शनिवार, 11 मई 2013

ठोस समाधानों की तात्कालिक आकांक्षाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



ठोस समाधानों की तात्कालिक आकांक्षाएं

लेकिन एक बात साफ कहनी है कि आपसे समझ तो मिलती है लेकिन ठोस समाधान पर कुछ निराशा हो रही है।....

आप ही के शब्द, ‘अब इस पर क्या कहें?’ :-) यदि आप अपनी समझ में बेहतर होते जाएंगे तो अपने समाधान ख़ुद ही तलाश लेने की अवस्थाओं में होंगे और यही सबसे अच्छी बात होगी। कुछ कहते ही हैं, यह पुनरावर्तन ही होगा पर फिर भी। इसके मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करते हैं।

जब वास्तविक दुनिया में परिवर्तन संभव नहीं लगते, तब अमूर्तन दुनिया अधिक रास आने लगती है। वास्तविक यथार्थ के कुछ पहलू हमारे विचारों को आंदोलित करते हैं, हमें ग़लत लगते हैं, समस्याएं पैदा करते हैं, और हम उनका समाधान करने को प्रस्तुत हो जाना चाहने लगते हैं। पर यदि यथार्थ की वस्तुगत समझ पैदा नहीं हो पाई होती हैं तो हम उन समस्याओं के मूल पर नहीं पहुंच पाते। मूल तक नहीं पहुंच पाना उन्हें सही रूप से हल कर पाने की संभावनाओं को बंद कर देता है।

हम सामान्यतः तत्काल समाधान चाहते हैं, सोचते हैं कि क्यों ना इन समस्याओं के तुरंत हल निकल आएं। यही आकांक्षा हमें उस स्थिति की ओर ले जाती है, जब हम वास्तविक तात्कालिक समाधान ना भी कर पाएं तो कम से कम तार्किक रूप में यानि अमूर्त रूप में, अपनी चेतना में, तो उनका समाधान प्रस्तुत कर ही लें। यह हमें वास्तविक यथार्थ से अलग करता है और हमें अमूर्तन रूप में, चेतना के स्तर पर ही समाधानों में उलझे रहना और इसी को वास्तविकता समझने की ओर प्रवृत्त करता है। एक आभासी दुनिया हमारी चेतना में सरगर्मी करने लगती है और हम इन्हीं आभासी समाधानों की दुनिया में डूबे रहना पसंद करने लगते हैं। चाहे वास्तविकता में ये चरितार्थ हो पाएं या नहीं।

थोड़ा समझाएं, जैसे कि वर्तमान परिस्थितियों में जो देश की आत्मनिर्भरता और संप्रभुता से वास्ता रखते हैं वे यह समस्या महूसस करते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश में पूंजी का जिम्मेदारी रहित, जम कर दोहन कर रही हैं तथा आत्मनिर्भरता और संप्रभुता पर संकट खड़ा कर रही हैं, साम्राज्यवादी भाषा और संस्कृति की वाहक हैं। वे इसका समाधान करना चाहते हैं।

यहां हम संसंदीय पार्टियों की अवसरवादी राजनीति को छोड़ देते हैं क्योंकि उनके ज़रिए सिर्फ़ सत्ता की अलट-पलट होती है, नीतियां कमोवेश वही रहती हैं। आगे बढ़ें, कुछ लोगों को लगता है कि ये इसलिए संभव हो पा रहा है कि देश की वर्तमान सत्ता की साम्राज्यवादी शक्तियों के आगे घुटने टेकने और देश की पूंजीवादी शक्तियों को फायदा पहुंचाने तथा मिल-जुलकर खाने हड़पने की नीतियां इसके मूल में हैं, इसलिए बिना इस पूंजी-सत्ता के गठजोड़ को सत्ता को हटाए और एक जनपक्षीय सत्ता कायम किए बगैर इन समस्याओं के वास्तविक और स्थायी समाधान नहीं निकल सकते। यानि सत्ता पर निर्णायक कब्ज़े की लड़ाई छेड़ना और जीतना ही इसका समाधान है।

कुछ लोगों को लगता है कि फिलहाल की परिस्थितियों में इसके लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध किया जाना चाहिए और इनके खिलाफ़ बहिष्कार की रणनीति अपनानी चाहिए। इनकी सभी कार्यवाहियां मुनाफ़ा बटोरने के लिए होती हैं, इसलिए बहिष्कार इनका मुनाफ़ा कम करेगा या खत्म कर देगा और मजबूरन उन्हें यहां से वापस लौटना ही होगा। इनके अनुसार यही एक कारगर तात्कालिक समाधान होगा।

क्रांति, आमूल-चूल परिवर्तन के लिए परिस्थितियों, पूंजीवादी शक्तियों के खिलाफ़ एक व्यापक जन चेतना और बृहत्तर स्तर पर अधिकतर जनता की सक्रिय भागीदारी वाला संघर्ष आवश्यक है, और इस हद तक का बहिष्कार जिससे उनका वास्तविक रूप में मुनाफ़ा ख़त्म किया जा सके के लिए भी एक व्यापक जनचेतना और बृहत्तर रूप से बहुल जनता के बहिष्कार की सक्रिय और लंबी भागीदारी की आवश्यकता है। इसका मतलब ये दोनों समाधान सिर्फ़ दिमाग़ में ही अमूर्त समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं और व्यावहारिक रूप से एक लंबी और व्यापक कार्यवाहियों की आवश्यकता को ही प्रतिबिंबित कर रहे हैं।

दोनों ही तात्कालिक समाधान मस्तिष्क में तो प्रस्तुत हो रहे हैं, पर यथार्थ में देखा जाए तो वास्तविकता में कोई तात्कालिक हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं। इसलिए हमने ऊपर तार्किक रूप से सूझ रहे इस तरह के समाधानों को अमूर्त दिमागी शगल मात्र ही कहा है जिनसे प्राप्त तात्कालिक मानसिक संतुष्टि रास आने लगती है। आपको यह समझना चाहिए ही कि समस्याओं के सैद्धांतिक या तार्किक समाधानों के पीछे का मनोविज्ञान क्या है? इतिहास हमें सिखाता है कि बृहत्तर सामाजिक और राजनैतिक समस्याओं के कोई लघु-कालिक तात्कालिक समाधान नहीं होते। व्यवस्थाओं के अंतर्विरोध उनके निषेध से यानि आमूलचूल परिवर्तन से ही स्थायी रूप से हल हो सकते हैं, यहां कोई लघु-मार्ग नहीं होता।

उपरोक्त दोनों समाधानों पर थोड़ा और गौर फरमाएं तो हम देखते हैं कि पहले समाधान में परिस्थितियों की एक वस्तुगत और व्यापक समझ है, वहीं दूसरे समाधान में परिस्थितियों की भाववादी व्याख्या है और आदर्शवादी तात्कालिक अवसरवादी प्रवृत्ति है जो इसी तरह तात्कालिक रूप से समाधान होने का भ्रम तो पैदा करती है पर इन समस्याओं के मूल, वर्तमान व्यवस्था के विरोध की कोई मानसिकता उसके पीछे परिलक्षित नहीं होती इसलिए यथास्थितिवादी रुख आसानी से ले सकती है।

जब ये दोनॊं समाधान एक व्यावहारिक रूप से एक लंबी और व्यापक जन कार्यवाहियों की आवश्यकता को ही प्रतिबिंबित कर रहे हैं यानि एक व्यापक जन आंदोलन और लंबे संघर्षों की आवश्यकता को परिलक्षित कर रहे हैं तो फिर अपनी जिम्मेदारी समझ रहे व्यक्तियों और समूहों द्वारा जनता के बीच ऐसी व्यापक कार्यवाहियां, पहले समाधान के दूरगामी लक्ष्यों के प्रति ही लक्षित क्यों ना हों। जब एक व्यापक जन चेतना पैदा करनी ही है तो क्यों ना इसके लिए अपनी उर्जा को संपूर्ण परिवर्तन की दिशा में ही लगाया जाए। क्यों ऐसे तात्कालिक से समाधानों में उलझा जाए जिनसे व्यावहारिक रूप से कोई वास्तविक परिणाम प्राप्त होने की संभावना नहीं है।

