरह का संभव प्रोत्साहन देना क्योंकि इतिहास के स्वतःस्फूर्त ( spontaneous ) क्रम की पूर्ववर्ती अवस्थाओं में उत्पन्न कठिनाइयों को इसी आधार पर दूर किया जा सकता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 18 जून 2016

मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में आबादी की भूमिका पर चर्चा की थी, इस बार हम मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल को और गहराई से समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य का कृत्रिम निवास स्थल - १
( the artificial habitat - 1 )

हम पिछली प्रविष्टियों में यह भली-भांति देख चुके हैं कि प्राकृतिक निवास स्थल, प्रकृति के नियम ( जैविक नियमों सहित ) समाज पर सीधा प्रभाव नहीं डालते, बल्कि उत्पादन पद्धति ( mode of production) तथा उसके आधार पर उत्पन्न सामाजिक संबंधों के ज़रिये अप्रत्यक्ष प्रभाव डालते हैं। भौतिक उत्पादन के विकास के साथ-साथ मनुष्य अपने आसपास की प्रकृति में फेर-बदल करता जाता है और एक कृत्रिम निवास स्थल की रचना करता है, जो उसके अपने जीवन के क्रियाकलाप का ही उत्पाद ( product ) होता है।

कृत्रिम निवास स्थल में केवल मनुष्य द्वारा निर्मित अजैव तथा प्रकृति में नहीं पायी जानेवाली वस्तुएं ही नहीं, बल्कि जीवित अंगी ( living organism ) - कृत्रिम वरण ( selection ) या जीन इंजीनियरी से मनुष्य द्वारा प्रजनित या रचित पौधे तथा जानवर - भी शामिल होते हैं। किंतु कृत्रिम निवास स्थल को केवल इस भौतिक आधार तक ही सीमित नहीं किया जा सकता है। मनुष्य केवल कुछ निश्चित सामाजिक संबंधों की प्रणाली ( system ) में ही रह और काम कर सकता है। ये सामाजिक संबंध, निश्चित भौतिक दशाओं में, मनुष्य द्वारा कृत्रिम रूप से निर्मित परिस्थितियों सहित प्रकट होते हैं और दोनों मिलकर मनुष्य के कृत्रिम निवास स्थल बनाते हैं।

समाज के विकास के साथ ही कृत्रिम निवास स्थल की भूमिका लगातार बढ़ती जाती है और मनुष्य के जीवन में उसका महत्व निरंतर बढ़ता है। इस बात पर विश्वास दिलाने के लिए हम निम्नांकित तथ्य पर विचार कर सकते हैं। मानव निर्मित सारी अजैव चीज़ों तथा सजीव अंगियों के द्रव्यमान को तकनीकी द्रव्यमान ( technomass ) कहा जाता है जबकि प्राकृतिक दशाओं के अंतर्गत विद्यमान सारे जीवित अंगियों को जैव द्रव्यमान ( biomass ) कहते हैं। कुछ दशकों पहले अनुमान लगाया गया था कि मनुष्य द्वारा एक वर्ष में निर्मित तकनीकी द्रव्यमान क़रीब १०१३- १०१४ टन के और थल पर उत्पन्न जैव द्रव्यमान क़रीब १०१२ टन के बराबर होता है। इससे यह निष्कर्ष निकला कि मनुष्यजाति एक ऐसा कृत्रिम निवास स्थल बना चुकी है, जो प्राकृतिक निवास स्थल की तुलना में दसियों या सैकड़ों गुना अधिक उत्पादक है

बेशक इसका यह अर्थ नहीं है कि अब लोग प्रकृति और प्राकृतिक निवास स्थल के बिना ही काम चला सकते हैं। प्रकृति हमेशा मनुष्य समाज के अस्तित्व की पूर्वशर्त ( precondition ) व आधार ( foundation ) बनी रहेगी। स्वयं कृत्रिम निवास स्थल केवल तभी अस्तित्वमान और विकसित हो सकता है, जब प्राकृतिक पर्यावरण मौजूद हो। किंतु आज मानवजाति की भौतिक और आत्मिक जरूरतों के एक काफ़ी बड़े अंश की पूर्ति कृत्रिम निवास स्थल से होती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 11 जून 2016

समाज के विकास में आबादी की भूमिका - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में आबादी की भूमिका पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



समाज के विकास में आबादी की भूमिका - २
( the role of population in the development of society - 2 )

