रविवार, 25 जनवरी 2015

संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना - २
( structure of cognitive process -2 )

हम जानते हैं कि आकाशीय पिण्डों, विशेषतः हमारी पृथ्वी के उपग्रह चन्द्रमा की प्रकृति और गति के नियमों का प्रश्न लोगों को बहुत पहले से ही उद्वेलित ( agitated ) करता रहा है। जब से टेलीस्कोप का अविष्कार हुआ और खगोलवैज्ञानिक जटिल यंत्रों का इस्तेमाल करने लगे, चन्द्रमा के बारे में हमारी जानकारी असामान्य रूप से बढ़ गयी। फिर भी चन्द्रमा की उत्पत्ति, उसके अदृश्य भाग के धरातल, उसके क्रेटर, आदि के बारे में संतोषजनक उत्तर उपलब्ध नहीं थे। वैज्ञानिकों ने तरह-तरह के अनुमान लगाये, जो इन या उन तथ्यों को न्यूनाधिक युक्तियुक्त ढंग से समझाते थे। मगर हर महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर ऐसी प्राक्कल्पनाओं ( hypothesis ) की संख्या इतनी अधिक थी कि बहुत समय तक यह तय नहीं किया जा सका कि उनमें से सही कौन सी है। किंतु आज कृत्रिम उपग्रहों, स्वचालित अंतरिक्ष प्रयोगशालाओं, अंतरिक्षयात्रियों के अनुसंधान, आदि के ज़रिये उपरोक्त प्रश्नों में से बहुतों का सही-सही उत्तर पा लिया गया है।

इन सबके बारे में सोचते हुए हम दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्यों पर ध्यान दिये बिना नहीं रह सकते : पहले, किसी भी वस्तु या परिघटना का ज्ञान प्राप्त करने में मनुष्य द्वारा अपनी ज्ञानेन्द्रियों या यंत्रों की मदद से किये जानेवाले प्रेक्षण ( observation ) की बहुत बड़ी भूमिका है और, दूसरे, अध्ययन की जानेवाली वस्तुओं और प्रक्रियाओं के गुणों, विशेषताओं तथा नियमों के बारे में सबसे महत्त्वपूर्ण जानकारी अध्ययनाधीन ( under investigation ) परिघटनाओं के साथ सक्रिय अन्योन्यक्रिया ( active mutual interaction ) के आधार पर ही पायी जा सकती है।

बाह्य विश्व की परिघटनाओं के कार्य में सक्रिय हस्तक्षेप के बिना और विचाराधीन प्रक्रियाओं के साथ अन्योन्यक्रिया के बिना प्रेक्षण, निष्क्रिय चिंतन ( passive contemplation ) ही होता है। वह हमें इन परिघटनाओं तथा प्रक्रियाओं के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी अवश्य देता है, मगर उनके बीच मौजूद अधिक गहरे संबंधों, वस्तुओं और प्रक्रियाओं के मूलभूत गुणों तथा संपर्कों की जानकारी पाने के लिए निष्क्रिय चिंतन तक ही सीमित रहना ठीक नहीं है।

वृक्ष का प्रेक्षण करके हम उसके पत्तों का रंग तथा आकार, स्वयं वृक्ष का आकार, उसकी छाल की ऊपरी विशेषताएं, जिस मिट्टी में उस जाति के वृक्ष उगते हैं, उसे और दूसरी बहुत सी बातें जान सकते हैं। किंतु काट में दिखायी देनेवाले वलयों ( rings ) के अनुसार वृक्ष की आयु निर्धारित करने के लिए उसके तने को काटना जरूरी है। वानस्पतिक कोशिकाओं की संरचना की विशेषताओं या उनमें घटनेवाली जीवरासायनिक प्रक्रियाओं की विशिष्टता का पता लगाने के लिए हमें सूक्ष्मदर्शी इस्तेमाल करना होगा, बहुत से रासायनिक परीक्षण करने होंगे। वृक्ष की लकड़ी की कठोरता, लचीलेपन की सीमा और रासायनिक संरचना को जानने के लिए हमें उसपर और भी जटिल प्रभाव डालने होंगे। यह सब जानने के लिए आवश्यक है कि वृक्ष के तने, जड़ों, शाखाओं और पत्तों को भिन्न-भिन्न जगहों पर दर्जनों बार मोड़ा, तोड़ा और रसायनों से उपचारित ( treated ) किया जाये। अध्ययन की जानेवाली वस्तु के साथ ऐसी सक्रिय अन्योन्यक्रिया को वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप कहते हैं। इस क्रिया के दौरान हम उसका ज्ञान प्राप्त करते हैं, जो निष्क्रिय चिंतन की सहायता से नहीं जाना जा सकता है।

इस प्रकार हम अगले महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। संज्ञान की प्रक्रिया में निम्न तत्व शामिल हैं : पहले संज्ञान की वस्तुएं ; दूसरे, वस्तु के साथ वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप ; तीसरे, ज्ञान, जो इस कार्यकलाप के परिणामस्वरूप वस्तुओं में पाये जानेवाले गुणों और विशेषताओं के प्रतिबिंब के रूप में प्रकट होता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 17 जनवरी 2015

संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत ज्ञान के स्रोतों के बारे में विभिन्न दार्शनिक मतों के बीच एक वार्ता प्रस्तुत की थी, इस बार हम संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना - १
( structure of cognitive process -1 )

दैनिक जीवन अज्ञेयवाद ( agnosticism ) का और कुल मिलाकर प्रत्ययवाद ( idealism ) का सर्वाधिक निश्चायक खंडन है। निस्संदेह, यदि लोग अपने इर्द-गिर्द की वस्तुओं और घटनाओं को नहीं समझ सकते, तो वे उन्हें न तो उपयोग में ला सकते, न उन्हें संवार सकते, न उन्हें दुरस्त कर सकते, न उनमें कोई संशोधन कर सकते, न उनमें कोई परिवर्तन ला सकते और न ही उनका पुनरुत्पादन ( reproduction ) कर सकते थे। लोगों के भौतिक, ठोस क्रियाकलाप ( activities ) के दौरान ही यथार्थता ( reality ) में फेर-बदल हो रहे हैं। इन क्रियाकलापों से हमारा मतलब सबसे पहले श्रम ( labour ) के उन रूपों से है, जिनसे खाद्य व आवास और साथ ही स्वयं श्रम-उपकरणों का उत्पादन होता है।