बाकी बात हम पहले भी और ऊपर भी विकल्प वाली बात के अंतर्गत ही काफ़ी कुछ कह चुके हैं।

समस्याओं के मूल में वर्तमान व्यवस्था अगर है तो जाहिरा तौर पर इसके निषेध से ही समस्याओं का समाधान संभव हो सकता है। यानि कि आमूलचूल परिवर्तनकारी क्रांति ही असल समाधान है। तभी समस्याओं के वास्तविक हल निकल सकते हैं। पर यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है और पारिस्थितिक रूप से ही समग्रता से संभव हो सकती है। यह बात पूरी तरह समझ में जब तक नहीं आ पाएगी, तब तक हम किन्हीं सुधारवादी गतिविधियों में उलझने को अभिशप्त होंगे जो यथास्थिति को बनाए रखने में ही मददगार ही होती है।

क्या किया जा सकता है, इसके कई इशारे हम पेश कर ही चुके हैं, कि तात्कालिक परिस्थितियों में हमारे हस्तक्षेपों की सही दशा और दिशा क्या हो सकती है। वही जो इस दूरगामी लक्ष्य हेतु प्रवृत्त करती हो, और वर्तमान व्यवस्था से तात्कालिक राहत जरूर हासिल कर लेती हो परंतु जो वर्तमान व्यवस्था की वास्तविकताओं को भी खोल कर रखती रहती हों और इसके निषेध की तरफ़ लक्षित हों।

इतिहास को देखिए, आपको पता चलेगा कि समाज में कोई भी परिवर्तनकारी परिणाम यूं ही ना हासिल कर लिए गये हैं, उनके पीछे एक बेहद लंबी और बलिदानी कार्यवाहियों की श्रृखलाएं रही है। और ये संघर्ष हमेशा सफल रहे हों यह भी जरूरी नहीं। कई छुटपुट सफलताओं और असफलताओं की श्रृंखलाएं चलती रही हैं। व्यापक क्रांतियों के मामले में भी, असफल संघर्षों के मामले में भी, सुधारवादी हासिलों के मामले में भी। तत्काल और तुरंत कुछ नवीन हासिल नहीं किया जा सकता है, जहां हासिल होता भी लग रहा है तो यह समझ लेना चाहिए कि जरूर इसमें कुछ भी नवीन नहीं होगा, यह कोई पुरानी चीज़ ही होगी जिसमें मुलम्मा कोई नया लपेट दिया गया हो। ताकि यह नया सा भी लगे, और पुराने ढांचे के रूप में ही यथास्थिति के लिए पहले की तरह ही मुफ़ीद भी हो।

तो इसलिए ठोस समाधान पर निराशा तो होगी ही, क्योंकि तत्काल में ये कोई वास्तविक परिवर्तन करते हुए नहीं दिखाई देते हैं। पर यदि वस्तुगतता में देखेंगे, समाज के विकास के नियमों को समझेंगे तो आदर्शवादी रुझानों से मुक्ति पा सकते हैं। यह समझ में आ सकता है कि परिस्थितियां पकने पर ही फल मिला करते हैं, और एक व्यक्ति के रूप में इसी बात पर संतोष किया जा सकता है कि हमने इन पकने की परिस्थितियों के पैदा होने में मदद की, अपना योगदान किया और विरोधी परिस्थितियों से जमकर मुकाबला, संघर्ष किया। एक व्यक्ति के रूप में अपने हस्तक्षेप की अधिकतर संभावनाओं का यथासम्भव दोहन किया।

दोबारा पढा तो लगा कि काफ़ी पुनरावृत्ति हो रही है, हम एक ही जैसी बातें बार-बार दोहरा कर कहे जा रहे हैं। एकबारगी तो लगा कि हटा दें, फिर लगा कि जब लिखने में श्रम हो ही गया है तो रहने ही देते हैं। आप ख़ुद समझदार है। काम की बातें छांट लेंगे, थोथा उड़ा ही लेंगे।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 4 मई 2013

कोरी भावुकता और गंभीर संवेदनशीलता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



कोरी भावुकता और गंभीर संवेदनशीलता


हम इस बात पर सहमति रखते हैं कि सारे क्रांतिकारी मार्क्स-लेनिन से लेकर धार्मिक-जन, जैसे बिस्मिल-नेताजी तक, अधिकतर भावनाओं के कारण लड़े। सहानुभूति से उत्पन्न दुख भावनाओं का खेल है।...हमारी समझ से यह चिंतन के साथ भावनाओं का गठजोड़ है ही।

कोरी भावुकता और गंभीर संवेदनशीलता के बीच समझ और विवेक का अंतर होता है। भावनाएं यदि कुछ समाजोन्मुखी मूल्यों के साथ व्यक्ति के व्यवहार में नियामक ( regulatory ) भूमिका नहीं निभाती तो ये समाज के हितों के विपरीत भी जा सकती हैं, खतरनाक भी हो सकती हैं। इसलिए हमें भावनाओं और उनसे जुडे व्यवहार में भी अंतर करना सीखना होगा।

आपका शायद ‘समय के साये में’ पर ही भावनाओं वाली मनोविज्ञान श्रृंखला से गुजरना हुआ हो। भावनाएं, मनुष्य के चीज़ों के प्रति रवैयों पर निर्भर होती है, और व्यक्ति के रवैये की जड़े उसके दृष्टिकोण, उसके समग्र व्यक्तित्व में होती हैं। इसका मतलब यह होता है कि अलग-अलग व्यक्ति एक ही चीज़ के प्रति अपने अनुकूलन के अनुसार अलग-अलग भावनाएं महसूस कर सकता है। यहीं आकर भावनाओं के दायरों और उनकी सामाजिक उपादेयता पर भी तुलनात्मक रूप से विचार करने की आवश्यकता उत्पन्न होती है। हर तरह की भावना को जायज़ और सही नहीं ठहराया जा सकता।

वृहत सामाजिक मूल्यों से असंपृक्त कोरी भावुकताएं ही, जो किसी भी विभाजक तथ्यों के लिए पैदा होती हैं, या किसी व्यक्ति या समूह के द्वारा उभारी जा सकती हैं; उस तरह की कई नकारात्मक परिघटनाओं के लिए जिम्मेदार होती हैं, जिनका जिक्र आपने अपने भाषण में किया था। वहीं वृहत सामाजिक मूल्यों से संपृक्त उच्च स्तरीय भावनाएं ऐसी कई व्यक्तिगत अवदानों का कारण बन सकती हैं जिनका कि भी जिक्र आपने किया था। अभी अधिक नहीं कहते हैं, पर इतना जरूर कह सकते हैं कि सिर्फ़ भावनाओं के कारण या उनके सहारे सार्थक लड़ाइयां नहीं लड़ी जा सकती, उसके लिए और भी कई चीज़ों और परिपक्व समझ की आवश्यकता है।

हमारे कहने का मतलब था कि प्राथमिकतः भावनाएं ही होती हैं, इन्हें सार्थक लड़ाई के लिए वृहत सामाजिक मूल्य से लैस करना ही होता है। सिर्फ़ भावनाओं के कारण नहीं, लेकिन बिना भावनाओ के हम लड़ ही नहीं सकते। शुरुआत तो भावनाओं से होती है, फिर हम आगे उच्च स्तर तक आते जाते हैं।

