शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका - १


हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका पर विचार शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका - १
( the role of sensations in knowing - 1 )

संवेदन ( sensation ) मनुष्य द्वारा विश्व के परावर्तन ( reflection ) के प्रारंभिक रूप हैं। ( इन पर मनोविज्ञान श्रृंखला में एक और पोस्ट यहां देखी जा सकती है। ) संवेदन हमारे संवेद अंगों ( sense organs ) पर बाह्य जगत की वस्तुओं के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं, इस प्रभाव का फल होते हैं, वस्तुओं के अत्यंत विविधतापूर्ण अनुगुणों ( properties ) से उत्पन्न हो सकते हैं। हम किसी वस्तु के कड़ेपन की, ध्वनियों की, रंगों, आदि की संवेदानुभूति प्राप्त कर सकते हैं। विभिन्न वस्तुएं और घटनाएं, हमारे संवेदी अंगों पर भिन्न-भिन्न ढंग से क्रिया कर सकती हैं।

कुछ मामलों में संवेदी अंग वस्तुओं के प्रत्यक्ष संपर्क ( direct contact ) में आते हैं और उससे, मसलन, मिठास, कडुवा व खट्टापन, लोचपन, खुरदुरे व चिकनेपन, आदि के संवेदन पैदा होते हैं। अन्य मामलों में हम दूरी से किसी वस्तु का संवेद प्राप्त करते हैं, जैसे कि वस्तु द्वारा परावर्तित या विकीर्ण ( radiate ) प्रकाश से आंखों के दृष्टि पटल पर पड़ने-वाले प्रभाव से उस वस्तु का एक दृश्य बिंब ( image ) बन जाता है। परंतु संवेदी अंगों पर किसी वस्तु का कोई भी प्रभाव क्यों न पड़ता हो, संवेदन उन पर प्रभाव डालनेवाले किसी बाह्य उद्दीपक ( stimulus ) का ही फल होता है

हम चाक्षुष संवेदनों ( visual sensations ) की रचना के उदाहरण से इस प्रक्रिया पर और गहराई से विचार करते हैं। सौर प्रकाश विद्युत चुंबकीय क्षेत्रों ( फ़ोटानों ) का अभिवाह ( flux ) होता है, जिनमें निश्चित ऊर्जा होती है। जब सौर प्रकाश किसी वस्तु पर ( मसलन, एक सेब पर ) पड़ता है, तो उसका एक अंश उसकी सतह से परावर्तित होता है और एक अंश अवशोषित ( absorbed ) हो जाता है। सेब से परावर्तित किरणें हमारी आंखों से टकराती हैं। परावर्तित किरणों में, परावर्तित करने वाली सतह की भौतिक तथा रासायनिक संरचना के अनुसार फेर-बदल हो जाते हैं। आंख के भीतर उनमें और भी कई संपरिवर्तन ( conversion ) तथा रूपांतरण ( transformation ) होते हैं। प्रकाश की तरंगे प्रकाशिकी ( optics ) के नियमों के अनुसार नेत्र-लेंस द्वारा अपवर्तित ( refracted ) होती हैं और उस वस्तु की सैकड़ों या हज़ारों गुना तक छोटी छाप ( impression ) दृष्टिपटल पर छोड़ देती हैं। दृष्टिपटल ( retina ) की कोशिकाएं तंत्रिका-तंत्रओं ( nerve fibers ) के ज़रिये जैव-विद्युत आवेग उत्पन्न करती हैं और ये मस्तिष्क के दृष्टिकेंद्र की कोशिकाओं में विशेष रूपांतरण कर देते हैं, उसका परिणाम प्रकाश और आकृति के विविध चाक्षुष संवेदन होते हैं। ये संवेदन एक साकल्य ( a whole ) में संयुक्त हो जाते हैं, या उस चीज़ में संश्लेषित ( synthesized ) हो जाते हैं, जिसे हम वस्तु का ( मसलन, सेब का ) दृश्य बिंब कहते हैं।