अपने क्रियाकलाप में मनुष्य केवल वस्तुओं को ही परिवर्तित नहीं करता, बल्कि अनुभव और ज्ञान के संचय द्वारा ख़ुद को भी रूपांतरित ( transform ) करता है। उत्पादन का अनुभव प्राकृतिक विज्ञानों को जन्म देता है। हम यह जानते ही हैं कि जहाजरानी ( shipping ) की व्यावहारिक आवश्यकता ने खगोलविद्या ( astronomy ) को जन्म दिया और ज्यामिति का जन्म खेती की आवश्यकताओं के कारण हुआ। अंकगणित ने लोगों को क्षेत्रफल और घनफल की गणना करने और लेखाकारों ( accountants ) को पारिश्रमिकों ( wages ) का हिसाब रखने में सहायता की थी। किंतु व्यावहारिक क्रियाकलाप प्रकृति में फेर-बदल करने में ही सहायक नहीं होते, वे सामाजिक जीवन में भी परिवर्तन लाते हैं।

संज्ञान ( cognition ) एक मानसिक क्रिया ( mental activity ) है, जो व्यावहारिक क्रियाकलाप से संबद्ध ( associated ) होने पर भी उनसे भिन्न ( different ) होती है। अपनी श्रम-क्रियाओं के दौरान मनुष्य प्रकृति को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तित करता है। वह तेल और कोयले का निष्कर्षण ( extraction ) करता है, जंगल लगाता है, ज़मीन जोतता है, आदि। यह सब करने के लिए उसे संबद्ध विषयों और घटनाओं की जानकारी होनी ही चाहिए। संज्ञान, ज्ञान के रूप में यथार्थता का मानसिक स्वांगीकरण ( assimilation ) है। अधिगम ( learning ) तथा जांच-पड़ताल के ज़रिये ज्ञानोपार्जन ( acquisition of knowledge ) तथा संस्कृति की उपलब्धि से मनुष्य एक ऐसे सर्जक ( creator ) में परिवर्तित हो जाता है, जो यथार्थता को ही नहीं स्वयं अपने आपको भी रूपांतरित करता है। वह ज्ञान का विषयी है, सामाजिक ज्ञान का वाहक ( carrier ) है। यदि प्रारंभिक ज्ञान व्यवहार से पृथक नहीं, बल्कि उससे घुल-मिल जाता है तो समय आने पर ज्ञान का यह संचय उसे ( यानी स्वयं ज्ञान को ) सापेक्षतः स्वाधीन ( relatively independent ) बना देता है और वह पूर्व अर्जित ज्ञान के आधार पर विकसित ( develop ) होने लगता है।

संज्ञान का विषय सारा विश्व, प्रकृति और समाज नहीं, बल्कि वह चीज़ है, जो प्रदत्त ऐतिहासिक चरण में मानव संज्ञान के लिए सुगम ( intelligible ) है। यह भौतिक संभावनाओं पर और साथ ही संचित ज्ञान के स्तर व सामाजिक आवश्यकताओं पर भी निर्भर करता है। यह बोधगम्य बात है कि प्राचीन दार्शनिक परमाणु की संरचना को नहीं समझ पाये ; न्यूटन के ज़माने में सापेक्षता का सिद्धांत निरूपित करना असंभव था और जीन्स तकनीकी से संबंधित समस्याओं को आज के जमाने में ही हल किया जा सकता है। किंतु मनुष्य प्रकृति का अध्ययन महज उसकी आद्यावस्था में ही नहीं करता है। ज्ञान के कई विषय मनुष्य के क्रियाकलाप के दौरान बनते है। उदाहरण के लिए, अनाज की नयी क़िस्में तथा जानवरों की नयी प्रजातियां चयनात्मक प्रजनन ( selective breeding ) के द्वारा विकसित की गयी हैं।

फलतः संज्ञान, ज्ञानोपलब्धि की वह प्रक्रिया है, जिसका सीधा लक्ष्य है सत्य तक पहुंचना और अंतिम लक्ष्य सफल व्यावहारिक कर्म है। संज्ञान की संकल्पना ( concept ) को इस तरह से समझ लेने के बाद, हम संज्ञान की प्रक्रिया में अब और गहरे उतर सकते हैं, और क्रियाकलापों के दौरान संज्ञान की उत्पत्ति में ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रेक्षण, औज़ारों और यंत्रों के प्रयोग, चिंतन तथा क्रियाकलापाधीन प्रक्रिया या परिघटना के साथ मनुष्य की अन्योन्यक्रिया ( interaction ) की भूमिका की जांच-परख कर सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 10 जनवरी 2015

ज्ञान के स्रोतों के बारे में एक वार्ता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत  परावर्तन के रूप में संज्ञान को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम ज्ञान के स्रोतों के बारे में विभिन्न दार्शनिक मतों के बीच एक वार्ता प्रस्तुत करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



ज्ञान के स्रोतों के बारे में एक वार्ता
( a talk about the sources of knowledge )