आप की बात कहीं से भी ग़लत नहीं है, हम बस यह बात आप तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं कि हम भावनाओं के इस द्वंद को भी समझने की कोशिश करें। सभी तरह की भावनाओं का पैदा होना कोई जैविक सहजवृत्ति का परिणाम नहीं है, हमारी भावनाएं भी हमारे अनुकूलन पर आधारित होती हैं। एक जैसी ही चीज़ें, या परिस्थितियां सभी मनुष्यों में एक ही सी भावनाएं पैदा नहीं करती। यानि भावनाओं का पैदा होना और उनके ज़रिए अपने व्यवहार को नियमित करना, द्वंदवादी अन्योन्यक्रियाएं हैं। हमारा व्यवहार और मान्यताएं, हमारी भावनाओं को तय करते हैं और अपनी बारी में, पैदा हुई भावनाएं हमारे व्यवहार और मान्यताओं को नियमित करती हैं। इसलिए भावनाओं को स्पष्ट रूप से प्राथमिक मानना, कई चीज़ों की ग़लत समझ तक ले जा सकता है।

"भावनाएं ( अनुभूतियां ) मनुष्य के वे आंतरिक रवैये हैं, जिन्हें वह अपने जीवन की घटनाओं और अपने संज्ञान व सक्रियता की वस्तुओं के प्रति, विभिन्न रूपों में अनुभव करता है।"
"ऐसे आंतरिक वैयक्तिक रवैये की जड़ें सक्रियता और संप्रेषण में होती हैं, जिनके दायरे में उसका जन्म, परिवर्तन, सुदृढ़ीकरण ( strengthening ) अथवा विलोपन ( deletion ) होता है"

यानि कि भावनाओं के प्रस्फुटन के आधार में व्यक्ति का परिवेश, और इस परिवेश में उसकी सक्रियता तथा संप्रेषण का दायरा होता है, जिसके दायरे में वह सक्रियता और चेतना की अन्योन्यक्रियाओं के जरिए विकसित होता है। जहां व्यवहार, प्रवृत्तियों, विचारों का सुदृढ़ीकरण होता है, परिवर्तन होता है, विलोपन होता है और एक व्यक्तित्व आकार लेता है।

'उम्मीद है कि हमेशा की तरह ही आप आपकी शान में की गई इन गुस्ताखियों को आया-गया करते रहेंगे।' यह वाक्य.....अयोग्य शिष्य और अहंकारी साबित करता है।.....बहसों से बचा करूगा या संभव हुआ तो करूंगा ही नहीं......लेकिन इस बात से मैं दुखी हूँ कि आप मुझे ऐसा मानते हैं(?)।.....कुछ कुछ निराशा हुई इस वाक्य से।

ये संवादों के दौरान के औपचारिक वाक्यांश या कथन है, हम अक्सर ऐसे ही कुछ वाक्यों का प्रयोग करते रहते हैं। पर आपकी प्रतिक्रिया से लगा कि इसे आपके साथ प्रयुक्त करने की जरूरत नहीं थी, यह हमसे कुछ ग़लत सा हुआ। अब क्षमा चाहेंगे तो फिर यह कहियेगा कि फिर से हमने आपको निराश किया है, दुखी किया है, इसलिए नहीं कहते।

हम यहां संवाद कर रहे हैं तो महज इसलिए कि हम एक दूसरे में कुछ संभावनाएं देखते हैं। यह सबसे महत्त्वपूर्ण बात है और एक दूसरे के प्रति लिहाज़ और सम्मान का सबूत ( आपके शब्दों में ही ) भी, इसलिए इस तरह की भावनाओं में बहने की हमें लगता है आवश्यकता नहीं ही होनी चाहिए।

आपकी इस मासूम सी बात, ‘क्या एक नए शहर में किसी बच्चे को थोड़ी उछल-कूद करने की इजाजत नहीं है?’ ने हमें काफ़ी कुछ सोचने पर मजबूर किया है। हम शायद कुछ अधिक ही रुखेपन और कठोरता से पेश आ जाते हैं, हमें अपनी पद्धतियों में सुधार करना चाहिए। हमें यह अवसर उपलब्ध करवाने के लिए अगर आप बुरा ना माने तो क्या हम आपके शुक्रगुज़ार हो सकते हैं? आपका यह वाक्य लाजवाब है। शुक्रिया।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

परिस्थितियां ही व्यक्ति का निर्माण करती हैं

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



परिस्थितियां ही व्यक्ति का निर्माण करती हैं

एक जिज्ञासा है: ‘जब हम यह मानते हैं कि वस्तुएँ, भौतिक-भौगोलिक-सामाजिक-पारिवारिक आदि वातावरण हमारी सोच बनाते हैं तब हममें जो कमी है, वह तो उन परिस्थितियों की देन है। फिर व्यक्ति दोषी कैसे हुआ?…इस तरह हम स्वयं को जिम्मेदार कैसे मानें?’ यहाँ निवेदन होगा कि इसे यह न समझा जाय कि हम ऐसे तर्कों से या खोजने वाली बातों से खुद को निर्दोष मानना या साबित करना चाहते हैं।...यह सवाल हम सालों से सोचते रहे हैं, अपने को लेकर ही नहीं बहुतों को लेकर।

सही है, कौन कहता है कि कोई भी माने अपने को जिम्मेदार। व्यक्ति परिवेश की उपज है, तो जैसा भी व्यक्ति है, उसके लिए परिवेश ही जिम्मेदार है। मतलब, यदि हमें बेहतर व्यक्ति चाहिए तो एक बेहतर परिवेश की रचना करनी ही होगी।

जिम्मेदारी यहीं से शुरू होती है। जिन्हें यह नहीं पता उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। पर अब जो यह जान गये हैं कि परिवेश को बदले बिना, एक बेहतर परिवेश की रचना किए बगैर दुनिया को बेहतर नहीं बनाया जा सकता, जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। इसी तरह जो अपने व्यवहार, विचारों के उत्स और उनकी गैरवाज़िबता को जान गये हैं, वे अब इसे सही करना, इनसे लड़ने की और इन्हें बदलने की कोशिश नहीं करते, तो यह उनकी गैरजिम्मेदारी ही होगी। यदि थोड़ी सी भी परिस्थितियां उनके साथ हैं, तो उन्हें यह करना ही चाहिए। वे अब परिवेश बगैरा की बात करते हैं तो ये उनकी चालाकी ही समझी जाएगी।

आपकी यह बात कुछ समझ नहीं आई कि वास्तव में आपकी जिज्ञासा क्या है? थोड़ा और खोलिए, थोड़ा और निश्चित कीजिए। फिर से लिखिए।

