शनिवार, 16 अगस्त 2014

आभास और सार - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अंतर्वस्तु और रूप’ पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘आभास और सार’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
आभास और सार - १
( Appearance and Essence ) - 1

जब हम एक सेब की जांच करते हैं, उसे सूंघते, महसूस करते हैं तथा उसका स्वाद लेते हैं, तो हमें अनेक संवेदन ( sensations ) प्राप्त होते हैं, जिनसे हम एक निश्चित संवेदात्मक बिंब ( sense image ) की रचना करते हैं। हमारे संवेदनों द्वारा हमें प्राप्त वस्तुगत चीज़ को उसका आभास ( appearance ) कहते हैं। आभास में हमारे गिर्द ( around ) विद्यमान वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं के वस्तुगत गुणों ( objective properties ) बारे में सूचना निहित होती है। हमें वस्तु जो कुछ जान पड़ती है, हमारे सामने जैसी वह प्रकट होती है, यह केवल उसके वस्तुगत लक्षणों पर ही नहीं, बल्कि हमारे संवेद अंगों की संरचना, तंत्रिकातंत्र ( मस्तिष्क सहित ) और अंत में हमारे व्यावहारिक क्रियाकलाप ( practical activity ) पर भी निर्भर होती है।

एक सेब को देखने पर हम पाते हैं कि यह लाल और गोलाकार है। यह वस्तुतः उसकी पहली श्रेणी का आभास है। जब हम सेब की एक फांक को काटकर उसे सूक्ष्मदर्शी के तले देखते हैं, तो हमें उसकी कोशिकीय संरचना नज़र आती है, यह द्वितीय श्रेणी का आभास है। अनुक्रमिक ( sequential ) रूप से एक्स-रे उपकरण तथा इलैक्ट्रोनिक सूक्ष्मदर्शी, आदि का उपयोग करने पर हम सेब की कोशिकाओं की आंतरिक संरचना तथा उसके अंदर जारी आणविक प्रक्रियाओं ( molecular processes ) को होते देखते हैं। इसे तीसरी, चौथी, अदि श्रेणियों का आभास कहा जा सकता है। फलतः प्रवर्ग "आभास" हमारे गिर्द वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं के वस्तुगत बाह्य पक्ष ( objective external aspect ) को परावर्तित करता है, जिससे हमें अपने व्यावहारिक ( practical ) तथा प्रायोगिक क्रियाकलाप ( experimental activity ) में सामना पड़ता है। आभास बाह्य लक्षणों का, अनुगुणों तथा वस्तुओं के अंदर या उनके मध्य संबंधों का साकल्य है, वह रूप है, जिसमें सार अपने को प्रकट करता है। हम इस बाह्य, दिखावटी पक्ष का सीधे या उपकरणों व औज़ारों के ज़रिये अनुबोध ( perceive ) प्राप्त करते हैं।

किंतु प्रवर्ग ‘सार’ ( essence ) किसको परावर्तित करता है? उपरोक्त उदाहरण को ही देखते हैं। हम अलग-अलग विशेषताओं, मसलन सेब के रंग, आकृति तथा आकार के बारे में दृष्टि संवेदनों की प्राप्ति से जानकारी हासिल करते हैं। ये लक्षण इसे अन्य वस्तुओं से विभेदित करते हैं। बाद में हम इस जाति के सारे फलों के लिए लाक्षणिक उसकी कोशिकीय संरचना के बारे में जानते हैं। कुछ और आगे बढ़ने पर हम कोशिकाओं में होनेवाली उन भौतिक तथा रासायनिक प्रक्रियाओं के बारे में धारणा बनाते हैं, जो केवल पौधों की ही नहीं, बल्कि सामान्यतः जीवित अंगियों ( living organism ) की विशेषता भी है। सेब की आंतरिक संरचना में और गहरे पैठ कर हमें उन अधिकाधिक स्थायी ( stable ), आवश्यक संयोजनों ( necessary connections ) की जानकारी मिलती है, जो फल की इस जाति की वृद्धि ( growth ), विकास प्रक्रियाओं का संनियमन ( governing ) करते हैं।

दूसरे शब्दों में, पहली श्रेणी के आभास से दूसरी व अन्य श्रेणियों के आभास की तरफ़ चलते हुए तथा आभास या परिघटना ( phenomena ) की आंतरिक संरचना को जानकर हम उनकी वस्तुगत नियमितताओं ( objectives patterns ) का पता लगा सकते हैं। ये नियमितताएं ही उनके सार की रचना करते हैं। फलतः प्रवर्ग "सार" उन आंतरिक ( inner ), गहन अनुगुणों ( deep properties ) और संयोजनों ( connections ) को परावर्तित करता है, जो अध्ययनशील वस्तुओं और प्रक्रियाओं की कार्यात्मकता ( functioning ) तथा विकास का नियमन करते हैं। सार एक घटना या घटनाओं की आंतरिक नियमितताओं की समग्रता ( aggregate ) को परावर्तित ( reflect ) करता है। इस तरह हम देखते हैं कि प्रवर्ग "सार" तथा "नियम" ( law ) एक ही श्रेणी की संकल्पनाएं ( concepts ) हैं। जटिल सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के समय इसे याद रखना विशेष महत्त्वपूर्ण है। विज्ञान और क्रांतिकारी व्यवहार के लिए घटना के सार को समझना बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है।

जैसा कि हम देखते हैं, आभास और सार की संकल्पनाएं वस्तुओं और प्रक्रियाओं के अंतर्संबधित पक्षों ( interrelated aspects )  को द्वंद्वात्मकतः परावर्तित करती हैं इसीलिए इनके बीच कोई सुस्पष्ट विभाजक रेखा नहीं होती है। जो चीज़ आज नहीं देखी जा सकती है और जो किसी वस्तु का सार है, वह कल प्रेक्षण ( observation ) के दायरे में आ सकती है और आभास में परिणत ( resulted ) हो सकती है। प्रवर्ग "आभास" और "सार" एक तरफ़ से अंतर्विरोधी ( contradictory ) प्रतीत होते हैं, क्योंकि उनमें से एक प्रवर्ग बाह्य पक्ष को जो कि अधिक परिवर्तनशील है तथा दूसरा प्रवर्ग आंतरिक पक्ष को जो कि अधिक स्थायी है, परावर्तित करता है। ये द्वंद्वात्मक रूप से जुड़े हैं और एक दूसरे में संक्रमण ( transition ) करते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 9 अगस्त 2014

