शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

द्वंद्ववाद श्रॄंखला समाप्ति और डाउनलोडेबल पीडीएफ़

हे मानवश्रेष्ठों,

द्वंद्ववाद पर चल रही श्रृंखला अब समाप्त होती है। कुछ ही समय में फिर किसी नयी श्रॄंखला की यहां पर शुरुआत की जाएगी। कोई सार्थक सामग्री प्रस्तुत की जाएगी।

जैसा कि यहां की परंपरा है, द्वंद्ववाद ( द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ) पर प्रस्तुत सामग्री को डाउनलोडेबल पीडीएफ़ पुस्तिकाओं के रूप में उपलब्ध करा दिया गया है। इस श्रृंखला की सामग्री को चार भागों में समेकित करके अलग-अलग पुस्तिकाओं का रूप भी दे दिया गया है ताकि पाठक अपनी रुचि की सामग्री को अलग से भी डाउनलोड कर सकते हैं। संपूर्ण सामग्री भी एक अलग पुस्तिका के रूप में भी उपलब्ध है।

लिंक यहां दिये जा रहे हैं, जिनसे इच्छित सामग्री शीर्षकों पर क्लिक करके पीडीएफ़ रूप में डाउनलोड की जा सकती है। इन्हें साइड बार में भी डाल दिया गया है, जहां ये बाद में भी उपलब्ध रहेंगे।



द्वंद्ववाद - भाग १ - द्वंद्ववाद का परिचय
(dialectics - a introduction) - in hindi pdf - free download

इस भाग में द्वंद्ववाद का सामान्य परिचय है। जिसमें द्वंद्ववाद की भूमिका, द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास, द्वंद्ववाद क्या है?, अधिभूतवाद, तीन महान खोजें, क्रमविकास किस प्रकार होता है?, क्या गति का उद्‍गम है?, तथा द्वंद्ववाद और संकलनवाद पर सामग्री है।

द्वंद्ववाद - भाग २ - बुनियादी उसूल, नियम और प्रवर्ग
(basic principle, rules and categories of dialectics) - in hindi pdf - free download

इस भाग में द्वंद्ववाद के बुनियादी उसूल - सार्विक संपर्क का उसूल, विकास का उसूल, द्वंद्ववाद के नियम - विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम, परिमाण से गुण में रूपांतरण का नियम, निषेध के निषेध का नियम, तथा भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग - व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ), अंतर्वस्तु और रूप, आभास और सार, कारण और कार्य, अनिवार्यता और संयोग, संभावना और वास्तविकता पर सामग्री है।

द्वंद्ववाद - भाग ३ - ज्ञान का सिद्धांत
(dialectical theory of knowledge) - in hindi pdf - free download

इस भाग में संज्ञान पर अज्ञेयवाद, तर्कबुद्धिवाद, क्लासिकी प्रत्ययवाद, तथा तत्वमीमांसीय भौतिकवाद की ज्ञानमीमांसीय मतों का विवेचन है और संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत का व्यवस्थित निरूपण है। जिसमें परावर्तन के रूप में संज्ञान, ज्ञान के स्रोत, संज्ञान की प्रक्रिया, व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी, संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका, संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका, प्रत्ययवाद/भाववाद की ज्ञानमीमांसीय जड़ें, संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन, तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन पर सामग्री है। इसी भाग में सत्य के बारे में द्वंद्ववादी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक संज्ञान के रूप - सिद्धांत और प्राक्कल्पना, प्रयोग और प्रेक्षण तथा वैज्ञानिक संज्ञान की पद्धतियां - निगमनात्मक विधियां, आगमनात्मक विधियां, साम्यानुमान पद्धति, विश्लेषण और संश्लेषण, तार्किक और ऐतिहासिक विधियां आदि पर भी सामग्री है।

द्वंद्ववाद - भाग ४ - सत्य क्या है
(what is truth - a dialectical understanding) - in hindi pdf - free download

इस भाग में सत्य के बारे में द्वंद्ववादी दृष्टिकोण को संज्ञान सिद्धांत से ही यहां अलग से पुस्तिका रूप दिया गया है, ताकि सत्य के बारे में विशिष्ट रुचि और जिज्ञासा रखने वाले मानवश्रेष्ठ इसे अलग से डाउनलोड कर सकें। इसमें सत्य की संकल्पना, सत्य की निर्भरता, वस्तुगत सत्य, सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य, सत्य की द्वंद्वात्मकता, तथा संज्ञान में व्यवहार की भूमिका पर सामग्री है।



द्वंद्ववाद - समग्र (सभी भाग) - द्वंद्वात्मक भौतिकवाद
(dialectics - dialectical materialism) - in hindi pdf - free download

यह द्वंद्ववाद - द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर यहां प्रस्तुत संपूर्ण सामग्री है। इसमें उपरोक्त सभी भाग एक साथ उपलब्ध हैं। द्वंद्ववाद की एक निश्चित समझ बनाने के लिए यह अपेक्षित है कि इस अंतर्संबंधित संपूर्ण सामग्री को समग्रता में ही आत्मसात किया जाये। साथ ही दर्शन और चेतना पर साइडबार में उपलब्ध सामग्री को भी डाउनलोड करके इसी के समानांतर पढ़ा-समझा जाए।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

