शनिवार, 23 मई 2015

सत्य क्या है - ५ ( सत्य की द्वंद्वात्मकता )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - ५ ( सत्य की द्वंद्वात्मकता )
what is truth - 5 ( dialectics of truth )

कोई एक घटना जितनी ज़्यादा जटिल ( complicated ) होती है, निरपेक्ष सत्य की, यानी उसके बारे में पूर्ण ज्ञान की, प्राप्ति उतनी ही कठिन होती है। किंतु इसके बावजूद निरपेक्ष सत्य ( absolute truth ) होता है और उसे मानव ज्ञान की वांछित सीमा और लक्ष्य के रूप में समझना चाहिए। प्रत्येक सापेक्ष सत्य ( relative truth ) हमें उस लक्ष्य के निकटतर लानेवाला एक क़दम है।

पूछा जा सकता है कि इन या उन वस्तुओं के बारे में पूर्ण और सर्वांगीण ( exhaustive ) जानकारी पा लेने के बाद क्या यह प्रक्रिया ख़त्म हो सकती है? यदि हम यह याद रखें कि भौतिक विश्व की बात तो दूर, उसके अलग-अलग खण्ड तक असंख्य गुणों, संबंधों और संपर्कों की समग्रता ( totality ) हैं, तो स्पष्ट हो जायेगा कि किसी भी परिघटना ( phenomena ) का पूर्ण, अंतिम और सर्वांगीण ज्ञान नहीं पाया जा सकता है। यह इसलिए भी संभव नहीं है कि परिवेशी परिघटनाएं स्वयं भी बढ़ती और बदलती रहती हैं और इस प्रक्रिया में उनमें नये गुण, नयी विशेषताएं और नये संबंध प्रकट होते रहते हैं। हम जीव अवयवियों को लें, जो अन्योन्यक्रिया ( mutual interaction ) करनेवाली अरबों कोशिकाओं से बने होते हैं, या आर्थिक प्रणालियों को , जिनकी परिधि में हज़ारों उद्यम, करोड़ों कामगार, तरह-तरह के माल बनानेवाले लाखों तरह के यंत्र और उपकरण आते हैं, वे सब इतने जटिल ( complex ) हैं कि ऐसी किसी भी परिघटना या वस्तु के बारे में पूर्ण और निःशेष ( thorough ) ज्ञान प्राप्त करना सर्वथा असंभव है।

पूर्ण, निःशेष ज्ञान, जिसे निरपेक्ष सत्य कहते हैं, तभी पाया जा सकता है, जब परिघटना अत्यंत सामान्य हो और उसमें अपेक्षाकृत थोड़े ही तत्व तथा संबंध हों। ऐसी परिघटनाएं कभी-कभी, उदाहरण के लिए, गणित में मिलती हैं, किंतु यहां भी किसी जानकारी को निरपेक्ष सत्य घोषित कर सकने के लिए अत्यधिक अमूर्तन ( abstraction ) और परिसीमन ( limitation ) की ज़रूरत पड़ती है।

शंकाएं उठायी जा सकती हैं : क्या निःशेष सत्य की अलभ्यता ( unattainability ) को स्वीकार करने का अर्थ उसकी वस्तुगतता का निषेध ( negation ) नहीं है? क्या इसका यह मतलब नहीं है कि विश्व की संज्ञेयता से इंकार करनेवाले अज्ञेयवादी ( agnostic ) सही थे? ऐसी शंकाओं को युक्तिसंगत ( rational ) शायद ही कहा जा सकता है। यदि संज्ञान को द्वंद्वात्मक ( dialectical ) ढंग से समझा जाये और यह माना जाये कि बाह्य विश्व विषयक हमारा ज्ञान, अनिवार्यतः परिणति पर पहुंचने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि निरन्तर बढ़नेवाली प्रक्रिया है, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि विश्व संज्ञेय ( knowable ) है और वह भी इस अर्थ में नहीं कि हम एक ही बार में और सदा के लिए उसका संज्ञान कर सकते हैं, बल्कि इस अर्थ में कि हम ज्ञात सापेक्ष सत्यों को व्यावहारिक कार्यकलाप की सहायता से जांचते और सुधारते हुए निरन्तर बढ़ाते और व्यापक बनाते जा सकते हैं।

यह दावा करना ग़लत है कि सत्य के तीन प्रकार है, अर्थात वस्तुगत, सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य। वास्तव में, सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य, वस्तुगत सत्य ( objective truth ) के ही विभिन्न स्तर या रूप ( forms ) हैं। हमारा ज्ञान हमेशा सापेक्ष होता है, क्योंकि यह समाज, प्रविधि ( technique ), विज्ञान की अवस्था, आदि के विकास के स्तर पर निर्भर होता है। हमारे ज्ञान का स्तर जितना ऊंचा होता है, हम निरपेक्ष सत्य के उतने ही निकट होते हैं।

