शनिवार, 13 सितंबर 2014

कारण और कार्य - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘कार्य-कारण संबंध’ के प्रवर्गों पर चर्चा को आगे बढ़ाया था, इस बार हम उसका समापन करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
कारण और कार्य - ३
( Cause and Effect ) - 3

जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, कार्य-कारण संबंध की एक लाक्षणिक विशेषता यह है कि कारण और कार्य आपस में स्थान-परिवर्तन कर सकते हैं। कोई घटना, जो एक स्थिति में किसी कारण का परिणाम है, किसी दूसरी स्थिति या काल में एक कारण भी हो सकती है। मसलन, वर्षा निश्चित मौसमी दशाओं का परिणाम होने के साथ ही अच्छी फ़सल का कारण भी हो सकती है और अच्छी फ़सल ख़ुद अर्थव्यवस्था में सुधार का कारण हो सकती है, आदि, आदि।

सारी घटनाओं के, मुख्यतः पेचीदा ( complicated ) घटनाओं के कई कारण होते हैं। लेकिन कारणों के महत्त्व में अंतर होता है। कारण बुनियादी ( basic ), निर्णायक हो सकते हैं या ग़ैर-बुनियादी, सामान्य हो सकते हैं या प्रत्यक्ष। बुनियादी कारणों को अन्य सारे कारणों में से यह ध्यान में रखते हुए खोज निकालना महत्त्वपूर्ण है कि वे आम तौर पर भीतरी होते हैं। वैज्ञानिक संज्ञान ( scientific cognition ) तथा परिवर्तनकामी व्यवहार के लिए उनकी निश्चित जानकारी का बहुत महत्त्व है।

कार्य-कारण संबंधों में एक और बात की जानकारी आवश्यक है, वह इस प्रेक्षण से संबंधित है कि एक ही कारण हर बार एक ही निश्चित कार्य को उत्पन्न कर पाये यह जरूरी नहीं होता। एक कारण कार्य को उत्पन्न कर सके इसके लिए कुछ निश्चित पूर्वापेक्षाएं ( prerequisites ), कुछ निश्चित परिस्थितियों का संयोग आवश्यक हो सकता है, जिन्हें पूर्वावस्थाएं ( preconditions ) कहा जाता है। "कारण" और "कार्य" के प्रवर्ग, "पूर्वावस्था" के साथ घनिष्ठता से संबंधित हैं। पूर्वावस्था, विविध भौतिक घटनाओं और प्रक्रियाओं का ऐसा समुच्चय होती है, जिसके बिना एक कारण, कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकता है। किंतु इसके बावजूद पूर्वावस्थाएं कार्य की उत्पत्ति में सक्रिय ( active ) और निर्णायक ) decisive ) नहीं होती हैं। पूर्वावस्थाओं, कारणों और कार्यों के अंतर्संयोजनों ( interconnections ) की समझ घटनाओं के सही-सही मूल्यांकन ( evaluation ) के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण है।

प्रकृति में हर चीज़ प्राकृतिक, वस्तुगत नियमों के अनुसार और ख़ास तौर से घटनाओं की कारणात्मक निर्भरता ( causal dependence ) के अनुसार चलती है। प्रयोजन ( goal, purpose ) केवल वहीं पर उत्पन्न होता है, जहां मनुष्य जैसा बुद्धिमान प्राणी काम करना शुरू करता है, यानी सामाजिक विकास के दौरान। परंतु यद्यपि लोग अपने लिए विभिन्न लक्ष्य नियत करते हैं, तथापि इससे सामाजिक विकास की वस्तुगत, कारणात्मक तथा नियमबद्ध प्रकृति का निराकरण ( obviate ) नहीं हो सकता। हम कार्य-कारण संबंध की सटीक जानकारियों के उपयोग से अपने इच्छित लक्ष्यों की प्राप्ति के पूर्वाधारों के निर्माण के प्रयास कर सकते हैं, अपनी सफलताओं की गुंजाइश बढ़ा सकते हैं।

कार्य-कारण संबंध सार्विक हैं। लेकिन वास्तविकता के सारे संयोजन इसी तक सीमित नहीं हैं, क्योंकि यह सार्विक संयोजनों का एक छोटा अंश मात्र हैं। विश्व में कारणात्मक संबंधों के जटिल जाल ( intricate network ) में आवश्यक और सांयोगिक संयोजन सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। अगली बार हम इन्हीं "आवश्यकता और संयोग" के प्रवर्गों पर चर्चा करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 6 सितंबर 2014

कारण और कार्य - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववादपर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘कार्य-कारण संबंध’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
कारण और कार्य - २
( Cause and Effect ) - 2

कार्य-कारण संबंध के कई मूलभूत लक्षण ( basic features ) होते हैं। सबसे पहले, घटनाओं की कारणात्मक निर्भरता ( causal dependence ) सार्विक है। ऐसी कोई भी घटना या वाक़या नहीं होता है, जिसका कोई कारण न हो। वस्तुओं और घटनाओं के बीच अंतर्संबंधों की अपरिमित श्रृंखला ( infinite chain ) में कारणात्मक संपर्क एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। दूसरे, कारणात्मक संबंध वस्तुगत ( objective ) होता है, यानी यह भौतिक जगत की घटनाओं के अंदर निहित होता है। इसका मुख्य लक्षण यह है कि निश्चित दशाओं के अंतर्गत, एक निश्चित कारण अनिवार्यतः एक निश्चित कार्य तक पहुंचायेगा। मसलन, लोहे के टुकड़े को गर्म करने पर वह निश्चय ही फैलेगा, लेकिन स्वर्ण में परिवर्तित नहीं होगा। यदि अन्न का एक दाना उपयुक्त मिट्टी पर गिरता है, तो समुचित दशाओं ( appropriate conditions ) के अंतर्गत वह उस अन्न के पौधे को तो निश्चय ही जन्म देगा, लेकिन किसी अन्य पौधे को नहीं।