दृश्य बिंब के उत्पन्न होने के तरीक़े पर विचार करने पर हम निम्नांकित निष्कर्षों पर पहुंचते हैं : दृश्य बिंब देखनेवाले के मस्तिष्क में उत्पन्न और विद्यमान होता है, फलतः यह आत्मगत ( subjective ) है। यह वस्तु की सतह से परावर्तित भौतिक प्रकाश की तरंगों के अनेकानेक रूपांतरणों तथा संपरिवर्तनों के फलस्वरूप पैदा होता है। तरंगे विशेष जैव-विद्युत आवेगों में संकेंद्रित होती हैं जो पुनः मस्तिष्क की कोशिकाओं में रंग तथा देशिक ज्यामितिक ( spatial geometrical ) संवेदनों में रूपांतरित होते हैं। उसके फलस्वरूप, मस्तिष्क में उत्पन्न बिंब वस्तु के हूबहू अनुरूप ( correspond ) होता है और उसे अन्य सारी वस्तुओं से विभेदित ( distinguish ) करने में मदद देता है। इस अर्थ में हम कहते हैं कि एक दृश्य संवेद एक वस्तुगत वस्तु का परावर्तन होता है। वे वस्तुगत जगत ( objective world ) के आत्मगत बिंब ( subjective image ) हैं और साथ ही वे बाह्य उत्तेजना की ऊर्जा का चेतना के तथ्य ( fact ) में रूपांतरण हैं

संवेदन चूंकि वस्तुगत वास्तविकता ( reality ) के आत्मगत बिंब हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि आत्मगत मानसिक प्रक्रियाओं के लिए प्रारंभिक सामग्री हमें संवेदनों के ज़रिये ही प्राप्त होती है। यानी इससे यह स्पष्ट होता है कि संवेदन हमारे संपूर्ण ज्ञान का प्रारंभिक आधार-स्रोत हैं। संवेदन आत्मगत रूप में इसलिए होते हैं कि उनकी उत्पत्ति ( emergence ) संवेदी अंगों की क्रिया के साथ जुड़ी होती है। साथ ही साथ अपनी अंतर्वस्तु ( content ) में वे वस्तुगत होते हैं, क्योंकि वे वस्तुओं के वस्तुगत अनुगुणों को परावर्तित करते हैं। मसलन, वस्तुओ के सुगंध जैसे अनुगुणो व गुणों का प्रत्येक व्यक्ति, व्यष्टिक ( individually ) और आत्मगत रूप से अनुभव करता है परंतु फिर भी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को सामान्यतः यह एक जैसे ही संवेदित होते हैं। स्पष्ट है कि यह आत्मगत बिंब वस्तुओं की वस्तुगत प्रकृति के अनुरूप होता है। मसलन, किसी खाद्य की सुगंध उसके एक वस्तुगत अनुगुण को परावर्तित करती है।

अतः संवेदन वस्तुगत रूप से विद्यमान यथार्थता का सही परावर्तन होते हैं, वे हमें बाह्य जगत की चीज़ों और घटनाओं के बारे में सही सूचना देते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 21 फ़रवरी 2015

व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - ३
( practice - basis and criterion of cognition - 3 )

ज्ञात है कि परिवेशी विश्व की परिवर्तनशीलता और गतिशीलता विषयक कथन ( statement ) को पराकाष्ठा ( climax ) पर पहुंचानेवाले कुछ दार्शनिकों ने निष्कर्ष निकाला था कि विश्व का संज्ञान कर पाना असंभव है, क्योंकि, इन दार्शनिकों के अनुसार, हम वस्तुओं के गुणों को अभी पहचान ही रहे होंगे कि तब तक उनमें न जाने कितना परिवर्तन आ जायेगा। फिर भी व्यावहारिक कार्यकलाप ही जिसके दौरान दसियों, सैंकड़ो बार दोहरायी गयी क्रियाओं का न्यूनाधिक समान नतीजा निकलता है, विश्व के संज्ञान की संभावना के बारे में प्रत्ययवादियों/अज्ञेयवादियों ( idealistic/agnostics ) के दृष्टिकोण का सबसे कारगर खंडन करता है।

उदाहरण के लिए, सैकड़ों कृत्रिम उपग्रहों का पृथ्वी की कक्षा में पूर्वनिर्धारित प्रक्षेप-पथ पर उड़ना और कृत्रिम अंतरिक्षीय प्रयोगशालाओं का चन्द्र धरातल पर निश्चित स्थान पर उतरना और इसी क्रिया को बार-बार दोहराया जाना पूर्णतः सिद्ध कर देता है कि व्यवहार - चाहे वह उत्पादन संबंधी कार्यकलाप हो या कोई वैज्ञानिक प्रयोग - परिवेशी परिघटनाओं के स्थायी, आवृत्तिशील लक्षणों तथा गुणों का पता लगाने और उनके बारे में विश्वसनीय और सच्ची जानकारी पाने में मदद करता है।