फलतः ज्ञान के क्रमविकास का नियम सापेक्ष से निरपेक्ष की ओर उसकी प्रगति ( progress ) का ही नियम है। किंतु यह प्रक्रिया अंतहीन हो सकती है, क्योंकि हम ऐतिहासिक विकास की प्रत्येक अवस्था पर अपने परिवेशीय जगत में नये पहलुओं ( aspects ) तथा अनुगुणों ( properties ) की खोज करते हैं और उसके बारे में पूर्णतर तथा अधिक सटीक ज्ञान की रचना करते हैं। सत्य के एक सापेक्ष रूप से दूसरे सापेक्ष रूप में प्रविष्ट होने की यह सतत ( continuous ) प्रक्रिया, संज्ञान की प्रक्रिया में द्वंद्ववाद ( dialectics ) की सबसे महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। इस तरह, प्रत्येक सापेक्ष सत्य में निरपेक्ष सत्य का एक अंश होता है। इसके विपरीत, निरपेक्ष सत्य, सापेक्ष सत्यों के एक असीम अनुक्रम ( succession ) की सीमा है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 16 मई 2015

सत्य क्या है - ४ ( सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे एवं सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य को समझेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - ४ ( सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य )
what is truth - 4 ( relative and absolute truth )

ऐतिहासिक विकास की प्रत्येक अवस्था पर हमारा ज्ञान, सीमित और सापेक्ष ( relative ) होता है। इस सापेक्ष ज्ञान को आगे चलकर अधिक विशिष्ट ( specific ) तथा अधिक सही बनाया जा सकता है। प्राचीन चिंतक अक्सर घटनाओं या प्रक्रियाओं के मात्र बाहरी पक्ष का प्रेक्षण करते हुए उनकी जटिल आंतरिक संरचना के बारे में अतीव काल्पनिक अटकलें लगा दिया करते थे, परंतु फिर भी उनका ज्ञान, विज्ञान के लिए आगे बढ़ने का प्राथमिक आधार ही था। जब व्यवहार और विज्ञान, दोनों ही आगे बढ़ते हैं, तो लोग धीरे-धीरे सत्य को जानने लगते हैं। मसलन, देमोक्रितस ने महज अटकल लगायी थी कि दुनिया परमणुओं से बनी है, किंतु भौतिकीविद नील्स बोर ने परमाणु की संरचना की वस्तुतः खोज की थी।

हम कह सकते हैं कि मानव संज्ञान के विकास के हर चरण में वस्तुगत सत्य ( objective truth ) भी एक सीढ़ी ऊपर उठा और हमारे ज्ञान में से आत्मगत ( subjective ) तत्वों को निष्कासित करता गया। वस्तुगत सत्य के विकास की ये सीढ़ियां सापेक्ष सत्य ( या वस्तुगत सत्य के सापेक्ष रूप ) कहलाती हैं। एक प्रस्थापना के रूप में कहें तो, वस्तुगत सत्य की अभिव्यक्ति के रूप को, जो ठोस ऐतिहासिक दशाओं पर निर्भर होता है और ज्ञान के प्रदत्त स्तर पर प्राप्त उसकी सटीकता, परिशुद्धता और पूर्णता की कोटि को दर्शाता है, सापेक्ष सत्य ( relative truth ) कहते हैं

अतः निरंतर विकास करते और जटिल बनते व्यावहारिक कार्यकलाप के प्रभावस्वरूप, वस्तुगत सत्य भी निरंतर विकास करता जाता है और अपने किसी भी रूप में वह अंतिम और पूर्ण नहीं माना जा सकता। वास्तव में, वह इस या उस वस्तु से संबंधित सापेक्ष सत्यों का सिलसिला ही है, और वह भी ऐसे सापेक्ष सत्यों का कि उनमें से हर एक अपने पूर्ववर्ती का व्यापकीकरण और गहनीकरण होता है। इस प्रक्रिया को संज्ञान का द्वंद्व कहा जाता है। इस तरह, विज्ञान सहित मानव ज्ञान का सारा विकास कुछ सापेक्ष सत्यों का ऐसे सापेक्ष सत्यों के द्वारा अनवरत अनुक्रमण ( constant succession ) है, जो वस्तुगत सत्य को अधिक पूर्णता और सटीकता ( exactness ) से व्यक्त करते हैं। संज्ञान की प्रक्रिया, वस्तुगत सत्य की अधिक पूर्ण और अधिक सटीक जानकारी है।

किसी घटना के सर्वथा पूर्ण, सटीक, सर्वतोमुखी ( all-round ), सांगोपांग ( comprehensive ), सर्वांगपूर्ण ( exhaustive ) ज्ञान को निरपेक्ष सत्य ( absolute truth ) कहते हैं। अक्सर पूछा जाता है कि क्या हम निरपेक्ष सत्य को प्राप्त तथा उसका निरूपण ( formulate ) कर सकते हैं ? अज्ञेयवादी ( agnostic ) कहते हैं कि नहीं। प्रमाण के रूप में वे इस तथ्य का हवाला देते हैं कि हमारा सरोकार केवल सापेक्ष सत्यों से है और, वे आगे दलील देते हैं, आगे चलकर यह पता चलता है कि प्रत्येक सापेक्ष सत्य सटीक और पूर्ण नहीं है, जैसा कि सौर मंडल के उदाहरण में। फलतः, पूर्ण, सांगोपांग ज्ञान अलभ्य ( unattainable ) है। अधिभूतवादी ( metaphysicians ) यह सोचते हैं कि निरपेक्ष ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और हमारे क्रियाकलाप के किसी भी क्षण पर सदा के लिए जाना और व्यक्त किया जा सकता है।