दार्शनिकगण इस बात पर प्राचीनकाल से ही विचार करते रहे हैं कि ज्ञान के स्रोत क्या हैं और यथार्थता ( reality ) के ज्ञान का समारंभ कहां से होता है। कालान्तर में दो सुस्पष्ट प्रवृत्तियां बन गयीं, अर्थात अनुभववाद ( empiricism ) तथा तर्कबुद्धिवाद ( rationalism )। अनुभववाद के समर्थक संवेदनों ( sensations ) तथा उन पर आधारित अनुभवों ( experiences ) को ज्ञान का स्रोत समझते हैं। तर्कबुद्धिवादियों का विचार है कि ज्ञान स्वयं मनुष्य की तर्कबुद्धि ( reason ) से, सोचने की क्षमता से उपजता है। उनके कथनानुसार, यह क्षमता मनुष्य में प्रारंभ से ही अंतर्निहित ( inherent ) होती है। संवेदनवाद ( sensualism ), अनुभववाद के साथ घनिष्ठता से जुड़ा है; इसके प्रवक्ता संज्ञान के सैद्धांतिक व अमूर्त रूपों के महत्त्व से अक्सर इनकार करते हैं और ज्ञान को संवेदनों तक सीमित कर देते हैं। संवेदनवादियों के बीच कई भौतिकवादी ( materialists ) थे, जो यह समझते थे कि संवेदन बाह्य जगत के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं, लेकिन संवेदनवाद का उग्र रूप यह मान लेता है कि एकमात्र यथार्थता संवेदन है, फलतः वे आत्मगत प्रत्ययवाद ( subjective idealism ) तथा अज्ञेयवाद ( agnosticism ) पर जा पहुंचते हैं।

अनुभववादियों तथा तर्कबुद्धिवादियों की दलीलों और दृष्टिकोण से परिचित होने के लिए हम यहां एक अनुभववादी, एक तर्कबुद्धिवादी तथा एक द्वंद्वात्मक भौतिकवादी ( dialectical materialist )  के बीच एक काल्पनिक वार्ता को समझने की कोशिश करते हैं :

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अनुभववादी - किसी भी सामान्य व्यक्ति से पूछिये कि उसे यह कैसे मालूम कि गुलाब लाल होता है और मधुर सुगंध देता है, तो वह अपने संवेदनों का हवाला देगा। मैं एक लाल फूल देखता हूं, उसकी सुगंध को महसूस करता हूं। फलतः संवेदन ही ज्ञान के सच्चे स्रोत हैं।

तर्कबुद्धिवादी - लेकिन असल बात यह है कि हमारा वास्ता सिर्फ़ उससे नहीं है, जिससे संवेद ग्रहण किये जा सकते हैं और जिसका प्रेक्षण ( observation ) हो सकता है। मसलन, हमें इस तथ्य का ज्ञान कहां से प्राप्त होता है कि एक त्रिभुज के तीन कोणों का योग दो समकोणों के बराबर होता है, मूल कणों का या सामाजिक विकास के नियमों का ज्ञान कहां से प्राप्त होता है? हम उन्हें देख नहीं सकते, सूंघ नहीं सकते और उनको महसूस नहीं कर सकते।

अनुभववादी - हम कई भिन्न-भिन्न त्रिकोण बना सकते हैं, उनके कोणों को कई बार माप सकते हैं और फिर सामान्यीकरण ( generalization ) करके आंतरिक कोणों के योग के बारे में एक प्रमेय ( theorem ) का निरूपण कर सकते हैं। जहां तक मूल कणों ( elementary particles ) का संबंध है, हम विभिन्न उपकरणों के संकेतों और प्रमाणों ( evidence ) को देखते हैं और उसके जोड़ को एक मामले में इलैक्ट्रोन तथा दूसरे में प्रोटोन, तीसरे में पोज़ीट्रोन, आदि कहते हैं। केवल उपकरणों की सुइयों के संवेद प्रभावों का ही वास्तविक अस्तित्व होता है और ‘इलैक्ट्रोन’, ‘प्रोटोन’, आदि संकल्पनाएं ( concepts ) इन संवेदनों के द्योतक ( signifying ) शब्द मात्र हैं। जहां तक सामाजिक विकास के नियमों का संबंध है, वे भी ऐसी संकल्पनाएं है जो विविध संवेदों के प्रभावों का सामान्यीकरण करती हैं। इन शब्दों की कोई और वास्तविकता नहीं है और इस बात को ईमानदारी से मान लेना चाहिए।

तर्कबुद्धिवादी - किंतु ऐसी हालात में हम विभिन्न संवेदनों के बंदी भर बनकर रह जाते हैं। उनके बीच निश्चय ही अनेक त्रुटियां होंगी। हम जानते हैं कि विभिन्न प्रकार के मतिभ्रम ( hallucinations ) होते हैं, चाक्षुष भ्रांतियां ( optical illusions ) होती है, सुनने की ग़लतियां होती हैं, आदि। यदि हम उन सब पर विश्वास करें, तो हम लगातार अंतर्विरोधों ( contradictions ) में उलझे रहेंगे। प्रश्न यह है कि हम वास्तविक संवेदनों को मिथ्या संवेदनों से विभेदित ( distinguish ) कैसे कर सकते हैं? कुछ संवेदनों को दूसरे वैसे ही अविश्वसनीय संवेदों से कैसे अलग किया जा सकता है?

द्वंद्वात्मक भौतिकवादी - ( संवाद में भाग लेते हुए ) यहां यह बात जोड़ना जरूरी है कि विज्ञान तथा दैनिक जीवन में ऐसे अनेक कथन ( statement ) तथा संकल्पनाएं हैं, जिन्हें किसी भी सरल तरीक़े से संवेद प्रत्यक्षों ( sense perceptions ) या संवेदनों ( sensations ) में परिणत नहीं किया जा सकता है। मसलन, भौतिकी में हम कहते हैं कि प्रकाश का वेग ३ लाख किलोमीटर प्रति सेकंड है। हम यह तो समझ सकते हैं कि यह क्या है, किंतु हमारे संवेद अंग ऐसी गति के बोध के लिए अक्षम हैं, क्योंकि हमारे अंग इसके लिए अनुकूलित ( adapted, conditioned ) नहीं है। हम जानते हैं कि रंगाध ( colour-blind ) लोग लाल और हरे रंग में फ़र्क नहीं कर सकते। किसके संवेदों पर यक़ीन किया जाये? गणित में बहुआयामीय देश ( multidimensional space ) में आकृतियों के बारे में प्रमेयों को प्रमाणित किया जाता है, किंतु इन प्रमेयों के बिल्कुल सटीक होने के बावजूद ऐसे देश की संवेदनात्मक छवि ( sensory image ) की रचना करना असंभव है।

अनुभववादी - परंतु ऐसे प्रमेयों का क्या महत्त्व जिन्हें संवेदनों में परिणत नहीं किया जा सकता?

