शनिवार, 26 जुलाई 2014

व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग" पर चर्चा शुरू करते हुए ‘व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक )’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू किया था, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) - २
the individual, particular and general ( universal ) - 2

व्यष्टिक और सार्विक अंतर्संबंधित हैं। प्रत्येक व्यष्टिक ( किसी न किसी तरह ) सार्विक है। प्रत्येक सार्विक व्यष्टिक ( उसका एक टुकड़ा, या एक पहलू, अथवा उसका सार ) है। व्यष्टिक केवल उस संपर्क में अस्तित्व रखता है, जो सार्विक की ओर जाता हैसार्विक केवल व्यष्टिक में और व्यष्टिक के द्वारा अस्तित्व में आता है। सामान्य था व्यष्टिक के साथ उसके अंतर्संबंध की यह द्वंद्वात्मक-भौतिकवादी समझ वास्तविकता के सही ज्ञान के वास्ते बहुत महत्त्वपूर्ण है। सामान्य, वस्तुओं के सार ( essence ) से बद्धमूल होता है और उनकी आंतरिक एकता की एक अभिव्यक्ति होता है। यही कारण है कि वस्तुओं तथा घटनाओं के सार को तथा उनके विकास के नियमों को समझने का तरीक़ा सामान्य को समझना है। और सामान्य को केवल व्यष्टिक के द्वारा ही समझा जा सकता है।

स्वयं यथार्थता में सार्विक, विशेष तथा व्यष्टिक के बीच गहरा द्वंद्वात्मक संयोजन ( dialectical connection ) होता है। सार्विक और विशेष, व्यष्टिक में विद्यमान तथा उसके द्वारा व्यक्त होते हैं और विलोमतः कोई भी व्यष्टिक वस्तु तथा प्रक्रिया में कुछ विशेष और सार्विक विद्यमान होता है। यह उसूल ( principle ) प्रकृति, समाज तथा चिंतन में अनुप्रयोज्य ( applicable ) है। प्रत्येक पौधा तथा जंतु सामान्य जैविक नियमों के अंतर्गत होता है और साथ ही ऐसे विशिष्ट नियमों से भी संनियमित ( governed ) होता है, जो केवल उसकी प्रजातियों ( species ) के लिए ही लाक्षणिक होते हैं। इसके साथ ही साथ सार्विक और विशिष्ट, व्यष्टिक के बगैर तथा उससे पृथक ( separate ) रूप में विद्यमान नहीं होते हैं। समाज के सार्विक प्रतिमान ( general patterns ) पृथक श्रम समूहों के क्रियाकलाप में तथा उन समूहों की रचना करनेवाले व्यक्तियों के क्रियाकलाप में व्यक्त होते हैं।

एक मनुष्य, शुरू में, अपने संवेद अंगों से व्यष्टिक का, अलग-अलग घटनाओं का और उनके विविध अनुगुणों का बोध प्राप्त करता है, फिर उसका चिंतन इन अवबोधनों का विश्लेषण ( analysis ) करता है, आवश्यक को अनावश्यक से, सामान्य को व्यष्टिक से पृथक करता है। उसके बाद चिंतन, घटनाओं के एक समुच्चय के सामान्य और आवश्यक लक्षणों के संश्लेषण ( synthesis ) और सम्मेल के द्वारा इन घटनाओं के बारे में एक धारणा ( notion, concept ) बनाता है, जो घटनाओं के समुच्चय के सामान्य और साथ ही आवश्यक लक्षणों को व्यक्त करती है। कुलमिलाकर, संज्ञान की प्रक्रिया व्यष्टिक से शुरू होती है, विशिष्ट से गुजरती हुई सामान्य व सार्विक पर पहुंचती है

व्यष्टिक और सामान्य के प्रवर्ग ( categories ), नूतन ( new ) की उत्पत्ति की प्रक्रिया को समझने मे भी सहायक है। मुद्दा यह है कि नूतन प्रकृति और समाज में अक्सर तुरंत उत्पन्न नहीं होता है। शुरू में यह व्यष्टिक के रूप में पैदा होता है, फिर दृढ़ व साकार होकर विशिष्ट बन जाता है और अंततः सामान्य और सार्विक तक बन जाता है। सारे नये उपक्रम और आंदोलन इसी तरह उपजते हैं, इसी तरह से क्रांतिकारी चेतना उत्पन्न व सुदृढ़ होती है।

इस तरह से हम अब यह आसानी से समझ सकते हैं कि यदि हम ‘व्यष्टिक’ की विशषताओं की अवहेलना ( neglect ) करते है और बदलती हुई दशाओं और परिस्थितियों की परवाह किये बग़ैर ‘सामान्य’ के उपयोग पर बल देते हैं, तो हम नयी परिस्थितियों के समुचित विश्लेषण के बिना सामान्य फ़ार्मूलों को महज़ दोहराते रह जाएंगे और इस तरह जीवन तथा समाज के साथ अपने संपर्कों से हाथ धो बैठ सकते हैं। सामान्य की भूमिका से इन्कार तथा विशिष्ट और व्यष्टिक पर अनुचित ज़ोर देने से भी ऐसी ही गंभीर ग़लतियां हो सकती हैं। इसलिए व्यष्टिकता और सामान्यता के द्वंद्व को समुचित रूप से हल करके ही हम जीवन और समाज में सफल हस्तक्षेपों ( interventions ) के वाहक हो सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 19 जुलाई 2014

व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग" पर चर्चा शुरू करते हुए ‘प्रवर्ग’ की अवधारणा पर विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों पर दृष्टिपात किया था, इस बार हम ‘व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक )’ के प्रवर्गों को समझने का प्रयास शुरू करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ) - १
the individual, particular and general ( universal ) - 1

यह जानने के लिए अपने चारो तरफ़ की वस्तुओं पर एक नज़र डालना ही काफ़ी है कि वे सब, किसी न किसी तरह, एक दूसरे से भिन्न ( differ ) हैं। वस्तुओं और घटनाओं की गुणात्मक विविधता ( qualitative diversity ) पर विचार करते हुए हम जानते हैं कि वे एक दूसरे से भिन्न होती हैं। दुनिया में दो पूर्णतः अनुरूप वस्तुएं नहीं होती। यहां तक कि बिलियर्ड की दो समरूप ( identical ) गेंदे भी जब सूक्ष्मता से तोली जाती हैं तो उनके बीच एक ग्राम के हज़ारवें अंश का अंतर होता है। हालांकि क्वांटम यांत्रिकी इस बात की पुष्टि करती है कि एकसमान नाम के प्राथमिक कण एक दूसरे से अविभेद्य ( indistinguishable ) होते हैं, फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी प्रदत्त क्षण ( given moment ) पर वे भिन्न-भिन्न स्थानों पर हो सकते हैं और भिन्न परमाणुओं की रचना कर सकते हैं। यही नहीं, पृथ्वी के अरबों मनुष्यों में भी दो ऐसे आदमी नहीं होते, जिनकी उंगलियों की छाप एक-सी हो। बेशक, सर्वोपरि बात यह है कि वस्तु, लोग एक दूसरे से भिन्न होते हैं।

