रविवार, 14 जनवरी 2018

सामाजिक क्रांति

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत देखा था कि सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या होती है, इस बार हम सामाजिक क्रांति पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक क्रांति
(social revolution)

सामाजिक-आर्थिक विरचनाएं (formations) सामाजिक विकास के दौरान कार्यशील ही नहीं रहतीं, बल्कि एक के स्थान पर दूसरी क्रमिक रूप से आती रहती हैं और, यही नहीं, उनका यह क्रम निश्चित, वस्तुगत और नियम-संचालित होता है। एक विरचना से दूसरी में संक्रमण (transition) को सामाजिक क्रांति कहते हैं। इसका निर्धारण करनेवाली नियमितता (pattern) क्या है और वह किस पर निर्भर होती हैं ?

एक सामाजिक-आर्थिक विरचना से दूसरी में परिवर्तन का निर्धारण एक प्रभावी उत्पादन पद्धति (mode of production) का, दूसरी उत्पादन पद्धति के द्वारा प्रतिस्थापन (replacement) से होता है। पांच प्रमुख उत्पादन पद्धतियों के अनुरूप पांच प्रमुख सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं को विभेदित किया जाता है : आदिम-सामुदायिक, दासप्रथात्मक, सामंती, पूंजीवादी और कम्युनिस्ट।


विभिन्न देशों में और विभिन्न ऐतिहासिक अवधियों में एक विरचना से दूसरी में संक्रमण भिन्न-भिन्न ढंग से हो सकता है। कभी-कभी यह दशकों, यहां तक कि शताब्दियों तक जारी रहता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि सामाजिक क्रांति इस बात से निर्धारित नहीं होती कि यह शांतिपूर्ण तरीक़े से होती है या शस्त्रास्त्रों के ज़रिये, दीर्घकालिक होती है या अल्पकालिक, बल्कि इस तथ्य से होती है कि उसके दौरान उत्पादन पद्धति में और सर्वोपरि आर्थिक आधार में परिवर्तन होता है या नहीं। जैसा कि मार्क्स ने दर्शाया, आधारों के इस परिवर्तन को वैज्ञानिक सटीकता से साबित किया जा सकता है। सामाजिक क्रांति के दौरान सामाजिक अधिरचना की सारी अवस्थाओं में जटिल तथा अत्यंत कठिन परिवर्तन होता है और समाज की वर्ग संरचना (class structure) आमूलतः बदल जाती है। इसलिए वर्ग विरचनाओं में यह परिवर्तन कटु वर्ग संघर्ष (class struggle) के साथ होता है।

एक विरचना से दूसरी में संक्रमण के दौरान सामाजिक चेतना के विविध रूपों की अंतर्वस्तु (content) भी बदल जाती है। कला, धर्म, नीति-आचार तथा दर्शन स्वयं नये सामाजिक सत्व (social being) को, लोगों के बीच नये संबंधों और राज्य सत्ता तथा पार्टियों की नयी प्रणाली को परावर्तित (reflect) करने लगते हैं। पूर्ववर्ती सामाजिक-आर्थिक विरचना के अंदर शांतिपूर्ण विकास की अवधि की तुलना में क्रांतियों के दौरान उत्पादन पद्धति और सामाजिक संबंधों में परिवर्तन दसियों-सैकड़ों गुना तेजी से होते हैं और समाज के जीवन में कहीं अधिक गहराई तक पैठते हैं। 

पारंपरिक संबंध, क्रियाकलाप की पद्धतियां और चिंतन के तरीक़े छिन्न-भिन्न हो जाते हैं और समाज की मानसिकता और वैचारिकी बदल जाती है; संक्षेप में, सामाजिक शक्तियों के कटु और प्रबल संघर्ष में सारे का सारा भूतपूर्व जीवन मूल रूप से नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है और उसके फलस्वरूप नयी विरचना का रास्ता साफ़ हो जाता है। पुराने जीवन का यह उच्छेदन नयी विरचना के विकास का एक महत्वपूर्ण पूर्वाधार है। इसलिए सामाजिक क्रांतियां वस्तुगत ऐतिहासिक आवश्यकता (objective historical necessity) हैं। अगली, उच्चतर, इतिहासानुसार अधिक विकसित विरचना में संक्रमण एक सामाजिक क्रांति के बिना असंभव है



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 7 जनवरी 2018

सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या है ?

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत व्यष्टिक, विशेष तथा सार्विक पर चर्चा की थी, इस बार हम समझने का प्रयास करेंगे कि सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या है?

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक-आर्थिक विरचना क्या है ?
( what is a socio-economic formation? )

जब हम अतीत, वर्तमान तथा भविष्य में मनुष्य की नियति, समाज में उसकी अवस्थिति (position) और परिवेशीय जगत के प्रति उसके रुख़ (attitude) पर विचार करते हैं, तो हमें ऐतिहासिक घटनाओं तथा मानवीय कारनामों, लोगों की पूरी जातियों तथा राज्यों के उत्थान, विकास तथा पतन की असीम विविधता से सामना पड़ता है। क्या इन सबके पीछे प्रकृति के जैसे कुछ सामान्य नियमों (general laws) को खोजा जा सकता है? ऐतिहासिक भौतिकवाद के सामाजिक दर्शन के उद्‍भव (rise) से पहले ऐसे नियमों को खोजने के सारे प्रयास विफल रहे।

ऐतिहासिक संवृत्तियों (events) तथा लोगों के कारनामों (deeds) की बाहरी विविधता तथा द्रुत (rapid) परिवर्तन के अंतर्गत किसी सार्विक (common) को, किसी ऐसी चीज़ को खोजने के लिए समाज की समझ में एक सच्चे क्रांतिकारी परिवर्तन की ज़रूरत थी, जो इन्हीं संवृत्तियों तथा क्रियाकलाप के रूपों को, परस्पर संबंधित तथा स्वयं उनकी संभावना को ही स्पष्ट कर सके। ऐसे सार्विक, सामान्य (general) को ही ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ कहा गया।