अक्सर ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ, बहुत सरल मामलों में निरपेक्ष ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। मसलन, क्या यह कथन कि ‘दिल्ली भारत की राजधानी है’ निरपेक्ष सत्य नहीं है ? परंतु क्या यह कथन दिल्ली की आबादी, उसके क्षेत्रफल और इमारतों की संख्या के बारे में सर्वांगपूर्ण ज्ञान देता है, अथवा क्या यह बताता है कि यह भारत की राजधानी कब बना, आदि ? यहां तक कि निश्चित तारीख़ के लिए दिये जानेवाले आंकड़े एक या दो वर्ष में सदोष हो जायेंगे। इस भांति हम देखते हैं कि पहली नज़र में जो बात निरपेक्ष सत्य मालूम पड़ती है, वह वास्तव में सापेक्ष सत्य होती है, क्योंकि उसमें दिल्ली के बारे में सर्वांगपूर्ण तथा सर्वदा के लिए सत्य ज्ञान नहीं होता है।

कोई एक घटना जितनी ज़्यादा जटिल ( complicated ) होती है, निरपेक्ष सत्य की, यानी उसके बारे में पूर्ण ज्ञान की, प्राप्ति उतनी ही कठिन होती है। किंतु इसके बावजूद निरपेक्ष सत्य होता है और उसे मानव ज्ञान की वांछित सीमा और लक्ष्य के रूप में समझना चाहिए। प्रत्येक सापेक्ष सत्य हमें उस लक्ष्य के निकटतर लानेवाला एक क़दम है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 10 मई 2015

सत्य क्या है - ३ ( वस्तुगत सत्य )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे एवं वस्तुगत सत्य को समझेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - ३ ( वस्तुगत सत्य )
what is truth - 3 ( objective truth )

आधुनिक विज्ञान जो जानकारियां हासिल कर चुका है, उनमें से अधिसंख्य ऐसी हैं कि उनका स्वरूप न केवल अध्ययन की जानेवाली वस्तु ( object ) पर, अपितु उन औज़ारों, यंत्रों और उपकरणों पर भी निर्भर होता है, जिनके माध्यम से अनुसंधानकर्ता और वस्तु के बीच अन्योन्यक्रिया ( mutual interaction ) होती है। संज्ञान ( cognition ) के इन सभी साधनों का यथार्थ अस्तित्व ( real existence ) है, किंतु उसकी रचना लोगों के द्वारा की जाती है और इसलिए कुछ हद तक वे आत्मगत कारक ( subjective factors ) पर निर्भर होते हैं। दूसरे शब्दों में, जिन संकल्पनाओं ( concepts ), कथनों ( statements ) और अनुमानों ( inference ) के द्वारा हम हम बाह्य जगत के, और स्वयं अपने बारे में ज्ञान को व्यक्त करते हैं, वे इस जगत का ही परावर्तन ( reflection ) नहीं, बल्कि हमारे क्रियाकलाप ( activity ) का उत्पाद ( product ) भी हैं।

फलतः, ज्ञान में कुछ ऐसी चीज़ है, जो उस पर काम करनेवाले व्यक्ति पर निर्भर होती है, यानी संज्ञान के विषयी ( subject ) पर। विज्ञान का लक्ष्य यही है कि हमारे ज्ञान में उन तत्वों का अनुपात निरंतर बढ़ता जाये, जो अध्ययनाधीन वस्तुओं की नियमसंगतियों, गुणों और संबधों को प्रतिबिंबित करते हैं और जो किसी व्यक्ति या मानवजाति पर निर्भर नहीं होते। अतएव कहा जा सकता है कि जहां तक हमारा ज्ञान वस्तुगत जगत ( objective world ) को परावर्तित करता है, उसमें एक ऐसी अंतर्वस्तु ( content ) भी होती है, जो न तो मनुष्य पर निर्भर है, न ही सारी मानवजाति पर और फलतः केवल वस्तुगत जगत पर ही निर्भर होती है। हमारे विचारों और ज्ञान की इस अंतर्वस्तु को, जो न तो एक अलग व्यक्ति पर निर्भर होती है, न ही सारी मानवजाति पर, वस्तुगत सत्य ( objective truth ) कहते हैं

यह कथन कि सामान्य दाब पर, १०० डिग्री सेल्सियस तापमान तक गर्म करने पर पानी भाप में परिणत हो जाता है, एक वस्तुगत सत्य है। हालंकि यह तथ्य कि हम इस तापमान को फ़ारेनहाइट या रियोमूर थर्मामीटर से, या सेल्सियस से नापते हैं, मनुष्य पर निर्भर करता है, किंतु इस विशिष्ट तापमान पर स्वयं पानी का उबलना और भाप में तब्दील होना न मनुष्य पर निर्भर है न मानवजाति पर।