इस तरह उपरोक्त तथ्यों से हम ये तीन निष्कर्ष निकाल सकते हैं : १) व्यवहार संज्ञान का यथार्थ आधार और साथ ही इसकी कसौटी है कि किसी परिघटना का हमारा ज्ञान कितना गहन और विश्वसनीय है ; २) व्यवहार में इतनी गतिशीलता, अनिश्चितता और परिवर्तनीयता है कि वह हमारे संज्ञान को जड़, स्थिर नहीं होने देता, वह संज्ञान के विकास का मूलभूत कारक है ; ३) व्यवहार में इतनी सुनिश्चितता है कि हम सही और ग़लत जानकारियों, भौतिकवादी तथा प्रत्ययवादी उपागमों के बीच भेद और संज्ञान के भौतिकवादी सिद्धांत की सत्यता की पुष्टि कर सकते हैं।

व्यवहार और सिद्धांत ( theory ), दोनों ही विकसित होते रहते हैं और उनके विकास में निर्णायक भूमिका, व्यवहार की होती है। सिद्धांत और व्यवहार संज्ञान के दो अविभाज्य पहलू ( indivisible aspect ) हैं। वे एक दूसरे को समृद्ध ( enriched ) बनाते हैं, जैसे कि विज्ञान और उत्पादन की एकता में देखा जा सकता है। सिद्धांत और व्यवहार को उनके एकत्व ( unity ) में देखना चाहिए, क्योंकि सिद्धांत, सामाजिक-ऐतिहासिक व्यवहार से मात्र समृद्धतर ही नहीं होता, बल्कि यह ख़ुद भी एक सबल रूपांतरणकारी शक्ति है, जो विश्व के क्रांतिकारी रूपांतरण ( revolutionary transformation ) के लिए, युगों पुराने पिछड़ेपन ( backwardness ) को मिटाने और नये जीवन का निर्माण करने के तरीक़े सुझाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - २
( practice - basis and criterion of cognition - 2 )

मनुष्य का कार्यकलाप ( activity ) दो प्रकार का होता है, जिनके बीच आपस में घनिष्ठ संबंध है - वस्तुपरक ( objective ) कार्यकलाप और आत्मपरक ( subjective ) कार्यकलाप। वस्तुपरक कार्यकलाप समस्त सामाजिक तथा उत्पादन संबंधी व्यवहार को कहते हैं, क्योंकि वह उन नियमों के आधार पर संपन्न किया जाता है, जो आत्मपरक इरादों ( intentions ) या लोगों की इच्छा पर निर्भर नहीं होते। मिसाल के लिए, हथौड़े से पानी को नहीं गढ़ा जा सकता है या स्पंज के टुकड़े से कील नहीं ठोकी जा सकती है। इसी तरह निजी स्वामित्व ( private ownership ) पर आधारित समाज में वर्ग संघर्ष को भी ख़त्म नहीं किया जा सकता है। अपने उत्पादन कार्यकलाप में मनुष्य प्रकृति के साथ अन्योन्यक्रिया ( mutual interaction ) करते हुए सबसे पहले उन वस्तुओं और औज़ारों के वस्तुगत गुणों पर आश्रित होता है, जिनसे उसे काम पड़ता है। निस्संदेह, वह सचेतन ढंग से अपने सामने कोई लक्ष्य रखता है, अपनी हरकतों और कामों के महत्त्व को जानता है, परंतु मुख्य और निर्णायक भूमिका उन परिस्थितियों और नियमों की ही होती है, जिनसे ये हरकतें और काम, इच्छा और चेतना के बावजूद, निदेशित ( directed ) होते हैं।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के प्रवर्तकों ने बल देते हुए कहा था कि लोगों का आत्मपरक ( subjective ), यानी संज्ञानकारी कार्यकलाप ( cognitive activity ) आरंभ में उनके वस्तुपरक ( objective ), वस्तुओं और औज़ारों से संबंधित व्यावहारिक कार्यकलाप से गुंथा हुआ था। विकास के काफ़ी परवर्ती चरण ( later stage ) में ही वह उससे अलग हुआ। जंगली मनुष्य और बच्चे की विचारशक्ति की तुलना करने पर हम पायेंगे कि चिन्तन के सामान्यतम रूप, प्रेक्षण की योग्यता और वस्तुओं की समानता या अंतर को पहचानने की क्षमता, वस्तुओं के प्रत्यक्ष इस्तेमाल ( direct use ) के आधार पर ही पैदा होते हैं। किंतु यह नहीं सोचना चाहिए कि व्यवहार ( practice ) का सहारा लेने मात्र से संज्ञान ( cognition ) से संबंधित जटिल समस्याएं पूरी तरह हल हो जायेंगी।