सामाजिक-आर्थिक विरचना वस्तुगत (objective), स्थायी सामाजिक संबंधों, प्रक्रियाओं, संस्थानों तथा सामाजिक समूहों और सामाजिक चेतना के उन सारे रूपों व प्रकारों का समुच्चय (aggregate) है, जो एक निश्चित ऐतिहासिक युग में प्रचलित उत्पादन पद्धति (mode of production) के आधार पर उत्पन्न तथा विकसित होते हैं।

फलतः एक सामाजिक-आर्थिक विरचना अत्यंत जटिल प्रणाली है। प्रत्येक ऐतिहासिक युग में एक नहीं, अनेक उत्पादन पद्धतियां हो सकती हैं; मसलन, पूंजीवाद समाज में, प्रभुत्व प्राप्त पूंजीवादी उत्पादन के साथ ही टटपुंजियां (petty) पण्य उत्पादन (commodity production), पितृसत्तात्मक (patriarchal), यानी भरण-पोषण की उत्पादन व्यवस्था और सामंती (feudal) उत्पादन के अवशेष भी विद्यमान हो सकते हैं। इन गौण (subsidiary) या अप्रभावी (non-dominant) उत्पादन पद्धतियों को आम तौर पर क्षेत्रक (sectors) कहा जाता है। एक विरचना से दूसरी में संक्रमण (transition) की अवधि में ये विशेष विविधतापूर्ण होते हैं। किंतु क्षेत्रक स्वयं उत्पादन की प्रभावी पद्धति के अधीनस्थ (subordinate) होते हैं तथा उस पर निर्भर करते हैं। इसलिए प्रदत्त (given) विरचना के आधार (base) तथा उसकी अधिरचना (superstructure) को रूप प्रदान करनेवाले सारे सामाजिक संबंधों, प्रक्रियाओं, संस्थानों तथा चेतना के रूपों को यही प्रभावी पद्धति निर्धारित करती है।

समाज एक अविभक्त सामाजिक प्रणाली (system) या अंगी (organism) है, जो कई अंतर्संबंधित उपप्रणालियों (subsystems) से बना है। ये उपप्रणालियां एक दूसरे के साथ जुड़ी हैं ; मिसाल के लिए, उनमें वर्ग (class), राजनीतिक पार्टियां, राज्य, धार्मिक संगठन, परिवार, आदि शामिल हैं, किंतु वे सब अंततः उत्पादन पद्धति पर निर्भर हैं। एक विरचना की रचना करनेवाली विभिन्न उपप्रणालियों का उत्पादन पद्धति के साथ संयोजन (link) किंचित जटिल होता है और विविध संबंधों तथा निर्भरताओं के ज़रिये मूर्त होता है।

‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ एक प्रवर्ग (category) है, जो सर्वाधिक समान व सामान्य, वस्तुगत और आवश्यक विशेषताओं और अनुगुणों (properties) को परावर्तित (reflect) करता है, जो प्रभावी उत्पादन पद्धति से निर्धारित होते हैं, किंतु विभिन्न देशों में ख़ास तौर से व्यक्त होते हैं। ये विशेषताएं राष्ट्रीय और ऐतिहासिक अवस्थाओं पर, और इस पर निर्भर करती हैं कि प्रदत्त विरचना कब और किन परिस्थितियों में उत्पन्न हुई

सामाजिक-अर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत ने ऐतिहासिक प्रत्ययवाद (idealism) की सारी क़िस्मों पर क़रारी चोट की। इसलिए पूंजीवादी विचारकों, खासकर जर्मन सामाजशास्त्री माक्स बेबेर (१८६४-१९२०) के अनुयायियों ने इसका खंड़न करने के प्रयत्न में उसे ‘आदर्श प्रकार’ का यानी समाज का ऐसा काल्पनिक मॉडल बताया जिसका वस्तुगत ऐतिहासिक यथार्थता (reality) में कोई अस्तित्व नहीं है। प्रत्ययवादियों को जवाब देते हुए लेनिन ने लिखा था कि ‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ की संकल्पना (concept) ने "सामाजिक घटनाओं के वर्णन ( और आदर्श दृष्टि से उनके मूल्यांकन ) से उनके विशुद्ध वैज्ञानिक विश्लेषण की ओर अग्रसर होना संभव बनाया, उदाहरण के तौर पर कहा जाए तो ऐसा विश्लेषण जो एक पूंजीवादी देश को दूसरे से विभेदित (distinguish) करता है और उसकी जांच करता है जो उन सबमें समान (common) है।"

एक ही विरचना, मसलन, पूंजीवादी या समाजवादी विरचना, अपने को भिन्न-भिन्न मुल्कों में भिन्न-भिन्न ढंग से प्रकट कर सकती है, किंतु समान लक्षणों (common features) और स्थायी (stable), आवश्यक संयोजनों (necessary connections) के अस्तित्व से, सारे देशों तथा राष्ट्रों के लिए एक या दूसरी विरचना की कार्यशीलता (functioning) के नियमों और एक विरचना से दूसरी में संक्रमण के नियमों को निरूपित करना संभव हो जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 31 दिसंबर 2017

व्यष्टिक, विशेष तथा सामान्य

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल को निरूपित किया था, इस बार हम सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत व्यष्टिक, विशेष तथा सामान्य को समझने का प्रयास करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं का सिद्धांत
(the theory of socio-economic formations)
व्यष्टिक, विशेष तथा सामान्य
(the individual, particular and general)