अंतर्वस्तु और रूप - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अंतर्वस्तु और रूप’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अंतर्वस्तु और रूप - २
( Content and Form ) - 2

अंतर्वस्तु और रूप की एकता, अटूट संबंध और अंतर्क्रिया एक सार्विक नियम है। ऐसी एकता इस तथ्य से उपजती है कि पहले, वे एक दूसरे के बग़ैर अस्तित्व में नहीं रह सकते ; अंतर्वस्तु हमेशा एक रूप में आवृत्त ( covered ) होती है और रूप हमेशा किसी अंतर्वस्तु को आवेष्टित ( involved ) करता है। दूसरे, अंतर्वस्तु का अस्तित्व एक निश्चित रूप में ही हो सकता है : कोई भी ठोस रूप हमेशा एक निश्चित अंतर्वस्तु के तदनुरूप ( corresponding ) होता है।

इसके साथ ही अंतर्वस्तु और रूप की एकता हमेशा के लिए अपरिवर्तनीय ( unchangeable ) नहीं होती। यह गत्यात्मक ( dynamic ) और द्वंद्वात्मकतः अंतर्विरोधी ( contradictory ) होती है। वस्तुओं में अंतर्वस्तु और रूप हमेशा अपने विकास के विरोधी ( opposite ) पक्षों या तत्वों की शक्ल में प्रकट होते हैं। चूंकि कोई भी वस्तु सार्विक अंतर्क्रिया की स्थिति में होती है, अतः उसकी अंतर्वस्तु में बदलते रहने की प्रवृत्ति ( tendency ) होती है। इसके विपरीत प्रदत्त वस्तु के अस्तित्व का रूप वस्तु के स्वसंरक्षण ( self-preservation ) तथा स्थायित्व ( sustainability ) की प्रवृत्ति को व्यक्त करता है ; संपर्क और संबंध, वह ढंग, जिसके अनुसार रूप के तत्व संगठित हैं, उतनी जल्दी परिवर्तित नहीं हो सकते, जितनी जल्दी अंतर्वस्तु के घटक पहलू और प्रक्रियाएं बदलती हैं।

रूप अंतर्वस्तु के प्रभाव से उत्पन्न व परिवर्तित होता है, जिससे इसके परिवर्तन में अंतर्वस्तु के परिवर्तन से किंचित पीछे रहने का रुझान ( trend ) हो जाता है। अंतर्वस्तु और रूप के संघर्ष का कारण यही है। उनके बीच अंतर्विरोध ( contradiction ) का विकास और समाधान वस्तुओं के विकास का एक मुख्य स्रोत है, उनके रूपों में परिवर्तनों तथा उनकी अंतर्वस्तु के रूपांतरण ( transformation ) का मुख्य कारण है। वस्तुओं में परिवर्तन उनकी अंतर्वस्तु में परिवर्तनों से प्रारंभ होते हैं, जो अंततः उनके रूप के विकास का निर्धारण ( determination ) करते हैं। यही कारण है कि अंतर्वस्तु और रूप की द्वंद्वात्मक एकता ( dialectical unity ) में अंतर्वस्तु निर्णायक भूमिका ( decisive role ) अदा करती है।

वस्तुओं के विभिन्न पक्षों का, अंतर्वस्तु और रूप में विभाजन भी निरपेक्ष ( irrelative, absolute ) नहीं है : वह, जो एक संदर्भ में अंतर्वस्तु है, दूसरे में रूप बनकर प्रकट होता है और इसका विलोम भी सही है। मसलन, यदि हम एक उत्पादन पद्धति को देखें तो उत्पादन के संबंध उसके रूप हैं, जबकि उत्पादक शक्तियां उसकी अंतर्वस्तु हैं। इसके साथ ही ये ही उत्पादन संबंध, किसी भी सामाजिक-आर्थिक विरचना का आधार होते हैं, अतः इस संदर्भ में ये इस विरचना की अंतर्वस्तु के रूप में प्रकट होते हैं। रूप की सापेक्षता ( relativity ) का मतलब यह है कि यद्यपि यह अंततः अंतर्वस्तु से निर्धारित होता है, तथापि इसके विकास के स्वयं अपने ही नियम भी हैं। इसके फलस्वरूप रूप और अंतर्वस्तु का विकास समकालिक ( simultaneous ) नहीं होता और इससे उनके बीच स्वभावतः एक अंतर्विरोध उत्पन्न हो जाता है। विकास के दौरान एक नयी अंतर्वस्तु कुछ समय तक पुराने रूप को धारण किये रह सकती है। इसी तरह एक ही अंतर्वस्तु विभिन्न रूप भी ग्रहण कर सकती है।

रूप और अंतर्वस्तु की द्वंद्वात्मकता की एक और अभिव्यक्ति ( expression ) यह है कि उनके बीच के अंतर्विरोध अनिवार्यतः बिगड़ते हैं और कुछ दशाओं में टकराव ( clash ) की हद तक पहुंच जाता है। उस हद पर आगे और अधिक विकास केवल तभी हो सकता है, जबकि पुराना रूप नये रूप से प्रतिस्थापित ( replaced ) हो ताकि अंतर्वस्तु और रूप के बीच एक नयी संगति ( consistency ) स्थापित हो जाए। इसके बाद यह चक्र नये सिरे से चालू हो जाता है।

संज्ञान ( cognition ) की प्रक्रिया के लिए भी रूप और अंतर्वस्तु की वस्तुगत द्वंद्वात्मकता बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। चूंकि रूप अंतर्वस्तु से संयोजित ( connected ) और उसकी एक अभिव्यक्ति है, इसलिए संज्ञान को रूप के अवबोधन ( perception ) से आरंभ करके अंतर्वस्तु के उद्‍घाटन ( exposition ) की ओर, और फिर वापस सारी वस्तु की तरफ़ जाना चाहिये और उसके बाद एक उच्चतर स्तर पर रूप के अध्ययन पर पहुंचना और यही सिलसिला जारी रखना चाहिये। सच्चा वैज्ञानिक ज्ञान तभी बनता है, जब संज्ञान अंतर्वस्तु को तथा उसके व रूप के बीच वस्तुगत द्वंद्वात्मकता को उद्‍घाटित ( exposed ) करता है। यथा, जैव प्रकृति का संज्ञान वनस्पति व जीवों की बाहरी विशेषताओं के बारे में ज्ञान के संचय ( collection ) तथा जातियों, वंशों, वर्गों में उनके वर्गीकरण ( classification ) से शुरू हुआ और फिर उनकी अंतर्वस्तु को उद्‍घाटित करने, यानी विशिष्ट अंतरों के आनुवंशिक आधार ( genetic basis ) तथा क्रमविकास ( evolution ) के सर्वाधिक सामान्य नियमों का पता लगाने के लिए अग्रसर हुआ।