उत्पादन पद्धति तथा उसके संनियमन ( governing ) के प्रतिमान ( pattern ) ही आबादी की वृद्धि के प्रतिमानों तथा उसकी संरचना पर निर्धारक प्रभाव क्यों डालते हैं? ऐतिहासिक भौतिकवाद इस प्रश्न का उत्तर भी देता है। मुद्दा यह है कि मनुष्य मुख्य उत्पादक शक्ति है और सारे ऐतिहासिक युगों में आबादी की बहुसंख्या उत्पादक कार्य करती रही है। इसलिए सामाजिक क्रियाकलाप के सारे रूप, उत्पादक क्रियाकलाप के तदनुरूप बने, जिसके दौरान ख़ुद मानवजाति के अस्तित्व की भौतिक दशाओं का निर्माण व विकास हुआ। इसीकी वज़ह से उत्पादन क्रियाकलाप के प्रतिमान अंततः मानव क्रियाकलाप के अन्य सारे रूपों के संदर्भ में निर्धारक ( determinant ) होते हैं। आधुनिक समाज में इस बात का भी स्पष्टतः पता लगाया जा सकता है कि जनसंख्या के विकास तथा उसकी वृद्धि में उत्पादन पद्धति और इसके द्वारा निर्धारित उत्पादन संबंधों की भूमिका निर्णायक है।

प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, यह विश्वास किया जाता है कि खेती के उपकरणों तथा कृषि विज्ञान की वर्तमान स्थिति में खेती की मौजूदा ज़मीनों पर दस अरब से भी अधिक लोगों को भरपेट खिलाने के लिए पर्याप्त खाद्य पैदा किया जा सकता है। यह तथ्य कि विश्व की आबादी इसकी आधी के बराबर है और कई पूंजीवादी तथा विकासमान देशों में सैकड़ों लाखों भुखमरी से पीड़ित हैं या भुखमरी के कगार पर हैं, इस बात का परिणाम है कि पूंजीवादी समाज में अत्यंत विकसित उत्पादक शक्तियों को पूरी तरह से काम में नहीं लगाया जा रहा है। इसकी वजह निजी स्वामित्व ( private property ) की प्रमुखता तथा उसके तदनुरूप ही विकसित सामाजिक प्रणाली में निहित है।

यही नहीं, ‘अतिरिक्त’ ( surplus ) आबादी, जनसंख्या की अत्यंत द्रुत वृद्धि ( rapid growth ) का परिणाम नहीं, बल्कि समाज के एक विशेष रूप का फल है। मालूम है कि सभी प्रमुख पूंजीवादी देशों में बेरोजगारों की एक भारी फ़ौज हमेशा विद्यमान रहती है। यह साबित किया जा चुका है कि बेरोजगारी मनुष्य की संतानोपत्ति के जैविक ( biological ) नियमों के कारण नहीं, बल्कि मुनाफ़ा ( profit ) आधारित पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के विशेष लक्षणों के कारण है। समाज के समाजवादी पुनर्निर्माण के जरिए आबादी वृद्धि को सामाजिक न्याय तथा मानववाद के जनवादी उसूलों के आधार पर संपूर्ण समाज की खुशहाली के लिए संनियमित किया जा सकता है, उसे प्रोत्साहित तथा नियंत्रित भी किया जा सकता है।

साथ ही साथ हमें इस द्वंद्व ( dialectics ) को भी समझ लेना चाहिए कि अत्यधिक आबादी की वृद्धि उत्पादन को धीमा कर सकती है और बड़ी सामाजिक कठिनाइयां पैदा कर सकती है। और दूसरी तरफ़, आबादी में बहुत कम बढ़ती और काम करने वाले हाथों की तंगी, उत्पादक शक्तियों के विकास पर नकारात्मक असर डाल सकती है। इसलिए आज की दशाओं में इस प्रक्रिया के वैज्ञानिक प्रबंध की वस्तुगत ( objective ) आवश्यकता पैदा हो रही है। अभी तक जनसंख्या वृद्धि, सामाजिक उत्पादन और सामाजिक विकास के आम नियमों के आधार पर ही सही पर अचेतन रूप से होती रही है। अब आबादी की वृद्धि के सचेत नियंत्रण की दशाएं और वस्तुगत आवश्यकता पैदा होने लगी है।