यह जानने के लिए अपने चारो तरफ़ की वस्तुओं पर एक नज़र डालना काफ़ी है कि वे सब, किसी न किसी तरह, एक दूसरे से भिन्न हैं। यहां तक की बिलियर्ड की दो समरूप गेंदें भी जब सूक्ष्मता से तोली जाती हैं तो उनके बीच एक ग्राम के हजारवें अंश का अंतर होता है। हालांकि क्‍वांटम यांत्रिकी इस बात की पुष्टि करती है कि एकसमान नाम के प्राथमिक कण एक दूसरे से अप्रभेद्य (indistinguishable) होते हैं, फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी प्रदत्त (given) क्षण पर वे भिन्न-भिन्न स्थानों में हो सकते हैं और भिन्न-भिन्न परमाणुओं की रचना कर सकते हैं और परमाणु भिन्न-भिन्न अणुओं के अंश की तथा अणु भिन्न-भिन्न भौतिक वस्तुओं के अंश की। बेशक सर्वोपरि बात यह है कि लोग एक दूसरे से भिन्न होते हैं और ये भिन्नताएं हैं सूरत, चरित्र, कुशलताओं, नियतियों, जातीयता, भाषा, आदि की। संक्षेप में हमारे गिर्द सारी घटनाओं (phenomena) और प्रक्रियाओं (processes) में अनूठे लक्षण (features) और गुण-धर्म (attributes) होते हैं, जो उनमें अंतर्निहित (inherent) होते हैं, यानी उनमें व्यष्टिकता (individuality) होती हैयह अनुगुण (property), प्रवर्ग (category) "व्यष्टिक" (individual) ( या अनन्य unique, एकल single ) में परावर्तित होता है

इसके साथ ही ऐसी पूर्णतः व्यष्टिक घटनाएं तथा प्रक्रियाएं नहीं है, जो अन्य किसी से न मिलती-जुलती हों। मसलन, सारे कौव्वों के पंख काले होते हैं, सारे तरलों में तरलता का एक-सा अनुगुण होता है। लोगों को एक दूसरे से भिन्न बनानेवाले व्यष्टिक अंतरों के बावजूद उनमें एकसमान लक्षण तथा अनुगुण भी होते हैं, यानी ऐसे विशेष लक्षण होते हैं जिनके आधार पर उन्हें कई समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है। लोगों को उनकी आयु, लिंग, वर्ग, बालों के रंग, रुधिर-वर्ग, जातीयता, भाषा, आदि के अनुसार विभिन्न समूहों में बांटा जा सकता है। ठीक इसी तरह, रासायनिक तत्वों को उनकी रासायनिक संरचना में अंतर के बावजूद क्षारीय धातुओं, हैलोजनों तथा निष्क्रिय गैसों ( जिनमें से प्रत्येक के अपने विशेष रासायनिक अनुगुण होते हैं ) में विभाजित किया जा सकता है। उनकी नियतियां, रूपरंग तथा ठोस क्रियाकलाप कुछ भी क्यों न हो, सिकंदर तथा जुलियस सीज़र, नेपोलियन व सुवोरोव के व्यक्तित्वों में अनेक एकसमान लक्षण देखें जा सकते हैं : संकल्प, साहस, सैनिक प्रतिभा, संगठन की योग्यता, आदि जिनकी बदौलत उनका महान सेनापति बनना संभव हुआ। 

इस तरह व्यष्टिक या एकल घटनाओं में ऐसे गुण-घर्म और अनुगुण होते हैं जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ही नहीं करते, बल्कि उन्हें एक दूसरे के समान भी बनाते हैं। इस आधार पर हम उन्हें समूहों में रख सकते हैं और समूह के सामूहिक लक्षण निश्चित कर सकते हैं। घटनाओं और प्रक्रियाओं के कुछ समुच्चयों में अंतर्निहित वस्तुगत विशेषताओं (objective traits) तथा अनुगुणों ( properties) को प्रवर्ग "विशेष" (particular) से परावर्तित (reflected) किया जाता है

घटनाओं तथा प्रक्रियाओं के पृथक समूहों में अंतर्निहित अनुगुणों और गुण-धर्मों के साथ ही वस्तुगत यथार्थता (objective reality ) में एक प्रदत्त क़िस्म की सारी घटनाओं तथा प्रक्रियाओं की सार्विक लाक्षणिक विशेषताएं, अनुगुण और संबंध भी होते हैं। उन्हें "सामान्य" (general) या "सार्विक" (common, universal) प्रवर्ग से परावर्तित किया जाता है। सारे रासायनिक तत्वों में सार्विक यह तथ्य है कि उनके परमाणुओं की संरचना में एक परमाणविक नाभिक तथा इलैक्ट्रोनों का खोल होता है। लिंग, भाषा, नस्ल, जाति, आदि के बावजूद सारे लोगों की सामान्य विशेषता यह है कि वे सब तर्कबुद्धिसंपन्न सामाजिक सत्व (rational social beings) हैं, जो औज़ारों के जरिये विविध वस्तुएं बनाने में समर्थ होते हैं। इस तरह, हम एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि प्रवर्ग "व्यष्टिक", "विशेष" और "सामान्य" हमारे परिवेशीय जगत के वस्तुगत अनुगुणों को परावर्तित करते हैं

स्वयं यथार्थता (reality) में सामान्य, विशेष तथा व्यष्टिक के बीच गहरा द्वंद्वात्मक संयोजन (dialectical connections) होता है। सामान्य और विशेष, व्यष्टिक में विद्यमान तथा उसके द्वारा व्यक्त होते हैं और विलोमतः कोई भी व्यष्टिक वस्तु तथा प्रक्रिया में कुछ विशेष और सामान्य विद्यमान होता है। यह कथन प्रकृति, समाज तथा चिंतन में अनुप्रयोज्य (applicable) है। प्रत्येक पौधा तथा जंतु सामान्य जैविक नियमों के अंतर्गत होता है और साथ ही ऐसे विशेष नियमों से भी संनियमित (governed) होता है, जो केवल उसकी प्रजातियों के लिए ही लाक्षणिक होते हैं। इसी प्रकार, प्रत्येक अलग-अलग व्यक्ति चाहे उसका व्यक्तित्व कितना ही मेधापूर्ण क्यों न हो, अपने व्यवहार तथा सामाजिक क्रियाकलाप में एक विशेषता को व्यक्त करता है, जो उसकी जाति, व्यवसाय और श्रम-समष्टि (work collective) की लाक्षणिकता होती है और साथ ही वह उन सामान्य गुणों को भी प्रदर्शित करता है, जो उसकी संस्कृति, उसके ऐतिहासिक युग और सामाजिक वर्ग (class) के लोगों में अंतर्निहित होते हैं। इसके साथ ही साथ सामान्य और विशेष, व्यष्टिक के बग़ैर तथा उससे पृथक रूप में विद्यमान नहीं होते हैं।