सत्य ज्ञान, स्वयं वस्तुगत जगत की भांति ही द्वंद्ववाद ( dialectics ) के नियमों के अनुसार विकसित होता है। मध्ययुग में लोग यह समझते थे कि सूर्य और ग्रह, पृथ्वी के गिर्द घूमते हैं। वह बात सत्य थी या असत्य ? मनुष्य आकाशीय पिंडों की गति को एक ही ‘प्रेक्षण स्थल’, यानी पृथ्वी से देखता था ; इस तथ्य ने उसे इस असत्य निष्कर्ष पर पहुंचाया कि सूर्य और ग्रह, पृथ्वी के गिर्द घूमते हैं। इसमें संज्ञान के विषयी पर हमारे ज्ञान की निर्भरता को देखा जा सकता है, किंतु इस कथन में एक ऐसी अंतर्वस्तु थी, जो मनुष्य या मानवजाति पर निर्भर नहीं थी, वह यह तथ्य कि सौर मंडल के आकाशीय पिंड घूमते तो हैं। उस तथ्य में वस्तुगत सत्य का बीज था।

कोपेर्निकस के सिद्धांत ने इस बात की पुष्टि की कि सूर्य हमारे ग्रहमंडल का केन्द्र है और पृथ्वी तथा अन्य ग्रह एककेंद्रिक वृत्तों में उसके गिर्द चक्कर काटते हैं। इस सिद्धांत में वस्तुगत अंतर्वस्तु का अंश, पूर्ववर्ती दॄष्टिकोणों की तुलना में बहुत अधिक था, लेकिन वस्तुगत यथार्थता के पूर्णतः अनुरूप क़तई नहीं था, क्योंकि इसके लिए आवश्यक खगोलीय प्रेक्षणों का अभाव था। अपने गुरू टाइको ब्राहे के प्रेक्षणों पर भरोसा करते हुए केपलर ने यह साबित किया कि ग्रह सूर्य के चारों तरफ़ वृत्तों में नहीं, बल्कि दीर्घ वृत्तों ( ellipses ) में चक्कर काटते हैं। यह पहले से कहीं अधिक सत्य ज्ञान था। आधुनिक खगोलविद्या ( astronomy ) में ग्रहों के प्रक्षेप पथों तथा घूर्णन के नियमों की गणना और भी अधिक सटीकता से की गयी है।

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वस्तुगत सत्य इतिहासानुसार विकसित होता है। हर नयी खोज के बाद यह पूर्णतर होता जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 2 मई 2015

सत्य क्या है - २ ( सत्य की निर्भरता )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - २ ( सत्य की निर्भरता )
what is truth - 2 ( dependence of truth )

सत्य का प्रश्न एक वैज्ञानिक द्वारा अपनाये जानेवाले सामान्य दार्शनिक दृष्टिकोण से, दर्शन के मूल प्रश्न का उत्तर देने के उसके तरीक़े से घनिष्ठता के साथ जुड़ा है। सत्य के मामले में विज्ञान और धर्म की परस्पर विरोधी प्रकृति अत्यंत स्पष्टता से प्रकट होती है। विज्ञान के लिए सत्य की खोज एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण काम है, जबकि धर्म आस्था की ओर रुख करता है और कभी-कभी आस्था को खुलेआम सत्य के मुक़ाबले में खड़ा कर देता है।

प्रत्ययवाद/भाववाद ( idealism ) और अज्ञेयवाद ( agnosticism ) की सारी की सारी क़िस्में, सत्य को मानने से इनकार नहीं करती, किंतु वे इसकी व्याख्या आत्मगत ( subjective ) ढंग से करती हैं, क्योंकि वे इसे, परिवेशीय वास्तविक जगत के अस्तित्व की मान्यता के साथ, तथा सही-सही ढंग से उसका संज्ञान कर सकने व अपनी चेतना में उसे परावर्तित करने की मनुष्य की क्षमता के साथ, नहीं जोड़ती हैं। कुछ प्रत्ययवादी सत्य को लोगों के बीच संपन्न एक समझौते का परिणाम मानते हैं। कभी-कभी जो उपयोगी होता है उसी को सत्य घोषित कर दिया जाता है, परंतु जो उपयोगी है, वह सब सत्य नहीं होता है।

केवल द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) ही ने, जिसने संज्ञान के सिद्धांत में क्रांति कर दी थी, सत्य का, उसके आधारों और उसकी कसौटियों ( criterion ) का, एक मूलतः नया सिद्धांत प्रस्तुत किया। वह सिद्धांत क्या है?

संज्ञान एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें आत्मगत चिंतनात्मक कार्य और क्रियाविधियां, वस्तुगत ( objective ) तथा व्यावहारिक कार्यों तथा कार्यकलाप के रूपों के साथ घनिष्ठता से अंतर्संबंधित ( interconnected ) होती हैं। इस प्रक्रिया की उपज के रूप में प्राप्त ज्ञान ( knowledge ) पर, इन दोनों परस्परसंबंधित पहलुओं ( aspects ) की छाप होती है। इसलिए यह पता करना बहुत महत्त्वपूर्ण है कि हमारे ज्ञान में क्या वस्तुगत कारकों पर निर्भर है और क्या आत्मगत कारकों पर। विज्ञान के इतिहास पर दृष्टिपात करके हम जान सकते हैं कि, मसलन चन्द्रमा के बारे में, हमारा ज्ञान कैसे विकसित हुआ है।