द्वंद्वात्मक भौतिकवादी - उनके तथा संवेदों में परिवर्तित नहीं किये जा सकने वाले अन्य कथनों के ज़रिये कई महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक परिणाम हासिल किये जा सकते हैं और भौतिक व रासायनिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित किया जा सकता है। ऐसा ही सामाजिक विज्ञानों में भी होता है। यदि ‘सामाजिक विकास के नियम’ जैसी संकल्पना संवेदनों के एक समुच्चय का नाम भर होती, तो संवेदनों में फेर-बदल करके उनसे छुटकारा पाना आसान होता। किंतु मुद्दा यह है कि समाज का विकास, अलग-अलग लोगों के संकल्प ( will ) व चेतना, संवेदनों व अनुभवों से स्वतंत्र रूप में होता रहता है।

तर्कबुद्धिवादी - इस हालत में मैं यह सुझाता हूं कि ज्ञान का स्रोत मनुष्य की तर्कबुद्धि ( reason ) को समझा जाना चाहिए।

अनुभववादी - इसका क्या मतलब?

तर्कबुद्धिवादी - हमें यह मानना चाहिए कि मनुष्य में सोचने की अंतर्जात ( inborn ) क्षमता होती है। वह ईश्वर या प्रकृति द्वारा उसके मन में बैठाये हुए विश्व के आधारभूत, गहन ज्ञान की खोज करने में समर्थ है। उदाहरण के लिए, देकार्त का विचार था कि इस ज्ञान की रचना ईश्वर ने की है, जबकि भौतिकवादी स्पिनोज़ा इसे भौतिक पदार्थ का परिणाम या नतीजा समझते थे। बात जो भी हो, जब हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, उसका अन्वेषण ( invent ) व खोज करते हैं, तो हम तर्कशास्त्र के नियमों के द्वारा उससे अन्य सभी कुछ निगमित ( deduce ) कर सकते हैं और जिस हद तक वह विश्व से संबंधित है, उसे प्रयोगों से या प्रेक्षणों से परख सकते हैं। मुख्य बात है बूंद-बूंद कर, क़दम-ब-क़दम, संगत रूप से ( consistently ) तथा आनुक्रमिक ढंग से ( consecutively ), किसी बात को नज़रअंदाज़ किये बग़ैर ज्ञान को व्युत्पन्न ( derive ) करना।

अनुभववादी - इस तरह से तो कोई भी मिथकीय दंतकथा ( mythical legend ) निश्चय ही विज्ञान कही जा सकती है। किसी भी कपोल-कथा ( fairytale ) या आस्था की कल्पना को स्वीकार करने के लिए जादूगरों, झाड़ुओं पर बैठी उड़ान भरती जादूगरनियों, आदि के बारे में संगत और तार्किक ढंग से बातें करना और यह कह देना ही काफ़ी है कि आपने अपने प्रारंभिक ज्ञान को अपने मन में देखा था।

तर्कबुद्धिवादी - लेकिन मैंने तो प्रयोगों ( experiments ) और प्रेक्षणों से जांचने की बात भी कही थी।

अनुभववादी - आप इस मामले में असंगत ( inconsistent ) हैं, क्योंकि आपने ख़ुद यह भी कहा था कि संवेदन और फलतः उन पर आधारित प्रेक्षण भ्रामक ( deceptive ) हो सकते हैं। मेरी यह समझ में नहीं आता कि तर्कबुद्धिवाद से क्या फ़ायदे हासिल होते हैं।

द्वंद्वात्मक भौतिकवादी - दरअसल आप दोनों के दृष्टिकोण एकतरफ़ा है और देर-सवेर वे दोनों प्रत्ययवाद पर पहुंचा सकते हैं। संवेदनों को ज्ञान का एकमात्र स्रोत बताकर अनुभववाद, अज्ञेयवाद की तरफ़ सरकता जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि संवेदनों के पीछे कुछ नहीं हो और भौतिक जगत लापता हो जाये। तर्कबुद्धिवाद भी वस्तुगत प्रत्ययवाद ( objective idealism ) की तरफ़ ले जाता है, क्योंकि यह ऐसे शाश्वत ( eternal ), अंतर्जात ज्ञान के अस्तित्व को मान्यता देता है, जो वास्तविक सामाजिक दशाओं पर या लोगों के भतपूर्व अनुभव और व्यावहारिक क्रियाकलाप पर निर्भर नहीं होता।

अनुभववादी - फिर आप क्या कहते हैं?

द्वंद्वात्मक भौतिकवादी - दोनों दृष्टिकोण संवेदनात्मक ( आनुभविक ) तथा बौद्धिक ज्ञान के विच्छेदन तथा एक को दूसरे के मुक़ाबले में खड़ा करने का परिणाम है। लेकिन मुख्य त्रुटि यह है कि आप सारे ज्ञान पर सरलीकृत दोसदस्यीय रूप आरोपित कर रहे हैं, अर्थात ‘मनुष्य और उसके मुक़ाबले में खड़ी दुनिया’ और आप इन दो सदस्यों के बीच किसी भी संपर्क सूत्र को नहीं देख पा रहे हैं। परंतु, वास्तव में मनुष्य तथा बाह्य जगत के बीच एक जटिल संपर्क सूत्र है, जो विशेष मानव क्रियाकलाप में, यानी व्यवहार में व्यक्त होता है और यह व्यवहार है - श्रम, भौतिक उत्पादन और वस्तुओं तथा औज़ारों के साथ तरह-तरह के काम। यह व्यवहार ( practice ) ही है, जो ज्ञान का आधार और स्रोत है तथा उसकी सत्यता को परखने का साधन है