यह जन्मदर का जबरिया, अनिवार्य माल्थसवादी परिसीमन ( limitation ) का मामला नहीं, बल्कि कई सुविचारित उपायों ( measures ) का मामला है, जिनके ज़रिये देश के कुछ इलाकों में आबादी बढ़ेगी तथा कुछ अन्य अन्य में रफ़्तार घट जायेगी। इस प्रकार का नियंत्रण मुख्यतः मानवजाति की बहुत बड़ी संख्या की संस्कृति तथा चेतना ( consciousness ) के ऊंचे स्तर पर आधारित होगा। ऐसा केवल उन्हीं सामाजिक-राजनैतिक दशाओं में ही संभव है, जहां सारे श्रम संसाधनों ( labour resources ) का निजी हितों के लिए नहीं, वरन् सारे समाज के हित में नियोजित ( planned ) उपयोग करने की संभावनाएं मूर्त रूप लेंगी।

फलतः इस प्रश्न, कि मौजूदा जनसंख्या विस्फोट प्रकृति और समाज को किस प्रकार प्रभावित कर रहा है और इसके ख़तरनाक परिणामों से कैसे बचा जा सकता है, का उत्तर जैविक नहीं, बल्कि समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) के सामाजिक नियमों में खोजा जाना चाहिए।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 4 जून 2016

समाज के विकास में आबादी की भूमिका - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के विकास में आबादी की भूमिका को समझने की शुरुआत करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



समाज के विकास में आबादी की भूमिका - १
( the role of population in the development of society - 1 )

पश्चिमी अध्येता सामाजिक विकास में सामाजिक नियमों की नहीं, जैविक ( biological ) नियमों की निर्णायकता को सिद्ध करने की कोशिश में आबादी की वृद्धि ( growth ) द्वारा अदा की जानेवाली विशेष भूमिका का नियमतः हवाला देते हैं। वे दावा करते हैं कि समाज की अवस्था, आबादी की वृद्धि पर निर्भर होती है और अपनी बारी में वृद्धि, पुनरुत्पादन ( reproduction ) के जैविक नियमों से निर्धारित होती है, अतः समाज की जीवन क्रिया तथा विकास, जैविक नियमों से संचालित होते हैं। क्या यह सच है? यह मुद्दा ठोस ऐतिहासिक विश्लेषण ( analysis ) की अपेक्षा करता है।

समाज के मामलों में आबादी तथा आबादी की वृद्धि की भूमिका को समझने के लिए हम कुछ तथ्यों पर विचार करेंगे। अब विश्व की आबादी छः अरब से अधिक हो गयी है और उसका तेजी से बढ़ना जारी है। यह वृद्धि कितनी तेज है, इसका अंदाज़ा लगाने के लिए याद करें कि दस हजार साल पहले मानवजाति की संख्या लगभग ५० लाख थी, दो हजार वर्ष पूर्व करीब २० करोड़ थी, १६५० में कम से कम ५० करोड़, १९५० में लगभग ढाई अरब और १९८७ में पांच अरब। आबादी के हाल के वर्षों में देखी इस तीव्र वृद्धि दर को अक्सर ‘जनसंख्या विस्फोट’ कहा जाता है। पश्चिमी अध्येताओं की राय में, और आजकल उनकी यह राय सामान्य रूप से प्रचलन में आती जा रही है, इतने लोगों को आवश्यक वस्तुएं, आवास, वस्त्र, पीने का पानी और वायु मुहैया करने के लिए सारे के सारे प्राकृतिक संसाधन भी काफ़ी नहीं होंगे। अंततः मनुष्यजाति प्रकृति को नष्ट कर देगी और उसके फलस्वरूप स्वयं भी मर जायेगी। ये दलीले ( arguments ) नयी नहीं हैं।