कार्य-कारण संबंध का एक अन्य प्रमुख लक्षण इसकी अनम्य कालक्रमिकता ( strict sequence in time ) है। यानी जो घटना कारण बनती है, वह उसके कार्य से हमेशा पहले होती है और वह कार्य उस घटना से पहले या उसके साथ-साथ कभी भी नहीं हो सकता है, लेकिन कुछ समय बाद होता है। किसी घटना को किसी कार्य का कारण मानने के लिए कालक्रम में पूर्ववर्तिता आवश्यक तो है, लेकिन एक अपर्याप्त ( inadequate ) शर्त है। किसी घटना से पहले होने वाली हर चीज़ उस घटना का कारण नहीं होती, केवल वे ही पूर्ववर्ती घटनाएं कारण हो सकती हैं जो कार्य के साथ संपर्क ( contact ) और संबद्धता ( association ) में हो, और जिनके पास उस कार्य को उत्पन्न करने के समुचित पूर्वाधार और नियमितताएं मौज़ूद हों।

जब विज्ञान अपर्याप्त रूप से विकसित था और वैज्ञानिक ज्ञान अधिकांश लोगों की पहुंच से बाहर था, तब वे कालक्रम और कारणात्मक संबंध को स्पष्टतः समझने में अक्सर असफल हो जाते थे और फलतः कई असंबद्ध कारणात्मक धारणाएं प्रचलित हो जाती थीं। यह उन अंधविश्वासों तथा पूर्वधारणाओं का एक उद्‍गम ( source ) था, जिनके अवशेष किसी न किसी रूप में आज भी विद्यमान हैं। आज भी समुचित वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव, इस तरह की कई भ्रांतियां पैदा करता है और लोगों द्वारा ऐसी भ्रांतियों को मानने तथा मानते रहने के आधार पैदा करता है, जहां कि सिर्फ़ कालक्रम के आधार पर किन्हीं पूर्ववर्ती असंबद्ध घटनाओं या परिस्थितियों को प्रदत्त घटनाओं का कारण समझ लिया जाता है।

कारणात्मक संबंध पर विचार करते समय यह ध्यान में रखना चाहिये कि कारण बाहरी भी हो सकते हैं और भीतरी भी। किसी वस्तु के परिवर्तन के भीतरी कारण उसके पक्षों की एक अंतर्क्रिया ( interaction ) होने के सबब से उस वस्तु के अपने स्वभाव में ही बद्धमूल ( rooted ) होते हैं। भीतरी कारण बाहरी कारणों से अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। यह हम अंतर्विरोधों ( contradictions ) की विवेचना के अंतर्गत भली-भांति देख ही चुके हैं।

किसी बाहरी कारण से उत्पन्न कार्य, कारण तथा उस घटना के बीच अंतर्क्रिया का परिणाम होता है, जिस पर कारण की क्रिया होती है। फलतः एक ही कारण विभिन्न कार्यों को उत्पन्न कर सकता है। मसलन, एक ही समय में धूप के कारण बर्फ़ पिघलती है, पौधों में कार्बन डाइआक्साइड का स्वांगीकरण ( assimilation ) व वृद्धि होती है, किसी आदमी की त्वचा का रंग गहरा हो जाता है और उसके शरीर में जटिल शारीरिक क्रियाएं होती हैं। ऐसा भी हो सकता है कि भिन्न-भिन्न कारणों का फल एक ही कार्य हो। मसलन, ख़राब फ़सल सूखे का परिणाम हो सकती है या खेती की त्रुटिपूर्ण विधियों का, यथा, फ़सलों का ग़लत हेरफेर, बीजों का अच्छा न होना, ग़लत समय में बोआई करना, आदि, या ये सभी या कुछ एक साथ भी। अतः किसी एक घटना का कारण या तो विभिन्न वस्तुओं की अंतर्क्रिया या एक ही वस्तु के विभिन्न पक्षों की आपसी अंतर्क्रिया, अथवा ये दोनों साथ-साथ भी हो सकते हैं, यानी बाहरी और भीतरी कारकों का सम्मेल ( combination ) हो सकता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 30 अगस्त 2014

कारण और कार्य - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववादपर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘आभास और सार’ पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘कार्य-कारण संबंध’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
कारण और कार्य - १
( Cause and Effect ) - 1

हम यह भली-भांति जानते हैं कि विश्व निरंतर गतिमान है और इसमें निरंतर घटनाएं घटती रहती हैं, कई प्रक्रियाएं चलती रहती हैं। हमारे प्रेक्षण हमें यह भी स्पष्टतः दिखाते हैं कि प्रकृति, समाज और चिंतन की सारी घटनाएं या प्रक्रियाएं, किन्हीं अन्य घटनाओं या प्रक्रियाओं की वज़ह से या उनके द्वारा उत्पन्न और विनियमित ( governed ) होती हैं। जो पहली घटना, दूसरी को जन्म देती है, उसे दूसरी घटना का कारण ( cause ) कहा जाता है। एक घटना ( प्रक्रिया ) को उस हालत में, दूसरी घटना ( प्रक्रिया ) का कारण कहते हैं, जब ( १ ) पहली, काल में दूसरी की पूर्ववर्ती ( preceding ) हो ; ( २ ) और जब पहली, दूसरी की उत्पत्ति ( rise ), परिवर्तन ( change ) या विकास ( development ) के लिए एक आवश्यक पूर्वावस्था ( precondition ) या आधार ( basis ) हो। जो किसी घटना को उत्पन्न करता है, वह उस घटना का कारण कहलाता है। किसी एक घटना की उत्पत्ति, उसकी अवस्था में परिवर्तन तथा उसका विलोपन ( elimination ), कारण पर निर्भर होता है। कारण की संक्रिया ( operation ) का परिणाम कार्य ( effect ) कहलाता है।