विज्ञान तथा दैनंदिन जीवन में पैदा होनेवाले बहुत ही विविध प्रश्नों का पूर्ण और अंतिम उत्तर खोजने का प्रयास संज्ञान के प्रति तत्वमीमांसीय उपागम ( approach ) की एक मूल विशेषता है। ऐसे बहुत से उत्तर हमें निर्विवाद प्रतीत हो सकते हैं और दैनंदिन, सीमित कार्यकलाप की कसौटी पर खरे भी उतर सकते हैं। किंतु जैसा कि कहा भी गया है, "मनुष्य की सामान्य बुद्धि ( common sense ), जो घर की चहारदीवारी में बहुत ही सम्माननीय साथी होती है, ज्यों ही अनुसंधान ( research ) की व्यापक दुनिया में क़दम रखने का साहस करती है, उसे बहुत ही तरह-तरह के अप्रत्याशित अनुभवों ( unexpected experiences ) से गुज़रना पड़ता है।"

हमारे संज्ञान के परिवर्तन का स्वरूप भी व्यवहार के रूपों की विशेषताओं पर निर्भर होता है। जहां ये रूप अपेक्षाकृत स्थायी होते हैं और किन्हीं क्रियाओं में दशकों या सदियों तक दोहराये जाने की प्रवृत्ति पायी जाती है, वहां उनके आधार पर पैदा होनेवाला ज्ञान भी उसी तरह स्थायी और अपरिवर्तनीय सा प्रतीत होता है। मगर व्यावहारिक कार्यकलाप ( practical activity ) में गंभीर परिवर्तन आये नहीं कि लोगों के उससे संबंधित ज्ञान को बदलते भी देर न लगेगी। सच तो यह है कि व्यवहार बहुत ही बहुविध होता है, उसमें अनिश्चितता ( uncertainty ) का पुट होता है और इतने तरह-तरह के गुण, लक्षण और व्यक्तिगत विशेषताएं पायी जाती हैं कि हम लाख कोशिश करने पर भी उन सबका ज्ञान सदा के लिए हासिल नहीं कर सकते। व्यवहार की यह अनिश्चितता, परिवर्तनशीलता और गतिशीलता ही संज्ञान का एक सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। व्यवहार इतना अनिश्चित है कि वह हमारे ज्ञान को स्थिर होने या रुकने नहीं देता। तो क्या ऐसी स्थिति में वह ज्ञान की कसौटी ( criterion ) बन सकता है?



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना पर चर्चा का समापन किया था, इस बार हम संज्ञान के आधार और कसौटी के रूप में व्यवहार को समझने की कोशिश शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी - १
( practice - basis and criterion of cognition - 1 )

दर्शन में ‘व्यवहार’ ( practice ) संप्रत्यय का विशेष अर्थ है। मनुष्य के प्रकृति और समाज का रूपांतरण ( transformation ) करने वाले सोद्देश्य ( purposive ) सामाजिक क्रियाकलाप ही व्यवहार हैं। इसमें निम्नांकित चीज़ें शामिल हैं : पहली, भौतिक उत्पादन की प्रक्रिया ; दूसरी, वर्गों की, अवाम की सामाजिक-राजनीतिक, रूपांतरणात्मक क्रियाएं और तीसरी, वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रयोग। व्यावहारिक सामाजिक क्रियाकलाप ही संज्ञान के प्रमुख, सारभूत आधार ( basis ) हैं। बाह्य जगत के साथ व्यावहारिक अंतर्क्रिया ( practical interaction ) के दौरान ही सच्चा वैज्ञानिक संज्ञान संभव है और व्यावहारिक आवश्यकताएं, जीवन की जरूरतें ही संज्ञान, विज्ञान के विकास को प्रणोदित ( propelled ) करती हैं। साथ ही, व्यवहार ही हमारे ज्ञान की सत्यता की कसौटी ( criterion ) भी है। व्यवहार विभिन्न संकल्पनाओं और सिद्धांतों को परखने ( testing ), उनकी सत्यता या मिथ्यापन को साबित करने ( proving ), ज्ञान को परिभाषित तथा प्रणालीबद्ध ( define and systematize ) करने का काम करता है।

जीवन में मनुष्य का प्रकृति, समाज या स्वयं मानव चिंतन की बहुत ही विविध परिघटनाओं ( phenomenon ) से साक्षात्कार होता है। आधुनिक समाज का ही उदाहरण लें। उसकी जटिल परिस्थितियों में ठीक दिशा ढूंढ़ने और काम करने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति को सामाजिक विकास के नियमों का ज्ञान हो। यह स्पष्ट है कि सामाजिक संरचनाओं ( social structures ) के कार्य और परिवर्तन, वर्ग संघर्ष ( class struggle ) के नियमों और संस्कृति के विकास के नियमों के अध्ययन में, उन श्रम औज़ारों और यंत्रों का प्रयोग नहीं किया जा सकता, जो प्रकृति की वस्तुओं के रूपांतरण एवं अध्ययन में प्रयुक्त होते हैं। तब तो यह कहा जा सकता है कि वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप सभी मामलों में संज्ञान का आधार और कसौटी नहीं बन सकता।