अंग्रेजी अर्थशास्त्री टामस माल्थस ( १७६६-१८३४ ) ने १८वीं सदी के अंत में यह सिद्धांत पेश किया था कि दुनिया की आबादी बहुत तेजी से, ज्यामितिक श्रेढ़ी ( geometric progression ) में बढ़ रही है, जबकि खाद्य तथा अन्य वस्तुओं का उत्पादन अधिक मंद गति से, अंकगणितीय ( arithmetic ) श्रेढ़ी में बढ़ रहा है। उनके अनुयायियों का ख़्याल था कि युद्ध, महामारियां तथा आबादी का विनाश करनेवाली अन्य विपत्तियां आबादी की वृद्धि के नियमन ( regulation ) के आवश्यक साधन हैं। आज के नवमाल्थसवादी भी आबादी के नियंत्रण के लिए कमोबेश वैसे ही, परंतु किंचित छद्मरूप में बाध्यकारी उपाय सुझाते हैं और इस बात पर जोर देना जारी रखते हैं कि विश्व में हमेशा जनाधिक्य रहा है, ऐसे ‘अनावश्यक’ लोगों की अतिरिक्त ( surplus ) संख्या रही है, जो कि उनके कथनानुसार, सामाजिक विकास में बाधा डालते हैं और इसके बिना ही पर्याप्त प्राकृतिक संसाधनों ( resources ) को हड़प जाते हैं। क्या यह बात सच है?

पुरातत्वीय ( archaeological ) आधार सामग्री से पता चलता है कि मनुष्य के पुरखों और समाज की शुरुआती अवधि में, मानवों की संख्या में वृद्धि बहुत मंद थी। कठोर प्राकृतिक दशाओं तथा उत्पादक शक्तियों के निम्न स्तर की वजह से वह बढ़ नहीं पाती थी। जब-जब अधिक विकसित उत्पादन की तरफ़ पहुंचा जाता था, तब-तब जनसंख्या वृद्धि त्वरित ( accelerate ) हो जाती थी। मसलन, पत्थर के औज़ारों से धातु के औज़ारों में संक्रमण ( transition ) और आखेट ( hunting ) तथा खाना बटोरने के युग से पशुपालन व खेती में संक्रमण के साथ ही पृथ्वी पर मनुष्यों की आबादी में छंलागनुमा वृद्धि हुई। 

हालांकि भिन्न-भिन्न सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं ( socio-economic formation ) में उत्पादन शक्तियों के विकास स्तर और जनसंख्या वृद्धि की दर के बीच संबंध की हमेशा के लिए सटीकतः ( exactly ) स्थापना नहीं हुई है, फिर भी इतिहास की आधार सामग्री की मदद से विश्वसनीय ढंग से यह दर्शाना संभव हो जाता है की आबादी की वृद्धि अंततः उत्पादन के विकास पर निर्भर होती है। सामंतवादी उत्पादन पद्धति के लिए, जिसमें कि विकास सापेक्षतः मंद था, आबादी की वृद्धि भी नियमतः धीरे-धीरे होती थी। इसके विपरीत, मशीनी उत्पादन पर आधारित पूंजीवादी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) के द्रुत ( rapid ) विकास ने आबादी की वृद्धि को त्वरित कर दिया।

इस सिलसिले में यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि आबादी की वृद्धि में निर्णायक कारक ( determinant factor ) होने के बावजूद उत्पादन पद्धति उसका एकमात्र कारण नहीं है। आबादी की वृद्धि और संरचना ( structure ) केवल उत्पादक शक्तियों तथा उत्पादन संबंधों से ही प्रभावित नहीं होती, बल्कि कई राष्ट्रीय परंपराओं, जनता की संस्कृति, विविध ऐतिहासिक घटनाओं, युद्धों आदि से भी होती है। इसके साथ-साथ जनसंख्या की वृद्धि दरें तथा इसकी संरचना, भौतिक उत्पादन की सारी प्रणाली पर एक उलट, प्रतिप्रभाव भी डालती है। कुछ मामलों में ये उत्पादन के विकास को बढ़ावा देती हैं, तो कुछ अन्य मामलों में उसके लिए बाधक भी हो जाती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 28 मई 2016

नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - ३
( races and nations - 3 )

आधुनिक विज्ञान ने साबित कर दिया है कि सारी नस्लें मनुष्यजाति के समान पुरखों ( ancestors ) से उत्पन्न हुई हैं। मानवजाति की रचना के दौरान, निर्वाह के प्राकृतिक साधनों ने, बाह्य प्राकृतिक दशाओं की प्रणाली में, निर्णायक भूमिका अदा की। प्राचीन, आदिम क़बीलों ( tribes ) के विभाजन के फलस्वरूप तथा अलग-अलग जैविक उत्परिवर्तनों ( biological mutations ), यानी आनुवंशिकता ( heredity ) में सांयोगिक परिवर्तनों, के परिणाम के रूप में मनुष्य की कुछ द्वितीयक जैविक विशेषताएं ( चमड़ी का रंग, नैन-नक्श आदि ) पैदा हो गयीं और बाद में सुस्थापित होकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होने लगीं।

