रविवार, 17 सितंबर 2017

समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में 
उत्पादन पद्धति - २
(mode of production as the basis of the development and functioning of society - 2)

उत्पादन कार्य करते समय लोग उत्पादन के संबंधों की स्थापना में भाग लेते हैं, जो उनके संकल्प ( will ) व चेतना ( consciousness ) पर निर्भर नहीं होते। उत्पादन संबंध उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग की प्रक्रिया में लोगों के बीच बनने वाले संबंध हैं। अतः भौतिक संपदा के उत्पादन की प्रक्रिया या उत्पादन की प्रणाली के दो अंतर्संबंधित पक्ष होते हैं - उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) और उत्पादन के संबंध ( relations of production )। उत्पादक शक्तियां उत्पादन पद्धति की अंतर्वस्तु हैं और उत्पादन के संबंध उसका रूप हैं। अंतर्वस्तु किसी भी घटना का निर्धारक या प्रमुख पक्ष होती है। लेकिन रूप भी एक महत्वपूर्ण सक्रिय भूमिका अदा करता है। यह घटना के अनुरूप होने पर उसके विकास को बढ़ावा देता है और जब यह अनुरूपता गड़बड़ा जाती है तो यह विकास में बाधक बन जाता है।

उत्पादन पद्धति के दो पक्षों के बीच एक वस्तुगत ( objective ) व अनिवार्य, यानी नियमसंचालित संबंध होता है। इस संबंध को ऐतिहासिक भौतिकवाद के संस्थापकों ने खोजा, उसका अध्ययन किया और उसे उत्पादन पद्धति के विकास का संचालन करनेवाले विशेष वस्तुगत नियम की शक्ल में निरूपित किया। इस नियम को उत्पादक शक्तियों के स्वभाव तथा विकास स्तर के साथ उत्पादन संबंधों की अनुरूपता ( correspondence ) का नियम कहते हैं। यह इस बात पर बल देता है कि उत्पादन संबंध, उत्पादक शक्तियों के जितने ज़्यादा अनुरूप हों भौतिक उत्पादन उतनी ही सफलता से विकसित होता है। परंतु यह अनुरूपता, निरपेक्षतः पूर्ण तथा स्थिर कभी नहीं होती है। किसी भी उत्पादन पद्धति के सर्वाधिक गतिशील पक्ष ( mobile side ) होने के नाते उत्पादक शक्तियां, देर-सवेर, अपने विकास में उत्पादन संबंधों से आगे निकल जाती हैं। उनके बीच अननुरूपता ( non-conformity ) या सांमजस्यहीनता ( disharmony ) उत्पन्न हो जाती है। उत्पादन संबंध, अपरिवर्तित रहकर उत्पादन में प्रेरक बल ( motive force ) होने की बजाय उसमें बाधक हो जाते हैं और तब नये उत्पादन संबंध बनाने की वस्तुगत आवश्यकता पैदा हो जाती है। इसके फलस्वरूप एक नयी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) उत्पन्न होती है और साथ ही साथ सारे सामाजिक संबंध तथा सामाजिक क्रियाकलाप के अन्य सारे रूपों में भी बदलाव हो जाता है।

जैसा कि हम देखते हैं, उत्पादन संबंध, उत्पादन पद्धति के विकास तथा परिष्करण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। जब हम कहते हैं कि ये संबंध लोगों के संकल्प तथा इच्छाओं से स्वतंत्र रूप में स्थापित होते हैं, तो हम उनके वस्तुगत, भौतिक स्वभाव ( material character ) पर बल देते हैं। किंतु, आख़िरकार, एक दूसरे के साथ संबंध क़ायम करते हुए, उदाहरणार्थ, सहयोग के या प्रतिद्वंद्विता और प्रतियोगिता के, पारस्परिक सहायता या संघर्ष के संबंध क़ायम करते हुए लोग यह समझते हैं कि वे क्या कर रहे हैं और उन्हें अपने कर्मों के बारे में कुछ न कुछ हद तक ज्ञान होता है। तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि उत्पादन पद्धति की प्रक्रिया में बने उनके संबंध वस्तुगत होते हैं?