सामान्य, विशेष तथा व्यष्टिक के संबंध को स्पष्ट करने तथा यह दर्शाने के बाद कि वह प्रकृति और समाज दोनों पर लागू होता है अब हम सामाजिक विकास के सबसे सामान्य नियमों की चर्चा कर सकते हैं। यह समस्या सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत से अविभाज्य है।



इस बार इतना ही।
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समय अविराम

रविवार, 24 दिसंबर 2017

ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना की संकल्पनाओं पर चर्चा की थी, इस बार हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल को निरूपित करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल
(the basic principle of historical materialism )

प्रवर्ग ( category ) ‘सामाजिक अस्तित्व’ ( social being ), सामान्य दार्शनिक प्रवर्ग ‘भूतद्रव्य’ ( matter ) को सामाजिक घटनाओं तक विस्तार देने का परिणाम है, ठीक उसी तरह जैसे कि ‘सामाजिक चेतना’ ( social consciousness ), अधिक सामान्य दार्शनिक प्रवर्ग ‘चेतना’ ( consciousness ) का सामाजिक घटनाओं तक विस्तार देने का परिणाम है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, दर्शन के बुनियादी सवाल का उत्तर देते हुए आधुनिक विज्ञान के साथ पूर्ण मेल सहित इस बात की पुष्टि करता है कि भूतद्रव्य प्राथमिक तथा चेतना द्वितीयक है। इसका तात्पर्य, सबसे पहले और सर्वोपरि, यह है कि क्रमविकास में भूतद्रव्य चेतना से पहले विद्यमान था और उससे स्वतंत्र रूप में अस्तित्वमान हो सकता है। इसके विपरीत चेतना भूतद्रव्य से स्वतंत्र रूप में अस्तित्वमान नहीं रह सकती है।

परंतु यह सोचना भ्रामक होगा कि सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना से पहले तथा उससे स्वतंत्र रूप में विद्यमान हो सकता है। हालांकि जो सामाजिक संबंध तथा भौतिक घटनाएं, सामाजिक अस्तित्व का अंग हैं, उनका स्वतंत्र और वस्तुगत अस्तित्व है, उनकी रचना लोगों के द्वारा उनके सोद्देश्य क्रियाकलाप के, यानी चिंतनशील अस्तित्वों के क्रियाकलाप के दौरान होती है। ऐसे मानव समाज की कल्पना करना असंभव है, जिसमें सामाजिक अस्तित्व तो रूप ग्रहण कर चुका हो किंतु सामाजिक चेतना लापता हो। ऐसे समाज का क़तई अस्तित्व नहीं हो सकता है। इस हालत में सामाजिक जीवन तक विस्तारित दर्शन के बुनियादी सवाल का भौतिकवादी उत्तर कैसा है?

हम देख चुके हैं कि जिस प्रकार समाज का आर्थिक आधार, समाज की राजनीतिक और क़ानूनी अधिरचना ( superstructure ) का आधार है, उसी प्रकार भौतिक संपदा की उत्पादन पद्धति, आत्मिक क्रियाकलाप सहित सारे मानवीय क्रियाकलाप का आधार है। क्रियाकलाप के अन्य सारे रूप तथा सारी पद्धतियां जिस उत्पादन पद्धति पर आश्रित होती हैं, वह, अंततः, समाज के जीवन में गहनतम परिवर्तनों का और एक सामाजिक प्रणाली से दूसरे में संक्रमण ( transition ) का कारण है और इस अर्थ में ठीक उसी तरह निर्णायक भूमिका अदा करती है, जिस तरह से आधार में परिवर्तन अधिरचना के परिवर्तनों को नियंत्रित करते हैं, क्योंकि आधार इस तथ्य के बावजूद उनका पहला कारण होता है कि अधिरचना स्वयं आधार पर सक्रिय प्रभाव डाल सकती है। आधार की निर्णायक भूमिका इसी में व्यक्त होती है।

अब इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि दर्शन के बुनियादी सवाल को सामाजिक जीवन पर किस तरह से लागू किया जा सकता है और इसका भौतिकवादी उत्तर कैसे दिया जा सकता है। समाज के संबंध में इस प्रश्न का रूप ऐसा होगा : निर्धारक ( determinant ) कौन है - सामाजिक अस्तित्व या सामाजिक चेतना ? इसके उत्तर में ऐतिहासिक भौतिकवाद, ऐतिहासिक प्रत्ययवाद/भाववाद ( idealism ) के विपरीत, इस बात की पुष्टि करता है कि लोगों के अस्तित्व को उनकी चेतना निर्धारित नहीं करती किंतु, इसके विपरीत, उनका सामाजिक अस्तित्व उनकी चेतना को निर्धारित करता है। यह प्रस्थापना ( preposition ) मनुष्यजाति के संपूर्ण ऐतिहासिक अनुभव का वैज्ञानिक सामान्यीकरण ( scientific generalisation ) है और साथ ही समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) का बुनियादी नियम है। सामाजिक अस्तित्व इस अर्थ में भौतिक तथा प्राथमिक है कि केवल वही ऐसा है, जो सामाजिक चेतना की अंतर्वस्तु ( content ) और रूप ( form ) को और यहां तक कि सामाजिक अस्तित्व पर उसके प्रतिपुष्टिकारी ( feedback ) प्रभाव का भी निर्धारण करता है। यही कारण है कि सामाजिक चेतना के संबंध में सामाजिक अस्तित्व की निर्धारक भूमिका से संबंधित यह प्रस्थापना ऐतिहासिक भौतिकवाद का एक बुनियादी उसूल है।