कुछ ऐतिहासिक दशाओं में उन्होंने उन ठोस प्राकृतिक निवास स्थलों ( natural habitats ) के प्रति मनुष्य के बेहतर अनुकूलन को आगे बढ़ाया जिनमें एक गोत्र-क़बीलाई समुदाय बहुत लंबे समय तक रहता रहा था। सामाजिक विकास के त्वरण ( acceleration ) के साथ-साथ जब प्राकृतिक संपदा ( wealth ) एवं आंतरिक प्राकॄतिक संसाधनों ने अधिकाधिक बड़ी भूमिका अदा करनी शुरू कर दी, तब नस्लीय, जैविक विशेषताओं का अनुकूलनात्मक महत्व अंततः समाप्त हो गया। हमारे युग में सारी नस्लों के सदस्य सारे महाद्वीपों में तथा किन्हीं भी प्राकृतिक तथा सामाजिक दशाओं में रहते हैं और सफलतापूर्वक काम करते हैं।

यह भी साबित कर दिया गया है कि विभिन्न नस्लों के सदस्यों की समान मानसिक क्षमताएं होती हैं तथा समान मनोवैज्ञानिक लक्षण, आदि होते हैं। विभिन्न नस्लों और राष्ट्रों के सदस्यों के बीच मिश्रित विवाहों से नितांत जीवंत संतानें पैदा होती हैं। मानवजाति के दसियों लाख वर्षों के क्रमविकास ( evolution ) के दौरान, जातियों तथा विभिन्न नस्लों के व्यक्तियों ने सैकड़ों बार अपने निवास स्थान बदले और विविध रक्त संबंध तथा पारिवारिक व विवाह संबंध क़ायम किये। इसलिए किसी प्रकार की ‘शुद्ध’ नस्ल की बातें करना उचित नहीं है। ‘शुद्ध’ नस्लें, नस्लवादियों, फ़ासिस्टों तथा राष्ट्रवादी प्रचार ( propaganda ) की वैचारिक मिथक ( ideological myth ) हैं।

आधुनिक राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन तथा एशिया, अफ़्रीका और दक्षिणी अमरीका और कैरीबियन क्षेत्र में अनेकों नये विकासमान देशों का उद्‍भव यह दिखलाता है कि नीग्रो तथा मंगोल नस्लों के जनगण तथा राष्ट्र, वैज्ञानिक-तकनीकी विकास के रास्ते पर सफलतापूर्वक चल सकते हैं और अपने विज्ञान, संस्कृति और अर्थव्यवस्थाओं का ठीक उतनी ही अच्छी तरह से विकास कर सकते हैं जैसे कि यूरोपी नस्ल। वे श्वेत उपनिवेशी अधिकारियों के बिना प्रबंध करने तथा अपनी नियति का स्वयं निर्धारण करने में समर्थ हैं।

हम यह भी अच्छी तरह से जानते हैं कि सारी नस्लों के सदस्यों ने सारे इतिहास में एक निश्चित भूमिका अदा की है। असाधारण वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों, लेखकों और दार्शनिकों के बीच प्रत्येक नस्ल के सदस्यों को देखा जा सकता है। इन तथ्यों से दो अविवादास्पद निष्कर्ष निकलते हैं : (१) सारी नस्लें बराबर हैं और समाज तथा उसकी संस्कृति के विकास में अपना योगदान करने में समर्थ है और नस्लीय श्रेष्ठता का मिथक निराधार है ; (२) नस्लों की जैविक विशेषताएं, विविध राष्ट्रों तथा जनगण की ऐतिहासिक नियति के लिए निर्धारक नहीं है, किंतु इतिहास के दौरान स्वयं उभरी तथा परिवर्तित हुई हैं और बहुत हद तक सामाजिक कारकों से संचालित है। इससे यह स्पष्ट नतीजा निकलता है कि प्रकृति के प्रति लोगों के रुख़ तथा अंतर्क्रिया नस्ल से नहीं, बल्कि सामाजिक और ऐतिहासिक दशाओं तथा कारणों से निर्धारित होती है

जहां तक नस्लों और राष्ट्रों ( जातियों ) के रिश्ते का संबंध है, राष्ट्र नितांत निश्चित ऐतिहासिक दशाओं में बनते हैं और कुलमिलाकर जैविक नहीं, बल्कि सामाजिक विशेषताओं से निर्धारित होते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 21 मई 2016

नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - २

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - २
( races and nations - 2 )

१९वीं सदी के उत्तरार्ध में और २०वीं सदी के प्रारंभ में, जब विश्व की उपनिवेशी प्रणाली ( colonial system ) तथा दुनिया में पुनर्विभाजन ( redivide ) के लिए साम्राज्यवादियों ( imperialists ) का संघर्ष ज़ोर पर था, तब विविध नस्लवादी ( racist ) तथा राष्ट्रवादी ( nationalistic ) सिद्धांतों और दृष्टिकोणों का उत्पन्न होना शुरू हुआ और उनका व्यापक रूप से प्रचार होने लगा।

नस्लवादियों के दृष्टिकोण से लोगों की मुख्य विशेषता उनकी जैविक प्रकृति से निर्धारित होती है। नस्लों के जैविक अनुगुण शाश्वत ( eternal ) और अपरिवर्तनीय हैं, जो लोगों की मानसिक क्षमता, संस्कृति की रचना, आविष्कार तथा शासन करने, अन्य जातियों को अपने अधीन लाने की क्षमता, आदि का निर्धारण करते हैं। नस्लवादी यह सोचते हैं कि कुछ नस्लें ऊंची और कुछ नीची होती हैं और कि मनुष्यजाति के इतिहास तथा उसकी संस्कृति में हर मूल्यवान चीज़ की रचना उच्चतर नस्लों ने की है, जबकि नीची नस्लें उनको आत्मसात करने में भी अक्षम हैं और इसीलिए नीची नस्लों को ऊंची नस्लों द्वारा शासित होना चाहिए।

जर्मन फ़ासिज़्म ( fascism ) के विचारकों का ख़्याल था कि आर्य उच्चतम नस्ल हैं और आर्य भावना जर्मन राष्ट्र में सर्वाधिक पूर्णता से मूर्त है। अमरीकी और दक्षिण अफ़्रीकी नस्लवादी आज भी अश्वेतों ( नीग्रो ) पर श्वेत नस्ल ( यूरोपीय ) की श्रेष्ठता के गुण गाते हैं। नस्लवाद के दृष्टिकोण से नीची जातियां परजीवी ( parasitic ) हैं और प्रकृति तथा सभ्यता को विघटित करती हैं और इसीलिए उनके क्रियाकलाप को ऊंची नस्लों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए।

राष्ट्रवाद, नस्लवाद के साथ घनिष्ठता से संबंधित है। राष्ट्रवादी, एक राष्ट्र की दूसरे पर श्रेष्ठता की शिक्षा देते हैं। सारतः, वे राष्ट्रों को विभाजित करके तथा उन्हें एक दूसरे के मुक़ाबले में खड़ा करके प्रभुतासंपन्न वर्गों ( dominant classes ) द्वारा ग़ुलाम बनाये गये जनगण व राष्ट्रों के शोषण को प्रोत्साहित करते हैं।

फलतः नस्लवाद और राष्ट्रवाद प्रतिक्रियावादी ( reactionary ) भूमिका अदा करते हैं। मनुष्यजाति को ग़रीबी, अधिकारों के अभाव और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए वर्ग संघर्ष के क्रांतिकारी सिद्धांत के मुक़ाबले में, वे कुछ लोगों की अन्य पर श्रेष्ठता के जैविक आधारों के मत को, कुछ राष्ट्रों द्वारा अन्य को ग़ुलाम बनाने के अधिकार को, राष्ट्रीय अंतर्विरोधों और राष्ट्रीय झगड़ों के शाश्वत स्वभाव तथा उन पर क़ाबू पाने की असंभाव्यता के मत को ला खड़ा करते हैं। इन दृष्टिकोणों का मक़सद शोषित वर्ग की शक्तियों में फूट डालना, समान शत्रु के ख़िलाफ़ तथा समानता आधारित समाज की ख़ातिर उनके संघर्ष को कमज़ोर बनाना होता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 14 मई 2016

नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - १

हे मानवश्रेष्ठों,

समाज और प्रकृति के बीच की अंतर्क्रिया, संबंधों को समझने की कोशिशों के लिए यहां पर प्रकृति और समाज पर एक छोटी श्रृंखला प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक आधारों पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय विशेषताओं पर विचार करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