इस दृष्टिकोण की सत्यता से, स्वयं अपने को विश्वास दिलाने के लिए हमें इस बात की अधिक विस्तार से जांच करनी होगी कि ज्ञान कैसे प्राप्त होता है, यानी इसमें संवेदन क्या भूमिका अदा करता है, अपकर्षित ( अमूर्त ) संकल्पनाएं ( abstract concepts ) तथा ज्ञान कैसे उत्पन्न होते हैं और इस प्रक्रिया में लोगों के भौतिक क्रियाकलाप ( material activity ) क्या भूमिका अदा करते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 3 जनवरी 2015

परावर्तन के रूप में संज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत तत्वमींमासीय भौतिकवाद की संज्ञान विषयक अवधारणा पर संक्षिप्त विवेचना प्रस्तुत की थी, इस बार हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि परावर्तन के रूप में संज्ञान आख़िर क्या है।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



परावर्तन के रूप में संज्ञान
( cognition as reflection )

विश्व की ज्ञेयता ( knowability ) का, सत्य ( truth ) को समझने की मानव चिंतन की क्षमता का प्रश्न, विज्ञान और व्यवहार ( practice ) के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। यदि विश्व और उसके विकास के नियम संज्ञेय हैं और हमारा ज्ञान वास्तविकता का सही परावर्तन ( reflection ) है, तो प्रकृति तथा समाज की संज्ञात शक्तियों को मानवजाति की सेवा में लगाया जा सकता है। संज्ञान की प्रकृति को समझने की कोशिशों में हम देखते हैं कि सारे भौतिकवादी ( materialistic ) इस बात पर सहमत हैं कि संज्ञान, यथार्थता ( reality ) के परावर्तन का एक विशेष रूप ( form ) है। परंतु यह विशेष रूप क्या है? हम यहां पहले इस पर विस्तार से देख चुके हैं कि परावर्तन भूतद्रव्य ( matter ) का एक सार्विक अनुगुण ( universal property ) है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि परावर्तन के हर स्तर पर संज्ञान होता है। संज्ञान केवल मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही उत्पन्न हुआ।

हमारा सारा ज्ञान या तो किन्हीं घटनाओं और प्रक्रियाओं से संबंधित होता है, या मानवीय क्रियाकलाप ( human activity ) के कुछ कार्यों तथा रूपों से। जब हम दो संख्याओं को जोडने या गुणा करने की आवश्यकता की बात करते हैं, तो हमें सिर्फ़ यही जानना नहीं होता कि संख्याएं क्या हैं, बल्कि यह भी जानना होता है कि योग या गुणा की संक्रिया ( operation ) कैसे की जाती है। जब हम एक इमारत का निर्माण शुरू करते हैं, तो हमें सिर्फ़ यही नहीं जानना होता कि ईटें तथा संरचनात्मक ( structural ) तत्व, आदि क्या होते हैं, बल्कि यह भी जानना होता है कि इमारत बनाने का काम कैसे किया जाता है।

ज्ञान को हमेशा उन अलग-अलग शब्दों या शब्द समूहों के रूप में भाषा द्वारा व्यक्त किया जाता है, जिनके ज़रिये संकल्पनाएं ( concepts ) निरूपित की जाती हैं और उन वाक्यों तथा प्रस्थापनाओं ( propositions ) से व्यक्त किया जाता है, जिनके ज़रिये वस्तुओं के अनुगुणों, विविध प्रकार के मानवीय कर्मों तथा उनके बीच संबंधों का वर्णन किया जाता है। अमुक-अमुक वाक्य किसी के आंतरिक संवेदनों ( sensations ) या मानसिक प्रक्रियाओं का वर्णन भी कर सकते हैं। एक तरफ़, पृथक-पृथक शब्दों, शब्द समूहों या वाक्यों के और, दूसरी तरफ़, बाह्य जगत की घटनाओं के बीच ऐसी बाहरी सादृश्यता ( likeness ) या समानता नहीं होती है, जिसे संवेद अंगों ( sense organs ) से जाना जा सके।

इसलिए जब हम कहते हैं कि हमारा ज्ञान वास्तविकता को परावर्तित करता है, तो हमारा तात्पर्य बाह्य जगत की घटनाओं तथा मनुष्यों द्वारा किये गये कुछ कर्मों के साथ, संकल्पनाओं तथा निर्णयों ( कथनों ) की विशेष अनुरूपता ( correspondence ) से होता है। इसका यह मतलब है कि कुछ घटनाएं, प्रक्रियाएं या क्रियाओं के रूप, कुछ निश्चित संकल्पनाओं के अनुरूप होते हैं। इसका यह मतलब भी है कि हम कुछ कथनों ( statements ) के ज़रिये वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) की घटनाओं और प्रक्रियाओं के नितांत निश्चित अनुगुणों का तथा उनके बीच संबंधों का वर्णन कर सकते हैं और उन्हें पहचान सकते हैं। और अंत में, इसका यह मतलब है कि कार्यकलाप के कुछ नियमों को निरूपित करते तथा आदेश और हिदायतें देते या लेते समय हम जानते हैं ( समझते हैं ) कि अमुक-अमुक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए क्या-क्या कार्य किये ही जाने चाहिए और क्या-क्या कार्य नहीं किये जाने चाहिए। यह इस कथन का अर्थ है कि हमारा ज्ञान वस्तुगत यथार्थता का एक परावर्तन है।

यानि इस बात को एक प्रस्थापना के रूप में कहा जा सकता है कि ‘बाह्य जगत का वस्तुगत अस्तित्व है और वह मानव चेतना में परावर्तित होता है’। इसका मतलब है कि वास्तविकता की वस्तुएं और घटनाएं मनुष्य के संवेदी अंगों पर प्रभाव डालकर संवेदों ( sensations ) और अवबोधनों ( perceptions ) की उत्पत्ति करती हैं, जिनके आधार पर मनुष्य संकल्पनाओं का विस्तारण करता है। अतएव यह कहा जा सकता है कि हमारे ज्ञान का स्रोत बाह्य जगत है। लेकिन संज्ञान की प्रक्रिया आस-पास के जगत का एक निष्क्रिय ( passive ) परावर्तन नहीं है। लोग प्रकृति और समाज को सक्रियता से रूपांतरित ( transform ) करते हैं और यह सक्रियता उनके सामने विभिन्न समस्याएं पैदा कर देती है, जिनके समाधानार्थ प्राकृतिक और सामाजिक नियमों के ज्ञान की आवश्यकता होती है। फलतः संज्ञान वास्तविकता का निष्क्रिय अवलोकन नहीं, बल्कि उसका सक्रिय तथा सोद्देश्य परावर्तन है