इसका अर्थ था कि किसी अपराधी को, किसी भी व्यक्ति को हम दोषी कैसे मानें? जब हम यह मानते हैं व्यक्ति स्वयं की नहीं परिवेश की उपज है। जैसे हम कहते हैं कि वह अलगाववादी, पूँजीवादी है। उसे हम कैसे दोष दें जब किसी के निर्माण उसका कोई हाथ ही नहीं। जैसे आपने कहा था धर्म के मामले में व्यक्ति को नहीं स्थितियों को दोषी मानना चाहिए। या फिर जैसे हमारे अन्दर अहंकार है, तो हमारा दोष क्या है? वह तो मैंने नहीं पैदा किया। यह एक महत्वपूर्ण सवाल है।
पहले जो लिखा था उसी को आगे बढ़ाते हैं। पारिवेशिक परिस्थितियां ही व्यक्ति का निर्माण करती हैं। जब हम यह समझ रहे होते हैं तो इसका मतलब यह होता है कि हम उसके व्यक्तित्व के चारित्रिक गुणों के उत्स को समझने का प्रयत्न कर रहे होते हैं ताकि उसकी वस्तुस्थिति को समझा और समझाया जा सके। दूसरा हम उसकी प्रवृत्तियों को सामाजिक कसौटियों पर कसकर यह तय कर रहे होते हैं कि ये ग़लत हैं या सही हैं। यह इसलिए भी कि हम व्यक्तिगत रूप से दोष तय करके और उसे तदअनुसार सज़ा देकर मात्र ही अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं होलें। यह इस वर्तमान व्यवस्था का काम करने का तरीका है। पर वे परिस्थितियां जो इस तरह की प्रवृत्तियां पैदा करती हैं वे अनछुई ही पड़ी रहती है और इस तरह के ही अन्य व्यक्ति पैदा करती रहती हैं। यदि समस्या को मूल से ही समाप्त करना है तो इस मूल यानि वैसी परिस्थितियों को ही ख़त्म करना होगा। यदि किसी की कोई प्रवृत्तियां आक्रामक स्तर पर समाज के लिए खतरनाक हो उठती है और वह सुधार की गुंजाइश से बाहर हो गया है तो उसको विभिन्न तरीकों से प्रतिबंधित भी करना होगा ही। यह व्यक्तिगत से ज़्यादा व्यवस्थागत मामला अधिक है।

व्यक्तिगत तौर पर इसे समझना इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हम व्यक्तिगत तौर पर अपने व्यवहार को समुचित रूप से व्यवस्थित कर सकें। व्यक्तिगत रूप से दोषारोपण, नफ़रत, द्वेष आदि से मुक्त रहकर अपनी सक्रियता में अधिक विनम्रता, अधिक परिपक्वता और जिम्मेदारी से पेश आना ला सकें और सामने वाले में बदलाव की प्रक्रिया में अपना सकारात्मक योगदान करने के लिए प्रस्तुत हो सकें।

हमें लग रहा है कि आप इस मामले को अपने इस सवाल से ज़्यादा संदर्भित करना चाह रहे हैं कि हमारे अंदर अहंकार है, तो हमारा दोष क्या है, वह हमने तो पैदा नहीं किया? व्यक्तिगत चीज़ों से निपटना थोड़ा सा भिन्न हो उठता है।

कोई व्यक्ति अधिकतर अपनी प्रवृत्तियों की नकारात्मक पहचान से परिचित नहीं होता। यह दूसरे लोग ही आंक रहे होते हैं कि वह स्वार्थी है, अहंकारी है, कंजूस है, क्रोधी है आदि-आदि। हो सकता है लोगों के द्वारा उसका यह आकलन उस तक भी पहुंचता हो। अब चूंकि यह प्रवृत्तियां उसकी परिस्थितियों की उपज़ होती हैं, इसका मतलब यह भी तो है कि उन परिस्थितियों में ये उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक भी होती हैं, फलतः व्यक्ति उन्हें सही और बेहद जरूरी मान रहा होता है, इसीलिए उनसे चिपका रहता है, उनके पक्ष में सैद्धांतिक तर्क भी गढ़ रहा होता है।

जैसे कि यह कहना भी कि परिस्थितियों के कारण ही वह ऐसा है, इसमें उसका दोष क्या है? एक ऐसे ही तर्क की तरह है। यदि वह जान गया है कि उसकी परिस्थितिवश पैदा हो गई कुछ प्रवृत्तियां एक बेहतर व्यक्तित्व और सामाजिक कसौटियों के सापेक्ष सही नहीं है, तो उनको बनाए रखने की हर कोशिश ग़लत ही कही जाएंगी यदि उसकी तात्कालिक परिस्थितियों में वह ऐसा कर भी सकता हो। अपने लंबे अनुकूलन से लड़ना मुश्किल भी होता है और कष्टदायक भी। यथास्थिति के अनुसार ढ़लना और उसे बनाए रखना, यथास्थिति को परिवर्तित कर अपने अनुकूल बनाने की प्रक्रिया से हमेशा आसान होता है। अतः जो व्यक्तिगत तौर पर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझते हैं, अपने व्यक्तित्व को अधिक बेहतर बनाना चाहते हैं, उनको तो यह कठिन चुनौतियां स्वीकार करनी ही होंगी। व्यक्तिगत स्तर पर भी और सामाजिक व्यवहार के स्तर पर भी।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 20 अप्रैल 2013

विभाजन और एकता के आधार

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



विभाजन और एकता के आधार

विभाजन तो होना ही है। जब भौतिक परिस्थितियाँ अलग हैं, भाषाएँ अलग हैं और जब अन्य अलगाव हैं तो वर्ग बनेंगे ही। कम से कम वर्तमान में तो विभाजन का अस्वीकार आदर्शवादी-भाववादी है। विभाजन यथार्थ है। हाँ, हम इनमें कुछ ऐक्य तलाश सकते हैं। हालांकि इसकी सम्भावना कम है। एक सुखद स्वप्न है कि ये सब विभाजन खत्म हो जाएँ और सब एक जैसे हो जाएँ। लेकिन हम जानते हैं भारत के राष्ट्रीय झंडे पर कोई विभाजन नहीं दिखता, उसपर कोई भारी या हल्का बहस, शोर नहीं दिखता। जब तक वर्गीकरण है, वर्ग तो तय है, क्योंकि वही आधार है।

सही सा ही कह रहे हैं, परिस्थितियों का वस्तुगत विश्लेषण करना आप सीख रहे हैं। पर समग्रता में और लक्ष्यों के सापेक्ष रखकर देखना अभी सीखना बाकी है।

वास्तविकताओं का, वस्तुगतताओं का विश्लेषण इसलिए किया जाता है कि इन्हें समझ कर, आगे की राह इन्हीं में से निकालना हम सीख सकें, तदअनुसार अपनी कार्यवाहियां और फौरी लक्ष्य तय कर सकें; ना कि इसलिए कि हम वास्तविकताओं को समझकर उसी के अनुसार अपने आपको और अपनी कार्यवाहियों को ढ़ाल लें, उन्हीं के अनुसार अपनी सैद्धांतिकियां गढ़ लें।

जैसा कि आप सही समझ रहे हैं, समाज में समग्रता में एक्यताएं हैं, और विभाजन भी। विभाजनों के कई अलग-अलग आधार हैं, क्षेत्र, धर्म, भाषा, जाति, आदि-आदि, और कई नये भी पैदा किए जा सकते हैं। एक समझ यह भी कह सकती है कि विभाजन है, यह यथार्थ है, इसलिए अभी के लिए यही उचित है कि इसी विभाजन की राजनीति की जाए, इसी के ज़रिए अपने को ऊंचा उठाया जाए, अपने समूह को इस स्थिति में लाया जाए कि वह व्यवस्था से सौदेबाजी की ताकतों में हो। अभी इसी तरह की ही राजनीति अधिकतर चल रही है। जाहिर है, विभाजन और पुख्ता होते हैं, अलगाव तथा नफ़रत और पुख़्ता होती है, परिणामतः यथास्थिति बनी ही नहीं रहती और पुख़्ता होती है।

मुक्ति की राह समग्रता में है। अलग-अलग मुक्त नहीं हुआ जा सकता। इसलिए जो समग्र मुक्ति के स्वप्न देखते हैं, वे अपनी कार्यवाहियों के लिए इस समग्रता को विभाजित करने वाले तथ्यों को आपना आधार नहीं बनाया करते। वे इस तरह के आधार चुना करते हैं जो अधिक सार्वभौम हैं, जरूरी हैं, सामान्य हैं, आम हैं, प्राथमिक हैं। जो उनकी इस समग्रता और एकता का सूत्रपात करते हैं और विभाजनों के आधारों को कमज़ोर करते हैं।