विश्व में कारणहीन कुछ नहीं होता। सारी घटनाएं निश्चित कारणों का परिणाम होती हैं। किसी एक घटना के कारण का पता लगाना उसके संज्ञान ( cognition ) का एक प्रमुख तत्व है। कार्य-कारण संबंध ( cause-and-effect connection ) एक प्रकार का सार्विक ( universal ) संबंध है, अर्थात संबंध का एक ऐसा प्रकार है, जिसके अंतर्गत एक घटना या परिस्थिति, अन्य को स्वयं पर आश्रित करती है अथवा उसे उत्पन्न ( engender ) करती है। कारण और कार्य वस्तुगत ( objective ) हैं। उनके बीच संबंध को कारणता संबंध ( causal connections ) कहते हैं। दार्शनिक प्रवर्ग "कारण" और "कार्य" वस्तुगत कारणता संबंधों को परावर्तित करते हैं, जिनका सार्विक महत्त्व है और जो भूतद्रव्य ( matter ) की गति के सारे रूपों में विद्यमान होते हैं। कार्य-कारण संबंध की खोज से विज्ञान की शुरुआत होती है। इन संबंधों का अध्ययन प्राकृतिक, तकनीकी और सामाजिक विज्ञानों का एक महत्त्वपूर्ण काम है।

१८वीं सदी में विज्ञान जगत में ज्ञान की तत्कालीन सीमाओं के अंतर्गत कई अजीब धारणाएं प्रचलित थी। जैसे कि पिण्ड दहनशील ( combustible ) इसलिए होते हैं कि उनमें फ़्लोजिस्टोन नामक द्रव्य पाया जाता है। फ़्लोजिस्टोन हमेशा दहन का कारण है और दहन हमेशा फ़्लोजिस्टोन का कार्य ( परिणाम ) है। इस दृष्टि से फ़्लोजिस्टोन दहन का कार्य नहीं हो सकता, और दहन फ़्लोजिस्टोन का कारण नहीं हो सकता। इसी तरह, लगभग उसी काल में यह धारणा भी प्रचलित हुई कि पिण्डों ( bodies ) के तपने की वजह उनमें तापजनक नामक एक भारहीन पदार्थ का होना है। यह माना जाता था कि तापजनक सदैव तापीय परिघटनाओं ( thermal phenomena ) का कारण और तापीय परिघटनाएं सदैव तापजनक का कार्य हैं। उस काल में सभी ज्ञात विद्युतीय ( electrical ) परिघटनाओं को कुछ विशिष्ट अदृश्य विद्युतीय द्रवों ( liquids ) की क्रिया का परिणाम माना जाता था और सोचा जाता था कि इन द्रवों के कुछ पिण्डों से दूसरे पिण्डों में बहने से ही विद्युत पैदा होती है। तत्कालीन धारणाओं के अनुसार ये विद्युतीय द्रव सदैव विद्युतीय परिघटनाओं के कारण थे और विद्युतीय परिघटनाएं सदैव इन द्रवों का कार्य।

तापीय, विद्युतीय और अन्य परिघटनाओं की ऐसी समझ के आधारों पर ही कारण और कार्य की तत्कालीन समझ पैदा हुई, जिसके अनुसार यदि वस्तु ‘क’ वस्तु ‘ख’ का कारण है, तो यह असंभव है कि वस्तु ‘क’ वस्तु ‘ख’ का कार्य हो। यानी कि कुछ घटनाएं हमेशा अन्य का कारण और अन्य उनके केवल कार्य ( परिणाम ) होती है, अर्थात उनके बीच के संबंध और स्थान अपरिवर्तनीय ( unchangeable ) होते हैं। इस तरह इस द्वंद्ववादविरोधी तत्वमीमांसीय दृष्टिकोण का सार यह था कि एक ही वस्तु में दो विलोम ( यानी कारण और कार्य ) नहीं हो सकते। किंतु ज्ञान के आगे के विकास ने कारण और कार्य के प्रवर्गों ( categories ) की इस तत्वमीमांसीय समझ को भ्रामक ( misleading ) ठहराया। उसने दिखाया कि विश्व तैयार वस्तुओं का जमघट नहीं, अपितु प्रक्रियाओं, संबंधों और संपर्कों की समष्टि है।

आज हम जानते हैं कि पनबिजलीघर में जो बिजली पैदा की जाती है उसका कारण जलधारा की यांत्रिक गति है। जब कोई मशीन, जैसे कि लेथ चालू की जाती है, तो बिजली की धारा उसकी यांत्रिक गति का कारण बनती है। पहले दृष्टांत ( illustration ) में बिजली की धारा यांत्रिक गति का कार्य है और दूसरे दृष्टांत में यही धारा यांत्रिक गति का कारण है। भौतिकवादी द्वंद्ववाद, मानवजाति के अनुभव व ऐतिहासिक व्यवहार तथा विज्ञान की ऐसी उपलब्धियों पर आधारित होने की वजह से यह दर्शाता है कि कोई एक घटना ( मसलन, वर्षा के बादलों में आर्द्रता का संचयन ) जो किसी अन्य घटना का परिणाम है और स्वयं भी एक अन्य घटना ( वर्षा ) का कारण हो सकती है। इस अर्थ में यह कहा जा सकता है कि वस्तुतः कार्य और कारण स्थान परिवर्तन करते हैं ; जो एक समय पर किसी घटना का कार्य है, वह अगले क्षण पर दूसरी घटना का कारण हो सकता है।