लेकिन हमें निष्कर्ष ( conclusion ) निकालने में इतनी उतावली दिखाने की कोई जरूरत नहीं। बात यह है कि श्रम और सारा वस्तु-औज़ार कार्यकलाप अपने आप में सामाजिक परिघटनाएं हैं। उन्हें संपन्न करने के लिए आवश्यक है कि लोग एक दूसरे के संपर्क में आयें, आत्मसंगठन के इन या उन रूपों का पालन करें, सूचनाओं का विनिमय ( exchange ) करें और संचित ( accumulated ) अनुभवों को सुरक्षित रखें, संप्रेषित ( communicate ) करें और बढ़ायें। इसलिए ‘व्यवहार’ या अधिक व्यापक संदर्भ में, ‘सामाजिक तथा उत्पादन संबंधी व्यवहार’ को हमें उन प्रक्रियाओं और कार्यों की समष्टि ( totality ) के अर्थ में लेना होगा, जो मनुष्य के वस्तु-औज़ार कार्यकलाप के आधार पर पैदा होते हैं और इस कार्यकलाप के अस्तित्व ( existence ) तथा विकास ( development ) के लिए आवश्यक परिस्थितियां बनाते हैं।

इस दृष्टि से विरोधपूर्ण ( antagonistic ) समाज में वर्ग संघर्ष, सामाजिक तथा उत्पादन संबंधी व्यवहार का एक महत्त्वपूर्णतम तत्व होता है, क्योंकि वह उत्पादक शक्तियों ( productive forces ) तथा उत्पादन संबंधों के विकास के आधार पर पैदा होता है और उसकी प्रगति ( progress ) तथा परिणाम पर सामाजिक उत्पादन की आगे प्रगति निर्भर होती है। वर्ग संघर्ष के दौरान विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं ( political ideologies ) ही प्रतिपादित नहीं की जातीं, उसके दौरान इसकी परीक्षा भी होती है कि ये विचारधाराएं इस या उस वर्ग के हितों को किस हद तक व्यक्त करती हैं, घोषित लक्ष्य सामाजिक विकास की आवश्यकताओं के कितने अनुकूल हैं और संघर्ष के जो रूप तथा साधन प्रस्तावित किये गये हैं, वे कितने कारगर ( effective ) हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना -३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना पर चर्चा आगे बढ़ायी थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना -३
( structure of cognitive process -3 )

अब हम द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के संज्ञान सिद्धांत ( theory of knowledge ) और पूर्ववर्ती दार्शनिक प्रणालियों के संज्ञान सिद्धांतों के मुख्य अंतर को निरूपित कर सकते हैं।  ये पूर्ववर्ती प्रणालियां भौतिकवादी या प्रत्ययवादी, कैसी भी क्यों नहीं रही हों, वे सब संज्ञान की प्रक्रिया को दो ही तत्वों से बनी मानती थीं - संज्ञान की वस्तुएं और मनुष्य द्वारा प्राप्त ज्ञान। वस्तु-औज़ार कार्यकलाप या संज्ञेय ( knowable ) परिघटनाओं के साथ मनुष्य की सक्रिय अन्योन्यक्रिया ( active mutual interaction ) की ओर उनकी दृष्टि गयी ही नहीं। इसलिए जब भी इस प्रश्न की चर्चा चली कि मनुष्य विश्व का संज्ञान कर सकता है या नहीं और कैसे, तो भौतिकवादी भी और प्रत्ययवादी भी उस कारगर विधि ( effective method ) को नहीं बता सके, जिसकी सहायता से उनके द्वारा ही प्रस्तावित हल की पुष्टि हो सकती। दूसरे शब्दों में, पूर्ववर्ती दार्शनिक प्रणालियों के पास वह मापदण्ड या कसौटी ( criterion ) नहीं थी, जिससे इस या उस दार्शनिक दृष्टिकोण की वस्तुपरक मूल्यवत्ता ( objective valuation ) को आंका जा सकता।