हम और हमारा दृष्टिकोण, हमारी तात्कालिकताएं हमें वही दिखा रही होती है, जो वाक़ई में हम देखना चाहते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि आखिर यह भी यथार्थ का ही एक हिस्सा होती हैं, इसलिए यथार्थवादी वास्तविकता का भ्रम रचना आसान हो जाता है। हमें विभाजन के आधार मुख्य लग रहे हो सकते हैं, और इस तरह की चीज़ें भी जो अधिक जरूरी और आम हो सकती हैं, वे गौण समझी जा सकती हैं।

हमारी भूख एक सी है, हमारे अभाव एक से हैं, हमारे जीवन संबंधी दुख और हमारी चिंताएं एक सी हैं, हमारी शिक्षा की कोई आसान सुविधा नहीं है, रोजगार हम सभी को नहीं मिला करता, हम एक ही तरह से चिकित्सा के अभाव में मरा करते हैं, हमारे नलों में एक सा ही गंदा पानी आता हैं, हमारी झौंपड़ियों में बल्ब कभी-कभी ही जला करता है, मंहगाई हम सभी को एकसा ही मारा करती है, हम विरोध नहीं कर सकते, पुलिस का डंडा हम पर एक सा ही बरसा करता है, एक सा ही ख़ून बहा करता है, हमारी पसीने की थोड़ी-बहुत कमाई पर भी एक सा ही डाका डाला जाता है, शोषण का दमन-चक्र हम पर एक सा ही चला करता है, हम एक सी ही असमानता झेला करते हैं, हम मॉलों की बिजलियों की चकाचौंध में एक से ही सहमा करते हैं, आदि-आदि। हम सभी की जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं एक सी ही तरह पूरी नहीं हुआ करती, हमारी अभिशप्तताएं एक सी हैं। इतना कुछ हममें एकसा है, इसका अस्वीकार, इनका तिरस्कार, इनकी उपेक्षा, इनकी अवहेलना करके, हम सबमें विभाजन, अलगाव, नफ़रत बढ़ाकर हमारी लड़ाइयों, हमारे संघर्षों को कमजोर करना पता नहीं कौनसा यथार्थवाद होगा।

जो लोग सुखद स्वप्नों को साकार होते देखना चाहते हैं, वे एक्यता के आधारों को मजबूत करते हैं, इन्हीं के आधारों पर आमजन की लामबंदी करना सुनिश्चित करके संघर्षों को अमली जामा पहनाते हैं, प्राथमिकताओं को पहचानने की चेतना जागृत करते हैं और विभाजन के आधारों को कमजोर करते हैं, उन्हें द्वितीयक प्राथमिकता पर रखना सीखते और सिखाते हैं।

समाज के विकास की रौशनाई में, वर्ग का दार्शनिक संवर्ग ( category ), और इसकी अवधारणा, जिस तरह का आप प्रयोग कर रहे हैं, वह उससे अधिक व्यापक है। वर्ग और वर्ग-संघर्ष के बारे में अभी आप अध्ययन करेंगे ही।



इस बार इतना ही।
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शुक्रिया।

समय

शनिवार, 13 अप्रैल 2013

भाषा और रोटी के मुद्दे की प्राथमिकता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



भाषा और रोटी के मुद्दे की प्राथमिकता

भारत की 40-50 करोड़ की अनुमानित आबादी के अनुमानित समस्या को लेकर हम 60 करोड़ हिन्दी भाषियों को धूल चटाएँ और एकता का गीत गाते रहें? हालांकि भाषा का मुद्दा हमने शुरू में अंग्रेजी से मुक्ति के लिए था लेकिन अब वह रोटी से जुडती है और यह मुख्य बात है। अब ये बचकाना या चाहे जैसा लगे।

जब ये बचकाना या चाहे जैसा भी लगे तो फिर हर्ज़ ही क्या बचता है।

यह बात जरूर समझने की कोशिश की जानी चाहिए कि भाषा का मुद्दा रोटी से जुड़ता है, या रोटी के मुद्दे से जाकर सारे मुद्दे जुड़ जाते हैं। यानि महत्त्वपूर्ण क्या है? रोटी या भाषा? पहले पेट या पहले भजन? रोटी के लिए, हमने फारसी सीखी, अंग्रेजी सीखी, क्योंकि सत्ता इनमें आसानी से रोटी दे रही थी। रोटी के लिए हम अमेरिका, इंगलैंड, कनाड़ा, दुबई जाने कहां-कहां पहुंच जाते हैं। राजस्थानी बंगाल जा पहुंचता है, बिहारी महाराष्ट्र, बंगाली गुजरात में, मराठी कश्मीर में नज़र आ सकता है, केरली दिल्ली में, तमिल पंजाब में, सब इधर-उधर छितराये रहते हैं। हमारे आदिवासी जब रोटी के लिए गांवों या शहरों में पहुंचते हैं तो स्थान के हिसाब से कोई हिंदी बोलने लगता है, कोई बांग्ला, कोई मराठी अपनाने को मजबूर होता है, तो कोई अन्य भाषा। नेपाली हमारे बंगलों पर जी साब जी कर रहा हो सकता है, जापानी हिंदी सीख रहे हो सकते हैं, या राजस्थानी चीनी पर्यटकों के लिए चीनी, आदि-आदि।

हम तो बाबूजी तभी से रोटी के लिए लगे रहते थे जबकि हम बंदर जैसे ही थे और खौं-खौं किया करते थे, इसी रोटी के चक्कर ने हमें कहां से कहां पहुंचा दिया, कितनी नस्लें, कितने देश, कितने धर्म बगैरा। इसी रोटी के चक्कर में हमने बोलना भी सीखा बाबूजी और इतनी सारी भाषाए भी रच डालीं। अभी अधिकतर और बढ़िया रोटी अंग्रेजी में मिल रही है तो पूरा देश अंग्रेजी सीखने लगा है। पहले यही फारसी में हो रहा था, तो फारसी सीखने में लगा था, उससे पहले प्राकृत भी, संस्कृत भी। अंग्रेजों को यहां से रोटी समेटनी थी, तो वे यहां आकर हिंदी बोलने लगे, आदि-आदि। रोटी जहां मिल रही होगी, जिस भी भाषा में मिल रही होगी, हम तो वहीं के और उस भाषा के ही हो जाएंगे बाबूजी। आप हिंदी में दे दीजिए, सिर्फ़ इसी में दिया जाना सुनिश्चित कर दीजिए बाबूजी, देखिएगा पूरा देश हिंदीमय हो जाएगा। आपको किसी से कहना भी नहीं पड़ेगा बाबूजी। ( मुस्कुराहट )

"रोटी के लिए हम अमेरिका, इंगलैंड, कनाड़ा, दुबई जाने कहां-कहां पहुंच जाते हैं।..." मैं नहीं मानता कि रोटी कारण है कम से कम इतनी दूर जाने वालों के लिए। वे रोटी से कम लुटेरेपने के लिए अधिक जाते हैं।...इनके मामले में तो रोटी के तर्क को खारिज करेंगे हम। ये अथाह पूँजी के लिए जाना चाहते हैं। कम से कम इनमें से 95 प्रतिशत लोग तो ऐसे होते ही हैं।