वस्तु के विकास में इसके विभिन्न पहलुओं और तत्वों की भूमिका को स्पष्ट करना भी महत्त्वपूर्ण है। सार और आभास के प्रवर्ग से हमें इसे समझने में मदद मिलती है, जिसे हम अगली बार प्रस्तुत करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 2 अगस्त 2014

अंतर्वस्तु और रूप - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक )’ पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘अंतर्वस्तु और रूप’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अंतर्वस्तु और रूप - १
( Content and Form ) - 1

हमारे गिर्द दुनिया सतत गतिमान है। यह गति अनेक रूपों में होती है। हम अक्सर साहित्यिक व कलात्मक रचनाओं में रूप ( form ) और अंतर्वस्तु ( content ) की, सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों, सामाजिक प्रतिद्वंद्विता, आदि के रूपों के बारे में चर्चा करते हैं। दैनिक जीवन में हम इन शब्दों के सही-सही वैज्ञानिक अर्थ पर शायद ही कभी विचार करते हैं, लेकिन सैद्धांतिक दार्शनिक मामलों पर विचार करते समय ऐसा करना जरूरी होता है।

रूप और अंतर्वस्तु क्या है? हमारे आसपास की घटनाएं बहुत जटिल हैं, उनके अनगिनत भाग और तत्व होते हैं, जिनके बीच स्थायी संबंध, संयोजन ( connections ) या अंतर्क्रियाएं ( interactions ) होती हैं, जिन्हें संरचनाएं ( structures ) कहा जाता है। किसी भी संरचना का एक बाहरी और एक भीतरी पक्ष होता है। संरचना के बाहरी पक्ष को उसका रूप कहते हैं और भीतरी पक्ष तथा उसके घटक तत्वों व प्रक्रियाओं को उसकी अंतर्वस्तु कहते हैं। अंतर्वस्तु और रूप के प्रवर्ग ( category ) वस्तु या घटना के सार ( essence ) को समझने में सहायक होते हैं। सारी वस्तुओं और घटनाओं की अपनी अंतर्वस्तु और रूप होता है। सारी वस्तुएं वस्तुतः अपने बाहरी पक्ष में एक दूसरे से तथा मनुष्य के साथ अंतर्क्रिया करती हैं, इसलिए उनकी अंतर्वस्तु प्रत्यक्ष प्रकाश में नहीं आती, बल्कि बाहरी पक्ष, यानी रूप की मध्यस्थता से ऐसा करती हैं।

अंतर्वस्तु, उन तत्वों, पहलुओं, प्रक्रियाओं तथा उनके संबंधों का साकल्य है, जो प्रदत्त वस्तु या घटना के अस्तित्व ( existence ) के लिए आधारभूत ( basic ) हैं और जिन पर उनके रूप का विकास और परिवर्तन आश्रित ( dependent ) है। रूप, अंतर्वस्तु के संगठन और अस्तित्व की विधि है, किसी एक प्रदत्त अंतर्वस्तु के तत्वों, पहलुओं और प्रक्रियाओं के बीच ऐसा आंतरिक विशिष्ट संयोजन होता है, जो अंतर्वस्तु को बाह्य दशाओं के साथ अपनी अंतर्क्रिया में एक प्रकार की अखंडता ( integrity ) प्रदान कर देता है।

अंतर्वस्तु तथा रूप किसी वस्तु या घटना के दो अभिन्न पक्ष ( integral aspects ) हैं। विश्व में रूप और अंतर्वस्तु के बिना कुछ नहीं होता है। मसलन, कोई भी जीवित अंगी ( living organism ) तत्वों ( कोशिकाओं, अंगों, हिस्सों ) तथा प्रक्रियाओं ( उपापचयन, उत्परिवर्तन, आदि ) से बना होता है, जो उसकी अंतर्वस्तु की रचना करती हैं। इन तत्वों और प्रक्रियाओं के संगठन व संबंध की जो विधि ( method ) उस अंतर्वस्तु को अपना अस्तित्व रखने में सक्षम बनाती है, वह उसका रूप है। इस तरह, संपूर्ण जैव प्रकृति, रूप और अंतर्वस्तु के तादात्म्य या अविभाज्यता का एक सतत प्रमाण है।

सारी सामाजिक प्रक्रियाओं और घटनाओं में अंतर्वस्तु और रूप की एक आंगिक एकता ( organic unity ) भी होती है। मसलन, उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) किसी भी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) की अंतर्वस्तु हैं और उत्पादन संबंध ( relations of production ) उसका रूप हैं। साहित्य और कला की कृतियों में कलात्मक बिंबों के रूप में परावर्तित जीवन ( reflected life ) उनकी अंतर्वस्तु है और इन बिंबों को संगठित और व्यक्त करने की पद्धति उनका रूप हैं। इस तरह, भाषा, संरचना, शैली, आदि साहित्यिक कृति का रूप हैं।

किन्हीं भी वस्तुओं और प्रक्रियाओं की अंतर्वस्तु का एक बाहरी और एक भीतरी रूप होता है। वस्तुओं का बाहरी रूप उनका आयतन, आकृति, रंग आदि है और भीतरी रूप उसकी अंतर्वस्तु का संगठन है। बाहरी रूप अंतर्वस्तु के साथ उतनी घनिष्ठता से नहीं जुड़ा होता, जितना की भीतरी रूप। अंतर्वस्तु में कोई भी परिवर्तन किये बग़ैर उस रूप में उल्लेखनीय परिवर्तन किये जा सकते हैं। मसलन, किसी भी महत्त्वपूर्ण पुस्तक को विभिन्न आकार-प्रकारों वाले चार या दस खंडों में छापा जा सकता है, भिन्न-भिन्न गुणवत्ता वाले काग़ज़ पर मुद्रित ( print ) किया जा सकता है, भिन्न-भिन्न तरीक़ों से रूपांतरित किया जा सकता है, आदि-आदि। लेकिन कुछ मामलों में, जैसे विमान या जहाज निर्माण में, अंतर्वस्तु पर काफ़ी अधिक प्रभाव डाले बिना बाहरी रूप में मनमाने परिवर्तन नहीं किये जा सकते। यहां बाहरी रूप तकनीकी दृष्टि से इतना समुपयुक्त ( suitable ) है कि वह अंतर्वस्तु से प्रत्यक्षतः संयोजित ( direct connected ) हैं।