यदि हम आरंभिक, अति प्राचीन काल से चले आ रहे ज्ञान का गहन विश्लेषण करें, तो पायेंगे कि उनमें मानों दो स्तर हैं। इस ज्ञान में से कुछ तो मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों ( sense organs ) की विशेषताओं, प्रेक्षक ( observer ) की स्थिति, प्रेक्षण करने की उसकी योग्यता, मेहनत तथा ध्यान की मात्रा, आदि पर निर्भर होता है। मगर इसी ज्ञान का एक दूसरा स्तर भी है, जो न तो अलग व्यक्ति पर और न सारी मानवजाति पर ही निर्भर होता है। हम जो चन्द्रमा की विभिन्न ऋतुओं में और महिने के विभिन्न दिनों मे कभी प्रकाशमान चक्र और कभी हंसिये जैसा देखते हैं, वह आंशिकतः प्रेक्षक की स्थिति और आंशिकतः स्वयं चन्द्रमा और सूर्य की स्थिति से निर्धारित होता है। किंतु जहां तक चन्द्रमा के पृथ्वी के गिर्द घूमने या उसकी मिट्टी की रासायनिक संरचना का संबंध है, तो वे प्रेक्षक की स्थिति पर निर्भर नहीं होते।

ज्यों-ज्यों हमारे प्रेक्षण साधन परिष्कृत ( refined ) होते हैं और प्रकाशीय दूरदर्शियों का स्थान रेडियो दूरदर्शी, रेडार, लेज़र यंत्र और अंतरिक्षीय प्रयोगशालाएं लेती हैं, त्यों-त्यों चन्द्रमा के बारे में हमारा ज्ञान अधिकाधिक बहुविध बनता जाता है। इसके साथ ही हमारे ज्ञान में उस स्तर और उस जानकारी का अनुपात भी बढ़ता जाता है, जो व्यक्तियों और मानवजाति पर निर्भर नहीं होता, बल्कि जिसका निर्धारण वस्तुगत कारकों द्वारा किया जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

सत्य क्या है - १ ( सत्य की संकल्पना )

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम सत्य की द्वंद्ववादी शिक्षा को समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सत्य क्या है - १ ( सत्य की संकल्पना )
what is truth - 1 ( concept of the truth )

संज्ञान की प्रक्रिया में हम विलगित संकल्पनाओं ( isolated concepts ) का नहीं, बल्कि अंतर्संबंधित ( interconnected ) संकल्पनाओं का उपयोग करते हैं। कथनों ( statements ) तथा अनुमानों ( inferences ) के ज़रिये यह अंतर्संबंध कायम किया जाता है। उनके द्वारा हम अपने इर्दगिर्द दुनिया में अनुगुणों ( properties ), संबंधों या अंतर्क्रियाओं के बारे में किसी चीज़ की अभिपुष्टि ( assert ) या अस्वीकरण ( deny ) करते हैं।

अलग-अलग संकल्पनाएं ‘घर’, ‘संस्थिति’, ‘पहाड़ी’ इस बात की बहुत कम जानकारी देते हैं कि हमारा घर कहां हैं। इसके विपरीत, यह पद कि ‘घर पहाड़ी पर है’ हमें आवश्यक सूचना देता है। एक अनुमान या निष्कर्ष ( conclusion ), कथनों की एक श्रृंखला है जो ऐसे निर्मित होती है कि उनमें से एक कथन, तर्कणा के नियमों के अनुसार, दूसरे कथन का अनुगामी ( follower ) होता है। मसलन, आवश्यक पता ज्ञात होने पर हम निम्नांकित अनुमान की रचना कर सकते हैं : ‘यदि हमारी जरूरत का घर पहाड़ी पर है, तो हमें पहाड़ी पर चढ़ना पड़ेगा।’

लेकिन जिन कथनों तथा अनुमानों से कोई एक व्यक्ति बाह्य जगत के बारे में अत्यंत महत्त्वपूर्ण और मूल्यवान सूचना को निरुपित ( formulate ) करता है, वे भी इस जगत को सही ढंग से भी परावर्तित ( reflect ) कर सकते हैं और ग़लत ढंग से भी। बाह्य जगत को सही ढंग से तथा ग़लत ढंग से परावर्तित करनेवाले कथनों के बीच भेद करने के लिए हम विशेष संकल्पनाओं का उपयोग करते हैं - ‘सत्य’ ( truth ) और ‘असत्य’ ( falsehood )। संज्ञान का लक्ष्य, सत्य की उपलब्धि है और उसके आधार पर मानवजाति के सम्मुख मौज़ूद नयी समस्याओं को हल करना है

‘सत्य’ क्या है? यह बहुत जटिल प्रश्न है और संज्ञान के सिद्धांत का एक केन्द्रीय प्रश्न है। प्रत्ययवादी/भाववादी ( idealistic ) तथा भौतिकवादी ( materialistic ) दर्शन इसका भिन्न-भिन्न ढंग से उत्तर देते हैं।

सत्य की संकल्पना अनेकार्थक है और बहुधा विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त की जाती है। अपने दार्शिनिक अर्थ में यह शब्द, ज्ञान की अंतर्वस्तु तथा बाह्य जगत के बीच एक निश्चित संबंध ( connection ) को व्यक्त करता है। ‘सत्य’ शब्द चिंतन में वास्तविकता ( reality ) के शुद्ध, प्रामाणिक ( authentic ) परावर्तन को द्योतित करता है। सत्यता स्वयं वस्तुओं का अपना अनुगुण नहीं है, बल्कि मनुष्य के मन में उनका प्रामाणिक परावर्तन हैमार्क्स के विचार में सत्य का ज्ञान वस्तुओं, घटनाओं तथा प्रक्रियाओं को उस रूप में समझना है, जिस रूप में वे वास्तव में विद्यमान हैं।