द्वंद्ववाद श्रॄंखला - समाहार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत आधुनिक विज्ञान में गणित के अनुप्रयोग पर चर्चा की थी, इस बार हम द्वंद्ववाद श्रॄंखला का समाहार प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



द्वंद्ववाद श्रॄंखला - समाहार

भौतिकवादी द्वंद्ववाद एक बड़ी सैद्धांतिक उपलब्धि है। इसके ऐतिहासिक महत्व तथा मानव समाज के वर्तमान तथा भावी विकास में इसके मूल्य को कम करके नहीं आंका जा सकता है। यह मानवीय क्रियाकलाप के हर क्षेत्र - दर्शन व विशेष विज्ञान, भौतिक व आत्मिक उत्पादन की सारी धाराओं - में निरपवाद रूप से परिव्याप्त है। द्वंद्ववाद के मूल सिद्धांत अपने गहन विश्वदृष्टिकोण, उसूलों, नियमों व प्रवर्गों की अध्ययन पद्धति, उनकी वैधता और विशुद्ध वैज्ञानिक प्रकृति के कारण, वैज्ञानिक संज्ञान के लिए और इस पर आधारित व्यवहार के लिए वस्तुगत रूप से आवश्यक हो उठते हैं।

भौतिकवादी द्वंद्ववाद प्रकृति, समाज तथा चिंतन के सर्वाधिक सामान्य नियमों का विज्ञान है, जो सारे क्षेत्रों में विकास की वस्तुगत नियमानुवर्तिताओं कों वैज्ञानिक ढंग से परावर्तित करता है। यह विज्ञान और व्यवहार को विश्वदृष्टिकोण तथा अध्ययन-पद्धति से लैस करता है, उन्हें नूतन, प्रगतिशील और विकास की ओर ले जाता है। वहीं दूसरी ओर, इतिहासपरकता के उसूलों का सुसंगत उपयोग करके भौतिकवादी द्वंद्ववाद, मानवजाति की प्रगति के असीम परिप्रेक्ष्य को दर्शाता है और जनगण की चेतना को प्रगतिशीलता एवं भविष्य की ओर उन्मुख करता है

भौतिकवादी द्वंद्ववाद अन्य सारी दार्शनिक संकल्पनाओं से इस बात में भिन्न है है कि यह नियमों और प्रवर्गों की विज्ञान द्वारा प्रमाणित और तार्किक रूप से अंतर्संबंधित प्रणाली है और यही नहीं, यह वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक प्रगति के आधार पर बनी ऐसी प्रणाली भी है, जो ऐतिहासिक विकास के साथ अपने को विकसित करती रहती है। प्रकृति, समाज तथा चिंतन के विकास को सही-सही परावर्तित करवे वाली पद्धति के रूप में भौतिकवादी द्वंद्ववाद निरंतर बदलता, विकसित होता तथा स्वयं को समृद्ध बनाता रहता है और नयी संकल्पनाओं के समावेश तथा पुरानी संकल्पनाओं के सत्यापन से अपने प्रवर्गीय उपकरण को अधिक पूर्ण बनाता है।

यह स्वयं को क्रमविकास के एक सिद्धांत के और साथ ही संज्ञान के सिद्धांत और सैद्धांतिक चिंतन के तर्क के रूप में उद्घाटित करता है। विशेष विज्ञानों के लिए यह, ज्ञान की इन शाखाओं में सामान्य सैद्धांतिक और दार्शनिक समस्याओं को हल करने के लिए विश्वदृष्टिकोणात्मक तथा अध्ययन-पद्धतिपरक आधार का काम देता है, और उन्हें प्रेक्षण, प्रयोग तथा प्रतिरूपण के वैज्ञानिक उपकरणों से लैस करता है। भौतिकवादी द्वंद्ववाद की इन पद्धतियों के सचेत उपयोग से प्राकृतिक व सामाजिक, दोनों क्षेत्रों के विशेष विज्ञानों की प्रगति में तेज़ी आ जाती है।

भौतिकवादी द्वंद्ववाद मनुष्यों के क्रांतिकारी व्यवहार और रूपांतरणकारी कार्यकलाप में विशेष महत्वपूर्ण है। किसी व्यावहारिक समस्या के समाधान के तरीक़ों व उपायों को निरूपित करने में इसका सचेत और कुशलतापूर्वक उपयोग सफलता की पूर्वशर्त है, जबकि इसके बगैर संज्ञान तथा व्यवहार, दोनों में ही गंभीर ग़लतियों और भारी भ्रांतियों का होना अनिवार्य है।

भौतिकवादी द्वंद्ववाद आधुनिक विज्ञान व संस्कृति की शैली तथा प्रकृति से पूर्णतः मेल खाता है। यह विज्ञान और व्यवहार में वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रेरित करता है, ऐसे विचारों के चयन व प्रतियोगिता को प्रोत्साहित करता है, जिससे लोगों के लिए घटनाओं के सार को अधिकाधिक गहराई से समझना संभव हो जाता है। यही नहीं, वह इस काम को शुद्ध वैज्ञानिक पद्धतियों से निष्पन्न करता है, वह विज्ञान में मुख्य रूप से उन वस्तुगत प्रक्रियाओं को खोजता है, जो अनुसंधान करनेवालों को द्वंद्वात्मक ढंग से सोचने के लिए विवश करती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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समय अविराम

शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण पर चर्चा की थी, इस बार हम आधुनिक विज्ञान में गणित के अनुप्रयोग को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान
( application of mathematics and modern science )

एक चौकोर मैदान के क्षेत्रफल को नापने के वास्ते एक मापने के दंड का उपयोग करने के बजाय हम केवल उसकी दो समलंब भुजाएं माप सकते हैं और फिर प्राप्त अंकों को गुणा करके पल भर में सारे मैदान का क्षेत्रफल नाप सकते हैं।

विज्ञान, इंजीनियरी तथा व्यावहारिक क्रियाकलाप में गणित का महत्व और अनुप्रयोग इस तथ्य पर आधारित है कि हम नापजोख के विभिन्न साधनों के द्वारा भौतिक वस्तुओं तथा उनके अनुगुणों पर कुछ अंकों को आरोपित कर सकते हैं और उसके उपरांत वस्तुओं के साथ श्रमसाध्य क्रियाएं करने के बजाय कुछ गणितीय नियमों के अनुसार इन अंकों के साथ संक्रियाएं ( operations ) कर सकते हैं। उसके पश्चात हम प्राप्त अंकों को पुनः भौतिक वस्तुओं पर लागू कर सकते हैं और उन्हें वस्तु के अन्य अनुगुणॊं तथा विशेषताओं को जानने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। परिमाण ( quantity ) और गुण ( quality ) का द्वंद्वात्मक संयोजन इस बात में स्पष्टतः अभिव्यक्त होता है। गणित कुछ सीमाओं के अंदर वस्तुओं के परिमाणात्मक लक्षणों के ज़ारिये उनकी असीम व विविधतापूर्ण गुणात्मक विशेषताओं का वर्णन करना संभव बना देता है। चूंकि परिमाणात्मक लक्षणों का वर्णन सापेक्षतः सुस्पष्ट, सरल सूत्रों तथा समीकरणों में व्यक्त गणितीय क़ायदों से किया जा सकता है, इसलिए वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) के संज्ञान की प्रक्रिया सरलीकृत, द्रुत और सुविधापूर्ण हो जाती है।

हमारे युग में गणित ने विज्ञान की अनेक शाखाओं में पैठ बना ली है। अब वैज्ञानिकगण ऐसे अधिकाधिक जटिल अमूर्तों, अपकर्षणों ( abstractions ) का उपयोग करने लगे हैं, जिन्हें संवेद बिंबों ( sensory images ) में परिणत नहीं किया जा सकता है, इसलिए नियमों तथा सिद्धांतों को जटिल गणितीय समीकरणों के ज़रिये निरूपित करना होता है। बीसवीं सदी के मध्य से कंप्यूटरों का बहुत तेज़ी से विकास हुआ और अब उनकी बदौलत अत्यंत जटिल गणनाओं को पूर्वलिखित कार्यक्रमों ( programmes ) के ज़रिये शीघ्रता से और विश्वसनीय ढंग से करना और उन समस्याओं को हल करना संभव हो गया है जो पहले व्यक्ति के लिए या तो बेहद कठिन या अत्यंत श्रमसाध्य होती थीं।

गणित, ऐसे पूर्णतः प्रमाणित प्रमेयों ( theorems ) तथा क़ायदों ( rules ) पर आधारित है, जो वस्तुगत सत्य हैं, किसी के संकल्प या इच्छाओं पर निर्भर नहीं है और इसीलिए हमारे परिवेशीय जगत के बारे में निश्चित ज्ञान हासिल करना संभव बनाता हैं। किंतु जिस प्रकार परिणाम को गुण से विच्छेदित नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार संज्ञान की गणितीय विधि को विभिन्न विज्ञानों की गुणात्मकतः भिन्न अन्य विधियों से विच्छेदित नहीं किया जा सकता है। समसामयिक वैज्ञानिक ज्ञान की सारी विधियों का एकत्व ( unity ) ही, उनके वस्तुगत सत्य की और वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर उनके प्रभाव की गारंटी करता है।



इस बार इतना ही।
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शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियों पर चर्चा की थी, इस बार हम वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण
( models and modelling in scientific cognition )

आधुनिक विज्ञान में प्रयुक्त एक सबसे सामान्य विधि मॉडल निर्माण ( modelling ) है। मॉडल तथा मॉडल निर्माण क्या है? शब्द "मॉडल" का मतलब है एक नमूना, प्रतिरूप या रूपांकन अथवा एक त्रिआयामीय चित्रण, किंतु यह स्वयं अपने आप में कोई स्पष्टीकरण नहीं है, क्योंकि विज्ञान में संकल्पना "मॉडल" ने एक विशेष आशय ग्रहण कर लिया है।

वस्तुएं अक्सर छानबीन के लिए समुपयुक्त नहीं होतीं। वे बहुत बड़ी या बहुत क़ीमती हो सकती हैं, बहुत जटिल या अनुपलब्ध हो सकती हैं। इस स्थिति में एक ऐसी वस्तु बनायी या खोजी जाती है जो कुछ सारभूत मामलों में दिलचस्पी की वस्तु या प्रक्रिया के समान हों, यानी स्थानापन्न ( substitute ) हों। यदि इस वस्तु का अध्ययन हो सकता हो और प्राप्त परिणामों को समुचित त्रुटि सुधारों तथा समंजनों ( adjustments ) के साथ अध्ययनाधीन वस्तु के संज्ञान के लिए प्रयुक्त या लागू किया जा सकता हो, तो इसे मॉडल कहा जायेगा। एक मॉडल की रचना या चयन, उसका अध्ययन तथा प्राप्त परिणामों को मुख्य वस्तु के संज्ञान के लिए इस्तेमाल करने को मॉडल निर्माण कहते हैं।