थोड़ा अधिक ही पूर्वाग्रही हो रहे हैं। कुछ ज़्यादा ही प्रतिशत पकड़ा दिया इस तरह के लोगों को। हमें लगता है पढ़े-लिखे, डिग्रीधारियों के सापेक्ष, कुशल-अर्धकुशल-अकुशल-हैल्पर आदि के लिए जाने वाले मज़दूरों की संख्या कहीं अधिक है। जिनकी की शुरुआत रोटी की वज़हों से होती हैं, भले ही उनके मन में बड़ी आमदनी के सपने कुलबुला दिये गए हों, जो कि मुद्रा के मूल्यों में अंतर की वज़ह से सामने दिखते भी हों। नेपाल से आने वाले चौकीदारों और नौकरों के सापेक्ष शायद इसे और बेहतरी से समझा जा सके।

बात इसको यह दिशा देने के लिए नहीं कही गई थी, वह प्राथमिकता के सवाल पर मन का अलोड़न-विलोड़न करने के लिए उकसावा था।

प्राथमिक तो यह है ही। आप स्वयं बताइए कि रोटी-कपड़ा-मकान-शिक्षा-बिजली-पानी-सड़क-स्वास्थ्य से प्राथमिक क्या होता है? जिस आबादी के पास रहने-खाने के लिए ही नहीं है, हम उसे एकता का पाठ पढ़ाएँ तो एक शेर है:

मुझे उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है, जो भूखों को सेहत की दवा देता है। - नीरज

एकदम सही कहा है आपने। सही कहा कि जिसके पास रहने-खाने के लिए ही नहीं है, उसके लिए क्या किया जाए। अब उसकी रोटी-पानी का इंतज़ाम कैसे हो? कुछ दान-दक्षिणा के प्रबंध किए जा सकते हैं। उनके लिए चंदा इकट्ठा किया जा सकता है। अमीरों से उनके लिए दया की भीख मांगी जा सकती है। हम लोग कुछ अपने पुराने-सुराने कपड़े इकट्ठे करके उन तक पहुंचा सकते हैं। यानि कि कुलमिलाकर अकेले-अकेले अस्सी-नब्बे करोड़ लोगों के लिए यह करना होगा। फिर यह क्या एकाध-दिन के लिए किया जाएगा या हमेशा का इंतज़ाम करना है? कितने साधन, कितने लोग, कितना पैसा चाहिए होगा। फिर यह सब आएगा कहां से, और इतना सारा होगा तो हम कितने अमीरों को उनकी संपत्ति लुटवाने को तैयार कर पाएंगे। और लगातार यदि इंतज़ाम हमेशा के लिए करना हुआ तो। खैर, सोच लिया जाए तो क्या नहीं किया जा सकता, हमारे कुछ महान कवि कह गये हैं - कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा। आप बताइये, आपके पास कोई उचित योजना हो तो इसे करना भी बुरा नहीं लगता।

एक अकेला मनुष्य शिकार नहीं कर सकता था, एक अकेला ज़िंदा नहीं रह सकता था, एक अकेला कुछ भी नहीं कर सकता था, यहां तक कि अपनी संतति को भी आगे नहीं बढ़ा सकता था, उसके लिए भी दो यानि एक नर और एक मादा की जरूरत पड़ती थी। कुछ भी नहीं हो सकता था, यदि मनुष्य अकेला ही हुआ करता, उसने साथ रहना और साथ लड़ना नहीं सीखा होता।

कुछ सनकी लोग यह भी कह गए हैं कि इतनी बड़ी आबादी को यदि पेट भरने तक का जुगाड़ नहीं है तो सिर्फ़ इसीलिए कि वह अलग-अलग विभाजित है। धर्म, जाति, भाषा, लिंग, आदि-आदि में। रोटियां गोदामों में बंद है, अकेले-अकेले जाकर दया की भीख मांगी जा सकती है, दुत्कार खाई जा सकती है, पर अकेले उन्हें छीन के लिया नहीं जा सकता। पूंजी की सत्ता की इकट्ठा ताकत से, इसके लिए इकट्ठा होकर ही, मिलकर ही कुछ किया जाना होगा। पर अब किया क्या जा सकता है? आप और नीरज जी मना कर गये हैं एकता का पाठ पढ़ाने के लिए। ( मुस्कुराहट )

नीरज कितना सही सा कह गये हैं कि समाज के ऐसे वैद्यों के ज्ञान और विद्या पर तरस आना चाहिए जो कि भूख का इलाज़ सेहत की दवाइयों में देखते हैं। इसका ईलाज़ सिर्फ़ रोटियां हैं, और इसी की व्यवस्था यह तंत्र नहीं कर पा रहा है।

हमने ऐसी कोई बात न कही थी, न कोई संकेत ऐसे थे कि दान-दक्षिणा से काम चलाएंगे। या फिर हम कपड़े बांटकर इन समस्याओं को सु्लझाएंगे।

सही कह रहे हैं कि आपने सीधा ऐसा कुछ नहीं कहा था, पर अप्रत्यक्ष रूप से उसका मतलब यही निकलता सा लगा, इसलिए वह गु्स्ताखी हुई। आपने कहा था, "जिस आबादी के पास रहने-खाने के लिए ही नहीं है, हम उसे एकता का पाठ पढ़ाएँ तो एक शेर है..."। इसको आगे बढ़ाएं, रहने-खाने के लिए नही है इसका मतलब रहने-खाने का प्रबंध पहले करना होगा ( एकता की बात करना इसीलिए बेमानी है ), अब बात यह कि इतनी बड़ी आबादी के रहने-खाने का प्रबंध कैसे किया जाए, यह काम वर्तमान पूंजीवादी मुनाफ़ाखोर व्यवस्था को करना होता, या कर सकती तो अपने मुनाफ़ों को छोड़कर, उनका शोषण छोड़कर, कर ही रही होती, यानि कि वह करेगी नहीं, फिर कैसे किया जा सकता है, व्यवस्था से छीनने, लड़ने के लिए, उसे बदल ड़ालने के लिए तो इकट्ठा होकर लड़ाई छेड देनी होगी, यह अभी करना नहीं है क्योंकि लड़ने या एका बनाने का सवाल से अधिक महत्त्वपूर्ण सवाल, अभी की भूखी-नंगी आबादी को रहने-खाने का प्रबंध करना है, एकता का पाठ पढ़ाने वाले अपने सीमित संसाधनों से तो यह नहीं कर सकते, तो फिर रास्ता बचता क्या है, वही जिसकी परिकल्पना हमारे महान मानवश्रेष्ठों ने पहले से ही तैयार कर रखी है, और जैसा कि हमने लिखा था, हम चंदा इकट्ठा करें, दान-दक्षिणा मांगे, सेठों से अपील करें, कि भई आबादी भूखी-नंगी है, उनके रहने-खाने का प्रबंध कीजिए, दान दीजिए, फिर यह सब इकट्ठा करके खाना-साना खरीदा जाए, मकान-बकान बनाए जाएं, कपड़े-सपड़े लाए जाएं, आदि-आदि।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

भाषाई-प्रेम की भावुक तार्किकी

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



भाषाई-प्रेम की भावुक तार्किकी

आज दक्षिणवासियों का 1965 और 1986 का हिन्दी विरोध....क्या यह 5-6 प्रतिशत लोगों का अत्याचार नहीं कि बाकी 94-95(वैसे तो कुछ कम भी) प्रतिशत लोगों के उपर अंग्रेजी थोप दिया गया....यह लोकतंत्र के विरुद्ध है।....इस बात से तो लगता है गैर हिन्दी लोगों का देश ही अलग कर दिया जाना चाहिए...कम से कम तमिल लोगों को....इस बात के लिए तो उदार नहीं हुआ जा सकता कि 6-7 करोड़ लोगों या अधिक से अधिक 15-20 करोड़ लोगों के लिए 70 करोड़ लोगों अंग्रेजी थोपी जाय....भारत बँट जाए तो बुरा नहीं होगा कुछ।