आंतरिक रूप, अंतर्वस्तु से और भी अधिक घनिष्ठता ( closeness ) से जुड़ा होता है। उसमें होनेवाले कोई भी परिवर्तन किसी न किसी तरह से अंतर्वस्तु में परावर्तित होते ही हैं। मसलन, शैली या संरचना में परिवर्तन कथानक को, साहित्यिक रचना की अंतर्वस्तु को अवश्य ही प्रभावित करता है, उससे रचना का भावनात्मक प्रभाव ( emotional impact ) निश्चय ही भिन्न हो जाता है। कला में अंतर्वस्तु और रूप की एकता, उसका एक प्रमुख नियम तथा जीवंतता का स्रोत है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 26 जुलाई 2014

व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग" पर चर्चा शुरू करते हुए ‘व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक )’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) - २
the individual, particular and general ( universal ) - 2

व्यष्टिक और सार्विक अंतर्संबंधित हैं। प्रत्येक व्यष्टिक ( किसी न किसी तरह ) सार्विक है। प्रत्येक सार्विक व्यष्टिक ( उसका एक टुकड़ा, या एक पहलू, अथवा उसका सार ) है। व्यष्टिक केवल उस संपर्क में अस्तित्व रखता है, जो सार्विक की ओर जाता हैसार्विक केवल व्यष्टिक में और व्यष्टिक के द्वारा अस्तित्व में आता है। सामान्य था व्यष्टिक के साथ उसके अंतर्संबंध की यह द्वंद्वात्मक-भौतिकवादी समझ वास्तविकता के सही ज्ञान के वास्ते बहुत महत्त्वपूर्ण है। सामान्य, वस्तुओं के सार ( essence ) से बद्धमूल होता है और उनकी आंतरिक एकता की एक अभिव्यक्ति होता है। यही कारण है कि वस्तुओं तथा घटनाओं के सार को तथा उनके विकास के नियमों को समझने का तरीक़ा सामान्य को समझना है। और सामान्य को केवल व्यष्टिक के द्वारा ही समझा जा सकता है।

स्वयं यथार्थता में सार्विक, विशेष तथा व्यष्टिक के बीच गहरा द्वंद्वात्मक संयोजन ( dialectical connection ) होता है। सार्विक और विशेष, व्यष्टिक में विद्यमान तथा उसके द्वारा व्यक्त होते हैं और विलोमतः कोई भी व्यष्टिक वस्तु तथा प्रक्रिया में कुछ विशेष और सार्विक विद्यमान होता है। यह उसूल ( principle ) प्रकृति, समाज तथा चिंतन में अनुप्रयोज्य ( applicable ) है। प्रत्येक पौधा तथा जंतु सामान्य जैविक नियमों के अंतर्गत होता है और साथ ही ऐसे विशिष्ट नियमों से भी संनियमित ( governed ) होता है, जो केवल उसकी प्रजातियों ( species ) के लिए ही लाक्षणिक होते हैं। इसके साथ ही साथ सार्विक और विशिष्ट, व्यष्टिक के बगैर तथा उससे पृथक ( separate ) रूप में विद्यमान नहीं होते हैं। समाज के सार्विक प्रतिमान ( general patterns ) पृथक श्रम समूहों के क्रियाकलाप में तथा उन समूहों की रचना करनेवाले व्यक्तियों के क्रियाकलाप में व्यक्त होते हैं।

एक मनुष्य, शुरू में, अपने संवेद अंगों से व्यष्टिक का, अलग-अलग घटनाओं का और उनके विविध अनुगुणों का बोध प्राप्त करता है, फिर उसका चिंतन इन अवबोधनों का विश्लेषण ( analysis ) करता है, आवश्यक को अनावश्यक से, सामान्य को व्यष्टिक से पृथक करता है। उसके बाद चिंतन, घटनाओं के एक समुच्चय के सामान्य और आवश्यक लक्षणों के संश्लेषण ( synthesis ) और सम्मेल के द्वारा इन घटनाओं के बारे में एक धारणा ( notion, concept ) बनाता है, जो घटनाओं के समुच्चय के सामान्य और साथ ही आवश्यक लक्षणों को व्यक्त करती है। कुलमिलाकर, संज्ञान की प्रक्रिया व्यष्टिक से शुरू होती है, विशिष्ट से गुजरती हुई सामान्य व सार्विक पर पहुंचती है

व्यष्टिक और सामान्य के प्रवर्ग ( categories ), नूतन ( new ) की उत्पत्ति की प्रक्रिया को समझने मे भी सहायक है। मुद्दा यह है कि नूतन प्रकृति और समाज में अक्सर तुरंत उत्पन्न नहीं होता है। शुरू में यह व्यष्टिक के रूप में पैदा होता है, फिर दृढ़ व साकार होकर विशिष्ट बन जाता है और अंततः सामान्य और सार्विक तक बन जाता है। सारे नये उपक्रम और आंदोलन इसी तरह उपजते हैं, इसी तरह से क्रांतिकारी चेतना उत्पन्न व सुदृढ़ होती है।

इस तरह से हम अब यह आसानी से समझ सकते हैं कि यदि हम ‘व्यष्टिक’ की विशषताओं की अवहेलना ( neglect ) करते है और बदलती हुई दशाओं और परिस्थितियों की परवाह किये बग़ैर ‘सामान्य’ के उपयोग पर बल देते हैं, तो हम नयी परिस्थितियों के समुचित विश्लेषण के बिना सामान्य फ़ार्मूलों को महज़ दोहराते रह जाएंगे और इस तरह जीवन तथा समाज के साथ अपने संपर्कों से हाथ धो बैठ सकते हैं। सामान्य की भूमिका से इन्कार तथा विशिष्ट और व्यष्टिक पर अनुचित ज़ोर देने से भी ऐसी ही गंभीर ग़लतियां हो सकती हैं। इसलिए व्यष्टिकता और सामान्यता के द्वंद्व को समुचित रूप से हल करके ही हम जीवन और समाज में सफल हस्तक्षेपों ( interventions ) के वाहक हो सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 19 जुलाई 2014