सभी पूर्ववर्ती दार्शनिक प्रणालियों के विपरीत द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ने एक नयी ही चीज़ को संज्ञान सिद्धांत का केन्द्रबिंदु बनाया और विश्व की संज्ञेयता के भौतिक आधार तथा वस्तुपरक कसौटी के प्रश्न को प्रमुखता प्रदान की। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का संज्ञान सिद्धांत अज्ञेयवादियों और काण्ट के अनुयायियों के संज्ञान सिद्धांतों से इस अर्थ में भिन्न था कि उसने विश्व की संज्ञेयता के प्रश्न का न केवल सकारात्मक उत्तर दिया, अपितु उसे - और यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है - दूसरा, नया आयाम भी प्रदान किया। इस चर्चा में फंसे रहने के बजाय कि हमारी अनुभूतियां ( sensations ), कल्पनाएं और संप्रत्यय ( concept ) उनके मुक़ाबले में खड़े वस्तु-निजरूपों ( the thing itself ) के कितने अनुरूप ( relevant ) हैं, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद अपना ध्यान इसके अध्ययन पर संकेन्द्रित करता है कि ये अनुभूतियां , कल्पनाएं और संप्रत्यय कैसे पैदा होते हैं और उनमें निहित ज्ञान मनुष्य को परिवेशी विश्व में कार्य करने, सही रूख अपनाने और ऐतिहासिकतः उत्पन्न कार्यभारों के अनुसार उसे ( परिवेशी विश्व को ) रूपांतरित ( transform ) करने में किस तरह सहायता देता है।

चन्द्रमा पर स्वचालित स्टेशनों की सहज उतराई और पृथ्वी पर वापसी, दूरस्थ नियंत्रित स्वचालित रॉबोटों की चन्द्रतल पर कई किलोमीटरों की यात्रा और अंतरिक्षयांत्रियों की उतराई और सफल वापसी इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि हमने चन्द्र धरातल की संरचना की विशेषताओं को सचमुच काफ़ी कुछ जान लिया है। ख़मीर की फफूंद के जीन का १९७० में किया गया सफल संश्लेषण ( synthesis ) इसकी पुष्टि करता है कि जीव अवयवियों की आनुवंशिकता ( heredity ) के भौतिक वाहकों की भौतिकीय तथा रासायनिक संरचना के बारे में हमारा ज्ञान सही है।

इस प्रकार द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के संज्ञान सिद्धांत के मूलाधार को यों सूत्रबद्ध किया जा सकता है : बाह्य विश्व के संज्ञान का आधार मनुष्य द्वारा श्रम के औज़ारों, यंत्रों, उपकरणों, आदि की मदद से किया जानेवाला वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप ( activity ) है। इस कार्यकलाप में शामिल की गयी वस्तुओं के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण गुणों का ज्ञान सही और विश्वसनीय तभी माना जा सकता है, जब उनकी सहायता से हम किन्हीं भौतिक वस्तुओं की रचना, निर्माण या पुनर्निर्माण कर सकें और कोई उचित परिवर्तन ला सकें।

वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप का दूसरा नाम व्यवहार ( practice ) है। अगली बार हम समझने की कोशिश करेंगे कि उसकी विशेषताएं, ढांचा और भूमिका क्या है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 25 जनवरी 2015

संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना - २
( structure of cognitive process -2 )

हम जानते हैं कि आकाशीय पिण्डों, विशेषतः हमारी पृथ्वी के उपग्रह चन्द्रमा की प्रकृति और गति के नियमों का प्रश्न लोगों को बहुत पहले से ही उद्वेलित ( agitated ) करता रहा है। जब से टेलीस्कोप का अविष्कार हुआ और खगोलवैज्ञानिक जटिल यंत्रों का इस्तेमाल करने लगे, चन्द्रमा के बारे में हमारी जानकारी असामान्य रूप से बढ़ गयी। फिर भी चन्द्रमा की उत्पत्ति, उसके अदृश्य भाग के धरातल, उसके क्रेटर, आदि के बारे में संतोषजनक उत्तर उपलब्ध नहीं थे। वैज्ञानिकों ने तरह-तरह के अनुमान लगाये, जो इन या उन तथ्यों को न्यूनाधिक युक्तियुक्त ढंग से समझाते थे। मगर हर महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर ऐसी प्राक्कल्पनाओं ( hypothesis ) की संख्या इतनी अधिक थी कि बहुत समय तक यह तय नहीं किया जा सका कि उनमें से सही कौन सी है। किंतु आज कृत्रिम उपग्रहों, स्वचालित अंतरिक्ष प्रयोगशालाओं, अंतरिक्षयात्रियों के अनुसंधान, आदि के ज़रिये उपरोक्त प्रश्नों में से बहुतों का सही-सही उत्तर पा लिया गया है।