अब आप स्वयं ही देखिए कि सामान्यतः उचित सा लगता हिंदी-प्रेम का आदर्श अंततः अपनी तार्किक श्रृंखला में तर्क को कहां तक और किस हद तक खींच लाया, कि एक राष्ट्रीय चेतना की आकांक्षा को, राष्ट्र के ही टुकडे़ कर देने की मजबूरी तक पहुंचा दिया। हिंदी के ज़रिए संपूर्ण राष्ट्र को एक कड़ी में बांधने की बात इस तरह अंततः हिंदी प्रदेशों तक ही सीमित हो जाने को अभिशप्त होती सी महसूस होने लगी। अगर वास्तविक उद्देश्य राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने का था तो जाहिरा तौर पर इस आदर्शी आकांक्षा पर पुनर्चिंतन किए जाने की जरूरत है, और यदि बात इस तरह से है कि राष्ट्र जाए भाड़ में, मेरी मान्यता तो सिर्फ़ किसी भाषा की सीमाओं में बंधी है तो फिर कोई आवश्यकता नहीं पुनर्विचार की, इसी विचार को आगे पल्लवित किया जा सकता है।

आप समझ रहे होंगे कि उपरोक्त पंक्तियों को बज़ाए हिंदी-विरोध के वक्तव्य की तरह समझने के, एक बेहतर तार्किक पद्धति विकसित करने की आवश्यकता के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है। आप शनैः शनैः शायद यह समझने की राह निकालेंगे कि सत्ता के राजनैतिक निर्णयों के आधार सामान्यतः दिखते हुए तथ्य नहीं वरन् सत्ता और पूंजी के गठजोड़ के मिलेजुले हितों की रक्षार्थ के छिपे मंतव्य हुआ करते हैं।

सत्ता को यदि कई कारणों से अंग्रेजी रास आ रही थी, वह स्वयं अंग्रेजी को बनाए रखना अपनी राजनैतिक जरूरतों के मद्देनज़र आवश्यक समझ रहा था, तो वस्तुतः उसके द्वारा इसे बनाए रखना ही था, यदि हिंदी-विरोध का बहाना ना मिला होता तो भी किसी और बहाने इसे ही जारी रखा जाना था। यह भी एक तथ्य ही है कि राष्ट्रभाषा का दर्जा दिए जाने, सत्ता द्वारा हिंदी-हिंदी गाए-बजाए जाने के बाद भी, हिंदी भाषी प्रदेशों में भी हिंदी की हालत, आम ज़िंदगी, प्रशासनिक कार्यो में, शिक्षा के माध्यमों में, सत्ता के गलियारों में क्या है, यह आप बेहतर जानते ही हैं।

लोकतंत्र का मतलब यदि आप सिर्फ़ बहुमत की तानाशाही ही के रूप में ही देखना चाहते हैं, तो बात अलग है और यदि लोकतंत्र का मतलब इसकी वास्तविक परिभाषाओं के अंतर्गत ही समझना चाहते हैं तो किसी भी व्यक्ति या समूह के वास्तविक हितों ( जो कि वॄहत सामाजिक हितों के वास्तविक विरोध में ना हो ) की सुरक्षा की गारंटी सुनिश्चित करने की राह में निकलना ही होगा।

यदि बात को, मातृभाषा को शिक्षा, प्रशासन और निश्चित रोजगार से जोड़ने तथा हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में विकसित किए जाने के तर्क से शुरू किया जाए तो अधिक बेहतर हो। ना चाहते हुए भी कुछ अधिक ही कह दिया जाता है, हालांकि तय यह किया था बाद में ही इस पर विस्तृत चर्चा की जाएगी। अन्यथा नहीं लीजिएगा अभी।

कहना यह था कि...सब कुछ के बाद भी कोई नहीं मानता या समझना चाहता तब हमेशा के लिए स्थापित होने वाली अंग्रेजी का जिम्मेदार तमिलनाडु अलग हो जाय तो कोई बड़ी बात नहीं....मूल लक्ष्य निश्चय ही भारत और दुनिया के लोगों के बीच अधिक से अधिक चैन-शान्ति-समानता के लिए कोशिश करना ही होना चाहिए।

यानि यदि इसी तरह की बचकानी भावुक बातों और तर्क श्रृंखला पर चला जाए, और इन्हें ही प्राथमिक बना लिया जाएगा तो मान लीजिए आपकी अभी तक की सूचनाओं में एक तमिलनाडु ही आया है, वह आपके इन तर्कों और बातों से सहमत नहीं तो उसे अलग कर दीजिए, कल यदि कोई और प्रदेश या समूह मसलन केरल, कर्नाटक, बंगाल, उडीसा, महाराष्ट्र आदि-आदि भी हमारी इन बातों और तर्कों से मुतमइन नहीं हो तो उन्हें भी अलग कर देंगे और कोई बड़ी बात नहीं होगी। दुनिया के दूसरे हिस्सों से भी ऐसा ही व्यवहार करेंगे और फिर भी कहेंगे यही कि हमारा मूल लक्ष्य तो भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में एका और शांति कायम करना है। बहुत अच्छा है। :-)

आपका कहना है कि अलगाववादी लोगों से नफ़रत होनी ही चाहिए....फिर ऐसे लोगों से, ऐसे नेताओं से नफ़रत नहीं करें तो क्या करें...?

आप किसी भी कारण से इस तरह का छद्म प्रतिनिधित्व कर रहे व्यक्तियों को, जिनका प्रतिनिधित्व किया जा रहा है उस आमजन से अलग नहीं कर पा रहे हैं। आप ऐसे व्यक्तियों, नेताओं को, समग्र जनता समझने की भूल कर रहे हैं। यानि आप कुछ नेताओं बगैरा को संपूर्ण दक्षिण जनता समझ रहे हैं। और वहां के आमजन की उभारी गई सिर्फ़ भाषाई दुश्चिंताओं के साये में, उनकी सारे देश की आम जनता के साथ, अन्य वास्तविक जीवनीय जरूरतों, तकलीफ़ों, समस्याओं की एकरसता को भुला दे रहे हैं।

मित्र इस तरह के गांव के चोरों के साथ नफ़रत कीजिए, आप उनके साथ गांववालों से नफ़रत करने की क्यों सोच रहे हैं। सिर्फ़ बाहरी चोरों से की जा रही लड़ाई के दौरान जब इस तरह की परिस्थितियां पैदा होती हैं कि अंदरुनी चोर लड़ाई को इस तरह का मोड़ दे रहे होते हैं, तो अब आप शायद समझ सकें कि किस तरह इन अंदरुनी चोरों के चक्करों में हम अपनी ही मूल लड़ाई को भुलाकर, बाहरी चोरों और अंदरुनी चोरों को छोडकर, अपनी लड़ाई को अपने ही लोगों, अपने ही गांववालों की तरफ़ किस तरह मोड़ दे सकते हैं। अब ऐसी अवस्थाओं में अंदरुनी और बाहरी चोरों द्वारा मिलकर, हम जैसे लोगों को ठिकाने लगाना और किस तरह आसान हो जाता है।

दस करोड़ लोगों के चलते हम भारत के 80-90 करोड़ लोगों को ऐसे ही सताते रहें और अभी कई दशकों तक इतनी विशाल आबादी से खिलवाड़ करते रहें...?