आइये, उत्पादन संबंधों पर कुछ अधिक विस्तार से विचार करें। उनके निम्नांकित घटक हैं : (१) उत्पादन के बुनियादी साधनों, सर्वोपरि, श्रम के उपकरणों पर स्वामित्व ( ownership ) के संबंध, (२) उत्पादन की प्रक्रिया में उत्पन्न प्रत्यक्ष संबंध, और अंतिम (३) श्रम के उत्पादों के वितरण ( distribution ) से जुड़े संबंध, यानी वितरण के संबंध। उत्पादन के इन सारे संबंधों में निर्धारक है स्वामित्व के संबंध ( property relations ), शेष सब उन पर आश्रित हैं। सामाजिक विकास की किसी भी अवस्था में विद्यमान उत्पादन पद्धति की क़िस्म भी, स्वामित्व की क़िस्म पर निर्भर होती है। स्वामित्व के प्रकारों में भेद के अनुरूप ही उत्पादन पद्धति की पांच मुख्य क़िस्में हैं : आदिम-सामुदायिक, दास-प्रथात्मक, सामंती, पूंजीवादी और समाजवादी।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्वामित्व, जैसा कि पूंजीवादी दार्शनिक और अर्थशास्त्री कहते हैं, वस्तुओं का विशिष्ट लक्षण नहीं है। एक ही मशीन पूंजीवादी व्यवस्था में निजी संपत्ति है और समाजवादी व्यवस्था में सामाजिक संपत्ति। स्वामित्व, उत्पादन के साधनों के संदर्भ में संबंध का एक विशेष रूप है, जो वस्तुगत ऐतिहासिक आवश्यकता के फलस्वरूप लोगों के बीच स्थापित होता है और जो समाज की उत्पादक शक्तियों के विकास के स्वभाव और स्तर पर निर्भर होता है। मसलन, आदिम समाज में पत्थर के औज़ारों का अस्तित्व था, उस हालत में लोग निजी संपत्ति ( private ownership ) तथा पूंजीवादी मुनाफ़े के विनियोजन ( appropriation ) पर आधारित पूंजीवादी संबंधों की स्थापना नहीं कर सकते थे। उस काल में विद्यमान उत्पादक शक्तियों के निम्न स्तर के लिए मुनाफ़े के उत्पादन को सुनिश्चित बनाना असंभव था। इसलिए, उत्पादन के साधनों पर आम स्वामित्व ( common ownership ) पर आधारित आदिम समाज के सामूहिक संबंध उन आदिम लोगों के संकल्प तथा उनकी चेतना द्वारा नहीं, बल्कि भौतिक उत्पादन की शक्तियों के विकास के स्वभाव तथा स्तर के अनुरूप बने थे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 10 सितंबर 2017

समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज के विकास पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा शुरू करेंगे

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में 
उत्पादन पद्धति - १
(mode of production as the basis of the development and functioning of society - 1)

वास्तविक जीवन में, लोग विविध प्रकार के कामधाम करते हैं, जैसे पारिवारिक-घरेलू कार्य और उत्पादन, राजनीतिक, वैज्ञानिक, अध्यापकीय, धार्मिक, सैनिक, क्रीड़ा-कलाप, आदि। इनमें से किसी भी कार्य को संपन्न करने में वे एक दूसरे के साथ कुछ निश्चित संबंध क़ायम करते हैं। पहले के युगों के चिंतकों ने, जो नियमतः समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों ( dominant classes ) के हितों को व्यक्त करते थे, मुख्य भूमिका बौद्धिक क्रियाकलाप ( intellectual activity ) को दी। ऐसा इसलिए हुआ कि बौद्धिक क्रियाकलापों से जुड़ी आत्मिक संस्कृति का उत्पादन, यानी दार्शनिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और अन्य विचारों का विस्तारीकरण प्रभुत्वशाली, शासक वर्गों का विशेषाधिकार ( privilege ) था।