व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग" पर चर्चा शुरू करते हुए ‘प्रवर्ग’ की अवधारणा पर विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों पर दृष्टिपात किया था, इस बार हम ‘व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक )’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) - १
the individual, particular and general ( universal ) - 1

यह जानने के लिए अपने चारो तरफ़ की वस्तुओं पर एक नज़र डालना ही काफ़ी है कि वे सब, किसी न किसी तरह, एक दूसरे से भिन्न ( differ ) हैं। वस्तुओं और घटनाओं की गुणात्मक विविधता ( qualitative diversity ) पर विचार करते हुए हम जानते हैं कि वे एक दूसरे से भिन्न होती हैं। दुनिया में दो पूर्णतः अनुरूप वस्तुएं नहीं होती। यहां तक कि बिलियर्ड की दो समरूप ( identical ) गेंदे भी जब सूक्ष्मता से तोली जाती हैं तो उनके बीच एक ग्राम के हज़ारवें अंश का अंतर होता है। हालांकि क्वांटम यांत्रिकी इस बात की पुष्टि करती है कि एकसमान नाम के प्राथमिक कण एक दूसरे से अविभेद्य ( indistinguishable ) होते हैं, फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी प्रदत्त क्षण ( given moment ) पर वे भिन्न-भिन्न स्थानों पर हो सकते हैं और भिन्न परमाणुओं की रचना कर सकते हैं। यही नहीं, पृथ्वी के अरबों मनुष्यों में भी दो ऐसे आदमी नहीं होते, जिनकी उंगलियों की छाप एक-सी हो। बेशक, सर्वोपरि बात यह है कि वस्तु, लोग एक दूसरे से भिन्न होते हैं।

संक्षेप में हमारे गिर्द सारी घटनाओं और प्रक्रियाओं में अनूठे लक्षण ( features ) और गुण-विशेष ( attribute ) होते हैं, जो कमोबेश हद तक उनमें अंतर्निहित ( inherent ) होते हैं, यानि उनमें व्यष्टिकता ( individuality ) होती है। एक वस्तु को दूसरी वस्तुओं से भिन्न बनानेवाले इन्हीं अलग-अलग लक्षणों का साकल्य "व्यष्टिक" ( individual ) कहलाता है। ऐसे लक्षणों के आधार पर ही, उदाहरण के लिए, हज़ारों लोगों के बीच से अपने परिचित को अलग पहचाना जा सकता है, वस्तुओं के अंबार में से भी अपनी इच्छित वस्तु अलग पहचानी जा सकती है।

लेकिन विभिन्न वस्तुएं विशिष्ट और भिन्न ही नहीं, बल्कि कई मामलों में एक दूसरी के समान भी होती हैं। ऐसी कोई वस्तुएं नहीं हैं, जिनमें कुछ न कुछ आपसी समानता न हो। जिस हालत में विभिन्न वस्तुओं के बीच कुछ भी समानता नहीं दिखाई देती, उस हालत में भी किंचित गहरी जांच करने पर उनमें कुछ मूल अनुगुणों ( properties ) तथा गुणों ( qualities ) की समानता अवश्य दिखाई देगी। मसलन, सारे लोग एक दूसरे से भिन्न होते हैं, लेकिन उन सभी में कुछ ऐसे लक्षण होते हैं, जो उन सबको मनुष्य बनाते हैं। हरेक मनुष्य इस पृथ्वी पर अनेक मनुष्यों के साथ रहता है और हजारों विविध संयोजनों तथा समानताओं से उनके साथ अंतर्संबंधित ( interrelated ) होता है। एक मनुष्य की शारीरिक बनावट तथा शारीरिक क्रियाएं अन्य मनुष्यों के समान होती हैं। अन्य लोगों की तरह वह भी महसूस कर सकता है, सोच, बोल व काम कर सकता है। वह एक निश्चित नस्ल और जाति का होता है और उसमें तदनुरूप विशेषताएं होती हैं। वह एक निश्चित वर्ग ( class ) या सामाजिक श्रेणी का भी होता है और उनके विशिष्ट लक्षणों को परावर्तित ( reflect ) करता है, आदि-आदि।

इस तरह व्यष्टिक घटनाओं में ऐसे गुण-विशेष ( attribute ) और अनुगुण होते हैं जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) ही नहीं करते, बल्कि उन्हें एक दूसरे के समान ( similar ) भी बनाते हैं। इस आधार पर हम उन्हें विभिन्न समूहों ( groups ) में रख सकते हैं और समूह के सामूहिक लक्षण निश्चित कर सकते हैं। घटनाओं और प्रक्रियाओं के कुछ समुच्चयों में अंतर्निहित वस्तुगत विशेषताओं ( objective traits ) तथा अनुगुणों को प्रवर्ग ‘विशेष’ या "विशिष्ट" ( particular ) से परावर्तित किया जाता है

वस्तुओं के समुच्चय के समान, अनुरूपी, पुनरावर्ती ( recurring ) लक्षण सामान्य के रूप में व्यक्त होते हैं। घटनाओं तथा प्रक्रियाओं के पृथक समूहों में अंतर्निहित अनुगुणों और गुण-विशेषों के साथ ही वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) में प्रदत्त क़िस्म की सारी घटनाओं तथा प्रक्रियाओं की लाक्षणिक विशेषताएं, अनुगुण और संबंध भी होते हैं। उन्हें "सामान्य" या "सार्विक" ( general or common ) प्रवर्ग से परावर्तित किया जाता है। जैसा कि उपरोक्त उदाहरण से जाहिर है, वस्तुओं के सर्वनिष्ठ अनुगुण या पहलू हमेशा पहली ही निगाह में स्पष्ट नहीं होते। वे उनके समान उद्‍गम ( origin ), एक ही विकास-नियमों, आदि में बद्धमूल ( rooted ) हो सकते हैं।