संक्षेप में हमारे गिर्द सारी घटनाओं और प्रक्रियाओं में अनूठे लक्षण ( features ) और गुण-विशेष ( attribute ) होते हैं, जो कमोबेश हद तक उनमें अंतर्निहित ( inherent ) होते हैं, यानि उनमें व्यष्टिकता ( individuality ) होती है। एक वस्तु को दूसरी वस्तुओं से भिन्न बनानेवाले इन्हीं अलग-अलग लक्षणों का साकल्य "व्यष्टिक" ( individual ) कहलाता है। ऐसे लक्षणों के आधार पर ही, उदाहरण के लिए, हज़ारों लोगों के बीच से अपने परिचित को अलग पहचाना जा सकता है, वस्तुओं के अंबार में से भी अपनी इच्छित वस्तु अलग पहचानी जा सकती है।

लेकिन विभिन्न वस्तुएं विशिष्ट और भिन्न ही नहीं, बल्कि कई मामलों में एक दूसरी के समान भी होती हैं। ऐसी कोई वस्तुएं नहीं हैं, जिनमें कुछ न कुछ आपसी समानता न हो। जिस हालत में विभिन्न वस्तुओं के बीच कुछ भी समानता नहीं दिखाई देती, उस हालत में भी किंचित गहरी जांच करने पर उनमें कुछ मूल अनुगुणों ( properties ) तथा गुणों ( qualities ) की समानता अवश्य दिखाई देगी। मसलन, सारे लोग एक दूसरे से भिन्न होते हैं, लेकिन उन सभी में कुछ ऐसे लक्षण होते हैं, जो उन सबको मनुष्य बनाते हैं। हरेक मनुष्य इस पृथ्वी पर अनेक मनुष्यों के साथ रहता है और हजारों विविध संयोजनों तथा समानताओं से उनके साथ अंतर्संबंधित ( interrelated ) होता है। एक मनुष्य की शारीरिक बनावट तथा शारीरिक क्रियाएं अन्य मनुष्यों के समान होती हैं। अन्य लोगों की तरह वह भी महसूस कर सकता है, सोच, बोल व काम कर सकता है। वह एक निश्चित नस्ल और जाति का होता है और उसमें तदनुरूप विशेषताएं होती हैं। वह एक निश्चित वर्ग ( class ) या सामाजिक श्रेणी का भी होता है और उनके विशिष्ट लक्षणों को परावर्तित ( reflect ) करता है, आदि-आदि।

इस तरह व्यष्टिक घटनाओं में ऐसे गुण-विशेष ( attribute ) और अनुगुण होते हैं जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) ही नहीं करते, बल्कि उन्हें एक दूसरे के समान ( similar ) भी बनाते हैं। इस आधार पर हम उन्हें विभिन्न समूहों ( groups ) में रख सकते हैं और समूह के सामूहिक लक्षण निश्चित कर सकते हैं। घटनाओं और प्रक्रियाओं के कुछ समुच्चयों में अंतर्निहित वस्तुगत विशेषताओं ( objective traits ) तथा अनुगुणों को प्रवर्ग ‘विशेष’ या "विशिष्ट" ( particular ) से परावर्तित किया जाता है

वस्तुओं के समुच्चय के समान, अनुरूपी, पुनरावर्ती ( recurring ) लक्षण सामान्य के रूप में व्यक्त होते हैं। घटनाओं तथा प्रक्रियाओं के पृथक समूहों में अंतर्निहित अनुगुणों और गुण-विशेषों के साथ ही वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) में प्रदत्त क़िस्म की सारी घटनाओं तथा प्रक्रियाओं की लाक्षणिक विशेषताएं, अनुगुण और संबंध भी होते हैं। उन्हें "सामान्य" या "सार्विक" ( general or common ) प्रवर्ग से परावर्तित किया जाता है। जैसा कि उपरोक्त उदाहरण से जाहिर है, वस्तुओं के सर्वनिष्ठ अनुगुण या पहलू हमेशा पहली ही निगाह में स्पष्ट नहीं होते। वे उनके समान उद्‍गम ( origin ), एक ही विकास-नियमों, आदि में बद्धमूल ( rooted ) हो सकते हैं।

इसके साथ ही सामान्यता की कोटि ( degree ) में भी अंतर हो सकता है। मसलन, पेड़ होने का अनुगुण, आम का या खजूर का पेड़ होने के अनुगुण के मुक़ाबले अधिक सामान्य है। लेकिन एक वनस्पति होने की ख़ासियत के मामले में वह कम सामान्य है। अधिक सामान्य अनुगुण की तुलना में कम सामान्य, विशिष्ट के रूप में व्यक्त होता है। इस मामले में पेड़ एक विशिष्ट वनस्पति है। जो अनुगुण और लक्षण सारे गोचर ( visible ) विषयों में, बिना अपवाद, अंतर्निहित होते हैं उन्हें सबसे ज़्यादा सामान्य या सार्विक ( universal ) कहा जाता है। द्वंद्ववाद ( dialectics ) वस्तुओं और घटनाओं के विकास के इन्हीं सार्विक लक्षणों का अध्ययन करता है और वे उसके नियमों व प्रवर्गों में परावर्तित होते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 12 जुलाई 2014

प्रवर्गों पर दार्शनिक दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग" पर चर्चा शुरू करते हुए ‘प्रवर्ग’की अवधारणा को समझने का प्रयास किया था, इस बार हम ‘प्रवर्ग’ की अवधारणा पर विभिन्न दार्शनिक दृष्टिकोणों पर दृष्टिपात करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रवर्गों पर दार्शनिक दृष्टिकोण
( philosophical approaches on categories )

प्राचीन काल में ही अन्य संप्रत्ययों ( concepts ) से प्रवर्गों ( categories ) का भेद जान लिया गया था और तबसे ही प्रवर्गों के बारे में दार्शनिकों के बीच निरंतर विवाद चल रहा है। विभिन्न दार्शनिकों ने प्रवर्गों के बारे में विभिन्न सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं।

इनमें से एक सिद्धांत की विवेचना करें, जिसे काण्ट  ने प्रतिपादित किया था। काण्ट इस बात पर विशेष बल देते हैं कि चूंकि हर प्रवर्ग उसमें सम्मिलित बहुसंख्य संकीर्णतर संप्रत्ययों की समष्टि है, इसलिए वह हमारे समस्त ज्ञान ( knowledge ) को एक सूत्र में पिरोता है और उसका संश्लेषण ( synthesis ) करता है और इसीलिए संज्ञान ( cognition ) में प्रवर्गों की बहुत ही बड़ी भूमिका है। इस निष्कर्ष के पीछे काण्ट का यह तर्क है : जब लोगों ने पहली बार ऐसी धातु देखी, जिसे जंग नहीं लगता, तो उन्होंने ‘सोना’ संप्रत्यय बनाया। सागरयात्रियों ने जब आर्कटिक महासागर में विराट तैरते हिमपर्वत देखे, तो ‘हिमशैल’ संप्रत्यय पैदा हूआ। इस तरह सभी आम संप्रत्यय भौतिक वस्तुओं के साथ लोगों के संपर्क के परिणाम, हमारी ज्ञानेन्द्रियों पर इन वस्तुओं के प्रभाव, अर्थात अनुभव ( experience ) के परिणाम हैं। इसलिए वे सब भौतिक विश्व की परिघटनाओं ( phenomena ) के बारे में हमारा ज्ञान हैं।