मानवसम वानर ( anthropoid apes ) कुछ मामलों में मनुष्य के समान होते हैं। वैज्ञानिकों ने बहुत पहले यह खोज की कि मेकाक बंदर की रीसस ( rhesus ) प्रजाति का रुधिर मनुष्य के रुधिर के समान होता है। इस रुधिर का अध्ययन करके उन्होंने विशेष अनुगुणों की खोज की जो रीसस-फ़ैक्टर कहलाता है। रुधिर की समानता को आधार बनाकर उन्होंने प्राप्त परिणामों को मानव रुधिर पर लागू किया और पता लगाया कि उसमें भी वैसे ही अनुगुण होते हैं। इस मामले में बंदर का रुधिर, मानव रुधिर का मॉडल था।

इंजीनियरी में मौलिक वस्तु या प्राक्-रूप ( prototype ) को बनाने से पहले अक्सर मॉडल का निर्माण तथा अध्ययन किया जाता है, ताकि बाद में किये जानेवाले निर्माण में कई ग़लतियों और कठिनाइयों से बचा जा सके। एक विशाल बिजलीघर के निर्माण से पहले उसका एक समानुपातिक तकनीकी मॉडल बनाया जाता है और उसे लेकर कई प्रयोग किये जाते हैं। इससे प्राप्त जानकारी को वास्तविक बिजलीघर बनाते समय ध्यान में रखा जाता है।

इन उदाहरणों में मॉडल की भूमिका नितांत भौतिक वस्तुओं द्वारा अदा की गयी है। किंतु आधुनिक विज्ञान में तथाकथित वैचारिक, प्रत्ययिक मॉडलों ( ideal models ) का व्यापक उपयोग होने लगा है। उनमें, मसलन, तथाकथित मानसिक प्रयोग शामिल हैं। एक अतिजटिल, खर्चीला प्रयोग शुरू करने से पहले एक वैज्ञानिक अपनी कल्पना में अपेक्षित औज़ारों के एक पूरे सेट की रचना करता है और उन्हें लेकर विभिन्न कार्यकलाप करता है और कभी-कभी सहायक साधनों के रूप में नक़्शों, रेखाचित्रों तथा आरेखों का उपयोग भी करता है। वह इन सारी कार्रवाइयों के बाद ही अपना असली प्रयोग करने का इरादा या तो त्याग देता है ( यदि मानसिक प्रयोग असफल हुआ है ) अथवा उसके व्यावहारिक कार्यान्वयन में जुट जाता है।

मॉडलों तथा मॉडल निर्माण की एक क़िस्म गणितीय मॉडल निर्माण है। इसमें स्थानापन्न वस्तु के रूप में भौतिक वस्तुओं या प्रक्रियाओं को लेने के बजाय गणितीय समीकरणों की एक प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इन समीकरणों में प्रेक्षणों तथा प्रयोगों से प्राप्त विविध आंकिक आधार-सामग्री को प्रतिस्थापित करके तथा उन समीकरणों को हल करके वैज्ञानिक विभिन्न प्रक्रियाओं के परिमाणात्मक अभिलक्षणों ( quantitative characteristics ) का सही-सही मूल्यांकन कर सकता है और उन कठिनाइयों का पूर्वानुमान लगा सकता है, जो व्यवहार में पैदा हो सकती हैं। आधुनिक विज्ञान के सारे क्षेत्रों में, विशेषतः इंजीनियरी तथा नियंत्रण ( control ) के सिद्धांत में गणितीय मॉडलों का व्यापक प्रयोग किया जाता है।



इस बार इतना ही।
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शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 26 सितंबर 2015

संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की विश्लेषण और संश्लेषण की पद्धतियों पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियां
( Logical and Historical methods of cognition )

प्रकृति तथा समाज में कोई प्रणाली कितनी ही जटिल क्यों न हो, उसे दो दृष्टिकोणों से जांचा जा सकता है। पहले उपागम ( approach ) में ज्ञान को प्रदत्त व निरूपित तथा कुछ हद तक पूर्ण माना जाता है। दूसरे में वस्तु के विकास तथा रचना की प्रक्रिया के अध्ययन पर जोर दिया जाता है। पहले उपागम से अध्ययनाधीन वस्तु की कार्यात्मकता ( functioning ) या जीवन क्रिया के नियमों को प्रकाश में लाना संभव हो जाता है, दूसरे में उसके विकास, रचना, उत्पत्ति और परिवर्तन के वस्तुगत ( objective ) नियमों को खोजा तथा उनका अध्ययन किया जाता है।

पहले उपागम में हम संज्ञान की जिस विधि का उपयोग करते हैं, वह तार्किक विधि ( logical method ) कहलाती है। इसमें बुनियादी, सबसे महत्वपूर्ण सारभूत विशेषताओं, अनुगुणों और लक्षणों को प्रकाश में लाया जाता है और इन अनुगुणों व विशेषताओं को परावर्तित करनेवाली आरंभिक संकल्पनाओं ( concepts ) से उन अधिक जटिल मूर्त संकल्पनाओं में निरंतर संक्रमण किया जाता है, जो हमें अध्ययनाधीन घटनाओं तथा प्रक्रियाओं के बारे में अधिक पूर्ण व सर्वांगीण ज्ञान प्रदान करती हैं। इस विधि के उपयोग से एक वस्तु के संज्ञान की प्रक्रिया में, उसकी सारभूत विशेषताओं के साथ यथातथ्य जानने में मदद मिलती है।