ऐतिहासिक भौतिकवाद की असाधारण उपलब्धि यह समझ है कि समाज के विकास का वास्तविक आधार ( और बौद्धिक क्रियाकलापों सहित अन्य सारी क़िस्मों के कार्यों का आधार ) श्रम की प्रक्रिया, यानी भौतिक संपदा का उत्पादन है। यह प्रस्थापना, जो हमें सरल और बोधगम्य जान पड़ती है, अपने समय के लिए ( जब इसे पेश किया गया था ) समाज के जीवन की समझ में एक वास्तविक क्रांति थी।

जैसा कि हम यहां पहले देख चुके हैं, श्रम और लक्ष्योन्मुख व्यावहारिक कार्यकलाप ही वह मुख्य कारण था, जिसने मनुष्य को जंतु जगत से विलग किया और साथ ही चेतना की उत्पत्ति का आधार था। श्रम ऐतिहासिक विकास और समाज की कार्यात्मकता का आधार है

श्रम प्रक्रिया क्या है? और इसकी संरचना क्या है? इस प्रक्रिया के मूलभूत तत्व निम्नांकित हैं : (१) मनुष्य और उसका ज्ञान व कुशलताएं ; (२) श्रम के औज़ार, यांत्रिक विधियां, उपकरण तथा तकनीकी युक्तियां ; (३) काम की वस्तुएं, जिन्हें मनुष्य प्रकृति से हासिल करता या जिनकी रचना करता और जिन्हें औज़ारों के ज़रिये तैयार माल बनाता है। औज़ारों और श्रम की वस्तुओं को संयुक्त रूप से उत्पादन के साधन ( means of production ) कहा जाता है। वे भौतिक हैं और वस्तुगत रूप में विद्यमान होते हैं। मनुष्य और उसके ज्ञान व कुशलताओं और उत्पादन के समुपयुक्त साधनों से समाज की उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) निर्मित होती हैं। यह उत्पादन का वह पक्ष है, जिससे मनुष्य प्रकृति को प्रभावित करता है। औज़ारो के ज़रिये बाह्य जगत पर क्रिया करते हुए मनुष्य उसे परिवर्तित करता है, बाह्य घटनाओं व प्रक्रियाओं को एक ऐसा रूप प्रदान करता है, जो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक उपयुक्त होता है। अपने परिवेशीय जगत को परिवर्तित करते हुए वह स्वयं को भी परिवर्तित करता है। 

मेहनतकशों के ज्ञान व कुशलताओं में परिवर्तन व विकास, औज़ारों तथा संपूर्ण उत्पादन साधनों में परिवर्तन के बाद आते हैं। इसके फलस्वरूप उत्पादक शक्तियों के विकास का स्तर भी ऊंचा उठता है और वे अधिक अच्छी और परिष्कृत हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, कृत्रिम रेशों जैसी नयी कृत्रिम सामग्री ( श्रम की वस्तु ) की रचना के फलस्वरूप नयी कताई मशीनों का अविष्कार हुआ, उसके लिए नये उत्पादन ज्ञान तथा कुशलताओं की जरूरत पड़ी। अपनी बारी में पश्चोक्त ने इन मशीनों को और उत्पादन की सारी तकनीक को सुधारना संभव बनाया, जिसने सामान्यतः उत्पादन शक्तियों के विकास को बढ़ावा दिया।