किंतु प्रवर्ग के साथ दूसरी ही बात है। जिस परिघटना को हम पहले नहीं जानते थे, उससे साक्षात्कार होने पर हम तुरंत उसका कारण ( cause ) ढूंढ़ने लगते हैं, यह जानने की कोशिश करते हैं कि उसमें सांयोगिक ( coincidental ) क्या है और अनिवार्य ( essential ) क्या है, आदि। इन प्रवर्गों के इस्तेमाल के बिना वस्तुओं के साथ कोई भी संपर्क नहीं होता, कोई भी अनुभव हासिल नहीं किया जाता : हम अभी नहीं जानते कि दत्त ( given ) परिघटना का कारण क्या है, मगर हमें विश्वास है कि उसमें कुछ सांयोगिक और कुछ न कुछ अनिवार्य अवश्य है। इस आधार पर काण्ट  निष्कर्ष निकालते हैं कि हम भौतिक विश्व की वस्तुओं के साथ संपर्क में आने, उनका अनुभव प्राप्त करने से पहले ही अनिवार्यता और संयोग, कार्य और कारण आदि के प्रवर्गों से परिचित रहते हैं। काण्ट के अनुसार, प्रवर्ग अनुभव का परिणाम नहीं होता, अपितु अनुभव से पहले ही विद्यमान रहता है, यानि वह अनुभव की पूर्वापेक्षा ( pre-requisite ) है।

काण्ट  आगे कहते हैं : चूंकि प्रवर्ग हमारे मस्तिष्क में अनुभव से पहले ही विद्यमान रहते हैं ( जो बात आम संप्रत्ययों के लिए नहीं की जा सकती ), इसलिए उनमें भौतिक विश्व का कोई ज्ञान नहीं होता ; यथार्थ वास्तविकता ( actual reality ) में ऐसा कुछ नहीं है, जो प्रवर्गों से मेल खाता हो। वे सब, यानी अनिवार्यता और संयोग, कार्य और कारण, आदि प्रवर्ग मनुष्य के मस्तिष्क में ही कल्पित ( assumed ) किये जाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि हमारे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संप्रत्यय - प्रवर्ग - भौतिक विश्व पर निर्भर नहीं है और इसी को आगे बढ़ाएं तो चिंतन पदार्थ पर निर्भर नहीं है। इस प्रत्ययवादी ( idealistic ) धारणा के आधार पर काण्ट दावा करते हैं कि प्रवर्ग पैदा नहीं होते, अपितु मानवजाति की उत्पत्ति के क्षण से ही मानव चेतना में शाश्वत रूप से विद्यमान हैं। फिर प्रवर्गों की संख्या और उनका अर्थ भी सदा अपरिवर्तित रहते हैं : आज जितने प्रवर्ग हैं, उतने ही हजारों साल पहले भी थे और आज उनका जो अर्थ है, वही हमारे प्राचीनतम पुरखों के काल में भी था।

अब आइये, देखें कि प्रवर्गों के प्रति यह प्रत्ययवादी दृष्टिकोण कहां तक सही है, जो कि आज भी प्रत्ययवादियों के द्वारा किसी न किसी रूप में काम में लिया जाता है। हममे से हर कोई प्रतिदिन भौतिक विश्व की परिघटनाओं के संपर्क में आता है और पाता है कि संप्रत्ययों - मोटर, स्विच, विद्युत धारा, टेलीविज़न, उद्योग, मूल्य, श्रम उत्पादिता, आक्सीजन, जीवाणु, आदि-आदि के बिना हमारा काम नहीं चल सकता। इनमें से कोई भी संप्रत्यय हमने स्वयं अपने अनुभव के आधार पर नहीं बनाया है। इनके बारे में हमने अपने शिक्षकों, किताबों, इत्यादि से जाना है। तो क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जाये कि ये संप्रत्यय अनुभव की उपज नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क में किसी भी अनुभव से पहले ही विद्यमान थे? निस्संदेह, नहीं। यद्यपि हमने और अपने ही अनुभव से किसी संप्रत्यय की रचना नहीं की है, किंतु हमसे बहुत पहले अन्य लोगों ने अपने अनुभव से उनकी रचना अवश्य की थी और बाद में और लोगों ने नये अनुभव-दत्तों के आधार पर उनमें कुछ और जोड़ा, सटीक बनाया और आगे विकास किया।

इस प्रकार जब हम कहते हैं कि हम जीवन में बने-बनाये संप्रत्यय इस्तेमाल करते हैं, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वे किसी के भी अनुभव का परिणाम नहीं हैं। लोगों द्वारा बने-बनाये संप्रत्ययों का इस्तेमाल उनके अनुभवेतर ( beyond experience ) मूल का प्रमाण नहीं है। इसके उलट इसके प्रबल प्रमाण प्रस्तुत किये जा सकते हैं कि सभी प्रवर्गॊं का स्रोत ( source, origin ) अनुभव है।

यदि सभी प्रवर्ग मानव मस्तिष्क में मानवजाति के आविर्भाव ( emersion ) के क्षण से ही मौजूद होते, तो वे उन जनजातियों के चिंतन में भी पाये जाने चाहिए, जो आदिम ( primitive ) गोत्रात्मक व्यवस्था के चरणों में अभी भी विद्यमान हैं। किंतु वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है। जैसे कि न्यू गिनी के पपुआ लोग अनेक प्रवर्गों को नहीं जानते, यद्यपि कार्य और कारण, इत्यादि कुछ प्रवर्गों से वे परिचित थे। मालों के विनिमय ( exchange of goods ) के समय वे उन्हें एक दूसरे के सामने रखते थे, क्योंकि उन्हें गिनना नहीं आता था। न केवल परिमाण ( quantity ) का प्रवर्ग, अपितु संख्या ( number ) का प्रवर्ग भी उनके लिए अपरिचित था। वैज्ञानिक अनुसंधानों ने सिद्ध कर दिया है कि बहुत सी आदिम जातियों को न ऐसा अनुभव था और न संख्या का ज्ञान ही, परिमाण और पदार्थ जैसे प्रवर्गों की जानकारी तो और भी दूर की बात है।

दूसरे, यदि प्रवर्ग अनुभव से पहले ही मस्तिष्क में होते, तो बच्चे को भी उनका ज्ञान होना चाहिए था। किंतु वास्तविकता तो यह है कि दो वर्षीय बच्चा बहुत से दूसरे संप्रत्ययों को सीख-जान जाने के बावजूद संख्या के संप्रत्यय ( और इसलिए परिमाण के संप्रत्यय से भी ) से परिचित नहीं होता। ये तथ्य अकाट्यतः प्रमाणित करते हैं कि अन्य सभी संप्रत्ययों की भांति प्रवर्ग भी अनुभव की उपज होते हैं, कि कुछ प्रवर्ग पहले पैदा होते हैं और कुछ बाद में और इसलिए उनकी संख्या स्थायी कतई नहीं है। निस्संदेह, नये प्रवर्गों की उत्पत्ति में संकीर्ण सप्रत्ययों की अपेक्षा कई गुना समय लगता है और यह प्रक्रिया ( process ) आज भी जारी है।

इस तरह हम देखते हैं कि सामान्यतः सभी संप्रत्ययों की भांति सभी प्रवर्ग अनुभव से निकाले गये हैं और वे वास्तविकता के प्रतिबिंब ( reflection, image ) हैं। इन अत्यधिक व्यापक संप्रत्ययों की विशिष्टता यह है कि वे यथार्थ वास्तविकता के लक्षणों को प्रतिबिंबित करते हैं, जो ब्रह्मांड की कुछेक नहीं, अपितु सभी परघटनाओं में पाये जाते हैं। इसीलिए इन मूल व्यापक संप्रत्ययों यानि प्रवर्गों का इतना बड़ा संज्ञानकारी महत्त्व है। प्रवर्ग, मनुष्य के समक्ष फैले हुए प्रकृति की परिघटनाओं के जाल में पृथक्करण ( segregation ), अर्थात विश्व के संज्ञान के चरण हैं और इस जाल के वे मुख्य बिंदु हैं जो उसे जानने और उसपर काबू पाने में मनुष्य की मदद करते हैं।

प्रवर्गों का भी विकास होता है और सभी प्रवर्ग परस्पर संबद्ध ( associated ) भी होते हैं, क्योंकि वे परिवेशी विश्व की, जिसकी सभी परिघटनाएं मिलकर एक समष्टि ( a whole ) बनाती हैं, विभिन्न प्रक्रियाओं, पक्षों और लक्षणों को प्रतिबिंबित करते हैं। यहां हम अगली बार से भौतिकवादी द्वंद्ववाद के कुछ प्रमुख प्रवर्गों पर थोड़ा विस्तार से चर्चा करेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 5 जुलाई 2014

भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम' का सार प्रस्तुत किया था, इस बार हम ‘भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग" पर चर्चा शुरू करेंगे और यह समझने की कोशिश करेंगे कि प्रवर्ग होते क्या हैं ?