इसके साथ ही सामान्यता की कोटि ( degree ) में भी अंतर हो सकता है। मसलन, पेड़ होने का अनुगुण, आम का या खजूर का पेड़ होने के अनुगुण के मुक़ाबले अधिक सामान्य है। लेकिन एक वनस्पति होने की ख़ासियत के मामले में वह कम सामान्य है। अधिक सामान्य अनुगुण की तुलना में कम सामान्य, विशिष्ट के रूप में व्यक्त होता है। इस मामले में पेड़ एक विशिष्ट वनस्पति है। जो अनुगुण और लक्षण सारे गोचर ( visible ) विषयों में, बिना अपवाद, अंतर्निहित होते हैं उन्हें सबसे ज़्यादा सामान्य या सार्विक ( universal ) कहा जाता है। द्वंद्ववाद ( dialectics ) वस्तुओं और घटनाओं के विकास के इन्हीं सार्विक लक्षणों का अध्ययन करता है और वे उसके नियमों व प्रवर्गों में परावर्तित होते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 12 जुलाई 2014

प्रवर्गों पर दार्शनिक दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग" पर चर्चा शुरू करते हुए ‘प्रवर्ग’की अवधारणा को समझने का प्रयास किया था, इस बार हम ‘प्रवर्ग’ की अवधारणा पर विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों पर दृष्टिपात करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रवर्गों पर दार्शनिक दृष्टिकोण
( philosophical approaches on categories )

प्राचीन काल में ही अन्य संप्रत्ययों ( concepts ) से प्रवर्गों ( categories ) का भेद जान लिया गया था और तबसे ही प्रवर्गों के बारे में दार्शनिकों के बीच निरंतर विवाद चल रहा है। विभिन्न दार्शनिकों ने प्रवर्गों के बारे में विभिन्न सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं।

इनमें से एक सिद्धांत की विवेचना करें, जिसे काण्ट  ने प्रतिपादित किया था। काण्ट इस बात पर विशेष बल देते हैं कि चूंकि हर प्रवर्ग उसमें सम्मिलित बहुसंख्य संकीर्णतर संप्रत्ययों की समष्टि है, इसलिए वह हमारे समस्त ज्ञान ( knowledge ) को एक सूत्र में पिरोता है और उसका संश्लेषण ( synthesis ) करता है और इसीलिए संज्ञान ( cognition ) में प्रवर्गों की बहुत ही बड़ी भूमिका है। इस निष्कर्ष के पीछे काण्ट का यह तर्क है : जब लोगों ने पहली बार ऐसी धातु देखी, जिसे जंग नहीं लगता, तो उन्होंने ‘सोना’ संप्रत्यय बनाया। सागरयात्रियों ने जब आर्कटिक महासागर में विराट तैरते हिमपर्वत देखे, तो ‘हिमशैल’ संप्रत्यय पैदा हूआ। इस तरह सभी आम संप्रत्यय भौतिक वस्तुओं के साथ लोगों के संपर्क के परिणाम, हमारी ज्ञानेन्द्रियों पर इन वस्तुओं के प्रभाव, अर्थात अनुभव ( experience ) के परिणाम हैं। इसलिए वे सब भौतिक विश्व की परिघटनाओं ( phenomena ) के बारे में हमारा ज्ञान हैं।

किंतु प्रवर्ग के साथ दूसरी ही बात है। जिस परिघटना को हम पहले नहीं जानते थे, उससे साक्षात्कार होने पर हम तुरंत उसका कारण ( cause ) ढूंढ़ने लगते हैं, यह जानने की कोशिश करते हैं कि उसमें सांयोगिक ( coincidental ) क्या है और अनिवार्य ( essential ) क्या है, आदि। इन प्रवर्गों के इस्तेमाल के बिना वस्तुओं के साथ कोई भी संपर्क नहीं होता, कोई भी अनुभव हासिल नहीं किया जाता : हम अभी नहीं जानते कि दत्त ( given ) परिघटना का कारण क्या है, मगर हमें विश्वास है कि उसमें कुछ सांयोगिक और कुछ न कुछ अनिवार्य अवश्य है। इस आधार पर काण्ट  निष्कर्ष निकालते हैं कि हम भौतिक विश्व की वस्तुओं के साथ संपर्क में आने, उनका अनुभव प्राप्त करने से पहले ही अनिवार्यता और संयोग, कार्य और कारण आदि के प्रवर्गों से परिचित रहते हैं। काण्ट के अनुसार, प्रवर्ग अनुभव का परिणाम नहीं होता, अपितु अनुभव से पहले ही विद्यमान रहता है, यानि वह अनुभव की पूर्वापेक्षा ( pre-requisite ) है।

काण्ट  आगे कहते हैं : चूंकि प्रवर्ग हमारे मस्तिष्क में अनुभव से पहले ही विद्यमान रहते हैं ( जो बात आम संप्रत्ययों के लिए नहीं की जा सकती ), इसलिए उनमें भौतिक विश्व का कोई ज्ञान नहीं होता ; यथार्थ वास्तविकता ( actual reality ) में ऐसा कुछ नहीं है, जो प्रवर्गों से मेल खाता हो। वे सब, यानी अनिवार्यता और संयोग, कार्य और कारण, आदि प्रवर्ग मनुष्य के मस्तिष्क में ही कल्पित ( assumed ) किये जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि हमारे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय - प्रवर्ग - भौतिक विश्व पर निर्भर नहीं है और इसी को आगे बढ़ाएं तो चिंतन पदार्थ पर निर्भर नहीं है। इस प्रत्ययवादी ( idealistic ) धारणा के आधार पर काण्ट दावा करते हैं कि प्रवर्ग पैदा नहीं होते, अपितु मानवजाति की उत्पत्ति के क्षण से ही मानव चेतना में शाश्वत रूप से विद्यमान हैं। फिर प्रवर्गों की संख्या और उनका अर्थ भी सदा अपरिवर्तित रहते हैं : आज जितने प्रवर्ग हैं, उतने ही हजारों साल पहले भी थे और आज उनका जो अर्थ है, वही हमारे प्राचीनतम पुरखों के काल में भी था।