प्राचीन दार्शनिक सत्य को सही ज्ञान के साथ जोड़ते थे, जो यथार्थता ( reality ) के अनुरूप ( corresponding ) होता था। इसका विलोम था भ्रम या मिथ्या ज्ञान, जो यथार्थता को विरूपित ( deform ) करता है। अरस्तु ऐसे ज्ञान को सत्य मानते थे, जिसमें बाह्य जगत से संबंधित निर्णय सही हैं। बाद में अनेक दार्शनिक इस बात पर सहमत हुए कि सत्य, यथार्थता के साथ चिंतन की अनुरूपता, और जो हम जानते हैं उसके साथ ज्ञान की अनुरूपता है। किंतु यह निरुपण प्रत्ययवादी और भौतिकवादी दोनों ही करते हैं, जबकि दर्शन के बुनियादी प्रश्न का भिन्न-भिन्न उत्तर देते हुए वे चिंतन तथा यथार्थता की अनुरूपता को भिन्न-भिन्न ढंग से समझते और व्याख्यायित करते हैं।

मसलन, वस्तुगत प्रत्ययवादी ( objective idealist ) अफ़लातून सत्य को शाश्वत ( eternal ), अपरिवर्तनीय प्रत्ययों ( ideas ) के साथ हमारे ज्ञान की अनुरूपता समझते थे। उनके दृष्टिकोण से भौतिक विश्व का ज्ञान सत्य नहीं हो सकता है, क्योंकि भौतिक विश्व अस्थिर और परिवर्तनशील है, और सत्य किसी शाश्वत तथा अपरिवर्तनशील चीज़ से ही संबंधित हो सकता है। वहीं, एक और वस्तुगत प्रत्ययवादी हेगेल सत्य को परम आत्मा ( absolute spirit ) के, निरपेक्ष प्रत्यय ( absolute idea ) के साथ हमारे ज्ञान की अनुरूपता मानते थे। उनकी राय में, मानव ज्ञान का लक्ष्य निरपेक्ष प्रत्यय के साथ पूर्ण संगतता ( coincidence ) है और सत्य इसी संगतता में निहित है।

मार्क्स से पहले के अधिकांश भौतिकवादी यह समझते थे कि सत्य, वस्तुगत भौतिक जगत के साथ हमारे ज्ञान की अनुरूपता है। लेकिन मुख्य कठिनाई ठीक इसी की वजह से पैदा हुई, यानी इस बात से कि इस अनुरूपता को कैसे परखा जाये, कैसे प्रमाणित ( establish ) किया जाये ? यदि इसका साधन, माप या कसौटी, संवेदन ( sensation ) हैं, तो कठिनाइयां और भी ज़्यादा होतीं क्योंकि संवेदन स्वयं भ्रामक ( deceptive ) हो सकता है। यदि सत्य की कसौटी स्वयं मनुष्य की तर्कबुद्धि ( reason ) में निहित है, तो वह देर-सवेर प्रत्ययवाद पर पहुंचा देती है ( देखें - ज्ञान के स्रोतों के बारे में एक वार्ता )।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन - २
( rational cognition or abstract thinking - 1 )

चिंतन-प्रक्रिया में संकल्पनाएं ( concepts ) आम तौर पर निर्णयों के अवयव ( elements of judgments ) होती हैं। निर्णय एक प्रकार का विचार ( thought ) है, जो इस बात को उचित या ग़लत ठहराता है कि कुछ लक्षण ( features ) एक निश्चित वस्तु या वस्तु-समूह के हैं, या जो वस्तुओं के बीच एक संबंध ( relation ) के होने या न होने का दावा करते हैं। मसलन, ऐसे विचार कि, ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’, ‘एशियाई, अफ़्रीकी और लैटिन अमरीकी देशों के पिछड़ेपन के लिए उपनिवेशवाद ( colonialism ) दोषी है’ और ‘समाजवाद ( socialism ) सामाजिक न्याय का समाज है’ निर्णय हैं। इनमें से पहला विचार मनुष्य और समाज के बीच संबंध, दूसरा उपनिवेशवाद तथा अनेक अल्पविकसित देशों के बीच तथा तीसरा समाजवाद और सामाजिक न्याय के बीच संबंध को निश्चित करता है।