इस उसूल ( principle ) से कई नतीजे निकलते हैं : (१) सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना से बाहर वस्तुगत रूप से अस्तित्वमान होता है ; (२) सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को परावर्तित ( reflect ) करती है ; (३) प्राथमिक तथा भौतिक होने की वजह से सामाजिक अस्तित्व, सामाजिक चेतना की अंतर्वस्तु तथा रूप, दोनों का नियमन करता है ; (४) सामाजिक चेतना में होनेवाले सारे परिवर्तन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्षतः सामाजिक अस्तित्व में परिवर्तन के कारण होते हैं ; (५) सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व के परिवर्तन तथा विकास पर सक्रिय प्रभाव डाल सकती है, किंतु अंततः यह प्रभाव स्वयं सामाजिक अस्तित्व के विकास तथा कार्यात्मकता के वस्तुगत नियमों से निर्धारित होता है ; (६) सामाजिक विकास के सारे नियम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूल पर आधारित हैं और उनका वैज्ञानिक स्पष्टीकरण इसी से मिलता है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद का बुनियादी उसूल इस प्रस्थापना की सटीकता पर बल देता है तथा उसे अभिपुष्ट करता है कि समाज का विकास एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया है। यह दृष्टिकोण सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं ( formations ) के सिद्धांत में अत्यंत पूर्णता से मूर्त होता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 10 दिसंबर 2017

सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठनों पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक सत्व और सामाजिक चेतना की संकल्पनाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक अस्तित्व और सामाजिक चेतना
( social being and social consciousness )

सामाजिक अधिरचना ( social superstructure ) के मुख्य तत्वों, यानी राज्य, पार्टियों तथा सामाजिक संगठनों के क्रियाकलाप में दो पक्षों, यानी आत्मिक ( spiritual ) और भौतिक ( material ), की अंतर्क्रिया ( interaction ) होती है। इस अंतर्क्रिया का नियमन ( regulation ) करनेवाली, सर्वाधिक सामान्य नियमितता ( pattern ) को निरूपित करने के लिए, ऐतिहासिक भौतिकवाद के इन दोनों प्रवर्गों ( categories ), यानी सामाजिक अस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) को समझना जरूरी है।

सामाजिक अस्तित्व में, उत्पादन के संबंधों के आधार पर उत्पन्न होनेवाले वस्तुगत ( objective ) सामाजिक और व्यावहारिक संबंधों की समग्रता ( totality ) तथा उत्पादक शक्तियों के भौतिक तत्व ( material elements ) शामिल होते हैं।

सामाजिक चेतना में, समाज के सदस्यों के उन सारे मतों, सिद्धांतों, दृष्टिकोणों, ज्ञान तथा अनुभवों की समग्रता शामिल होती है, जो सामाजिक अस्तित्व के परावर्तन ( reflection ) के ज़रिये उत्पन्न होते हैं। सामाजिक चेतना काल विशेष में समाज विशेष में रहनेवाले लोगों के मानसों ( minds ) का योग मात्र नहीं होती है। यह वह सामान्य ( general ), या वह सर्वनिष्ठ ( common ) है, जो किसी एक प्रदत्त ऐतिहासिक युग में समाज, वर्गों तथा सामाजिक समूहों के सदस्यों की चेतना में निहित होता है।

ये प्रवर्ग, ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) के लिए केंद्रीय महत्व के हैं। सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को परावर्तित ( reflect ) करती है। ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरोधियों ने अनेक बार कहा है कि वह सामाजिक चेतना को सीधे-सीधे अर्थव्यवस्थाओं से व्युत्पन्न करता है तथा सामाजिक जीवन के सारे पक्षों को महज़ आर्थिक उत्पादन कार्यों तक सीमित करता है। ऐतिहासिक भौतिकवाद इस तरह की एकांगी और अधिभूतवादी ( metaphysical ) व्याख्याएं प्रस्तुत नहीं करता है, वास्तव में, ये स्वयं पूंजीवादी अध्येता ही हैं, जो ऐसे आदिम ‘आर्थिक भौतिकवाद’ के दोषी हैं। मसलन, अमरीकी समाजशास्त्री व अर्थशास्त्री वाल्ट रोस्टो ने बुद्धि की अवस्थाओं का सिद्धांत पेश किया, जिसमें यह दावा किया गया कि समाज का सारा विकास उद्योग के विकास द्वारा निर्धारित होता है, कि सारे सामाजिक अंतर्विरोधों ( वर्गों के बीच अंतर्विरोधों सहित ) को आर्थिक क्रियाकलाप में सुधार भर करके तथा भौतिक संपदा की प्रचुरता से सुलझाया जा सकता है। हालांकि यह दृष्टिकोण जीवन के अनुभव से असत्य साबित हो गया है, क्योंकि पूंजीवादी देशों में सर्जित विराट संपदा मेहनतकशों ( working people ) की पहुंच से बिल्कुल बाहर है। फिर भी यह सिद्धांत अब भी बहुत प्रचलन में है।

विश्व में कई देशों की परिस्थितियों के विश्लेषण हमें बताते हैं कि, कई देशों में क्रांतियों और गृहयुद्धों के बाद वहां की उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) तबाह हो गयी थीं, अधिकांश कारखाने और मिलें काम नहीं कर रही थीं, कृषि की उत्पादकता नीचे गिर गयी थी। यानी अर्थव्यवस्था संकटापन्न थी। परंतु इस सबके बावजूद उन देशों में सर्वसाधारण की चेतना क्रांतिकारी थी, वह ऐतिहासिक आशावाद ( optimism ), नयी राजनैतिक व्यवस्था की संभावना पर विश्वास और नये समाज के निर्माण की चाह से ओतप्रोत थी। साथ ही ऐसे कई देशों में, जहां कि पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाएं बेहतर स्थिति में थीं, उनकी उत्पादक शक्तियों का स्तर सापेक्षतः ऊंचा था, लेकिन उनकी सामाजिक चेतना आम निराशावादी स्वभाव की थी और सारी आत्मिक संस्कृति संकट में थी। यदि सामाजिक चेतना की अवस्था तथा अंतर्वस्तु केवल उत्पादक शक्तियों तथा अर्थव्यवस्था की हालत से ही निर्धारित होती, तो वस्तुस्थिति बिल्कुल उल्टी होनी चाहिये थी।