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग
( categories of materialistic dialectics )

भौतिकवादी द्वंद्ववाद, विकासमान वास्तविकता ( developing reality ) के सर्वाधिक सामान्य और महत्त्वपूर्ण संयोजनों को व्यक्त करनेवाले उसूलों ( principles ) और नियमों ( laws ) तक ही सीमित नहीं है। यह भौतिक जगत और संज्ञान ( cognition ) के विकास के उन अनिवार्य संयोजनों और पक्षों का भी अध्ययन करता है, जो दार्शनिक प्रवर्गों ( philosophical categories ) में व्यक्त किये जाते हैं।

प्रवर्ग ( category ) क्या है?

आइये थोड़ा विस्तार से समझते हैं। उपग्रह पृथ्वी का ही नहीं होता ( पृथ्वी का उपग्रह चन्द्रमा है ), सौरमण्डल के अन्य ग्रहों के भी अपने उपग्रह हैं। उदाहरण के लिए, शनि के नौ उपग्रह हैं, जिनमें सबसे बड़ा टाइटन है। शनि का उपग्रह होने के नाते टाइटन को सौरमण्डल के ग्रहों के उपग्रहों की श्रेणी में और इसीलिए नक्षत्रों के गिर्द घूमनेवाले ग्रहों के उपग्रहों की श्रेणी में भी गिना जा सकता है। फिर स्वयं उपग्रह कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड हैं और जैसा ज्ञात है कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड सामान्यतः अंतरिक्षीय पिण्डों का ही एक हिस्सा है। इस तरह उत्तरोतर व्यापक संप्रत्ययों ( concepts ) की ओर बढ़ने पर हम एक श्रृंखला बनती देखते हैं, जिसकी हर अगली कड़ी ( संप्रत्यय ) पहली से अधिक व्यापक है : टाइटन --> शनि का उपग्रह --> सौरमण्डल के ग्रह का उपग्रह --> ग्रह का उपग्रह --> कठोर अंतरिक्षीय पिण्ड --> अंतरिक्षीय पिण्ड --> भौतिक पिण्ड --> पदार्थ।

एक अन्य संप्रत्यय लें - गेंहूं। गेंहूं अनाज है और सभी अनाज एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पतियां हैं, जो द्विबीजपत्री वनस्पतियों के साथ आवृत्तबीजियों का वर्ग बनाती हैं। आवृत्तबीजी और अनावृत्तबीजी, दोनों बीजधारी वनस्पतियों के वर्ग में शामिल हैं, जो स्वयं सामान्यतः वनस्पतियों का ( जिनमें बीजधारी और बीजरहित, सभी वनस्पतियां शामिल हैं ) अंग हैं। यहां व्यापकतर संप्रत्यय की ओर बढ़ने का क्रम इस प्रकार है : गेंहूं --> अनाज --> एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पति --> आवृत्तबीजी वनस्पति --> अवयवी --> स्वनियंत्रित तंत्र --> भौतिक पिण्ड --> पदार्थ।

इस तरह हम देख सकते हैं कि सभी संप्रत्यय ऐसी ही श्रृंखलाओं की कड़ियां हैं और ये श्रृंखलाएं आपस में संबद्ध ( associated ) होती हैं। चूंकि गेंहूं अनाज है, इसलिए ‘गेंहूं’ संप्रत्यय में अनाज के सभी लक्षण और इसके साथ ही केवल गेंहूं में पाये जानेवाले लक्षण ( जो उसे अन्य अनाजों से भिन्न बनाते हैं ) शामिल हैं। इसी तरह ‘अनाज’ संप्रत्यय में एकबीजपत्री आवृत्तबीजियों के लक्षणों के साथ-साथ उन लक्षणों की भी कल्पना की जाती है, जो अनाजों को शेष एकबीजपत्री आवृत्तबीजी वनस्पतियों से भिन्न बनाते हैं।

यही बात अन्य संप्रत्ययों पर भी लागू होती है : अधिक व्यापक संप्रत्यय का अर्थ अधिक संकीर्ण संप्रत्यय के अर्थ में पूर्णतः शामिल होता है। इसके अलावा अधिक संकीर्ण संप्रत्यय में उन लक्षणों की भी कल्पना की जाती है, जो इस उपवर्ग को, उस व्यापक वर्ग के ( जिसमें यह शामिल है ) अन्य उपवर्गों से भिन्न बनाते हैं। इसीलिए, उदाहरणार्थ, अवयवी ( organism ) के लक्षणों की कल्पना सभी वनस्पतियों ( अब तक पांच लाख से अधिक वनस्पतियां ज्ञात हैं ) के संप्रत्ययों में और सभी जीवों ( उनकी दस लाख से अधिक जातियां ज्ञात हैं ) के संप्रत्ययों में की जाती है। किंतु भौतिक वस्तुओं से संबंधित सभी संप्रत्ययों में ‘पदार्थ’ ( matter ) के संप्रत्यय का विशिष्ट स्थान है। चूंकि यह सबसे अधिक व्यापक, अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय है, इसलिए उसका अर्थ जीवों और अजीवों, प्राकृतिक और मनुष्यनिर्मित कृत्रिम भौतिक वस्तुओं से संबंधित करोड़ों विविध संप्रत्ययों में शामिल किया जाता है।

पदार्थ ही ऐसा एकमात्र अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय नहीं है, जिसकी परिधि में सभी ज्ञात संकीर्णतर संप्रत्यय आते हों। दर्शनशास्त्र के अनुसार अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय निम्न हैं : पदार्थ और चेतना, गति और गतिशून्यता, सामान्य और विशिष्ट, सार और परिघटना, गुण और परिमाण, क्रमभंग और सातत्य, कार्य और कारण, अनिवार्यता और संयोग, संभावना और वास्तविकता, अंतर्वस्तु और रूप, ढांचा और प्रकार्य, आदि-आदि। यही अत्यधिक व्यापक संप्रत्यय ही दार्शनिक प्रवर्ग कहलाते हैं। हर प्रवर्ग में विशाल संख्या में संकीर्णतर संप्रत्यय शामिल होते हैं, और यदि सभी प्रवर्गों को एक साथ लिया जाये, तो उनकी परिधि में मानवजाति को ज्ञात सभी संप्रत्यय आ जायेंगे।