यदि कारण-कार्य श्रृंखला की कड़ियों को प्रक्रियाओं ( processes ) के रूप में देखा जाए, तो पता चलेगा कि जब एक प्रक्रिया ‘क’, प्रक्रिया ‘ख’ पर प्रभाव डालकर उसमें परिवर्तन लाती है, तो अपनी बारी में प्रक्रिया ‘ख’ भी प्रक्रिया ‘क’ पर प्रभाव डालकर उसमें परिवर्तन लाती है। इसलिए हर प्रक्रिया दूसरी प्रक्रिया को प्रभावित करते हुए स्वयं भी प्रभावित होती है। इसका अर्थ यह है कि प्रकृति और समाज में भी, संबंध अन्योन्यक्रियाएं ( mutual actions ) हैं तथा एक ही वस्तु या प्रक्रिया में दो विलोम ( कारण और कार्य ) होते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 23 अगस्त 2014

आभास और सार - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘आभास और सार’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
आभास और सार - २
( Appearance and Essence ) - 2

स्वयं यथार्थता ( reality ) में सार और आभास अलग-अलग अस्तित्वमान ( existing ) नहीं होते। कहा गया है कि सार आभासित होता है और आभास सारभूत है। इसका मतलब यह हुआ कि आंतरिक, छुपा हुआ पक्ष हमेशा बाह्य के ज़रिये खोजा जाता है, प्रेक्षण के लिए सुलभ होता है, जबकि बाह्य, आंतरिक से संचालित होता है और उसका कारण उसी में निहित होता है। साथ ही प्रवर्ग "सार" और "आभास" संज्ञान ( cognition ) की अवस्थाओं के संपर्क और निर्भरता को व्यक्त करते हैं। आभास मानवीय संवेद अंगों पर प्रत्यक्ष ( direct ) प्रभाव डालता है और उनके द्वारा परावर्तित होता है अतएव आभास का संज्ञान, संवेदनात्मक ज्ञान ( sensory knowledge ) और जीवित अनुध्यान ( live contemplation ) से होता है। परंतु सार वस्तुओं, प्रक्रियाओं या उनके संबंधों की सतह ( surface ) पर कभी प्रकट नहीं होता, बल्कि विषयी के लिए आभास की आड़ में छिपा होता है और इस तरह से संवेदात्मक अवबोधन के लिए अलभ्य ( unavailable ) होता है। यही कारण है कि सार को संकल्पनाओं ( concepts ) तथा निर्णयों ( judgments ) के ज़रिये अमूर्त चिंतन ( abstract thinking ) की अवस्था में खोजा और समझा जाता है। संज्ञान हमेशा आभास से सार की ओर, वस्तुओं के बाह्य पक्ष से उनके बुनियादी नियमबद्ध संपर्कों की ओर जाता है।

इस विश्व की कोई भी चीज़, सार और आभास की एकता होती है। यह एकता इस तथ्य में व्यक्त होती है कि पहला, वे एक ही वस्तु के दो पक्ष हैं और उन्हें केवल मन ही मन में पृथक ( separate ) किया जा सकता है। दूसरा, उनकी एकता इस तथ्य में प्रकट होती है कि विकास की वास्तविक प्रक्रिया में वे एक दूसरे में रूपांतरित ( transformed ) हो जाते हैं। तीसरा, सार और आभास की एकता उनके परिवर्तन की वस्तुगत अंतर्निर्भरता ( interdependence ) में प्रकट होती है। विकास के दौरान सार में होनेवाला कोई भी परिवर्तन अवश्यंभाव्यतः ( inevitably ) आभास को और विलोमतः आभास में परिवर्तन, सार को बदल देता है। लेकिन सार और आभास की एकता सापेक्ष ( relative ) है और इसका तात्पर्य है उनमें भेद और उनकी प्रतिपक्षता ( oppositeness ) भी। सार और आभास के बीच अंतर्विरोध इस बात में मुख्यतः व्यक्त होता है कि वे पूर्णतः मेल नहीं खाते हैं, क्योंकि वे एक वस्तु के अलग-अलग पक्षों को परावर्तित करते हैं। यदि वस्तुओं का सार उनकी अभिव्यक्तियों से पूर्णतः मेल खाता, तो संज्ञान इतनी लंबी और जटिल प्रक्रिया न होता और विज्ञान अनावश्यक हो जाता।