ज्ञान, स्वयं अपने आप या स्वयं अपने में अस्तित्वमान नहीं होता है। यह एक विशेष प्रक्रिया का, संज्ञान या जानने की प्रक्रिया, यानी मनुष्य की संज्ञानात्मक क्रिया का परिणाम ( result ) है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) मानव संज्ञान को सामाजिक विकास के एक उत्पाद ( product ) के, आस-पास के जगत के मनुष्य द्वारा रूपांतरण के परिणाम के रूप में देखता है। प्रकृति और समाज के रूपांतरण के उद्देश्य से किये जाने वाले मनुष्य के भौतिक क्रियाकलाप संज्ञान का आधार और लक्ष्य हैं। संज्ञान के सारे प्रकार व्यवहार ( practice ) के, संयुक्त मानवीय श्रम ( labour ) के दौरान रूप ग्रहण करते हैं। मनुष्य, समाज में रहते हुए विश्व को जानता-पहचानता है और पूर्ववर्ती पीढ़ियों द्वारा संचित ( accumulated ) और उत्पादन के औज़ारों में घनीभूत ( condensed ) तथा भाषा, विज्ञान, संस्कृति, आदि में अभिलिखित अनुभव का उपयोग करता है।

फलतः ज्ञान के सार ( essence ) को अधिक गहराई तथा सटीकता से समझने के लिए और इस प्रश्न कि जानने का क्या मतलब है, का उत्तर देने के लिए संज्ञान की प्रक्रिया, उसके स्रोतों तथा उन मुख्य अवस्थाओं का अध्ययन करना जरूरी है, जिनमें मानवीय ज्ञान निरूपित ( formulated ) होता तथा रचा जाता है। यह समझना भी महत्त्वपूर्ण है कि वस्तुगत यथार्थता के साथ हमारे ज्ञान की अनुरूपता को कैसे परखा जाता है और कैसे उसकी पुष्टि की जाती है तथा इस अनुरूपता को गहनतर ( deeper ) और पूर्णतर ( fuller ) बनाने के लिए क्या करना जरूरी है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 27 दिसंबर 2014

तत्वमींमासीय भौतिकवाद की ज्ञानमीमांसा

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत क्लासिकी प्रत्ययवाद के संज्ञान सिद्धांत पर संक्षिप्त विवेचना प्रस्तुत की थी, इस बार हम तत्वमींमासीय भौतिकवाद की संज्ञान विषयक अवधारणा पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



तत्वमींमासीय भौतिकवाद की ज्ञानमीमांसा
( epistemology of metaphysical materialism )

१७वीं सदी से लेकर १९वीं सदी के आरंभ तक प्रकृतिविज्ञान ( natural science ), परिघटनाओं के अध्ययन की विधियों ( methods ) के प्रश्न पर यंत्रवाद ( mechanism ) का ही अनुसरण करता रहा। यंत्रवाद, यांत्रिकी ( mechanics ) के नियमों के निरपेक्षीकरण के परिणामस्वरूप विश्व का एक यांत्रिकवादी चित्र प्रस्तुत करता था, जिसके अनुसार, समस्त ब्रह्मांड ( परमाणुओं से लेकर ग्रहों तक ) ऐसे अपरिवर्तनीय तत्वों से युक्त एक बंद यांत्रिक प्रणाली है, जिनकी गति क्लासिकीय यांत्रिकी से निर्धारित होती है। परंतु कालान्तर में प्राकृतिक विज्ञानों की उपलब्धियों ने यंत्रवाद की संकीर्णता को स्पष्ट कर दिया। तत्कालीन तत्वमीमांसीय या अधिभूतवादी भौतिकवाद के संज्ञान सिद्धांत की मूलभूत विशेषताएं काफ़ी कद तक इसी यांत्रिकवादी दृष्टिकोण की उपज थीं।

इस सिद्धांत के मूल में यह धारणा निहित थी कि मनुष्य परिवेशी विश्व का काफ़ी-कुछ सही संज्ञान प्राप्त कर सकता है। संज्ञान का आधार, या यह कहें कि भौतिक वास्तविकता के साथ मनुष्य के संपर्क का साधन अनुभूतियां ( sensations ) हैं। तत्कालीन भौतिकवादी दार्शनिकों के अनुसार, ये अनुभूतियां बाह्य विश्व की छवियां ( images ), प्रतिकृतियां ( replicas ) या दर्पण में दिखायी देनेवाली छायाओं ( shadows ) की तरह हैं। संज्ञान की प्रक्रिया में अनुभूतियों की भूमिका से संबंधित यह दृष्टिकोण न केवल सामान्य व्यक्ति में पायी जानेवाली सामान्य बुद्धि, बल्कि तत्कालीन प्रकृतिविज्ञान के भी अनुरूप था। आत्मपरक प्रत्ययवादी ( subjective idealistic ) और अज्ञेयवादी ( agnostic ) अनुभूतियों की भूमिका की ऐसी व्याख्या का ही घोर विरोध करते थे।