एक निर्णय, प्रत्यक्ष प्रेक्षण ( observation ) से भी निरूपित किया जा सकता है और अन्य निर्णयों के आधार पर अप्रत्यक्ष रूप से भी। चिंतन के जिस रूप के द्वारा एक या कई अन्य निर्णयों से एक नया निर्णय निगमित ( deduced ) किया जाता है, उसे अनुमान ( inference ) या अनुमिति ( conclusion ) कहते हैं। जिन निर्णयों से अनुमान का निष्कर्षण ( drawn ) होता है, उन्हें आधारिका ( premises ) और नये निर्णय को निष्कर्ष ( conclusion ) या परिणाम ( consequence ) कहते हैं। अनुमान का एक उदाहरण ऐसे लिया जा सकता है : "पितृसत्तात्मक (  patriarchal ) समाजों में स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्ज़े की होती है। भारत के अधिकतर हिस्सों में पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना अभी भी कायम है। फलतः, भारत के अधिकतर हिस्सों में अभी भी स्त्रियों की स्थिति दोयम दर्ज़े की है।" यहां पहले दो निर्णय इस प्रकार संबंधित हैं कि उनसे ऐसे नये निर्णय का अनुमान करना संभव हो जाता है, जिसमें एक नया प्रत्यय ( idea ) निहित हो।

जिन घटनाओं को प्रत्यक्षतः नहीं देखा जा सकता है, परंतु जो ज्ञात नियमों से संचालित ( governed ) हैं, उनके बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए अनुमानों का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। अनुमान, विभिन्न प्रस्थापनाओं ( propositions ) की सत्यता अथवा तर्कदोष ( fallacy ) को प्रमाणित करने, स्थापित तथ्यों और नियमों को स्पष्ट करने और अन्वेषित नियमानुवर्तिताओं ( discovered uniformities ) के बल पर वैज्ञानिक भविष्यवाणियां करने में सहायक होते हैं।

संज्ञान की संवेदनात्मक ( sensory ) और बौद्धिक ( rational ) अवस्थाएं घनिष्ठता से अंतर्संबंधित ( interconnected ) हैं। वैज्ञानिक संज्ञान, वस्तु या घटना के अलग-अलग पक्षों तथा संबंधों के प्रत्यक्ष अवबोधन ( perception ) से शुरू होता है। फिर प्रयोग किये जाते हैं, जिनमें सामान्य (general ) को प्रकाश में लाने के लिए, इन पक्षों और संबंधों की तुलना तथा मिलान करने के लिए सामग्री प्राप्त होती है। इसके उपरांत अपकर्षण ( abstraction ) होता है, यानी वस्तुओं और घटनाओं के कुछ अनुगुणों ( properties ) और संबंधों से ध्यान हटाना तथा सामान्यीकरण, यानी महत्त्वपूर्ण निर्णायक अनुगुणों और संबंधों को प्रकट करना। इससे आगे वैज्ञानिक संज्ञान, वस्तुओं और प्रक्रियाओं के आंतरिक संबंधों, उनकी अंतर्क्रियाओं ( interactions ) तथा कायांतरणों ( transmutations ) और उनके विकास की निर्णायक नियमानुवर्तिताओं को उद्‍घाटित करता है।

हमारे ज्ञान के गहराने के साथ ही इन संयोजनों, संबंधों और स्वयं वस्तु का परावर्तन ( reflection ) भी संवेदनात्मक बिंब ( sensory image ) को गंवाने लगता है, लेकिन संज्ञान की प्रक्रिया जारी रहती है, क्योंकि वैज्ञानिक अपकर्षण उसको भी समझना संभव बना देता है, जिसका प्रत्यक्ष प्रेक्षण नहीं हो सकता है। यहां यह मुद्दा ध्यान में रखना चाहिये कि संवेदनात्मक संज्ञान की ही भांति चिंतन भी व्यवहार ( practice ) पर, व्यावहारिक मानवीय आवश्यकताओं पर आश्रित तथा उनसे संबंधित होता है और व्यवहार से हासिल जानकारी पर भरोसा करता है

मानव संज्ञान के विकास का नियम, आभास ( appearance ) ) से सार ( essence ) की ओर, बाह्य ( external ) से आंतरिक ( internal ) की ओर होनेवाली हरकत ( movement ) है। विज्ञान का सारा इतिहास इसका गवाह है। मसलन, पहले के कई अर्थशास्त्रियों ने पण्यों ( commodities ) के बाहरी अनुगुण देखे थे, यानी उनकी उपयोगिता ( उपयोग मूल्य ) तथा विनिमय क्षमता ( विनिमय मूल्य )। लेकिन पण्यों के अनुगुणों की इन बाह्य अभिव्यक्तियों में गहरे आंतरिक संबंध छुपे हुए हैं। वह मार्क्स थे, जिन्होंने इनका पता लगाया और सारे पण्यों के सर्वनिष्ठ ( common ) गुण को, यानी उनके उत्पादन के लिए आवश्यक सामाजिक श्रम ( social labour ) को उद्‍घाटित किया। पण्य का मूल्य, श्रम की सामाजिक प्रकृति को, लोगों के बीच सामाजिक संबंधों को व्यक्त करता है।

वैज्ञानिक सैद्धांतिक चिंतन की भारी अहमियत इस बात में है कि यह विश्व के संज्ञान में एक ऐसा सशक्त औज़ार है, जो मनुष्य को सत्य ( truth ) की समझ में समर्थ ( enable ) बनाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 12 अप्रैल 2015

तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन पर चर्चा की थी, इस बार हम तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन को समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन - १
( rational cognition or abstract thinking - 1 )