अब आइये, देखें कि प्रवर्गों के प्रति यह प्रत्ययवादी दृष्टिकोण कहां तक सही है, जो कि आज भी प्रत्ययवादियों के द्वारा किसी न किसी रूप में काम में लिया जाता है। हममे से हर कोई प्रतिदिन भौतिक विश्व की परिघटनाओं के संपर्क में आता है और पाता है कि संप्रत्ययों - मोटर, स्विच, विद्युत धारा, टेलीविज़न, उद्योग, मूल्य, श्रम उत्पादिता, आक्सीजन, जीवाणु, आदि-आदि के बिना हमारा काम नहीं चल सकता। इनमें से कोई भी संप्रत्यय हमने स्वयं अपने अनुभव के आधार पर नहीं बनाया है। इनके बारे में हमने अपने शिक्षकों, किताबों, इत्यादि से जाना है। तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाये कि ये संप्रत्यय अनुभव की उपज नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क में किसी भी अनुभव से पहले ही विद्यमान थे? निस्संदेह, नहीं। यद्यपि हमने और अपने ही अनुभव से किसी संप्रत्यय की रचना नहीं की है, किंतु हमसे बहुत पहले अन्य लोगों ने अपने अनुभव से उनकी रचना अवश्य की थी और बाद में और लोगों ने नये अनुभव-दत्तों के आधार पर उनमें कुछ और जोड़ा, सटीक बनाया और आगे विकास किया।

इस प्रकार जब हम कहते हैं कि हम जीवन में बने-बनाये संप्रत्यय इस्तेमाल करते हैं, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वे किसी के भी अनुभव का परिणाम नहीं हैं। लोगों द्वारा बने-बनाये संप्रत्ययों का इस्तेमाल उनके अनुभवेतर ( beyond experience ) मूल का प्रमाण नहीं है। इसके उलट इसके प्रबल प्रमाण प्रस्तुत किये जा सकते हैं कि सभी प्रवर्गॊं का स्रोत ( source, origin ) अनुभव है।

यदि सभी प्रवर्ग मानव मस्तिष्क में मानवजाति के आविर्भाव ( emersion ) के क्षण से ही मौजूद होते, तो वे उन जनजातियों के चिंतन में भी पाये जाने चाहिए, जो आदिम ( primitive ) गोत्रात्मक व्यवस्था के चरणों में अभी भी विद्यमान हैं। किंतु वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है। जैसे कि न्यू गिनी के पपुआ लोग अनेक प्रवर्गों को नहीं जानते, यद्यपि कार्य और कारण, इत्यादि कुछ प्रवर्गों से वे परिचित थे। मालों के विनिमय ( exchange of goods ) के समय वे उन्हें एक दूसरे के सामने रखते थे, क्योंकि उन्हें गिनना नहीं आता था। न केवल परिमाण ( quantity ) का प्रवर्ग, अपितु संख्या ( number ) का प्रवर्ग भी उनके लिए अपरिचित था। वैज्ञानिक अनुसंधानों ने सिद्ध कर दिया है कि बहुत सी आदिम जातियों को न ऐसा अनुभव था और न संख्या का ज्ञान ही, परिमाण और पदार्थ जैसे प्रवर्गों की जानकारी तो और भी दूर की बात है।

दूसरे, यदि प्रवर्ग अनुभव से पहले ही मस्तिष्क में होते, तो बच्चे को भी उनका ज्ञान होना चाहिए था। किंतु वास्तविकता तो यह है कि दो वर्षीय बच्चा बहुत से दूसरे संप्रत्ययों को सीख-जान जाने के बावजूद संख्या के संप्रत्यय ( और इसलिए परिमाण के संप्रत्यय से भी ) से परिचित नहीं होता। ये तथ्य अकाट्यतः प्रमाणित करते हैं कि अन्य सभी संप्रत्ययों की भांति प्रवर्ग भी अनुभव की उपज होते हैं, कि कुछ प्रवर्ग पहले पैदा होते हैं और कुछ बाद में और इसलिए उनकी संख्या स्थायी कतई नहीं है। निस्संदेह, नये प्रवर्गों की उत्पत्ति में संकीर्ण सप्रत्ययों की अपेक्षा कई गुना समय लगता है और यह प्रक्रिया ( process ) आज भी जारी है।

इस तरह हम देखते हैं कि सामान्यतः सभी संप्रत्ययों की भांति सभी प्रवर्ग अनुभव से निकाले गये हैं और वे वास्तविकता के प्रतिबिंब ( reflection, image ) हैं। इन अत्यधिक व्यापक संप्रत्ययों की विशिष्टता यह है कि वे यथार्थ वास्तविकता के लक्षणों को प्रतिबिंबित करते हैं, जो ब्रह्मांड की कुछेक नहीं, अपितु सभी परघटनाओं में पाये जाते हैं। इसीलिए इन मूल व्यापक संप्रत्ययों यानि प्रवर्गों का इतना बड़ा संज्ञानकारी महत्त्व है। प्रवर्ग, मनुष्य के समक्ष फैले हुए प्रकृति की परिघटनाओं के जाल में पृथक्करण ( segregation ), अर्थात विश्व के संज्ञान के चरण हैं और इस जाल के वे मुख्य बिंदु हैं जो उसे जानने और उसपर काबू पाने में मनुष्य की मदद करते हैं।

प्रवर्गों का भी विकास होता है और सभी प्रवर्ग परस्पर संबद्ध ( associated ) भी होते हैं, क्योंकि वे परिवेशी विश्व की, जिसकी सभी परिघटनाएं मिलकर एक समष्टि ( a whole ) बनाती हैं, विभिन्न प्रक्रियाओं, पक्षों और लक्षणों को प्रतिबिंबित करते हैं। यहां हम अगली बार से भौतिकवादी द्वंद्ववाद के कुछ प्रमुख प्रवर्गों पर थोड़ा विस्तार से चर्चा करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 5 जुलाई 2014

भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम' का सार प्रस्तुत किया था, इस बार हम ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग" पर चर्चा शुरू करेंगे और यह समझने की कोशिश करेंगे कि प्रवर्ग होते क्या हैं ?

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
( categories of materialistic dialectics )

भौतिकवादी द्वंद्ववाद, विकासमान वास्तविकता ( developing reality ) के सर्वाधिक सामान्य और महत्त्वपूर्ण संयोजनों को व्यक्त करनेवाले उसूलों ( principles ) और नियमों ( laws ) तक ही सीमित नहीं है। यह भौतिक जगत और संज्ञान ( cognition ) के विकास के उन अनिवार्य संयोजनों और पक्षों का भी अध्ययन करता है, जो दार्शनिक प्रवर्गों ( philosophical categories ) में व्यक्त किये जाते हैं।

प्रवर्ग ( category ) क्या है?