दूसरे उपागम में हम ऐतिहासिक विकास की वास्तविक प्रक्रिया को क़दम-ब-क़दम पुनःप्रस्तुत करते हैं जो हमेशा सहज व सीधी प्रक्रिया नहीं होती है। संज्ञान की ऐतिहासिक विधि ( historical method ) में अध्ययनाधीन प्रक्रियाओं या घटनाओं की रचना, विकास तथा उनके रूपायित ( shaping ) होने की, सारी अवस्थाओं की अनुक्रमिक, सतत जांच तथा वर्णन किया जाता है। इसमें विकास की जटिल वास्तविक प्रक्रिया के सारे सर्पिलों ( spiral ) का, उसके सभी टेढ़े-मेढ़े रास्तों व पश्चगमनों ( retreats ) सहित, अध्ययन किया जाता है। इसलिए ऐतिहासिक विधि बहुत श्रम-साध्य होती है और भारी शक्ति तथा समय की मांग करती है। साथ ही यह उन कई प्रश्नों का उत्तर देने में मदद देती है, जिनका सर्वांगीण उत्तर तार्किक विधि से नहीं मिल सकता है। इन प्रश्नों में अध्ययनाधीन वस्तुओं ( विषयों ) के क्रम तथा ऐतिहासिक विकास की दिशा से संबंधित प्रश्न भी शामिल हैं। अतः तार्किक व ऐतिहासिक विधियां एक दूसरे का विरोध नहीं करतीं, बल्कि एक दूसरे की संपूरक ( supplement ) हैं।

मिसाल के लिए, जब एक डॉक्टर रोगलक्षणों का अध्ययन करता है, तो वह सबसे महत्वपूर्ण चिह्नों को पृथक कर लेता है : तापमान में परिवर्तन, रुधिर की अवस्था में परिवर्तन, कुछ सूक्ष्म जीवाणुओं की उपस्थिति, अलग-अलग अंगों में परिवर्तन। अंत में वह प्राप्त तथ्यों को तार्किक ढंग से जोड़ते तथा मिलाते हुए एक निदान ( diagnosis ) पर पहुंचता है, यानी वह रोगी के स्वास्थ्य तथा बीमारी की स्थिति के बारे में नितांत ठोस ज्ञान प्राप्त करता है। किंतु कारगर उपचार ( effective treatment ) के लिए यह निदान काफ़ी नहीं होता।  डॉक्टर को बीमारी के इतिहास, लक्षणों के प्रकट होने के क्रम, बीमारी के अलग-अलग प्रकटीकरणों के विकास, अंगों की विविध विशेषताओं में परिवर्तनों और रोगी की अनुभूतियों, आदि के बारे में भी जानना होता है। इस ऐतिहासिक सूचना से अपने पूर्व अर्जित ज्ञान को संपूरित करके ही डॉक्टर अंततःअपने निदान को अधिक सटीक बनाता है और रोग के कारगर इलाज के लिए हिदायतें देता है। इससे भी अधिक, स्वयं रोग का उपचार यह मांग करता है कि उसके विकास, गतिकी तथा परिवर्तनों में सुधार प्रक्रिया की लगाता जांच करते रही जाये।

संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियां विभिन्न सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में भी एक दूसरे को द्वंद्वात्मक ( dialectical ) ढंग से संपूरित करती हैं। उदाहरण के लिए, जब हम किसी देश की समसामयिक अर्थव्यवस्था का अध्ययन करते हैं, तो हमें सबसे पहले उसकी संरचना को उद्घाटित करने, उसके मुख्य उत्पादन संबंधों का विश्लेषण करने, अर्थव्यवस्था के मुख्य घटकों ( उद्योग, कृषि, व्यापार, सेवाक्षेत्र, वित्त, कर प्रणाली, अदि ) की जांच करने का प्रयत्न करते हैं ; अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों तथा तकनीकों की छानबीन करते हैं। यह अनुसंधान तार्किक उपागम के संदर्भ में किया जाता है, जिससे आर्थिक प्रणाली के प्रमुख केंद्रों और उनके संपर्कों, अंतर्क्रिया, पारस्परिक प्रभाव, आदि को विभेदित करना संभव हो जाता है।

किसी प्रदत्त देश में अमुक-अमुक स्थिति कैसे बनी, उसके विकास की प्रवृत्तियां और परिप्रेक्ष्य क्या है, कुछ सूचकांकों में अन्य देशों से क्यों भिन्न है - इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए ऐतिहासिक उपागम को अपनाना और अर्थव्यवस्था के सारे घटकों को उनके उत्थान ( rise ), स्थापना ( establishment ), निकट तथा दूर भविष्य में उनके अलग-अलग तत्वों के दुर्बलीकरण या दृढ़ीकरण की सविस्तार जांच करना आवश्यक है।