वर्तमान हालात में ऐसा प्रतीत हो सकता है कि पूंजीवादी औद्योगिक देशों में संकट की घटनाओं पर क़ाबू पाने, मुद्रास्फीति की दरों में अंशतः घटती होने, बेरोजगारी की बढ़ती बंद होने तथा किंचित आर्थिक उत्थान की उपलब्धि के बाद सार्वजनिक समझ तथा सार्वजनिक मनोदशा सार्विक, प्रशांत ( serene ) आशावाद के अनुरूप हो जाती होगी। लेकिन वस्तुस्थिति ऐसी कदापि नहीं होती। गहन वैज्ञानिक-तकनीकि क्रांति और समाज में सूचना प्रणाली का द्रुत विकास, जनता के कुछ संस्तरों और व्यावसायिक समूहों के बीच काफ़ी अधिक अस्थायित्व ( instability ) और भविष्य पर अविश्वास को जन्म दे रहे हैं। उद्योगों के स्वचालन ( automation ), रोबोटीकरण तथा कंप्यूटरीकरण के सिलसिले में कई कर्मचारियों के सिर पर बेरोज़गारी का खतरा लगातार मंडराता रहता है। नयी तकनीकों से अतिरिक्त धंधों के निकलने का तथ्य भी इस बात की गारंटी नहीं है कि अनेक लोग काम से निकाले नहीं जायेंगे, बेरोजगार नहीं होंगे और सामाजिक संरचना में ‘फालतू’ नहीं हो जायेंगे। इसलिए देशों की ऐसी परिस्थितियों की सामाजिक चेतना में निराशावादी स्वर हावी होता जाता है।

उपरोक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि सारे सामाजिक दृष्टिकोणों, सारे मतों, आदर्शों और राजनीतिक सिद्धांतों को प्रत्यक्षतः आधार से, यानी उत्पादन संबंधों से निगमनित ( deduce ) नहीं किया जा सकता है। ये संबंध तथा उनके अनुरूप भौतिक, व्यावहारिक क्रियाकलाप, वास्तव में अन्य सारे संबंधों व क्रियाकलाप के रूपों और सामाजिक प्रक्रियाओं की बुनियाद में निहित होते हैं। किंतु इसका मतलब यह है कि सामाजिक चेतना में केवल उत्पादन संबंध तथा उत्पादन के क्रियाकलाप ही परावर्तित नहीं होते, बल्कि अन्य वस्तुगत सामाजिक संबंध, क्रियाकलाप के रूप ( और उनसे जुड़ी हुई सामाजिक घटनाएं तथा प्रक्रियाएं, यानी सामाजिक अस्तित्व ) भी परावर्तित होते हैं। इस तरह, प्रवर्ग ‘आधार’ और ‘अधिरचना’ यह समझने के लिए अभी भी पर्याप्त नहीं है कि सामाजिक चेतना क्या और कैसे परावर्तित करती है और लोगों के सामाजिक क्रियाकलाप को कैसे प्रभावित करती है।

प्रवर्ग ‘सामाजिक अस्तित्व’, ‘आधार’ ( basis ) से अधिक विस्तृत है, क्योंकि वह केवल उत्पादन संबंधों को ही नहीं, बल्कि उत्पादक शक्तियों के भौतिक तत्वों तथा अन्य सामाजिक संबंधों व संस्थानों और विविध प्रकार के क्रियाकलाप को भी अपने में समेट लेता है। इसके विपरीत प्रवर्ग ‘सामाजिक चेतना’, ‘अधिरचना’ से संकीर्णतर है क्योंकि अधिरचना में सामाजिक चेतना के अतिरिक्त राज्य, पार्टियां तथा वे अन्य संस्थान तथा संगठन भी शामिल हैं, जो सामाजिक चेतना के ‘उत्पादन’ तथा विभिन्न सिद्धांतों, विचारों तथा मतों के सर्जन में लगे हैं और उन्हें कार्यान्वित करने और जीवनीशक्ति प्रदान करने के लिए संघर्ष करते हैं। किंतु ये संस्थान और संगठन स्वयं चेतना से परे वस्तुगत रूप से विद्यमान हैं और उनके भौतिक तत्व सामाजिक चेतना द्वारा परावर्तित होते हैं। इस तरह, सामाजिक चेतना और सामाजिक अस्तित्व का रिश्ता सीधा-सादा नहीं है, यह विभिन्न सामाजिक समूहों, वर्गों तथा सामाजिक संस्थानों के क्रियाकलाप के द्वारा व्यवहित ( mediated ) है।

सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को सिर्फ़ परावर्तित ही नहीं करती, बल्कि प्रतिपुष्टिकर ( feedback ) प्रभाव भी डालती है। मसलन, पूंजीवादी अवधि की सामाजिक चेतना की प्रणाली में और दृष्टिकोणों तथा मतों के साकल्य ( aggregate ) में पूंजीवाद के आंतरिक संकट को परावर्तित करनेवाले क्रांतिकारी विचार उत्पन्न हो सकते हैं। जब ये विचार सर्वसाधारण में घर कर लेते हैं, तो वे क्रांतिकारी क्रियाकलाप में मूर्त हो सकते हैं और स्वयं अपने अस्तित्व या सत्ता को ही परिवर्तित कर सकते हैं। इसके फलस्वरूप पूंजीवादी अस्तित्व या सत्ता के स्थान पर एक नया अस्तित्व या सत्ता - समाजवादी समाज - उत्पन्न हो सकता है। सामाजिक चेतना, सामाजिक अस्तित्व को जितनी सटीकता से परावर्तित करती है, उतनी ही अधिक प्रबलता से सामाजिक अस्तित्व को प्रभावित करती है।