यहां यह बात भी समझने की है कि सामान्यतः प्रवर्ग इस या अन्य विज्ञान की आधार संकल्पनाएं ( basic concepts ) होते हैं। मसलन, द्रव्यमान, ऊर्जा और आवेश भौतिकी के प्रवर्ग हैं, इसी तरह उत्पादन के संबंध, पण्य ( commodity ) और मूल्य राजनीतिक अर्थशास्त्र के प्रवर्ग हैं, आदि-आदि। किंतु दार्शनिक प्रवर्गों की अपनी विशेषता यह है कि वे सर्वाधिक सामान्य संकल्पनाएं होते हैं। उनका सह-संबंध ( correlation ) सार्विक नियमों ( universal laws ) तथा घटनाओं के बीच स्थायी संयोजनों ( permanent connections ) को व्यक्त करता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 28 जून 2014

निषेध के निषेध का नियम का सार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम पर चर्चा करते हुए ‘निषेध के निषेध’ की अवधारणा को समझने का प्रयास किया था, इस बार हम ‘निषेध के निषेध का नियम का सार" प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



निषेध के निषेध का नियम - चौथा भाग
निषेध के निषेध का नियम का सार

अभी तक की विवेचना के आधार पर, अब हम निषेध के निषेध ( negation of the negation ) के द्वंद्वात्मक नियम की प्रमुख प्रस्थापनाओं ( prepositions ) को निरूपित ( formulate ) कर सकते हैं। यह नियम प्रकृति, समाज और चिंतन में विकास की दिशा का निर्धारण ( determines ) करता है।

हेगेल  के कृतित्व से उपजे इस नियम को परंपरानुसार निषेध के निषेध का नियम कहते हैं, किंतु हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भौतिकवादी द्वंद्ववाद ( materialist dialectics ) में इसे परस्पर अपवर्जक निषेधों ( mutual exclusive negations ) का एक युग्म ( pair ) नहीं, बल्कि विकास की ऐसी असीम प्रक्रिया माना जाता है, जिसमें द्वंद्वात्मक निषेध, पुरातन ( old ) से नूतन ( new ) की ओर रास्ते को खोलते हैं और साथ ही पुरातन से नूतन के संबंध ( link ) को तथा उनके बीच सातत्य ( continuity ) को सुनिश्चित बनाते हैं। इस नियम की मुख्य प्रस्थापनाएं साररूप में इस प्रकार हैं:

( १ ) विकास के दौरान ऐसा नूतन लगातार उत्पन्न होता रहता है, जो पहले विद्यमान नहीं था और जो पुरातन का द्वंद्वात्मक निषेध होता है।

( २ ) निषेध के दौरान हर मूल्यवान और जीवंत ( viable ) चीज़ संरक्षित ( preserved ) रहती है और परिवर्तित रूप में नूतन में सम्मिलित ( include ) होती है। पुरातन के केवल उसी अंश का उन्मूलन ( elimination ) होता है, जो गतावधिक ( outlived ) हो गया है और विकास में बाधा डालता है।

( ३ ) विकास में पहले की बीती अवस्थाओं की एक निश्चित वापसी और पुनरावर्तन ( repetition ) होता है, किंतु एक नये और उच्चतर स्तर ( higher level ) पर और इसीलिए उसका स्वरूप वृत्ताकार या रैखिक नही, सर्पिल ( spiral ) होता है।

( ४ ) विकास की प्रक्रिया के दौरान पुराने से नये में संक्रमण ( transition ) के समय वस्तुगत स्वरूप की प्रगतिशील तथा पश्चगामी ( प्रतिगामी ) प्रवृत्तियां ( progressive and regressive tendencies ) होती हैं। सारी घटना का परिवर्तन प्रगतिशील होगा या पश्चगतिक, यह इस बात पर निर्भर होता है कि इन द्वंद्वात्मक्तः संबंधित दो प्रवृत्तियों में से कौनसी प्रभावी ( dominant ) है।

जब हम निषेध के निषेध के नियम की तुलना द्वंद्ववाद के अन्य बुनियादी नियमों ( विरोधियों की एकता और संघर्ष का नियम तथा परिणाम से गुण में रूपांतरण का नियम ) से करते हैं, तो उनको परस्पर जोड़नेवाले गहरे संबंध को आसानी से देखा जा सकता है। ‘अंतर्विरोधों के समाधान’, ‘गुणात्मक छलांग’ तथा ‘द्वंद्वात्मक निषेध’ जैसे प्रवर्गों ( categories ) के साथ तुलना में यह बात स्पष्टतः सामने आती है। वास्तव में कोई भी गुणात्मक छलांग ( qualitative leap ) सारतः घटना के प्रमुख आंतरिक अंतर्विरोधों ( internal contradictions ) का समाधान ( resolution ) होती है। इसी प्रकार, एक द्वंद्वात्मक निषेध यह बतलाता है कि पुराने गुण से नये में छलांगनुमा ( leap-like ) संक्रमण में संरक्षण या निरंतरता का और साथ ही उन्मूलन और विनाश का एक घटक विद्यमान होता है। इस तरह द्वंद्ववाद के मुख्य नियम विकास के स्रोतों, रूप और दिशा के बारे में पूर्ण ज्ञान प्रदान करते हैं और इसी से उनकी आंतरिक एकता निर्धारित होती है।

प्रकृति, समाज तथा चिंतन के विकास के इन सबसे सामान्य नियमों का विराट व्यावहारिक तथा राजनीतिक महत्त्व भी है। इनमें पारंगता हमें सारी घटनाओं को उनके आंतरिक, पारस्परिक संयोजन तथा उनकी पारस्परिक कारणता में देखना सिखाती है। ये बताते हैं कि व्यावहारिक जीवन में उत्पन्न होनेवाली समस्याओं को अधिभूतवादी ( metaphysical ) ढंग से, अन्य से पृथक ( isolated ) रूप में देखना-समझना एक सही नज़रिया नहीं है। अंतर्संबंधित ( interconnected ) समस्याओं और कार्यों को सतत गति तथा विकास में भी देखना चाहिए, क्योंकि स्वयं जीवन, यानि उन्हें जन्म देनेवाली वास्तविकता भी परिवर्तित और विकसित हो रही है।

द्वंद्ववाद के ये नियम सिखलाते हैं कि हमें जीवन के अंतर्विरोधों को नजरअंदाज़ ( ignore ) नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें खोजना, उनका उद्‍घाटन करना तथा उनके समाधान की प्रक्रिया को बढ़ावा देना चाहिए, क्योंकि आंतरिक, बुनियादी अंतर्विरोधों का समाधान ही किसी भी विकास का असली स्रोत होता है। जब हमारा सामना क्रमिक, कभी-कभी महत्त्वहीन, गुणात्मक परिवर्तनों से होता है, तो हमें इस बात पर लगातार ध्यान देना चाहिए कि वे देर-सवेर आमूल गुणात्मक परिवर्तनों को जन्म दे सकते हैं। साथ ही गुणात्मकतः नयी घटनाओं का उद्‍भव पुरानी घटनाओं के पूर्ण उन्मूलन का द्योतक नहीं होता। पूर्ववर्ती विकास के दौरान रचित हर मूल्यवान और जीवंत चीज़, छलांग और निषेध की प्रक्रिया में संरक्षित रहती है तथा और भी अधिक विकसित होती है। समाज के सही वैज्ञानिक, राजनीतिक नेतृत्व का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य यह जानना है कि पुरातन में नूतन के बीजों को कैसे देखा जाये, उन्हें समय रहते कैसे समर्थन दिया जाये तथा विकसित होने एवं उचित स्थान पर पहुंचने में कैसे सहायता दी जाये।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 21 जून 2014

निषेध का निषेध

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम पर चर्चा करते हुए ‘द्वंद्वात्मक निषेध’ को समझने का प्रयास किया था, इस बार हम ‘निषेध के निषेध’ की अवधारणा पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



निषेध के निषेध का नियम - तीसरा भाग
निषेध का निषेध

विकास प्रक्रिया ( development process ) की दार्शनिक व्याख्या में द्वंद्वात्मक निषेध ( dialectical negation ) को ही, केवल निषेध ( negation ) ही कह दिया जाता है, परंतु इसका विशिष्ट अभिप्राय यही होता है। निषेध के सबसे महत्त्वपूर्ण अनुगुण ( properties ) और विशिष्ट लक्षण क्या हैं? 