तार्किक और ऐतिहासिक विधियां घनिष्ठता से संयोजित तथा एक दूसरे की संपूरक हैं। किसी एक आर्थिक प्रणाली के मुख्य घटकों तथा संयोजनों को अलग छांटकर तार्किक विधि यह दर्शाती है कि इस प्रणाली के ठीक किस क्रियातंत्र का विश्लेषण किया जाये, आज की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए ऐतिहासिक अनुसंधान के लिए कौन से क्रियातंत्र सबसे महत्वपूर्ण है। परंतु ऐतिहासिक विधि इस आर्थिक प्रणाली के उत्थान के क्रम तथा कार्य-कारण संबंधों और पूर्ववर्ती अवस्थाओं से मौजूदा अवस्था में उसके संक्रमण ( transition ) की जांच करके हमें तार्किक विश्लेषण द्वारा उद्घाटित नियमितता को अधिक अच्छी तरह से समझने और इस आर्थिक स्थिति के विशिष्ट लक्षणों तथा विशेषताओं का स्पष्टीकरण देने में मदद करती है।

इस तरह, तार्किक और ऐतिहासिक विधियों के बीच एक गहन आंतरिक संपर्क होता है। तार्किक विधि उन महत्वपूर्ण घटकों को सामने लाती है, जो ऐतिहासिक अध्ययन के विषय हैं और ऐतिहासिक विधि, तार्किक विधि के परिणामों को ठोस, परिष्कृत बनाने तथा संपूरित करने में मदद देती हैं।



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शनिवार, 19 सितंबर 2015

विश्लेषण और संश्लेषण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की साम्यानुमान पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम विश्लेषण और संश्लेषण की पद्धतियों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



विश्लेषण और संश्लेषण
( Analysis and Synthesis )

जब वैज्ञानिकगण किसी नयी वस्तु का अध्ययन शुरू करते हैं, तो उन्हें उसके बारे में नियमतः अत्यंत सामान्य अमूर्त ( abstract ) ज्ञान होता है, जो उस वस्तु के अलग-अलग अनुगुणों ( properties ) और लक्षणों ( characteristics ) को परावर्तित करता है। यह ज्ञान अध्ययन की हुई घटना या प्रक्रिया को व्यावहारिक कार्यों में लागू करने के लिए तो दूर की बात, उसकी गहरी समझ के लिए भी पर्याप्त नहीं होता।

उनके बारे में सारी की सारी अपेक्षित जानकारी हासिल करने और उन्हें संनियमित ( govern ) करने वाले नियमों को खोजने के लिए प्रदत्त वस्तु को एक विशेष प्रणाली ( system ) के रूप में प्रस्तुत करना जरूरी है। इसके बाद इस प्रणाली को विखंडित करके उसके पृथक-पृथक तत्वों तक के विविध स्तरों की उपप्रणालियों में विस्तारित किया जाता है। एक प्रणाली को उसकी उपप्रणालियों तथा तत्वों में विखंडित करना और उन उपप्रणालियों व तत्वों का क़दम ब क़दम अध्ययन करना विश्लेषण ( analysis ) कहलाता है। दूसरे शब्दों में, विश्लेषण साकल्य ( whole ) का सरलतर घटक अंगों, पक्षों और अनुगुणों में मानसिक विखंडन है, उनका सोद्देश्य और सुव्यवस्थित अध्ययन है। इसके दौरान अध्ययनाधीन वस्तु के अलग-अलग अनुगुनों व लक्षणों, अंशों और तत्वों के बारे में सूचनाएं संचित की जाती है। विषय-वस्तु का उसके घटक अंगों में मानसिक विंखंडन और उनकी जांच अनुसंधानकर्ता को उनकी संपूर्ण विविधता से सर्वाधिक मौलिक, सारभूत और आंतरिक विशेषताओं को छांटने में, उन्हें गौण, सांयोगिक तथा बाह्य विशेषताओं से पृथक करने में समर्थ बना देता है। ऐसी मानसिक संक्रियाओं से उस मूलतः सामान्य विशेषता को प्रकट करना संभव हो जाता है, जो संपूर्ण विविध तत्वों को प्रदत्त वस्तु की गुणात्मक विशेषता ( qualitative determinacy ) में एकीभूत करता है।

परंतु संज्ञानात्मक प्रक्रिया ( cognitive process ) विश्लेषण पर ही समाप्त नहीं हो जाती, क्योंकि इसके दौरान एक प्रकार के साकल्य के रूप में वस्तु की मूल प्रारंभिक संकल्पना ( concept ) वस्तुतः लुप्त हो जाती है। वस्तु के बारे में नया और इस बार नितांत ठोस व समृद्ध ज्ञान प्राप्त करने के लिए संज्ञान की एक नयी अवस्था को अमल में लाना आवश्यक होता है। इस अवस्था को संश्लेषण कहते हैं। संश्लेषण ( synthesis ) विश्लेषण का तार्किक अनुक्रम ( continuation ) है, उसका दूसरा पक्ष है जो विविधता की एकता के रूप में मूर्त ( concrete ) का पुनरुत्पादन करता है। इसमें विश्लेशण के दौरान प्राप्त सारे ज्ञान को कुछ नियमों के अनुसार ऐसे समेकित व परस्पर संयोजित किया जाता है कि वे अध्ययनाधीन वस्तु की उपप्रणालियों तथा तत्वों के अनुगुणों, लक्षणों, संबंधों तथा उनके बीच संयोजनों को सर्वाधिक सटीकता ( exactly ) तथा पूर्णता से परावर्तित करते हैं। दूसरे शब्दों में, संश्लेषण विश्लेषित के अंगों, पक्षों तथा तत्वों के संपर्कों और संबंधों का मानसिक संयोजन तथा पुनरुत्पत्ति है, और साकल्य की एकता में उसका बोध ( comprehension ) है। जब ज्ञान का समेकन या संश्लेषण पूरा हो जाता है, तब हमें वस्तु की एक अखंडित संकल्पना तथा एकीकृत ज्ञान फिर से हासिल होता है।