सही है, आपकी चिंता जायज़ है। आपको इन दस करोड़ लोगों के चलते बाकी ८०-९० करोड़ लोगों से खिलवाड़ की चिंता सता रही है। और हम लगभग इतने ही यानि दस करोड़ उच्च मध्यमवर्गियों, अमीरों, पूंजीपतियों और राजनीतिकों के चलते, देश की बाकी संपूर्ण १००-११० करोड़ जनता की विशाल आबादी का बर्बादे-हाल देख रहे हैं, और इसकी चिंता करना चाहते हैं। और यह भी क्या खूब है कि हमें सिर्फ़ चिंताएं ही तो करनी है, जहां मन हो, मुफ़ीद लग रहा हो वहां करली। :-)



इस बार इतना ही।

आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

भाषाई श्रेष्ठता का सवाल

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



भाषाई श्रेष्ठता का सवाल

कम्प्यूटर की भाषा पर।....लेकिन जो कहा वही है कि भाषा का असर कम्प्यूटर पर पड़ता है। संस्कृत का असर नेट पर हिन्दी आदि से बहुत अधिक है

हमारा मंतव्य और स्पष्ट करते हैं। यह तो वास्तविकता है ही कि कंप्यूटर का विकास किसी भाषा-विशेष को ध्यान में रखकर तो हुआ नहीं है। अब यह संयोग दीगर है कि किसी भाषा-विशेष से इसकी समरसता अधिक बैठती है या किसी से कम। इसका उल्टा पक्ष भी देखिए कि यदि संस्कृत या हिंदी, कंप्यूटर के साथ संगत बेहतरी से नहीं बैठा पा रही होती तो क्या हीन मानकर इन्हें छोड़ दिया जाना चाहिए? हिंदी ही क्यों, कोई और भाषा ही हो। जो जिस भाषा को बोलता है, उसको अधिकार है कि वह अपनी मातृभाषा का इस्तेमाल करे, उसको कठिनाई से ही सही नई तकनीक के साथ हमसाया करे।

यहां भी हम एक बार फिर वही कहना चाहेंगे कि श्रेष्ठता बोध ढूंढना ठीक नहीं लगता। हर मानवसमाज की भाषा उसके विकास, समाज, संस्कृति, परंपराओं, अनुभवों आदि-आदि का परावर्तन होती है। उसको उसकी मातृभाषा से मरहूम कर देना, उसकी सकारात्मक विरासत से उन्हें मरहूम कर देना है। उनका साम्राज्यवादी अनुकूलन कर देना है। ऐसा लगता है।

श्रेष्ठता साबित करने की बात होनी ही नहीं चाहिए, भले ही कोई श्रेष्ठ नहीं हो तो क्या उसका दमन कर दिया जाएगा, उसे खत्म कर दिया जाना चाहिए? श्रेष्ठतर की उत्तरजीविता के प्राकृतिक उपक्रम को, मनुष्य जाति पर जंगली रूप में थोपना क्या मानवोचित है। मनुष्य, प्रकृति की खिलाफ़त में मनुष्य बना है और क्या इसीलिए मानवीयता के, इस प्राकृतिकता से हटकर अलग मायने, अलग मूल्य नहीं होने चाहिए ?

लेकिन अंग्रेजी के मामले में एक नफ़रत सी होती है और यहाँ समझौता नहीं करना चाहता....क्या यह सब देख-सुनकर गुस्सा नहीं आना चाहिए....जो बार बार सवाल करते हैं या भारतीय भाषाओं का मजाक उड़ाते हुए अंग्रेजी का समर्थन करते हैं। बार बार हिन्दी का अपमान या उसे कमजोर-छोटी भाषा कहने वालों के लिए.....कुछ कहा नहीं जाना चाहिए? यहाँ कुछ कहिए।

बाद में कभी इस पर वस्तुपरकता से बाते कर ली जाएंगी।

हालांकि यदि कोई किसी भी तरह का अनर्गल प्रलाप करता है तो उसका उचित और तार्किक जवाब प्रस्तुत किया जाना भी आवश्यक है। यदि आपको लगता है कि हिंदी के प्रति अपमान का भाव फैलाया जा रहा है या उसकी उपयोगिता के संदर्भ में गैरवाज़िब तर्क फैलाए जा रहे हैं, जो कि किसी हद तक सही भी है, तो इस तरह का कहना प्रासंगिक भी है।

इस पर बाद में बात करेंगे, हमारा उद्देश्य अपने आप में वह निर्लिप्तता पैदा करना है जब हम चीज़ों को वस्तुगत रूप से समझना सीख सकें, और यदि जरूरी भी हो तो सचेत रूप से, अंदर से किसी आत्मपरक भावना से विरत रहकर भी, अपनी बात को तार्किक रूप से रख सकें। तभी हमारी बात अधिक तार्किक, निष्पक्ष और प्रभावी बन उठती है।

एक अस्त्र बहिष्कार है। यद्यपि इसे राजीव दीक्षित से सुना है लेकिन यह फिलहाल या इस लोकतंत्र में बड़े काम का मालूम पड़ता है। जैसे अंग्रेजी से बहिष्कार का काम अंग्रेजी अखबारों, अंग्रेजी व्याख्यानों, अंग्रेजी समाचार, अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों का बहिष्कार करके बहुत हद तक किया जा सकता है और इसकी सम्भावना भी लगती है।

ऊपर की बात के संदर्भ में ही इसे भी समझा जा सकता है। अंग्रेजी का बहिष्कार, बिना किसी वैकल्पिक आसरे के तो और मुश्किल पैदा कर देगा। अंग्रेजी इसलिए नहीं चल रही है कि यह श्रेष्ठ है या बेहतर है। यह इसलिए चल रही है कि यह सत्ता की भाषा है। अंग्रेजों के जमाने से ही, और हमारे हुक्मरानों ने आज़ादी के बाद भी इसे अपने लिए मुफ़ीद पाकर इसे बचाए और बनाए रखा। अभी इस पर ज़्यादा नहीं कहेंगे, पर यह तो कहा ही जा सकता है कि जबकि अभी सारी महत्त्वपूर्ण नौकरियां, व्यवसाय, सत्ता के विभिन्न उपागम इसी के ज़रिए पाए जा सकते हैं और पाये जा रहे हैं तो लोग उसे अपनाने को मजबूर होंगे ही। बेहतर जीवनयापन की सारी परिस्थितियां इस अंग्रेजी से जुड गई हैं, उसके साथ नाभिनालबद्ध हैं। कुलमिलाकर लाबलुब्बोआब यह है कि कोई भी भाषा परवान नहीं चढ़ सकती यदि वह सत्ता की भाषा नहीं बनती, यदि वह रोजगार देने में सक्षम नहीं है। और इसीलिए यह भी राजसत्ता से जुड़ा मामला हो जाता है।

"सभी क्षेत्रों में अन्य भाषाओं को तो छह महीने में लाया जा सकता है। बस, राजनैतिक  इच्छा शक्ति और षडयंत्र जैसे कारक बाधा डालते हैं।"...."कुछ अच्छी मांगे जिनसे देश के लोगों को मूलभूत सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हो पातीं, ऐसा कुछ करते। नहीं किया इन्होंने।"

तो क्या हमें इतना मासूम होना चाहिए कि हम यह भी नहीं समझ सकें कि सत्ता-पूंजी का गठजोड़ इतनी आसानी से अपने हितों के अनुकूल बनाई हुई परिस्थितियों को बिना किसी प्रतिरोध के अपने हाथ से निकलने देगा और ख़ुद अपने लिए खाई खोदने का कार्य करेगा।

सत्ता-पूंजी का गठजोड़, अपने हितसाधक राज्य के जन कल्याणकारी चरित्र को उतना ही वास्तविक बनाने के लिए मजबूर होता है, जितना की अपनी यथास्थिति बनाए रखने और संसदीय लोकतंत्र में अपनी चुनावी राजनीति के लिए आवश्यक समझता है। इसी हेतु यह गठ-जोड़ सभी तरह के राजनैतिक-खेलों, ड्रामों और षड़यंत्रों और यदि इनसे भी काम नहीं चल रहा हो, तो तानाशाही दमन के रास्ते अख्तियार करता है।



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