सबसे पहले, निषेध सार्विक ( universal ) है। यह प्रकृति और समाज में, किसी भी विकास में अंतर्भूत ( immanent ) होता है, ऐसे विकास का एक आवश्यक पहलू है। जैव प्रकृति में शताब्दियों के दौरान हुए विकास में, पुरानी जैविक जातियां उन नयी जातियों से निषेधित हो जाती हैं, जो पुरानी जातियों की बुनियाद पर पैदा होती हैं और उनसे अधिक जीवनक्षम ( sustainable ) होती हैं। समाज के ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में नये और उच्चतर समाजों द्वारा पुरानों का प्रतिस्थापन है - आदिम-सामुदायिक समाज का दास-प्रथा वाले समाज से, दास-प्रथा वाले समाज का सामंती से, सामंती समाज का पूंजीवादी समाज से और पूंजीवादी समाज का समाजवादी समाज से। संज्ञान के क्षेत्र में भी, कुछ वैज्ञानिक प्रस्थापनाएं उन अन्य प्रस्थापनाओं के लिए स्थान छोड़ देती हैं, जिनमें वास्तविकता ( reality ) के संपर्कों का अधिक सही परावर्तन ( reflection ) होता है।

दूसरे, निषेध विरोधियों ( opposites ) की एकता व संघर्ष में अंतर्निहित है। एक अंतर्विरोध ( contradiction ) के विरोधी पक्षों का भिन्न-भिन्न महत्त्व होता है और वे किसी वस्तु या घटना के विकास में भिन्न-भिन्न भूमिकाएं अदा करते हैं। इनमें एक वस्तु या घटना को परिवर्तित करने की और संधान ( colligation ) में होता है और फलतः प्रगतिशील भूमिका ( progressive role ) अदा करता है। दूसरा वस्तु या घटना के स्थायित्व को व्यक्त करता है और इसलिए रूढि़पंथी भूमिका ( orthodox, conservative role ) अदा करता है। निषेध उस आंतरिक अंतर्विरोध का समाधान है, क्योंकि उसमें पुरातन, रूढिपंथी पक्ष पर काबू पा लिया जाता है और नूतन, प्रगतिशील पक्ष प्रभावी हो जाता है।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि निषेध के बिना कोई विकास नहीं होता। कोई भी, किसी भी क्षेत्र में अस्तित्व के अपने पूर्ववर्ती रूपों का निषेध किये बगैर विकसित नहीं हो सकता है। द्वंद्वात्मक निषेध का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण यह है कि यह किसी भी विकास-प्रक्रिया में ही अंतर्निहित ( inherent ) होता है और कभी भी बाह्य या बाहर से समाविष्ट ( incorporated ) किया हुआ नहीं होता।

इस द्वंद्वात्मक निषेध की प्रक्रिया क्या है? यदि बीज से उत्पन्न पौधे के नीचे ज़मीन खोदी जाए तो बीज वहां नहीं मिलेगा। वह कहां गया? नये पौधे की पैदा होने की प्रक्रिया में पहले छोटी-छोटी हरी पत्तियां और नन्हीं-नन्हीं जड़ें उस सामग्री से बनती हैं, जो बीज में मौज़ूद रहती हैं। इस पौष्टिक सामग्री को ढके रहने वाला बाहरी छिलका सचमुच नष्ट हो जाता है और नई वनस्पति की संरचना में शामिल नहीं होता। इस प्रकार बीज के विलोपन की प्रक्रिया में हालांकि एक भाग नष्ट हो जाता है, मगर दूसरा, महत्त्वपूर्ण भाग परिवर्तित रूप में सुरक्षित रहता है : वे अंकुर में परिवर्तित हो जाते हैं। फिर ज्यों ही नन्हीं सी जड़े प्रकट होती हैं, वे आसपास की मिट्टी से अपने लिए पौष्टिक पदार्थ लेने लग जाती हैं, पत्तियां भी हिस्सा लेने लगती हैं और इस तरह एक पौधा प्रकट हो जाता है, जो निश्चित ही बीज का निषेध है। लुप्त बीज की जगह पैदा हुए इस पौधे में बीज से लिए गए पदार्थ ही नहीं, बल्कि आसपास की मिट्टी से लिए गए पदार्थ भी मौज़ूद होते हैं।

द्वंद्वात्मक निषेध में आंतरिक कारक ( internal factors ) निर्णायक भूमिका अदा करते हैं। परंतु उसकी तैयारी के क्रम में, बाह्य कारकों ( external factors ) की भी काफ़ी बड़ी भूमिका हो सकती है। मसलन, अपर्याप्त गर्मी या नमी बीज के विकास को तथा अंकुरित होकर उगनेवाले पौधे से उसके निषेध को विलंबित ( delayed ) कर सकती है या रोक भी सकती है। द्वंद्वात्मक निषेध पुरातन ( old ) का विलोपन ही नहीं करता, बल्कि नूतन ( new ) को प्रभावी भी बनाता है। पुरातन नूतन द्वारा कभी भी पूर्णतः नष्ट नहीं किया जाता, द्वंद्वात्मक निषेध पुरातन के सकारात्मक तत्वों को संरक्षित ( preserved ) रखता है और अतीत के विकास की उपलब्धियां नूतन द्वारा स्वांगीकृत ( assimilated ) हो जाती हैं। द्वंद्वात्मक निषेध का सार यही है कि निषेध किए गये चरण में से कुछ छोड़ दिया जाता है, कुछ ग्रहण कर लिया जाता है ( चाहे परिवर्तित रूप में ही सही ) और कुछ ऐसा नया जोड़ा जाता है, जो पहले बिल्कुल नहीं था।

एक जीव नस्ल के विलोपन और उसके स्थान पर दूसरी नस्ल के आविर्भाव की प्रक्रिया में भी ये तीन तत्व प्रत्यक्षतः पाए जाते हैं। जीवों तथा वनस्पतियों की असंख्य जातियों का, जो करोड़ों वर्षों तक एक दूसरे का स्थान लेती रहीं, अध्ययन करने के बाद भी जीवाश्मविज्ञानियों को इसका कोई प्रमाण नहीं मिला है कि कोई जाति एक बार विलुप्त हो जाने के बाद पुनः उत्पन्न हुई हो। प्रकृति में पूरी तरह आवृति किसी की नहीं होती। यद्यपि बाद में उत्पन्न जातियों में लुप्त जातियों के कुछ लक्षण होते हैं, फिर भी वे हमेशा अपने पूर्वजों के कुछ लक्षणों से वंचित और कुछ सर्वथा नये लक्षणों से युक्त होती हैं। लंबी अवधियों में इन भिन्न लक्षणों का संचय ( accumulation ) पुनः नयी जातियों के आविर्भाव का कारण बनता है। वैज्ञानिक तथ्य इस तत्वमीमांसीय दृष्टिकोण का पूर्णतः खंडन करते हैं कि विकास बारंबार आरंभिक बिंदु पर पहुंचनेवाले एकसमान चक्रों की पुनरावृत्ति, अर्थात चक्राकार गति है।