ऊपर कही गयी सारी बातों का समाहार करते हुए अब हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के बुनियादी उसूलों ( basic principles ) को निरूपित कर सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 3 दिसंबर 2017

अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठन

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियों पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज की अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठनों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



अधिरचना की प्रणाली में सामाजिक संगठन
( social organisations in the system of the superstructure )

वर्ग समाजों में राज्य और राजनीतिक पार्टियों के साथ ही साथ विभिन्न सामाजिक संगठन भी अधिरचना का अंग होते हैं। उनकी स्थापना शोषक और शोषित दोनों ही वर्गों द्वारा की जा सकती है। शोषकों के हितों की रक्षा करनेवाले संगठनों के उदाहरण हैं कुलीनों के संघ, धार्मिक संगठन, सामंती समाज में व्यापारियों के संघ और पूंजीवादी समाज में निजी संपत्ति के मालिकों तथा पूंजीपतियों के विभिन्न निगमित ( corporative ) संगठन ( जैसे उद्योगपतियों, बड़े किसानों के संघ, अन्य संस्थाएं )।

वर्ग संघर्ष के विकसित तथा तीक्ष्ण होने तथा मेहनतकशों की वर्ग चेतना बढ़ने के साथ ही साथ उन्होंने भी अपने हितों की रक्षार्थ संगठन बनाने शुरू कर दिये। पूंजीवादी समाज में ऐसे संगठनों में सबसे महत्वपूर्ण ट्रेड-यूनियनें हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए मज़दूर वर्ग के संघर्ष को संगठित करना होता है। ट्रेड-यूनियनों के क्रियाकलाप का स्वभाव इस बात पर बहुत निर्भर होता है कि कौनसी राजनीतिक पार्टियां उन पर प्रभाव डालती हैं। पूंजीवादी विचारक, सुधारक ( reformists ) और संशोधनवादी ( revisionists ), ट्रेड-यूनियनों को पूंजीवादी लक्ष्यों के अंतर्गत लाने और क्रांतिकारी संघर्ष के रास्ते से डिगाकर ऐसी छिटपुट आर्थिक लड़ाइयों की ओर ले जाने की कोशिश करते हैं, जिनसे पूंजीवाद की बुनियाद को कोई हानि नहीं होती। पूंजीवादी देशों में कम्युनिस्ट और मज़दूर पार्टियों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य ट्रेड-यूनियन आंदोलन में अपने प्रभाव को बढ़ाना है। मज़दूरों की वर्ग चेतना को परिपक्व करने और क्रांतिकारी संघर्षों की राह पर ले जाने के लिए वे ट्रेड-यूनियनों में वैचारिक, शैक्षिक, राजनीतिक और संगठनात्मक कामों पर बल देते रहते हैं।

समसामयिक पूंजीवादी समाज की अधिरचना में ट्रेड-यूनियनों के अलावा पुरुषों के , महिलाओं के, कलात्मक व साहित्यिक, संगीत, युद्ध विरोधी, खेलों के तथा बहुत सारे अन्य संगठन भी शामिल होते हैं। विभिन्न सामाजिक, सामूहिक और व्यावसायिक हितों का प्रतिनिधित्व करनेवाले यह संगठन सामाजिक घटनाओं के प्रति अपने रुख़ ( attitude ) में भिन्न-भिन्न होते हैं और समाज के आधार पर भिन्न-भिन्न प्रकार का असर डालते हैं। परंतु जब उनके कार्यकलाप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूंजीवादी वर्ग के मौलिक, मूलभूत हितों पर असर डालने लगते हैं, तो उन्हें पूंजीवादी राज्य और उसकी राजनीतिक पार्टियों के घोर विरोध का सामना करना पड़ता है

समाजवादी समाज में मेहनतकशों के हितों को व्यक्त करनेवाले सामाजिक संगठनों की भूमिका लगातार बढ़ती रहती है। उनके क्रियाकलापों का मक़सद समाजवादी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाना, संस्कृति का विकास करना और सामाजिक जीवन के रूपों तथा दशाओं को बेहतर बनाना होता है। सहकारिता ( cooperation ) के विभिन्न रूपों की भूमिका बढ़ती है, जो सामाजिक स्वप्रबंध ( self-managements ) तथा अर्थव्यवस्था के विकास का कारगर साधन होते हैं। समाजवादी जनवाद के और अधिक विकसित होने के साथ-साथ सामाजिक संगठन समाज के प्रशासन में अधिक जटिल और सर्वसमावेशी ( all-embracing ) कार्य करने लगते हैं और अधिरचना में उनका महत्व लगातार बढ़ता जाता है।

दार्शनिक दृष्टिकोण से यह समझना महत्वपूर्ण है कि इस क्रियाकलाप में आत्मगत ( subjective ) और वस्तुगत ( objective ) कारकों को कैसे मिलाया जाता है और वे कैसे अभिव्यक्त होते हैं, सारे सामाजिक संस्थानों और संगठनों की कार्यात्मकता ( functioning ) में निर्धारक कारक कौनसे हैं और कि क्या उनके क्रियाकलाप में वस्तुगत नियमों ( laws ) और नियमितताओं ( patterns ) को देखा जा सकता है। इस स्थल पर हम ऐतिहासिक भौतिकवाद के सबसे महत्वपूर्ण प्रवर्गों के, अर्थात ‘सामाजिक अस्तित्व या सत्ता’ ( social being ) और ‘सामाजिक चेतना’ ( social consciousness ) के निकट आ पहुंचते हैं। इन पर चर्चा अगली बार करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 19 नवंबर 2017

अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां समाज की अधिरचना की प्रणाली में राज्य पर चर्चा चल रही थी, इस बार हम समाज की अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियों पर चर्चा करेंगे