नस्ल और राष्ट्र ( जातियां ) - १
( races and nations - 1 )

जैविक और सामाजिक के संबंध की सटीक समझ हमें समाज के विकास में नस्लीय तथा जातीय ( राष्ट्रीय ) विशेषताओं का निर्धारण करने में मदद देती है।

अपने व्यक्तिगत अनुभव से हर कोई यह जानता है कि लोग अपने विविध गुणों, चरित्र की विशेषताओं, शिक्षा के स्तर, सार्वजनिक हितों के प्रति रुख़, चमड़ी के रंग, ऊंचाई, चहरे की आकृति, भाषा, आदि में एक दूसरे से बहुत भिन्न होते हैं। इनमें से कुछ गुण मनोवैज्ञानिक हैं, कुछ सामाजिक और कुछः अन्य जैविक हैं। जैविक में निम्नांकित शामिल हैं : रंग, क़द, शरीर की कुछ विशेषताएं, आदि। मनुष्य की उत्पत्ति ( origin ), क्रमविकास ( evolution ) तथा मनुष्य की जैविक संविरचना ( biological constitution ) का अध्ययन करनेवाला नृतत्वविज्ञान ( anthropology ) इन गुणों के अनुसार कई नस्लों ( races ) को विभेदित ( distinguish ) करता है।

नस्लें ऐसे विभिन्न मानव समुदायों ( क़बीलों, जातियों, राष्ट्रों ) के समूहन हैं जो कई समान जैविक गुणों की उपस्थिति द्वारा आपस में एक हैं। सामान्यतः तीन नस्लों को विभेदित किया जाता है : यूरोपीय ( सफ़ेद चमड़ीवाले लोग ) ; मंगोलियाई ( पीताभ चर्म तथा तिरछी आंखों वाले लोग ) ; और नीग्रों ( काली चमड़ी वाले लोग )। बेशक, ये सारी विशेषताएं सोपाधिक, यादृच्छिक तथा सापेक्ष हैं और साथ ही वे हमेशा सुस्पष्ट नहीं होती हैं। कभी-कभी मध्यवर्ती, ग़ैरबुनियादी, छोटी नस्लों की बात भी की जाती है। लोगों की नस्लीय विशेषताएं जैविक स्वभाव की होती हैं

नस्लीय विशेषताओं के विपरीत जातीय व राष्ट्रीय विशेषताएं, सामाजिक विशिष्टताओं में व्यक्त होती हैं और इतिहासानुसार विरचित जन-समुदायों ( communities of people ) के लक्षणों को चित्रित करती हैं। इन समुदायों में क़बीले ( tribes ), जातियां ( nationalities ) और राष्ट्र ( nations ) शामिल हैं। सबसे जटिल समुदाय राष्ट्र है, जो एक निश्चित युग में, पूंजीवाद में संक्रमण के युग में लंबे ऐतिहासिक विकास के फलस्वरूप बनते हैं।

एक क़बीले या जाति के सदस्य कुछ पारिवारिक रिश्तों, रक्त संबंधों और एक निश्चित समान मूल ( common origin ) के द्वारा एकीकृत ( united ) होते हैं। परंतु राष्ट्र, विभिन्न क़बीलों तथा जातियों ( कभी-कभी नज़दीकी मूल के ) के एकीकरण, ‘मेल’ ( merging ), ‘संलयन’ ( fusing ) से बनते हैं। एक राष्ट्र के लोग एक भाषा बोलते हैं। वे समान आर्थिक क्रियाकलाप, एक ही भूक्षेत्र पर अधिकार, संस्कॄति और सामाजिक मानसिकता की समरूपता तथा राष्ट्रीय चरित्र की विशेषताओं से परस्पर जुड़े होते हैं। यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि ये सब विशेषताएं सामाजिक विकास के क्रम में उत्पन्न तथा रूपायित ( moulded ) होती हैं और जैविक गुण नहीं होती हैं। राष्ट्र का बनना सामाजिक, ऐतिहासिक तथा आर्थिक विकास की एक नितांत निश्चित अवस्था के साथ जुड़ा होता है।

अब हम नस्लों और राष्ट्रों के बीच के रिश्ते पर, तथा इस बात पर विचार करेंगे कि इसका प्रकृति और समाज की अंतर्क्रिया से और मनुष्य में जैविक तथा सामाजिक के संबंध से क्या नाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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