दर्शन की प्रत्ययवादी ( idealistic ) धाराएं दावा करती हैं कि हम केवल आभास को ही जान सकते हैं, यानि संवेद अंगों के ज़रिये यह जान सकते हैं कि चीज़ें हमें कैसी आभासित होती हैं। हम वस्तुओं के सार को नहीं जान सकते ( जिसे कि जैसे कांट ने "वस्तु निज रूप" कहा था )। इस तरह कहा जाता है कि "वस्तु निज रूप" ( thing-in-itself ) अज्ञेय ( unknowable ) है। परंतु इससे एक अंतर्विरोधी प्रश्न पैदा होता है कि अगर उसका संज्ञान पाना असंभव है, तो यह कैसे कहा जा सकता है "वस्तु निज रूप" वस्तुगत रूप से विद्यमान है। इसके समाधान के लिए प्रत्ययवाद आस्था का, संवेदनात्मक ज्ञान से परे खड़ी किसी सर्वोच्च तर्कबुद्धि ( supreme reason ) का सहारा लेने की कोशिश करता है और कहता है कि हम "निज रूप वस्तुओं" के अस्तित्व को इसलिए जानते हैं कि हम उन पर विश्वास करते हैं। इस तरह आभास और सार के बीच एक अपारगम्य खाई ( impassable gulf ) बना दी जाती है।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद का संज्ञान सिद्धांत, आधुनिक विज्ञान तथा अनुभव पर आधारित होने की वजह से, यह मानता है कि अज्ञेय "निज रूप वस्तुओं" का अस्तित्व नहीं होता है। यह विश्व और इसकी घटनाएं ज्ञेय हैं। केवल ऐसी विविध वस्तुओं, घटनाओं और प्रक्रियाओं का अस्तित्व होता है जिनका संज्ञान किया जा सकता है, और जो पूर्णतः ज्ञेय नहीं हैं उन्हें उस हद तक जाना जा सकता है, जिस हद तक हमारे व्यावहारिक और संज्ञानात्मक क्रियाकलाप गहन और विस्तृत होते हैं। संज्ञान के दौरान हम लगातार आभास से सार की ओर, किन्हीं सापेक्ष सत्यों से अन्य अधिक गहरे सत्यों की ओर जाते हैं, व्यवहार में उन्हें निरंतर परखते हैं और ग़लत व असत्य निर्णयों को निर्ममता से ( ruthlessly ) ठुकरा देते हैं।

वास्तविक जगत की वस्तुएं तथा घटनाएं अकेली-दुकेली नहीं होती, बल्कि अंतर्संबंधों के साथ अस्तित्व में होती हैं और उन अंतर्संबंधों के बाहर उनमें से किसी को भी समझना असंभव है। किसी वस्तु का अन्य के साथ अंतर्संबंध में अध्ययन करने का अर्थ है उसकी उत्पत्ति के कारण का पता लगाना, इसलिए अगली बार हम कार्य-कारण संबंध के प्रवर्गों पर विचार करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 16 अगस्त 2014

आभास और सार - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अंतर्वस्तु और रूप’ पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘आभास और सार’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
आभास और सार - १
( Appearance and Essence ) - 1

जब हम एक सेब की जांच करते हैं, उसे सूंघते, महसूस करते हैं तथा उसका स्वाद लेते हैं, तो हमें अनेक संवेदन ( sensations ) प्राप्त होते हैं, जिनसे हम एक निश्चित संवेदात्मक बिंब ( sense image ) की रचना करते हैं। हमारे संवेदनों द्वारा हमें प्राप्त वस्तुगत चीज़ को उसका आभास ( appearance ) कहते हैं। आभास में हमारे गिर्द ( around ) विद्यमान वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं के वस्तुगत गुणों ( objective properties ) बारे में सूचना निहित होती है। हमें वस्तु जो कुछ जान पड़ती है, हमारे सामने जैसी वह प्रकट होती है, यह केवल उसके वस्तुगत लक्षणों पर ही नहीं, बल्कि हमारे संवेद अंगों की संरचना, तंत्रिकातंत्र ( मस्तिष्क सहित ) और अंत में हमारे व्यावहारिक क्रियाकलाप ( practical activity ) पर भी निर्भर होती है।

एक सेब को देखने पर हम पाते हैं कि यह लाल और गोलाकार है। यह वस्तुतः उसकी पहली श्रेणी का आभास है। जब हम सेब की एक फांक को काटकर उसे सूक्ष्मदर्शी के तले देखते हैं, तो हमें उसकी कोशिकीय संरचना नज़र आती है, यह द्वितीय श्रेणी का आभास है। अनुक्रमिक ( sequential ) रूप से एक्स-रे उपकरण तथा इलैक्ट्रोनिक सूक्ष्मदर्शी, आदि का उपयोग करने पर हम सेब की कोशिकाओं की आंतरिक संरचना तथा उसके अंदर जारी आणविक प्रक्रियाओं ( molecular processes ) को होते देखते हैं। इसे तीसरी, चौथी, अदि श्रेणियों का आभास कहा जा सकता है। फलतः प्रवर्ग "आभास" हमारे गिर्द वस्तुओं तथा प्रक्रियाओं के वस्तुगत बाह्य पक्ष ( objective external aspect ) को परावर्तित करता है, जिससे हमें अपने व्यावहारिक ( practical ) तथा प्रायोगिक क्रियाकलाप ( experimental activity ) में सामना पड़ता है। आभास बाह्य लक्षणों का, अनुगुणों तथा वस्तुओं के अंदर या उनके मध्य संबंधों का साकल्य है, वह रूप है, जिसमें सार अपने को प्रकट करता है। हम इस बाह्य, दिखावटी पक्ष का सीधे या उपकरणों व औज़ारों के ज़रिये अनुबोध ( perceive ) प्राप्त करते हैं।

किंतु प्रवर्ग ‘सार’ ( essence ) किसको परावर्तित करता है? उपरोक्त उदाहरण को ही देखते हैं। हम अलग-अलग विशेषताओं, मसलन सेब के रंग, आकृति तथा आकार के बारे में दृष्टि संवेदनों की प्राप्ति से जानकारी हासिल करते हैं। ये लक्षण इसे अन्य वस्तुओं से विभेदित करते हैं। बाद में हम इस जाति के सारे फलों के लिए लाक्षणिक उसकी कोशिकीय संरचना के बारे में जानते हैं। कुछ और आगे बढ़ने पर हम कोशिकाओं में होनेवाली उन भौतिक तथा रासायनिक प्रक्रियाओं के बारे में धारणा बनाते हैं, जो केवल पौधों की ही नहीं, बल्कि सामान्यतः जीवित अंगियों ( living organism ) की विशेषता भी है। सेब की आंतरिक संरचना में और गहरे पैठ कर हमें उन अधिकाधिक स्थायी ( stable ), आवश्यक संयोजनों ( necessary connections ) की जानकारी मिलती है, जो फल की इस जाति की वृद्धि ( growth ), विकास प्रक्रियाओं का संनियमन ( governing ) करते हैं।