आइये थोड़ा विस्तार से समझते हैं। उपग्रह पृथ्वी का ही नहीं होता ( पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा है ), सौरमण्डल के अन्य ग्रहों के भी अपने उपग्रह हैं। उदाहरण के लिए, शनि के नौ उपग्रह हैं, जिनमें सबसे बड़ा टाइटन है। शनि का उपग्रह होने के नाते टाइटन को सौरमण्डल के ग्रहों के उपग्रहों की श्रेणी में और इसीलिए नक्षत्रों के गिर्द घूमनेवाले ग्रहों के उपग्रहों की श्रेणी में भी गिना जा सकता है। फिर स्वयं उपग्रह कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड हैं और जैसा ज्ञात है कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड सामान्यतः अंतरिक्षीय पिण्डों का ही एक हिस्सा है। इस तरह उत्तरोतर व्यापक संप्रत्ययों ( concepts ) की ओर बढ़ने पर हम एक श्रृंखला बनती देखते हैं, जिसकी हर अगली कड़ी ( संप्रत्यय ) पहली से अधिक व्यापक है : टाइटन --> शनि का उपग्रह --> सौरमण्डल के ग्रह का उपग्रह --> ग्रह का उपग्रह --> कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड --> अंतरिक्षीय पिण्ड --> भौतिक पिण्ड --> पदार्थ।

एक अन्य संप्रत्यय लें - गेंहूं। गेंहूं अनाज है और सभी अनाज एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पतियां हैं, जो द्विबीजपत्री वनस्पतियों के साथ आवृत्तबीजियों का वर्ग बनाती हैं। आवृत्तबीजी और अनावृत्तबीजी, दोनों बीजधारी वनस्पतियों के वर्ग में शामिल हैं, जो स्वयं सामान्यतः वनस्पतियों का ( जिनमें बीजधारी और बीजरहित, सभी वनस्पतियां शामिल हैं ) अंग हैं। यहां व्यापकतर संप्रत्यय की ओर बढ़ने का क्रम इस प्रकार है : गेंहूं --> अनाज --> एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पति --> आवृत्तबीजी वनस्पति --> अवयवी --> स्वनियंत्रित तंत्र --> भौतिक पिण्ड --> पदार्थ।

इस तरह हम देख सकते हैं कि सभी संप्रत्यय ऐसी ही श्रृंखलाओं की कड़ियां हैं और ये श्रृंखलाएं आपस में संबद्ध ( associated ) होती हैं। चूंकि गेंहूं अनाज है, इसलिए ‘गेंहूं’ संप्रत्यय में अनाज के सभी लक्षण और इसके साथ ही केवल गेंहूं में पाये जानेवाले लक्षण ( जो उसे अन्य अनाजों से भिन्न बनाते हैं ) शामिल हैं। इसी तरह ‘अनाज’ संप्रत्यय में एकबीजपत्री आवृत्तबीजियों के लक्षणों के साथ-साथ उन लक्षणों की भी कल्पना की जाती है, जो अनाजों को शेष एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पतियों से भिन्न बनाते हैं।

यही बात अन्य संप्रत्ययों पर भी लागू होती है : अधिक व्यापक संप्रत्यय का अर्थ अधिक संकीर्ण संप्रत्यय के अर्थ में पूर्णतः शामिल होता है। इसके अलावा अधिक संकीर्ण संप्रत्यय में उन लक्षणों की भी कल्पना की जाती है, जो इस उपवर्ग को, उस व्यापक वर्ग के ( जिसमें यह शामिल है ) अन्य उपवर्गों से भिन्न बनाते हैं। इसीलिए, उदाहरणार्थ, अवयवी ( organism ) के लक्षणों की कल्पना सभी वनस्पतियों ( अब तक पांच लाख से अधिक वनस्पतियां ज्ञात हैं ) के संप्रत्ययों में और सभी जीवों ( उनकी दस लाख से अधिक जातियां ज्ञात हैं ) के संप्रत्ययों में की जाती है। किंतु भौतिक वस्तुओं से संबंधित सभी संप्रत्ययों में ‘पदार्थ’ ( matter ) के संप्रत्यय का विशिष्ट स्थान है। चूंकि यह सबसे अधिक व्यापक, अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय है, इसलिए उसका अर्थ जीवों और अजीवों, प्राकृतिक और मनुष्यनिर्मित कृत्रिम भौतिक वस्तुओं से संबंधित करोड़ों विविध संप्रत्ययों में शामिल किया जाता है।

पदार्थ ही ऐसा एकमात्र अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय नहीं है, जिसकी परिधि में सभी ज्ञात संकीर्णतर संप्रत्यय आते हों। दर्शनशास्त्र के अनुसार अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय निम्न हैं : पदार्थ और चेतना, गति और गतिशून्यता, सामान्य और विशिष्ट, सार और परिघटना, गुण और परिमाण, क्रमभंग और सातत्य, कार्य और कारण, अनिवार्यता और संयोग, संभावना और वास्तविकता, अंतर्वस्तु और रूप, ढांचा और प्रकार्य, आदि-आदि। यही अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय ही दार्शनिक प्रवर्ग कहलाते हैं। हर प्रवर्ग में विशाल संख्या में संकीर्णतर संप्रत्यय शामिल होते हैं, और यदि सभी प्रवर्गों को एक साथ लिया जाये, तो उनकी परिधि में मानवजाति को ज्ञात सभी संप्रत्यय आ जायेंगे।

यहां यह बात भी समझने की है कि सामान्यतः प्रवर्ग इस या अन्य विज्ञान की आधार संकल्पनाएं ( basic concepts ) होते हैं। मसलन, द्रव्यमान, ऊर्जा और आवेश भौतिकी के प्रवर्ग हैं, इसी तरह उत्पादन के संबंध, पण्य ( commodity ) और मूल्य राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रवर्ग हैं, आदि-आदि। किंतु दार्शनिक प्रवर्गों की अपनी विशेषता यह है कि वे सर्वाधिक सामान्य संकल्पनाएं होते हैं। उनका सह-संबंध ( correlation ) सार्विक नियमों ( universal laws ) तथा घटनाओं के बीच स्थायी संयोजनों ( permanent connections ) को व्यक्त करता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय
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