इन सबके बारे में सोचते हुए हम दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथ्यों पर ध्यान दिये बिना नहीं रह सकते : पहले, किसी भी वस्तु या परिघटना का ज्ञान प्राप्त करने में मनुष्य द्वारा अपनी ज्ञानेन्द्रियों या यंत्रों की मदद से किये जानेवाले प्रेक्षण ( observation ) की बहुत बड़ी भूमिका है और, दूसरे, अध्ययन की जानेवाली वस्तुओं और प्रक्रियाओं के गुणों, विशेषताओं तथा नियमों के बारे में सबसे महत्त्वपूर्ण जानकारी अध्ययनाधीन ( under investigation ) परिघटनाओं के साथ सक्रिय अन्योन्यक्रिया ( active mutual interaction ) के आधार पर ही पायी जा सकती है।

बाह्य विश्व की परिघटनाओं के कार्य में सक्रिय हस्तक्षेप के बिना और विचाराधीन प्रक्रियाओं के साथ अन्योन्यक्रिया के बिना प्रेक्षण, निष्क्रिय चिंतन ( passive contemplation ) ही होता है। वह हमें इन परिघटनाओं तथा प्रक्रियाओं के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी अवश्य देता है, मगर उनके बीच मौजूद अधिक गहरे संबंधों, वस्तुओं और प्रक्रियाओं के मूलभूत गुणों तथा संपर्कों की जानकारी पाने के लिए निष्क्रिय चिंतन तक ही सीमित रहना ठीक नहीं है।

वृक्ष का प्रेक्षण करके हम उसके पत्तों का रंग तथा आकार, स्वयं वृक्ष का आकार, उसकी छाल की ऊपरी विशेषताएं, जिस मिट्टी में उस जाति के वृक्ष उगते हैं, उसे और दूसरी बहुत सी बातें जान सकते हैं। किंतु काट में दिखायी देनेवाले वलयों ( rings ) के अनुसार वृक्ष की आयु निर्धारित करने के लिए उसके तने को काटना जरूरी है। वानस्पतिक कोशिकाओं की संरचना की विशेषताओं या उनमें घटनेवाली जीवरासायनिक प्रक्रियाओं की विशिष्टता का पता लगाने के लिए हमें सूक्ष्मदर्शी इस्तेमाल करना होगा, बहुत से रासायनिक परीक्षण करने होंगे। वृक्ष की लकड़ी की कठोरता, लचीलेपन की सीमा और रासायनिक संरचना को जानने के लिए हमें उसपर और भी जटिल प्रभाव डालने होंगे। यह सब जानने के लिए आवश्यक है कि वृक्ष के तने, जड़ों, शाखाओं और पत्तों को भिन्न-भिन्न जगहों पर दर्जनों बार मोड़ा, तोड़ा और रसायनों से उपचारित ( treated ) किया जाये। अध्ययन की जानेवाली वस्तु के साथ ऐसी सक्रिय अन्योन्यक्रिया को वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप कहते हैं। इस क्रिया के दौरान हम उसका ज्ञान प्राप्त करते हैं, जो निष्क्रिय चिंतन की सहायता से नहीं जाना जा सकता है।

इस प्रकार हम अगले महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। संज्ञान की प्रक्रिया में निम्न तत्व शामिल हैं : पहले संज्ञान की वस्तुएं ; दूसरे, वस्तु के साथ वस्तुओं तथा औज़ारों से संबंधित कार्यकलाप ; तीसरे, ज्ञान, जो इस कार्यकलाप के परिणामस्वरूप वस्तुओं में पाये जानेवाले गुणों और विशेषताओं के प्रतिबिंब के रूप में प्रकट होता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 17 जनवरी 2015

संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत ज्ञान के स्रोतों के बारे में विभिन्न दार्शनिक मतों के बीच एक वार्ता प्रस्तुत की थी, इस बार हम संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की प्रक्रिया की संरचना - १
( structure of cognitive process -1 )

दैनिक जीवन अज्ञेयवाद ( agnosticism ) का और कुल मिलाकर प्रत्ययवाद ( idealism ) का सर्वाधिक निश्चायक खंडन है। निस्संदेह, यदि लोग अपने इर्द-गिर्द की वस्तुओं और घटनाओं को नहीं समझ सकते, तो वे उन्हें न तो उपयोग में ला सकते, न उन्हें संवार सकते, न उन्हें दुरस्त कर सकते, न उनमें कोई संशोधन कर सकते, न उनमें कोई परिवर्तन ला सकते और न ही उनका पुनरुत्पादन ( reproduction ) कर सकते थे। लोगों के भौतिक, ठोस क्रियाकलाप ( activities ) के दौरान ही यथार्थता ( reality ) में फेर-बदल हो रहे हैं। इन क्रियाकलापों से हमारा मतलब सबसे पहले श्रम ( labour ) के उन रूपों से है, जिनसे खाद्य व आवास और साथ ही स्वयं श्रम-उपकरणों का उत्पादन होता है।