दूसरे शब्दों में, पहली श्रेणी के आभास से दूसरी व अन्य श्रेणियों के आभास की तरफ़ चलते हुए तथा आभास या परिघटना ( phenomena ) की आंतरिक संरचना को जानकर हम उनकी वस्तुगत नियमितताओं ( objectives patterns ) का पता लगा सकते हैं। ये नियमितताएं ही उनके सार की रचना करते हैं। फलतः प्रवर्ग "सार" उन आंतरिक ( inner ), गहन अनुगुणों ( deep properties ) और संयोजनों ( connections ) को परावर्तित करता है, जो अध्ययनशील वस्तुओं और प्रक्रियाओं की कार्यात्मकता ( functioning ) तथा विकास का नियमन करते हैं। सार एक घटना या घटनाओं की आंतरिक नियमितताओं की समग्रता ( aggregate ) को परावर्तित ( reflect ) करता है। इस तरह हम देखते हैं कि प्रवर्ग "सार" तथा "नियम" ( law ) एक ही श्रेणी की संकल्पनाएं ( concepts ) हैं। जटिल सामाजिक घटनाओं के अध्ययन के समय इसे याद रखना विशेष महत्त्वपूर्ण है। विज्ञान और क्रांतिकारी व्यवहार के लिए घटना के सार को समझना बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है।

जैसा कि हम देखते हैं, आभास और सार की संकल्पनाएं वस्तुओं और प्रक्रियाओं के अंतर्संबधित पक्षों ( interrelated aspects )  को द्वंद्वात्मकतः परावर्तित करती हैं इसीलिए इनके बीच कोई सुस्पष्ट विभाजक रेखा नहीं होती है। जो चीज़ आज नहीं देखी जा सकती है और जो किसी वस्तु का सार है, वह कल प्रेक्षण ( observation ) के दायरे में आ सकती है और आभास में परिणत ( resulted ) हो सकती है। प्रवर्ग "आभास" और "सार" एक तरफ़ से अंतर्विरोधी ( contradictory ) प्रतीत होते हैं, क्योंकि उनमें से एक प्रवर्ग बाह्य पक्ष को जो कि अधिक परिवर्तनशील है तथा दूसरा प्रवर्ग आंतरिक पक्ष को जो कि अधिक स्थायी है, परावर्तित करता है। ये द्वंद्वात्मक रूप से जुड़े हैं और एक दूसरे में संक्रमण ( transition ) करते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 9 अगस्त 2014

अंतर्वस्तु और रूप - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘अंतर्वस्तु और रूप’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अंतर्वस्तु और रूप - २
( Content and Form ) - 2

अंतर्वस्तु और रूप की एकता, अटूट संबंध और अंतर्क्रिया एक सार्विक नियम है। ऐसी एकता इस तथ्य से उपजती है कि पहले, वे एक दूसरे के बग़ैर अस्तित्व में नहीं रह सकते ; अंतर्वस्तु हमेशा एक रूप में आवृत्त ( covered ) होती है और रूप हमेशा किसी अंतर्वस्तु को आवेष्टित ( involved ) करता है। दूसरे, अंतर्वस्तु का अस्तित्व एक निश्चित रूप में ही हो सकता है : कोई भी ठोस रूप हमेशा एक निश्चित अंतर्वस्तु के तदनुरूप ( corresponding ) होता है।

इसके साथ ही अंतर्वस्तु और रूप की एकता हमेशा के लिए अपरिवर्तनीय ( unchangeable ) नहीं होती। यह गत्यात्मक ( dynamic ) और द्वंद्वात्मकतः अंतर्विरोधी ( contradictory ) होती है। वस्तुओं में अंतर्वस्तु और रूप हमेशा अपने विकास के विरोधी ( opposite ) पक्षों या तत्वों की शक्ल में प्रकट होते हैं। चूंकि कोई भी वस्तु सार्विक अंतर्क्रिया की स्थिति में होती है, अतः उसकी अंतर्वस्तु में बदलते रहने की प्रवृत्ति ( tendency ) होती है। इसके विपरीत प्रदत्त वस्तु के अस्तित्व का रूप वस्तु के स्वसंरक्षण ( self-preservation ) तथा स्थायित्व ( sustainability ) की प्रवृत्ति को व्यक्त करता है ; संपर्क और संबंध, वह ढंग, जिसके अनुसार रूप के तत्व संगठित हैं, उतनी जल्दी परिवर्तित नहीं हो सकते, जितनी जल्दी अंतर्वस्तु के घटक पहलू और प्रक्रियाएं बदलती हैं।

रूप अंतर्वस्तु के प्रभाव से उत्पन्न व परिवर्तित होता है, जिससे इसके परिवर्तन में अंतर्वस्तु के परिवर्तन से किंचित पीछे रहने का रुझान ( trend ) हो जाता है। अंतर्वस्तु और रूप के संघर्ष का कारण यही है। उनके बीच अंतर्विरोध ( contradiction ) का विकास और समाधान वस्तुओं के विकास का एक मुख्य स्रोत है, उनके रूपों में परिवर्तनों तथा उनकी अंतर्वस्तु के रूपांतरण ( transformation ) का मुख्य कारण है। वस्तुओं में परिवर्तन उनकी अंतर्वस्तु में परिवर्तनों से प्रारंभ होते हैं, जो अंततः उनके रूप के विकास का निर्धारण ( determination ) करते हैं। यही कारण है कि अंतर्वस्तु और रूप की द्वंद्वात्मक एकता ( dialectical unity ) में अंतर्वस्तु निर्णायक भूमिका ( decisive role ) अदा करती है।