तत्वमीमांसीय भौतिकवाद की ज्ञानमीमांसा ( epistemology ) का कमज़ोर पहलू यह था कि वह निष्क्रिय प्रेक्षण ( passive observation ), यानी प्रेक्षणाधीन वस्तुओं में होनेवाले परिवर्तनों से असंबंधित प्रेक्षण पर आवश्यकता से अधिक ज़ोर देती थी। इस तरह प्रेक्षण को इतना महत्त्व दिया जाना इस प्रकृतिवैज्ञानिक सिद्धांत को परम सत्य मानने का परिणाम था कि वैज्ञानिक का कार्य प्रकृति का प्रेक्षण करना है, न कि उसे बदलना। यह नियम प्रायोगिक प्रकृतिविज्ञान के अपेक्षया आरंभिक चरण, तथ्य सामग्री के संचय और वर्गीकरण के अनुरूप था। हालांकि १७वीं-१९वीं सदियों में प्रयोगात्मक संज्ञान ( experimental cognition ) की संज्ञेय परिघटनाओं पर प्रभाव डालने से संबंधित विधियों का भी शनैः शनैः विकास और परिष्करण ( refinement ) हुआ, किंतु तत्वमीमांसीय भौतिकवाद उनके महत्त्व को पूरी तरह ह्रदयंगम नहीं कर पाये।

चिन्तनपरकता और संज्ञान की सक्रिय भूमिका के अपूर्ण मूल्यांकन का एक कारण यह भी था कि तत्वमीमांसीय भौतिकवादी, चिन्तन की नियमसंगतियों के विश्लेषण के महत्त्व को पूरी तरह आंक नहीं सके थे। यही पूर्ववर्ती भौतिकवाद की मुख्य कमज़ोरी थी, कि तत्वमीमांसीय भौतिकवादी विश्व के संज्ञान को एक ऐसी प्रक्रिया मानते थे, जो निष्क्रिय प्रेक्षण पर आधारित है न कि प्रकृति और समाज के सक्रिय रूपांतरण ( active transformation ) पर। वे इस तथ्य को पहचान नहीं पाये कि सही वैज्ञानिक ज्ञान विश्व के सक्रिय रूपांतरण के दौरान ही पाया जा सकता है।

यह स्वीकार करने के बावजूद, कि हमारे संप्रत्यय ( concepts ) और अनुभूतियां भौतिक वस्तुओं और प्रक्रियाओं के बिंब ही है, तत्वमीमांसीय भौतिकवाद तो चिंतन के विकास के नियमों की व्याख्या कर पाया और संज्ञान के परिवर्तन के आधारों का अध्ययन ही कर सका, क्योंकि वह संज्ञान के मुख्य तरीक़ो और रूपों को स्थायी ( permanent ) और अपरिवर्तित मानता था। इसी बात ने उसे दोषपूर्ण और उन बहुत से प्रश्नों का उत्तर देने में असमर्थ बनाया, जो समाज और विज्ञान के विकास द्वारा उठाये गये थे। यह आवश्यक था कि लोगों के संज्ञानकारी कार्यकलाप के अध्ययन के सिलसिले में पैदा हुए प्रश्नों के प्रति सिद्धांततः नया रवैया ( attitude ) अपनाया जाये। इस समस्या का समाधान द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के संज्ञान सिद्धांत ने प्रस्तुत किया।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

क्लासिकी प्रत्ययवाद का संज्ञान सिद्धांत -२

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत क्लासिकी प्रत्ययवाद के संज्ञान सिद्धांत पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



क्लासिकी प्रत्ययवाद का संज्ञान सिद्धांत -२
( theory of knowledge by classical idealism - 2 )

काण्ट का दर्शन अंतर्विरोधों ( contradictions ) से भरपूर था। एक ओर, प्रकृतिविज्ञान के सामने झुकते हुए वह यथार्थ ( real ) वस्तु-निजरूपों के अस्तित्व ( existence ) को स्वीकार करते थे और उन्हें अनुभूतियों का स्रोत ( source ) मानते थे। मगर दूसरी ओर, तर्कबुद्धिवाद के सिद्धांतों पर अडिग रहने की कोशिश में वह इस बात से इनकार करते थे कि अनुभूतियां और इन्द्रियजन्य कल्पनाएं यथार्थ विश्व का काफ़ी-कुछ सही प्रतिबिंब करती हैं, और इसलिए वह निर्णायक स्थान संज्ञान के प्रागनुभव रूपों को ही देते थे। काण्ट की ज्ञानमीमांसा ( epistemology ) की इस विरोधपूर्णता का उल्लेख करते हुए जर्मन दार्शनिक फ़्रीडरिख़ जैकोबी ( १७४३-१८१९ ) ने लिखा कि ‘वस्तु-निजरूप’ के बिना काण्ट के दर्शन में प्रवेश नहीं किया जा सकता, किंतु उसी ‘वस्तु-निजरूप’ के साथ इस दर्शन के अंदर रहा भी नहीं जा सकता।

महान जर्मन द्वंद्ववादी हेगेल ने काण्ट के दर्शन के अंतर्विरोध को ख़त्म करने और उसे अधिक सुसंगत बनाने की कोशिश में जर्मन क्लासिकी प्रत्ययवाद के संज्ञान के सिद्धांत को ‘वस्तु-निजरूप’ से और उसके साथ ही प्रकृतिविज्ञान पर आधारित भौतिकवाद के तत्वों से भी पूर्ण मुक्ति दे दी। हेगेल के अनुसार, आंतरिक विरोधों से प्रेरित होकर, मानव संज्ञान निरंतर विकास करता रहता है। विश्व संज्ञेय है किंतु हमारा चिंतन, सत्ता के रहस्यों में जितना ही गहरा पैठेगा, उतना ही अधिक यह स्पष्ट होगा कि संज्ञान की प्रक्रिया की सहायता से परम चित् परिवेशी विश्व में ख़ुद अपने नियमों को उद्घाटित करता है। दूसरे शब्दों में, विश्व के संज्ञान का मतलब है उसके आध्यात्मिक, प्रात्ययिक अन्तर्य का संज्ञान करना।

मानव संज्ञान की सक्रिय और द्वंद्वात्मक प्रकृति के निरूपण में हेगेल के बहुत बड़े योगदान के बावजूद उनका संज्ञान सिद्धांत आदि से लेकर अंत तक प्रत्ययवादी ( idealistic ) था और इसलिए प्रायोगिक प्रकृतिविज्ञान को वह मान्य नहीं हुआ। इसके अलावा, चूंकि हेगेल को अपने काल की भौतिकी और गणित की उपलब्धियों का भरपूर ज्ञान नहीं था, इसलिए प्रकृति विकास के नियमों के बारे में उनके निष्कर्ष प्रायः १९वीं सदी के वैज्ञानिकों की अवधारणाओं से मेल नहीं खाते थे।