किंतु, मूल प्रारंभिक ज्ञान के विपरीत यह अपकर्षित या अमूर्त नहीं, बल्कि मूर्त होता है और सूचनाओं का एक ऐसा परिमाण उपलब्ध कराता है, जिससे अध्ययन की गयी वस्तुओं को बदलना, रूपांतरित ( transform ) करना और उन्हें नियोजित ( planned ) उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए व्यावहारिक क्रियाकलाप में इस्तेमाल करना संभव हो जाता है। मूर्त की और अग्रसरण ( advancing ), विचाराधीन वस्तु के संपर्कों और संबंधों की विविधता व पूर्णता में उसकी मानसिक पुनरुत्पत्ति, एक पेचीदा विश्लेषण-संश्लेषणात्मक प्रक्रिया है। विश्लेषण से संश्लेशण में संक्रमण की प्रक्रिया को अनेक बार दोहराया जा सकता है। इस कार्यविधि की प्रत्येक नयी पुनरावृत्ति से मानो ज्ञान का एक नया सर्पिल ( spiral ) प्राप्त होता जाता है। संज्ञान की विधियां दोहरायी जाती हैं, किंतु संज्ञान के द्वंद्वात्मक सर्पिल के एक नये, उच्चतर स्तर पर।

संज्ञान की वैज्ञानिक पद्धतियों के रूप में विश्लेषण और संश्लेषण को पृथक नहीं किया जा सकता है। साकल्य को समझने के लिए विश्लेषण की मदद से उसके घटकों का अध्ययन करना जरूरी है, दूसरी तरफ़, घटकों की भूमिका और कार्य को संश्लेषण के द्वारा साकल्य के संज्ञान से ही समझा जा सकता है। विश्लेषण अनुसंधानकर्ता को संवेदनात्मक-मूर्त से अमूर्त की ओर, और संश्लेषण अमूर्त से मानसिक रूप से मूर्त की तरफ़ बढ़ने में मदद करता है। विश्लेषण और संश्लेषण का उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान तक ही सीमित नहीं है, उन्हें सभी सैद्धांतिक या व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में इस्तेमाल किया जाता है।

अध्ययन-सामग्री का विश्लेषण-संश्लेषणात्मक प्रसंस्करण ( processing ) उसके रचनात्मक स्वांगीकरण ( assimilation ) की एक शर्त है। ऐसी सामग्री का विश्लेषण, बोध तथा व्यवस्थापन द्वंद्वात्मक चिंतन को विकसित करता है, जबकि उसे यांत्रिक ढंग से याद करना व्यर्थ होता है : एक सीमा तक उससे किसी व्यक्ति की याददाश्त बेहतर हो सकती है, लेकिन फिर यह बेकार का बोझ ही सिद्ध होता है। सच्चे वैज्ञानिक ज्ञान का तक़ाज़ा है कि विश्लेषण और संश्लेषण को उनकी एकता में इस्तेमाल किया जाये। यदि कोई व्यक्ति अपने को विश्लेषण ही तक सीमित रखता है, तो वह पूर्ण, मूर्त ज्ञान हासिल नहीं कर सकता या विचाराधीन वस्तु, प्रक्रिया अथवा घटना के सार को नहीं समझ सकता। यदि कोई व्यक्ति अपने को केवल सतही संश्लेषण तक ही सीमित रखता है, तो वह संज्ञान को अनिश्चित और बहुधा व्यर्थ प्रयास में परिणत कर देगा।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 12 सितंबर 2015

साम्यानुमान पद्धति

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की पद्धतियों निगमन और आगमन के एकत्व पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की एक और पद्धति साम्यानुमान को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



साम्यानुमान पद्धति
( Analogy method )

संज्ञान में वैज्ञानिक अपाकर्षणों ( abstractions ) की भूमिका असाधारण महत्व की होती है। लेकिन संज्ञानात्मक प्रक्रिया अपाकर्षणों की विरचना ( formulation ) पर समाप्त नहीं होती, क्योंकि वे अध्ययनाधीन विषय के संपूर्ण सार ( essence ) को प्रकट नहीं कर सकते। अपाकृष्ट चिंतन ( abstract thought ) अपूर्ण, सामान्य और अद्वंद्वात्मक होता है, जबकि द्वंद्वात्मक चिंतन ( dialectical thought ) गहन रूप से वैज्ञानिक, स्पष्ट, सुसंगत, निश्चायक, यानी मूर्त ( concrete ) होता है। आगमन और निगमन के साथ ही विचार को मूर्त बनाने का एक और प्रमुख उपकरण है साम्यानुमान ( analogy )। इसका विशिष्ट लक्षण है एक विशेष ( particular ) से दूसरे विशेष की ओर विचार की गति। साम्यानुमान आगमन और निगमन के बीच एक प्रकार की मध्यवर्ती, संक्रामी ( transitional ) स्थिति में होता है।