वस्तुओं के विभिन्न पक्षों का, अंतर्वस्तु और रूप में विभाजन भी निरपेक्ष ( irrelative, absolute ) नहीं है : वह, जो एक संदर्भ में अंतर्वस्तु है, दूसरे में रूप बनकर प्रकट होता है और इसका विलोम भी सही है। मसलन, यदि हम एक उत्पादन पद्धति को देखें तो उत्पादन के संबंध उसके रूप हैं, जबकि उत्पादक शक्तियां उसकी अंतर्वस्तु हैं। इसके साथ ही ये ही उत्पादन संबंध, किसी भी सामाजिक-आर्थिक विरचना का आधार होते हैं, अतः इस संदर्भ में ये इस विरचना की अंतर्वस्तु के रूप में प्रकट होते हैं। रूप की सापेक्षता ( relativity ) का मतलब यह है कि यद्यपि यह अंततः अंतर्वस्तु से निर्धारित होता है, तथापि इसके विकास के स्वयं अपने ही नियम भी हैं। इसके फलस्वरूप रूप और अंतर्वस्तु का विकास समकालिक ( simultaneous ) नहीं होता और इससे उनके बीच स्वभावतः एक अंतर्विरोध उत्पन्न हो जाता है। विकास के दौरान एक नयी अंतर्वस्तु कुछ समय तक पुराने रूप को धारण किये रह सकती है। इसी तरह एक ही अंतर्वस्तु विभिन्न रूप भी ग्रहण कर सकती है।

रूप और अंतर्वस्तु की द्वंद्वात्मकता की एक और अभिव्यक्ति ( expression ) यह है कि उनके बीच के अंतर्विरोध अनिवार्यतः बिगड़ते हैं और कुछ दशाओं में टकराव ( clash ) की हद तक पहुंच जाता है। उस हद पर आगे और अधिक विकास केवल तभी हो सकता है, जबकि पुराना रूप नये रूप से प्रतिस्थापित ( replaced ) हो ताकि अंतर्वस्तु और रूप के बीच एक नयी संगति ( consistency ) स्थापित हो जाए। इसके बाद यह चक्र नये सिरे से चालू हो जाता है।

संज्ञान ( cognition ) की प्रक्रिया के लिए भी रूप और अंतर्वस्तु की वस्तुगत द्वंद्वात्मकता बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। चूंकि रूप अंतर्वस्तु से संयोजित ( connected ) और उसकी एक अभिव्यक्ति है, इसलिए संज्ञान को रूप के अवबोधन ( perception ) से आरंभ करके अंतर्वस्तु के उद्‍घाटन ( exposition ) की ओर, और फिर वापस सारी वस्तु की तरफ़ जाना चाहिये और उसके बाद एक उच्चतर स्तर पर रूप के अध्ययन पर पहुंचना और यही सिलसिला जारी रखना चाहिये। सच्चा वैज्ञानिक ज्ञान तभी बनता है, जब संज्ञान अंतर्वस्तु को तथा उसके व रूप के बीच वस्तुगत द्वंद्वात्मकता को उद्‍घाटित ( exposed ) करता है। यथा, जैव प्रकृति का संज्ञान वनस्पति व जीवों की बाहरी विशेषताओं के बारे में ज्ञान के संचय ( collection ) तथा जातियों, वंशों, वर्गों में उनके वर्गीकरण ( classification ) से शुरू हुआ और फिर उनकी अंतर्वस्तु को उद्‍घाटित करने, यानी विशिष्ट अंतरों के आनुवंशिक आधार ( genetic basis ) तथा क्रमविकास ( evolution ) के सर्वाधिक सामान्य नियमों का पता लगाने के लिए अग्रसर हुआ।

वस्तु के विकास में इसके विभिन्न पहलुओं और तत्वों की भूमिका को स्पष्ट करना भी महत्त्वपूर्ण है। सार और आभास के प्रवर्ग से हमें इसे समझने में मदद मिलती है, जिसे हम अगली बार प्रस्तुत करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 2 अगस्त 2014

अंतर्वस्तु और रूप - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्गों के अंतर्गत ‘व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक )’ पर चर्चा की थी, इस बार हम ‘अंतर्वस्तु और रूप’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
अंतर्वस्तु और रूप - १
( Content and Form ) - 1

हमारे गिर्द दुनिया सतत गतिमान है। यह गति अनेक रूपों में होती है। हम अक्सर साहित्यिक व कलात्मक रचनाओं में रूप ( form ) और अंतर्वस्तु ( content ) की, सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यों, सामाजिक प्रतिद्वंद्विता, आदि के रूपों के बारे में चर्चा करते हैं। दैनिक जीवन में हम इन शब्दों के सही-सही वैज्ञानिक अर्थ पर शायद ही कभी विचार करते हैं, लेकिन सैद्धांतिक दार्शनिक मामलों पर विचार करते समय ऐसा करना जरूरी होता है।