समाज के विकास में भी नये चरण के आविर्भाव का मतलब पुराने समाज के सभी लोगों, उनके द्वारा निर्मित सभी तकनीकों तथा उनके द्वारा अर्जित सभी जानकारियों का विलोपन नहीं है। यदि सब नष्ट हो जाता है, तो सामाजिक विकास का नया चरण शुरू न होता। नये चरण के समारंभ के लिए आवश्यक है, पुरानी, अनुपयोगी सामाजिक रीतियों, उनके रक्षक राज्य तथा उनकी समर्थक विचारधारा का उन्मूलन ( abolition ), पुराने लोगों का नये समाज में सम्मिलन ( inclusion ) और पूर्ववर्ती चरण में प्राप्त उत्पादन-तकनीकी उपलब्धियों एवं वैज्ञानिक जानकारियों का समुचित उपयोग, गुणात्मक रूप से भिन्न नये उत्पादन संबंधों, नये राज्य तथा नयी विचारधारा का निर्माण ( construction ) और विज्ञान तथा तकनीक की नयी उपलब्धियों के आधार पर अधिक विकसित उत्पादक शक्तियों का सृजन ( creation )।

इस प्रकार हम देखते हैं कि विकास की प्रक्रिया में कोई भी चरण शाश्वत नहीं है। हर चरण देर-सवेर ख़त्म हो जाता है और अगले चरण द्वारा उसका ‘निषेध’ कर दिया जाता है। द्वंद्वात्मक निषेध ( किसी वस्तु या प्रक्रिया के स्वभावगत नियमों के अनुसार होने वाला विकास के चरणों का परिवर्तन ) निषेध किए गये चरण के कालातीत लक्षणों का विलोपन ही नहीं, अपितु उसके कुछ लक्षणों का सुरक्षित रहना और साथ ही ऐसे नये लक्षणों का आविर्भाव भी है, जो पहले कतई नहीं थे। इन्हीं सब कारणों से विकास के चरणों का परिवर्तन अग्रगामी होता है। यद्यपि कोई भी चरण पूरी तरह कभी नहीं दोहराया जाता, फिर भी अधिक बाद के चरणों में काफ़ी पहले के चरणों के लक्षण बदले हुए रूप में दिखाई दे जाते हैं, जिसके फलस्वरूप विकास सर्पिल ( spiral ) बनता है।

विकास की ऊपर वर्णित सभी विशेषताएं निषेध का निषेध ( negation of the negation ) कहलाती हैं। यानि विकास किसी भी प्रक्रिया में केवल एक नहीं, बल्कि कई निषेधों के निषेध, यानि अनेक अनुक्रमिक ( successive ) निषेध होते हैं। वास्तव में, एक गुणात्मक अवस्था से दूसरी अवस्था में होने वाला प्रत्येक संक्रमण ( transition ) पूर्ववर्ती अवस्था का द्वंद्वात्मक निषेध होता है, जिसमें प्रत्येक मूल्यवान ( valuable ) तथा जीवंत ( viable ) चीज़ संरक्षित होती है, प्रतिधारित ( retained ) होती है और बदले हुए गुण में समाविष्ट हो जाती है। इस संरक्षण ( preservation ) और प्रतिधारण ( retention ) को ही सामान्यतः सातत्य ( continuity ) कहते हैं। प्रत्येक नये द्वंद्वात्मक निषेध को सर्पिल की एक नयी कुंडली ( loop ) के रूप में देखा जा सकता है। फलतः सातत्य पुरातन का सीधा-सादा पुनरावर्तन ( repetition ) नहीं है और यांत्रिक उन्मूलन ( mechanical abolition ) भी नहीं है। यह दो विरोधी अनुगुणों की एकता का द्योतक है, अर्थात मूल्यवान तथा जीवंत अनुगुणों के संरक्षण तथा विकास को रोक रहे गतावधिक ( outlived ) अनुगुणों का अस्वीकरण ( rejection ) है। फलतः ‘सातत्य’ एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक प्रवर्ग है, जो किसी भी विकासमान घटना में पुरातन और नूतन के बीच संबंध और अंतर को परावर्तित करता है।

इस तथ्य को कि द्वंद्वात्मक निषेध एक बहुआवर्तित ( multi-repetitive ) प्रक्रिया है, विकास की किन्हीं लंबी प्रक्रियाओं में स्पष्टता से देखा जा सकता है। बारंबार पुनरावृत निषेध ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में भी होता है। प्रत्येक सामाजिक-आर्थिक विरचना ( socio-economic formation ), अपनी पूर्ववर्ती विरचना का द्वंद्वात्मक निषेध होती है। किसी भी विकासमान घटना या प्रक्रिया के सर्पिल की प्रत्येक कुंडली या घुमाव पर नूतन जन्म लेता है, पुराना भंग होता है और साथ ही द्वंद्वात्मक पुनरुत्पादन ( reproduction ) होता है, यानि पूर्ववर्ती विकास में रचित हर मूल्यवान चीज़ का सातत्य होता है और आगे की उन्नति ( advance ) सुनिश्चित होती है। निषेध तथा सातत्य की द्वंद्वात्मक एकता और द्वंद्वात्मक निषेध की रचनात्मक क्रिया इसी में प्रकट होती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 14 जून 2014

द्वंद्वात्मक निषेध

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने द्वंद्ववाद के नियमों के अंतर्गत तीसरे नियम ‘निषेध के निषेध का नियम पर चर्चा करते हुए ‘विकास की दिशा और उसके सर्पिल स्वरूप’ पर बातचीत की थी, इस बार हम ‘द्वंद्वात्मक निषेध’ को समझने का प्रयास करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



निषेध के निषेध का नियम - दूसरा भाग
द्वंद्वात्मक निषेध

द्वंद्ववाद का तीसरा नियम - निषेध के निषेध का नियम ( the law of negation of the negation ) - विकास की प्रक्रिया में निषेध की भूमिका को स्थापित और व्याख्यायित करता है। इसके सार को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम निषेध की अवधारणा को समझ कर इस बारे में सुनिश्चित हो लें कि द्वंद्वात्मक निषेध ( dialectical negation ) का क्या अर्थ है और विकास की प्रक्रिया में उसका क्या स्थान है।

जब किसी बीज से अंकुर फूटता है, तो जो नन्हा सा पौधा पैदा होता है, वह देखने में इतनी सरल बनावटवाला और इतना कमजोर होता है कि हल्की सी चोट भी उसके अस्तित्व को ख़त्म करने के लिए क़ाफ़ी है। किंतु यदि वह बीज बरगद जैसे वृक्ष का हो, तो हम देखते हैं कि सदियां बीत जाती हैं, लोगों की कई पीढि़यां गुजर जाती हैं और वही नन्हा सा पौधा इतने विराट व ज़बर्दस्त वृक्ष में परिवर्तित हो जाता है कि हम उसकी मज़बूती, उसकी जड़ों, तने, टहनियों, पत्तों की जटिल बनावट देखकर दंग रह जाते हैं। हमारी धरती पर अरबों वर्ष पहले पैदा हुए एककोशीय जीव कितने मामूली, अल्पजीवी, कमज़ोर और बनावट तथा व्यवहार की दृष्टि से सरल थे और आधुनिक उच्च विकसित स्तनपायियों की शरीररचना, शरीरक्रिया, मानस तथा व्यवहार कितने अधिक जटिल और टिकाऊ हैं !