साम्यानुमान एक प्रकार का अनुमानित ( inferred ) ज्ञान होता है, जिसमें वस्तुओं के बीच कुछ मामलों की समानताओं को अन्य मामलों मे उनकी समानता पर निष्कर्ष निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसका यह मतलब है कि साम्यानुमान से पहले अध्ययनाधीन वस्तु के संबंध में प्रारंभिक संक्रियाओं ( operations ) का एक सेट पूरा हो चुकना चाहिये। ये संक्रियाएं हैं, पहली, वस्तु के अलग-अलग पक्षों, अनुगुणों, संपर्कों व संबंधों के बारे में अनुभवात्मक ज्ञान का स्वांगीकरण ( assimilation ) और उनका व्यवस्थापन; दूसरी, एक उपयुक्त तुल्यरूप ( analogue ) का ( समरूपता दर्शाने के लिए एक नमूने model का ) चुनाव, जिसके अनुगुणों का सर्वांगीण अध्ययन किया गया है तथा जिसके साथ साम्यानुमान लगाया जायेगा; और तीसरी, तुलनाधीन वस्तुओं के समान लक्षणों तथा नमूने में विद्यमान उस लक्षण के बीच आवश्यक व मौलिक संबंध का निर्धारण करना, जिसे अध्ययनाधीन वस्तु को अंतरित ( transferred ) करना है।

अनुसंधान की प्रारंभिक और सरलतम कार्य-विधि, विभिन्न वस्तुओं या घटनाओं की समान विशेषताओं को सही-सही निर्दिष्ट करना है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि पहला, जितनी अधिक समान विशेषताएं संभव हों, उन सबको निर्धारित करना और, दूसरा, इन वस्तुओं या घटनाओं की मूलभूत, अंतर्निहित विशेषताओं में समानता पर जोर देना और गौण तथा सांयोगिक विशेषताओं को पृथक करना। अध्ययनाधीन वस्तुओं, घटनाओं या प्रक्रियाओं की समानताओं तथा भेदों को जितनी ज़्यादा पूर्णता से विश्लेषित किया जाता है, साम्यानुमान के निष्कर्ष उतने ही सही, उतने ही अधिक प्रसंभाव्य ( probable ) होते हैं

अन्य अनुगुणों या पक्षों की समानताओं के आधार पर वस्तुओं या घटनाओं के कुछ अनुगुणों या पक्षों की समानता पर निकाला गया कोई भी निष्कर्ष हमेशा प्रसंभाव्य होता है। साम्यानुमान से निकाले गये निष्कर्षों की प्रसंभाव्यता को बढ़ाने की एक अत्यंत महत्वपूर्ण शर्त यह है कि समानुरूप वस्तुओं या घटनाओं का व्यापक, सर्वांगीण और गहन अध्ययन किया जाये। अध्ययनाधीन वस्तुओं का हमारा ज्ञान जितना पूर्णतर होगा, उनकी संख्या का महत्व उतना ही कम होगा। जहां वस्तुओं का अच्छा अन्वेषण न हुआ हो, उनका सार प्रकाश में न लाया गया हो और उनके भेदों को ध्यान में न रखा गया हो, वहां साम्यानुमान से निकाले गये निष्कर्षों की अच्छी प्रसंभाव्यता का कोई आधार नहीं होता।

साथ ही, यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि तुलनाधीन वस्तुएं पूर्णतः समान नहीं भी हो सकती हैं। साम्यानुमान निश्चित विशेषताओं के अनुसार केवल कुछ ही मामलों में उनकी अनुरूपता ( correspondence ) को प्रमाणित करता है। प्रत्येक तुलना अपूर्ण होती है, प्रत्येक तुलना में तुलनाधीन वस्तुओं या धारणाओं के एक या कुछ पक्षों के संदर्भ में समरूपता दिखलायी जाती है, जबकि अन्य पक्षों को अस्थायी रूप से तथा शर्त के साथ अपाकर्षित ( abstracted ) किया जाता है। चूंकि साम्यानुमान के निष्कर्ष केवल प्रसंभाव्य होते है, इसलिए यह तार्किक प्रमाण के औज़ार का काम नहीं कर सकता है। पर इसके बावजूद यह संज्ञान की एक सबसे अधिक प्रयुक्त पद्धति है।

साम्यानुमान को लागू करने के नियमों की तथा उसका कुशलता से इस्तेमाल करने की जानकारी व्यावहारिक काम में बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। समानुरूपी प्रक्रियाओं, घटनाओं तथा जीवन की स्थितियों के विश्लेषण से विभिन्न समस्याओं के लिए इष्टतम ( optimal ) समाधान खोजना और यह फ़ैसला करना संभव हो जाता है कि ठोस स्थितियों में कैसा व्यवहार किया जाये। मिलते-जुलते संसूचकों ( indicators ) के एक सेट के आधार पर एक प्रक्रिया या घटना के विकास की दिशा का अनुमान लगाया जा सकता है और उसके अवांछित परिणामों से बचने तथा उसके सकारात्मक तत्वों को सुदृढ़ बनाने के लिए, उस पर प्रभाव डालने के तरीक़े व साधनों का निर्धारण किया जा सकता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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