रूप और अंतर्वस्तु क्या है? हमारे आसपास की घटनाएं बहुत जटिल हैं, उनके अनगिनत भाग और तत्व होते हैं, जिनके बीच स्थायी संबंध, संयोजन ( connections ) या अंतर्क्रियाएं ( interactions ) होती हैं, जिन्हें संरचनाएं ( structures ) कहा जाता है। किसी भी संरचना का एक बाहरी और एक भीतरी पक्ष होता है। संरचना के बाहरी पक्ष को उसका रूप कहते हैं और भीतरी पक्ष तथा उसके घटक तत्वों व प्रक्रियाओं को उसकी अंतर्वस्तु कहते हैं। अंतर्वस्तु और रूप के प्रवर्ग ( category ) वस्तु या घटना के सार ( essence ) को समझने में सहायक होते हैं। सारी वस्तुओं और घटनाओं की अपनी अंतर्वस्तु और रूप होता है। सारी वस्तुएं वस्तुतः अपने बाहरी पक्ष में एक दूसरे से तथा मनुष्य के साथ अंतर्क्रिया करती हैं, इसलिए उनकी अंतर्वस्तु प्रत्यक्ष प्रकाश में नहीं आती, बल्कि बाहरी पक्ष, यानी रूप की मध्यस्थता से ऐसा करती हैं।

अंतर्वस्तु, उन तत्वों, पहलुओं, प्रक्रियाओं तथा उनके संबंधों का साकल्य है, जो प्रदत्त वस्तु या घटना के अस्तित्व ( existence ) के लिए आधारभूत ( basic ) हैं और जिन पर उनके रूप का विकास और परिवर्तन आश्रित ( dependent ) है। रूप, अंतर्वस्तु के संगठन और अस्तित्व की विधि है, किसी एक प्रदत्त अंतर्वस्तु के तत्वों, पहलुओं और प्रक्रियाओं के बीच ऐसा आंतरिक विशिष्ट संयोजन होता है, जो अंतर्वस्तु को बाह्य दशाओं के साथ अपनी अंतर्क्रिया में एक प्रकार की अखंडता ( integrity ) प्रदान कर देता है।

अंतर्वस्तु तथा रूप किसी वस्तु या घटना के दो अभिन्न पक्ष ( integral aspects ) हैं। विश्व में रूप और अंतर्वस्तु के बिना कुछ नहीं होता है। मसलन, कोई भी जीवित अंगी ( living organism ) तत्वों ( कोशिकाओं, अंगों, हिस्सों ) तथा प्रक्रियाओं ( उपापचयन, उत्परिवर्तन, आदि ) से बना होता है, जो उसकी अंतर्वस्तु की रचना करती हैं। इन तत्वों और प्रक्रियाओं के संगठन व संबंध की जो विधि ( method ) उस अंतर्वस्तु को अपना अस्तित्व रखने में सक्षम बनाती है, वह उसका रूप है। इस तरह, संपूर्ण जैव प्रकृति, रूप और अंतर्वस्तु के तादात्म्य या अविभाज्यता का एक सतत प्रमाण है।

सारी सामाजिक प्रक्रियाओं और घटनाओं में अंतर्वस्तु और रूप की एक आंगिक एकता ( organic unity ) भी होती है। मसलन, उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) किसी भी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) की अंतर्वस्तु हैं और उत्पादन संबंध ( relations of production ) उसका रूप हैं। साहित्य और कला की कृतियों में कलात्मक बिंबों के रूप में परावर्तित जीवन ( reflected life ) उनकी अंतर्वस्तु है और इन बिंबों को संगठित और व्यक्त करने की पद्धति उनका रूप हैं। इस तरह, भाषा, संरचना, शैली, आदि साहित्यिक कृति का रूप हैं।

किन्हीं भी वस्तुओं और प्रक्रियाओं की अंतर्वस्तु का एक बाहरी और एक भीतरी रूप होता है। वस्तुओं का बाहरी रूप उनका आयतन, आकृति, रंग आदि है और भीतरी रूप उसकी अंतर्वस्तु का संगठन है। बाहरी रूप अंतर्वस्तु के साथ उतनी घनिष्ठता से नहीं जुड़ा होता, जितना की भीतरी रूप। अंतर्वस्तु में कोई भी परिवर्तन किये बग़ैर उस रूप में उल्लेखनीय परिवर्तन किये जा सकते हैं। मसलन, किसी भी महत्त्वपूर्ण पुस्तक को विभिन्न आकार-प्रकारों वाले चार या दस खंडों में छापा जा सकता है, भिन्न-भिन्न गुणवत्ता वाले काग़ज़ पर मुद्रित ( print ) किया जा सकता है, भिन्न-भिन्न तरीक़ों से रूपांतरित किया जा सकता है, आदि-आदि। लेकिन कुछ मामलों में, जैसे विमान या जहाज निर्माण में, अंतर्वस्तु पर काफ़ी अधिक प्रभाव डाले बिना बाहरी रूप में मनमाने परिवर्तन नहीं किये जा सकते। यहां बाहरी रूप तकनीकी दृष्टि से इतना समुपयुक्त ( suitable ) है कि वह अंतर्वस्तु से प्रत्यक्षतः संयोजित ( direct connected ) हैं।

आंतरिक रूप, अंतर्वस्तु से और भी अधिक घनिष्ठता ( closeness ) से जुड़ा होता है। उसमें होनेवाले कोई भी परिवर्तन किसी न किसी तरह से अंतर्वस्तु में परावर्तित होते ही हैं। मसलन, शैली या संरचना में परिवर्तन कथानक को, साहित्यिक रचना की अंतर्वस्तु को अवश्य ही प्रभावित करता है, उससे रचना का भावनात्मक प्रभाव ( emotional impact ) निश्चय ही भिन्न हो जाता है। कला में अंतर्वस्तु और रूप की एकता, उसका एक प्रमुख नियम तथा जीवंतता का स्रोत है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय
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