ऐसी बात क़दम-क़दम पर देखी जा सकती हैं। प्रकृति और समाज, दोनों का इतिहास इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि विकास पुरातन ( old ) के अवसान तथा नूतन ( new ) के उद्‍भव के साथ जुड़ा है। पृथ्वी की पर्पटी में नयी भौमिक संरचनाएं बनती हैं और वनस्पति और प्राणी जगतों में नये तथा अधिक पूर्णताप्राप्त रूप, पुराने रूपों को प्रतिस्थापित करते हैं। जीव शरीरों में कोशिकाएं पुनर्नवीकृत ( renewed ) होती हैं, यानि पुरानी कोशिकाओं का ह्रास ( deterioration ) होता है और नयी अस्तित्व में आती जाती हैं। मानव समाज भी अपनी आदिम अवस्था से वर्तमान अवस्था तक कितना लंबा फ़ासला तय कर चुका है ! मनुष्यजाति आदिम झुंड़ों, कबिलाई समाजों, दास प्रथा, सामंती और उजरती श्रम ( hired labour ) की व्यवस्था से गुजरती हुई एक लंबा रास्ता तय करके ऐसी अवस्थाओं में पहुंच गई है जहां समानता आधारित सामाजिक व्यवस्था एक जरूरत और हकीकत बनती जा रही है। एक समय था जब मनुष्य पूरी तरह प्रकृति की अनियंत्रित शक्तियों पर निर्भर था और आज उसने नाभिक ऊर्जा समेत इन शक्तियों को मनुष्य की सेवा करने पर बाध्य कर दिया है, कृत्रिम सागरों, वनों और यहां तक कि पृथ्वी के कृत्रिम उपग्रहों की रचना की है।

केवल प्रकृति और ही नहीं, बल्कि स्वयं मानव मन भी परिवर्तित होता है, विश्वदृष्टिकोण ( world outlook ), प्रयत्नों और मनोवेगों में भी फेर-बदल हो जाते हैं। इतनी ही स्तंभितकारी हमारे ज्ञान की प्रगति भी है, जो आज अपनी गहनता, व्यापकता और वृद्धि की रफ़्तार की दृष्टि से हमारे आदिम पूर्वजों के ज्ञान की अपेक्षा अकल्पनीय रूप से उत्कृष्ट ( excellent ) है। नूतन से पुरातन का प्रतिस्थापन ( replacement ) प्रकृति, समाज और चिंतन के क्रम-विकास का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है। द्वंद्ववाद सारी वस्तुओं और घटनाओं में उनके अवश्यंभावी अवसान ( निषेध ) के चिह्न देखता है, उद्‍भव और विनाश की प्रक्रिया से नूतन के आविर्भाव, निम्नतर से उच्चतर में निर्बाध गति को देखता है। निषेध, अर्थात नूतन द्वारा पुरातन का प्रतिस्थापन सर्वत्र होता है।

कभी-कभी किसी एक वस्तु या घटना के सामान्य विनाश को, जिससे वह ख़त्म हो जाती है और उसका विकास बंद हो जाता है, निषेध समझ लिया जाता है। मसलन, यदि एक बीज को पीस दिया जाये, फूलों को कुचल दिया जाये, यदि जंगल और उद्यान काट दिये जायें, तो यह विनाश के समकक्ष होगा। इतिहास में बेहतरी के संघर्षों, यहां तक की पूरी की पूरी सभ्यताओं, संस्कृतियों के सर्वनाश के तथ्य दर्ज हैं। किंतु निषेध को केवल विनाश तक सीमित करना अधिभूतवादियों की लाक्षणिकता है। बेशक, निषेध के ऐसे रूप भी होते हैं। परंतु विकास की प्रक्रिया में निषेध क्रमविकास का निराकरण नहीं करता, बल्कि उसकी दशाओं का निर्धारण करता है। यह पुराने रूपों, चरणों का ऐसा निषेध है, जिसके साथ नये रूपों, चरणों का आविर्भाव नाभिनालबद्ध है। यह विकास की प्रक्रिया का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है, निषेध द्वारा प्रगति में एक सकारात्मक भूमिका अदा की जाती है। निम्नतर रूपों से उच्चतर रूपों की ओर प्रगति ( progress ), विकास के एक चरण के स्थान पर सारतः भिन्न अन्य दूसरे चरण के आने की अन्तहीन प्रक्रिया के फलस्वरूप होती है।

विकास का कोई चरण उसके स्थान पर आनेवाले दूसरे, नये चरण में परिवर्तित कैसे होता है?

अमीबा पर कई हज़ार डिग्री ताप का असर इस जीव का विलोपन ( निषेध ) कर देगा। इससे अमीबा के विकास का नया चरण पैदा नहीं होगा, उल्टे इससे जीवन बिल्कुल समाप्त हो जाएगा और उसके स्थान पर जड़ प्रकृति की भौतिक-रासायनिक प्रक्रियाएं ले लेंगी। अमीबा का स्वभावगत विकास क्रम अमीबा का विभाजन है ( जो कुछ निश्चित परिस्थितियों में होता है ), जिसके परिणामस्वरूप पुराना एककोशीय सूक्ष्मजीव लुप्त हो जाता है ( निषेध ) और उसके स्थान पर दो नई कोशिकाएं, नये सूक्ष्मजीव प्रकट हो जाते हैं। इसी तरह किसी बीज को चारे की तरह पशुओं को खिलाया जाए, या खाने की पौष्टिक चीज़ की तरह मनुष्य खा जाए, तो यह निश्चय ही उस बीज का निषेध, विलोपन होगा। इससे मात्र पशुओं या मनुष्यों के विकास में मदद मिलेगी और जहां तक बीज के स्वभावगत विकास का सवाल है, तो वह यहीं पर ख़त्म हो जाएगा। बीज के स्वभावगत विकास का क्रम यह है कि वह अपने पौधे या वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो।

किसी वस्तु के स्वभावगत नियमों के अनुसार होनेवाले विकास के चरणों के अनुक्रम में, दूसरे चरण के आविर्भाव की प्रक्रिया में ही, पहले चरण के विलोपन को द्वंद्वात्मक निषेध कहते हैं। द्वंद्वात्मक निषेध एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक पुराने गुण का पूर्ण उन्मूलन नहीं होता, बल्कि उसमें जो चीज़ सर्वाधिक मूल्यवान है व सारभूत है तथा घटना के और अधिक विकास को सुनिश्चित बनाने में समर्थ है, उसे संरक्षित रखा जाता है, उसकी पुष्टि की जाती है और वह नये गुण का अंग बन जाता है। इस तरह, एक द्वंद्वात्मक निषेध गुणात्मक संक्रमण ( qualitative transition ) के दौरान होता है। यह यांत्रिक मूलोच्छेदन से, बाह्य शक्तियों के हस्तक्षेप से पैदा हुए विकास चरणों के अनुक्रम से मूलतः भिन्न है, जो गति के दत्त रूप को नष्ट ही करता है। विकास प्रक्रिया की दार्शनिक व्याख्या में इस द्वंद्वात्मक निषेध को ही, केवल निषेध ही कह दिया जाता है, परंतु इसका विशिष्ट अभिप्राय यही होता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय
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