अपने क्रियाकलाप में मनुष्य केवल वस्तुओं को ही परिवर्तित नहीं करता, बल्कि अनुभव और ज्ञान के संचय द्वारा ख़ुद को भी रूपांतरित ( transform ) करता है। उत्पादन का अनुभव प्राकृतिक विज्ञानों को जन्म देता है। हम यह जानते ही हैं कि जहाजरानी ( shipping ) की व्यावहारिक आवश्यकता ने खगोलविद्या ( astronomy ) को जन्म दिया और ज्यामिति का जन्म खेती की आवश्यकताओं के कारण हुआ। अंकगणित ने लोगों को क्षेत्रफल और घनफल की गणना करने और लेखाकारों ( accountants ) को पारिश्रमिकों ( wages ) का हिसाब रखने में सहायता की थी। किंतु व्यावहारिक क्रियाकलाप प्रकृति में फेर-बदल करने में ही सहायक नहीं होते, वे सामाजिक जीवन में भी परिवर्तन लाते हैं।

संज्ञान ( cognition ) एक मानसिक क्रिया ( mental activity ) है, जो व्यावहारिक क्रियाकलाप से संबद्ध ( associated ) होने पर भी उनसे भिन्न ( different ) होती है। अपनी श्रम-क्रियाओं के दौरान मनुष्य प्रकृति को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार परिवर्तित करता है। वह तेल और कोयले का निष्कर्षण ( extraction ) करता है, जंगल लगाता है, ज़मीन जोतता है, आदि। यह सब करने के लिए उसे संबद्ध विषयों और घटनाओं की जानकारी होनी ही चाहिए। संज्ञान, ज्ञान के रूप में यथार्थता का मानसिक स्वांगीकरण ( assimilation ) है। अधिगम ( learning ) तथा जांच-पड़ताल के ज़रिये ज्ञानोपार्जन ( acquisition of knowledge ) तथा संस्कृति की उपलब्धि से मनुष्य एक ऐसे सर्जक ( creator ) में परिवर्तित हो जाता है, जो यथार्थता को ही नहीं स्वयं अपने आपको भी रूपांतरित करता है। वह ज्ञान का विषयी है, सामाजिक ज्ञान का वाहक ( carrier ) है। यदि प्रारंभिक ज्ञान व्यवहार से पृथक नहीं, बल्कि उससे घुल-मिल जाता है तो समय आने पर ज्ञान का यह संचय उसे ( यानी स्वयं ज्ञान को ) सापेक्षतः स्वाधीन ( relatively independent ) बना देता है और वह पूर्व अर्जित ज्ञान के आधार पर विकसित ( develop ) होने लगता है।

संज्ञान का विषय सारा विश्व, प्रकृति और समाज नहीं, बल्कि वह चीज़ है, जो प्रदत्त ऐतिहासिक चरण में मानव संज्ञान के लिए सुगम ( intelligible ) है। यह भौतिक संभावनाओं पर और साथ ही संचित ज्ञान के स्तर व सामाजिक आवश्यकताओं पर भी निर्भर करता है। यह बोधगम्य बात है कि प्राचीन दार्शनिक परमाणु की संरचना को नहीं समझ पाये ; न्यूटन के ज़माने में सापेक्षता का सिद्धांत निरूपित करना असंभव था और जीन्स तकनीकी से संबंधित समस्याओं को आज के जमाने में ही हल किया जा सकता है। किंतु मनुष्य प्रकृति का अध्ययन महज उसकी आद्यावस्था में ही नहीं करता है। ज्ञान के कई विषय मनुष्य के क्रियाकलाप के दौरान बनते है। उदाहरण के लिए, अनाज की नयी क़िस्में तथा जानवरों की नयी प्रजातियां चयनात्मक प्रजनन ( selective breeding ) के द्वारा विकसित की गयी हैं।

फलतः संज्ञान, ज्ञानोपलब्धि की वह प्रक्रिया है, जिसका सीधा लक्ष्य है सत्य तक पहुंचना और अंतिम लक्ष्य सफल व्यावहारिक कर्म है। संज्ञान की संकल्पना ( concept ) को इस तरह से समझ लेने के बाद, हम संज्ञान की प्रक्रिया में अब और गहरे उतर सकते हैं, और क्रियाकलापों के दौरान संज्ञान की उत्पत्ति में ज्ञानेन्द्रियों द्वारा प्रेक्षण, औज़ारों और यंत्रों के प्रयोग, चिंतन तथा क्रियाकलापाधीन प्रक्रिया या परिघटना के साथ मनुष्य की अन्योन्यक्रिया ( interaction ) की भूमिका की जांच-परख कर सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
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