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



अधिरचना की प्रणाली में राजनीतिक पार्टियां
( political parties in the system of the superstructure )

राज्य की भांति राजनीतिक पार्टियां भी समाज के वर्ग विभाजन का फल हैं। पार्टियां, निश्चित वर्ग या उसके संस्तरों द्वारा गठित सर्वाधिक संगठित तथा सचेत समूह होती हैं जो उनके हितों को व्यक्त करते हैं। पार्टियों का सबसे महत्वपूर्ण विभेदक लक्षण ( distinguishing feature ), जो अधिरचना की प्रणाली में उनका स्थान निर्धारित करता है, यह है कि वे अपने वर्ग के राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों के बारे में जानती हैं, उन्हें ठोस आधार प्रदान करती हैं और सत्ता संघर्ष में उसकी दूरगामी तथा तात्कालिक कार्यनीतियों का विकास करती हैं, समाज के जीवन के समुचित आदर्शों को पेश करती तथा उनका औचित्य ( justification ) साबित करती हैं और अवाम के बीच अपने प्रभाव के वास्ते संघर्ष में अपनी शक्तियों को संगठित व लामबंद ( mobilise ) करती हैं।

सारे वर्ग समाजों में किसी न किसी तरह की राजनीतिक पार्टियां विद्यमान होती हैं, किंतु पूंजीवादी तथा समाजवादी समाजों की अधिरचना में उनका सबसे अधिक महत्व का स्थान होता है। पूंजीवादी लोकतंत्र, विभिन्न पूंजीवादी पार्टियों के उत्थान के लिए सबसे अधिक अनुकूल दशाओं का निर्माण करता है। आधुनिक पूंजीवादी देशों में, इन पार्टियों में से कुछ घोर प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी स्थिति अपनाती हैं, कुछ अन्य अधिक उदार राजनीतिक अवस्थिति को वरीयता देती हैं। पूंजीवादी समाज में कई राजनीतिक पार्टियों का अस्तित्व, जिसे राजनीतिक बहुत्ववाद ( political pluralism ) कहते हैं, ऐसा आभास देता है, मानों मेहनतकशों ( working people ) के पास चुनाव के लिए कई विकल्प हैं। किंतु वास्तव में ये पार्टियां, राजनीतिक कार्यों तथा समस्याओं से निबटने के साधनों तथा तरीक़ों में भिन्न होने के बावजूद प्रचलित आर्थिक आधार तथा पूंजीवादी राज्य को सुदृढ़ बनाने का ही प्रयत्न करती हैं

कुछ पूंजीवादी देशों में मेहनतकशों द्वारा कठोर वर्ग संघर्ष में हासिल प्राथमिक लोकतांत्रिक अधिकार ( भाषण, सभा करने तथा संगठन बनाने के अधिकार ) उन्हें अपनी ही राजनीतिक पार्टियों का गठन करने में समर्थ बना देते हैं। अपने सैद्धांतिक कार्यक्रम के रूप में वैज्ञानिक समाजवाद को नियमतः अमान्य समझने वाली विभिन्न सामाजिक-जनवादी और समाजवादी पार्टियां सतही सामाजिक सुधारों की नीति पर चलती हैं। इसका यह मतलब है कि सत्ता प्राप्त करने के बाद भी ऐसी पार्टियां सिर्फ़ सीमित सुधार करती हैं, जिनका मक़सद वर्ग संघर्ष को ‘मृदु’ बनाना होता है। वे पूंजीवाद की बुनियाद - बड़े निजी स्वामित्व - को हाथ भी नहीं लगातीं। यह इस बात का स्पष्टीकरण है कि ऐसी पार्टियां सत्ता प्राप्ति के बाद भी मेहनतकशों का समर्थन क्यों नहीं हासिल कर पाती और अवाम के बीच अपने प्रभाव को धीरे-धीरे क्यों गंवा देती हैं।

आज की दुनिया में राजनीतिक पार्टियों की भूमिका, देश या प्रदेश विशेष की तीक्ष्ण सामाजिक समस्याओं के समाधान में उनके योगदान से तथा भूमंडलीय समस्याओं पर उनके दृष्टिकोण से निर्धारित होती है। इन समस्याओं में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं शांति और नाभिकीय निरस्त्रीकरण के लिए संघर्ष, पारिस्थितिक विनाश की रोकथाम, अधिक न्यायोचित व्यवस्था की उपलब्धि, मानवाधिकारों तथा भिन्न-भिन्न सामाजिक-आर्थिक प्रणालियोंवाले देशों के बीच लचीले, समान सहयोग की स्थापना के लिए संघर्ष। समाज के सामाजिक रूपांतरण ( transformation ) के लिए मेहनतकशों के संघर्ष के हितों को व्यक्त करनेवाली प्रगतिशील पार्टियों की भूमिका का प्रश्न अधिकाधिक महत्व ग्रहण कर रहा है। इन पार्टियों की दूरगामी तथा तात्कालिक कार्यनीतियों की भूमिका ठोस ऐतिहासिक दशाओं तथा उनके सामान्य वैचारिक और सामाजिक-राजनीतिक समादेशों ( precepts ) से निर्धारित होती है।

अनेक समाजवादी देशों तथा विकास के गैरपूंजीवादी रास्ते पर अग्रसर देशों में कम्युनिस्ट, मज़दूर तथा राष्ट्रीय क्रांतिकारी पार्टियों का, अधिरचना की प्रणाली में एक निर्णायक स्थान है। किंतु केवल एकपार्टी प्रणाली वाले समाजवाद का नमूना एकमात्र संभव नमूना नहीं है। ठोस ऐतिहासिक दशाओं में अन्य मॉडल भी संभव हैं, जिनमें वे भी शामिल हैं, जिनमें कम्युनिस्ट और मज़दूर पार्टियां, लोकतांत्रिक संस्थानों तथा आबादी के व्यापक संस्तरों के समर्थन पर भरोसा करते हुए अन्य राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक संगठनों के साथ फलप्रद सहयोग कर सकती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम
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