प्रत्ययवादी दार्शनिक ऐसा संज्ञान सिद्धांत न बना सके, जो सैद्धांतिक और प्रायोगिक प्रकृतिविज्ञानों की आवश्यकताओं और निष्कर्षों के अनुरूप होता। ऐसा सिद्धांत तत्कालीन भौतिकवादी ( materialistic ) दार्शनिक भी न बना पाये, यद्यपि उनके बीच कई प्रतिभाशाली विचारक थे। व्यापक प्रसार तथा विज्ञान और संस्कृति के विकास पर अपने बड़े प्रभाव के बावजूद ‘द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ ( dialectical materialism ) से पूर्व का भौतिकवाद भी संज्ञान प्रक्रिया की समझ के मामले में कई दोषों से मुक्त नहीं था।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

क्लासिकी प्रत्ययवाद का संज्ञान सिद्धांत -१

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान विषयक तर्कबुद्धिवाद के विचारों पर संक्षिप्त विवेचना प्रस्तुत की थी, इस बार हम क्लासिकी प्रत्ययवाद के संज्ञान सिद्धांत पर चर्चा शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


क्लासिकी प्रत्ययवाद का संज्ञान सिद्धांत -१
( theory of knowledge by classical idealism - 1 )

अज्ञेयवाद ( agnosticism ) और तर्कबुद्धिवाद ( rationalism ) में से कोई भी संज्ञान का एकीभूत, संपूर्ण चित्र प्रस्तुत न कर सका। दोनों में से प्रत्येक ने अनुभूति ( sensation ) या तर्कबुद्धि ( reason ) के महत्त्व को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हुए उन्हें एक दूसरे के मुक़ाबले में रखा और उस संबंध को अनदेखा किया, जो संज्ञान की प्रक्रिया में इन दोनों पहलुओं ( aspects ) के बीच मौजूद रहता है।

उदाहरण के लिए, भौतिकीवेत्ता यंत्र की मापनी पर सूई के इन्द्रियगोचर दोलनों ( sensible oscillations ) को देखते हुए उन्हें विद्युत-चुंबकीय क्षेत्र के परिवर्तनों ( changes ) से जोड़ता है और इस तरह तार्किक व्याख्या ( logical explanation ) और दृश्यानुभूति ( visual sensation ) को एकीभूत प्रक्रिया में संयुक्त ( unified ) बनाता है। किंतु जो संज्ञान की प्रक्रिया के अनुभूतिमूलक ( sense-oriented ) और तर्कमूलक ( logic-oriented ) पक्षों को एक दूसरे के मुक़ाबले में रखता है, वह संज्ञान की प्रक्रिया ( process of cognition ) का अति सरलीकरण करता है और संज्ञानकारी कार्यकलाप की असली तथा जटिल प्रकृति को बिगाड़कर दिखाता है।

जर्मन क्लासिकी प्रत्ययवाद के प्रवर्तक एमानुएल काण्ट ने अज्ञेयवाद और तर्कबुद्धिवाद के वैपरीत्य ( contrariety ) को ख़त्मकर संज्ञान सिद्धांत को तत्कालीन प्रकृतिविज्ञान और गणित के निष्कर्षों के अनुरूप बनाने की कोशिश की थी। जैसा कि ज्ञात है, प्राकृतिक विज्ञान प्रेक्षणों और प्रयोगों का सहारा लेता है। किंतु इस तरीक़े से पाया गया ज्ञान परिवेशी विश्व की घटनाओं के बाह्य, परिवर्तनशील और सांयोगिक पक्ष की ही सूचना देता है।

काण्ट के शब्दों का इस्तेमाल करें, तो बाह्य, प्रतीयमान और दृश्य पक्ष अर्थात परिघटना के पीछे यथार्थ वस्तुएं या ‘वस्तु-निजरूप’ ( ‘thing in itself’ ) छिपे होते हैं। ये वस्तु-निजरूप ही परिघटनाओं ( phenomena ) को जन्म देते हैं। किंतु परिघटना और वस्तु-निजरूप के बीच बहुत बड़ी खाई है। परिघटना अनुभूतिगम्य है, जबकि वस्तु-निजरूप केवल मन ( मस्तिष्क ) द्वारा ही जाना जा सकता है। मन में अनुभवनिरपेक्ष प्रवर्ग होते हैं, जिनकी संख्या १२ है, जैसे अनिवार्यता, कारण, आदि। विज्ञान के नियमों की रचना में ये प्रवर्ग ( categories ) ही भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार काण्ट के अनुसार इन्द्रियबोध हमें वस्तु-निजरूपों की जानकारी नहीं देता और इस प्रश्न को असमाधित ( unresolved ) ही छोड़ देता है कि हम उनके अस्तित्व के बारे में कहां से जानते हैं।

काण्ट ने संज्ञान के अनुभवनिरपेक्ष या प्रागनुभव रूपों ( pre-experience forms ) में दिक् और काल ( space and time ) को भी सम्मिलित किया था, जिनकी सहायता से ही अनुभूतियों पर आधारित अनुभवसिद्ध ज्ञान को क्रमबद्ध और व्यवस्थित किया जाता है। किंतु काण्ट का दर्शन इसका कोई उत्तर नहीं दे पाता कि प्रवर्गों तथा अन्य अनुभवनिरपेक्ष रूपों को, इन्द्रिय दत्त रूपों ( sensuous forms ) के अनुरूप कैसे और क्यों बनाया जाता है। और साथ ही यह भी कि इन्द्रिय दत्त रूप, सिद्धांततः असंज्ञेय ( non-cognizable ) वस्तु-निजरूपों के बारे में क्या सूचना देते हैं।



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