वस्तुओं के सार्विक ( universal ), आवश्यक और सारभूत अनुगुण तथा संबंध, उनके नियमाधीन संपर्क ( law-governed connections ), संवेदनात्मक ज्ञान के लिए अलभ्य ( inaccessible ) होते हैं। इन्हें जानने-समझने का काम चिंतन ( thinking ) की सहायता से संज्ञान की बौद्धिक या तार्किक अवस्था में संपन्न होता है। मानव चिंतन उसे भी समझ लेने में सक्षम है, जो किसी क्षण-विशेष पर देखा नहीं जा सकता या जिसका प्रत्यक्ष प्रेक्षण ( direct observation ) हो ही नहीं सकता। मसलन हमारे संवेदी अंग ( sensory organs ) पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की दशाओं की या प्रकाश की गति की रफ़्तार की प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं कर सकते, लेकिन ऐसी प्रक्रियाओं और घटनाओं का मानसिक बोध ( mental comprehension ) संभव हैं।

चिंतन, आंतरिक तथा सार्विक संबंधों को प्रकट करने, प्रकृति, समाज में और स्वयं संज्ञान में हो रहे परिवर्तनों व विकास के नियमों का पता लगाने, हमारे परिवेशीय जगत के गहनतम रहस्यों का अनावरण ( unravel ) करने में सहायता करता है। चिंतन, सामाजिक व्यवहार के ऐतिहासिक विकास का एक उत्पाद ( product ) है। यह वास्तविकता ( reality ) का सामान्यीकृत और अप्रत्यक्ष परावर्तन ( reflection ) है। चिंतन, वास्तविक जगत के साथ, संवेदनात्मक संज्ञान ( sensory cognition ) के द्वारा जुड़ा होता है और इसका सार ( essence ) संवेदी अंगों द्वारा प्राप्त सूचनाओं को संसाधित ( processing ) करने में निहित है।

वास्तविकता के सामान्यीकृत संज्ञान के रूप में चिंतन, वस्तुओं, घटनाओं और प्रक्रियाओं के सामान्य, सारभूत अनुगुणों ( general, essential properties ) को प्रकट करने की ओर निर्देशित होता है। भाषा के बग़ैर सामान्यीकरण असंभव होता : चिंतन और भाषा एक दूसरे के साथ घनिष्ठता से जुड़े हैं। वस्तुओं और घटनाओं में से सामान्य को प्रकाश में लाते हुए हम उसे भाषा में, शब्दों के रूप में व्यक्त करते हैं। भाषा की सामान्यीकरण करनेवाली भूमिका की ही वजह से एक मनुष्य अपने विचारों को प्रकट कर सकता है और अपनी बारी में अन्य लोगों के विचारों के बारे में पता लगा सकता है ; वह ज्ञान का समाहार ( summarise ) कर सकता है और उसे दूसरों को अंतरित ( pass on ) कर सकता है। ( चिंतन पर और विस्तार से `यहां' पढ़ा जा सकता है )

संवेदनात्मक संज्ञान की तरह चिंतन भी निश्चित रूप ( forms ) धारण करता है। ये रूप हैं : संकल्पनाएं ( concepts ), निर्णय ( judgments ) और अनुमान ( inference )। संकल्पना, चिंतन का एक ऐसा रूप है, जो वस्तुओं और घटनाओं के सामान्य और सारभूत लक्षणों ( features ) को परावर्तित करता है। इन सामान्य लक्षणों का साकल्य ( totality ), संकल्पना की अंतर्वस्तु ( content ) होता है। भाषा में संकल्पनाएं शब्दों या शब्द-समूहों में व्यक्त की जाती हैं, जैसे ‘भूतद्रव्य’ ( matter ), ‘अंगी’ ( organism ), ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ ( socio-economic formation ), आदि। प्रत्येक विज्ञान की संकल्पनाओं की अपनी ही प्रणाली ( system ) होती है। ये संकल्पनाएं उसके द्वारा खोजे नियमों को व्यक्त करती हैं और उसके प्रांरभिक उसूलों ( principles ) को निरूपित करती है। मसलन, दर्शन की बुनियादी संकल्पनाओं में शामिल हैं भूतद्रव्य, चेतना, गति, कारणता ( causality ), आदि, और राजनीतिक अर्थशास्त्र में मूल्य ( value ), पण्य ( commodity ), आदि की बुनियादी ( basic ) संकल्पनाएं शामिल हैं।

वैज्ञानिक संकल्पनाएं वास्तविकता का सामान्यीकृत परावर्तन हैं। उनमें एक संपूर्ण ऐतिहासिक अवधि के दौरान विज्ञान तथा व्यवहार ( practice ) द्वारा प्राप्त ज्ञान व अनुभव संचित ( accumulated ) होता है। इसलिए प्रत्येक संकल्पना ज्ञान के विकास में एक प्रकार की संक्षिप्त विवरणिका ( summary ), वस्तुगत जगत के संज्ञान की एक अवस्था ( stage ), किसी भी वैज्ञानिक सिद्धांत की श्रृंखला ( chain ) में एक मुख्य कड़ी ( nodal link ) होती है। संकल्पनाओं की सहायता से कोई एक विज्ञान, जारी परिवर्तनों के कारणों का, उनकी प्रकृति और विशेषताओं का और उनके पीछे निहित नियमों का स्पष्टीकरण दे सकता है। इसलिए संकल्पनाओं का विराट संज्ञानात्मक मूल्य है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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