इस तरह, हम देखते हैं कि उत्पादक शक्तियों में विशुद्ध भौतिक घटक ( औज़ार, यंत्रादि ), और मानसिक, बौद्धिक घटक ( उत्पादन का ज्ञान व कुशलताएं ) दोनों शामिल हैं, किंतु उत्पादन के विकास का प्रमुख, निर्धारक पक्ष भौतिक घटक है। इससे भी अधिक, श्रमिक रूपी मनुष्य प्रमुख उत्पादक शक्ति है, क्योंकि औज़ारों को काम में लानेवाला वही है और वही उत्पादन के समस्त साधनों को परिवर्तित करने में भी योग देता है। हमारे युग में, उत्पादक शक्तियों के विकास के विकास के लिए विशेष वैज्ञानिक ज्ञान की ज़रूरत होती है। यही कारण है कि विज्ञान एक प्रत्यक्ष उत्पादक शक्ति बन रहा है और ज्ञान की भूमिका लगातार बढ़ रही है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 3 सितंबर 2017

प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज का विकास

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधारों के रूप में मनुष्य व उसके क्रियाकलाप पर चर्चा की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि समाज का विकास एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया है।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज का विकास
( development of society as a natural-historical process )

एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज के विकास का सिद्धांत इस प्रश्न का उत्तर देता है कि मानव क्रियाकलाप के दोनों पक्षों, भौतिक ( material ) और प्रत्ययिक ( ideal ), में से कौन सा पक्ष प्राथमिक और निर्धारक है और कौनसा पक्ष द्वितीयक और निर्धारित है।

प्रकृति में जारी प्रक्रियाओं में से कोई भी मनुष्य के संकल्प ( will ) व उसकी चेतना पर निर्भर नहीं होती। वे सब वस्तुगत ( objective ) या प्राकृतिक होती हैं। अतः, प्रकृति की घटनाओं का विनियमन ( govern ) करनेवाले नियम वस्तुगत हैं। क्या समाज के विकास के वस्तुगत नियम, यानी ऐसे कुछ नियम हो सकते हैं, जो जनगण की चेतना पर निर्भर नहीं होते? याद रहे कि लोगों के क्रियाकलाप में दो पक्ष होते हैं - भौतिक और प्रत्ययिक। इतिहास की भौतिकवादी समझ इस प्रश्न का स्वीकारात्मक उत्तर देती है। इतिहास के अनुभव का सामान्यीकरण ( generalisation ) करते हुए यह समझ इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि सामाजिक विकास के नियम उतने ही वस्तुगत ढंग से और अनिवार्यतः काम करते हैं, जितने कि प्रकृति के नियम, मात्र बुनियादी अंतर यह है कि वे लोगों के क्रियाकलाप के ज़रिये संक्रिया ( operate ) करते हैं। यही कारण है कि समाज के विकास को एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया कहा जाता है।

यह हो सकता है कि लोग इससे अवगत ( aware ) न हो कि उनके क्रियाकलाप, उनके संकल्प तथा इरादों से परे अंततः वस्तुगत सामाजिक नियमों से संचालित होते हैं। ऐसे मामलों में, वे कहते हैं कि समाज स्वतःस्फूर्त ढंग से ( spontaneously ) विकसित होता है। स्वतःस्फूर्तता का यह मतलब नहीं है कि लोग नितांत अचेतन ढंग से ( unconsciously ) काम करते हैं। सामान्य, स्वस्थ लोगों के लिए ऐसा करना बिल्कुल असंभव है। स्वतःस्फूर्त अवस्था में लोगों को केवल अपने सीधे व्यक्तिगत तथा समूहगत लक्ष्यों की जानकारी होती है और वे उन्हीं को निरूपित करते हैं तथा उन्हें हासिल करने के लिए ऐसे साधनों का चयन करते हैं, जो सामाजिक विकास के नियमों पर निर्भर नहीं होते। इस मामले में ऐसा भी हो सकता है कि उनके क्रियाकलाप के परिणाम निश्चित लक्ष्यों के अनुरूप ( correspond ) न हों। जब लोग सामाजिक विकास के वास्तविक, सच्चे नियमों के प्रति सचेत ( conscious ) हों, तो उनके क्रियाकलाप समुचित अर्थों में सचेत होते हैं। सचेत सामाजिक क्रियाकलाप की अवस्था में ही उसके परिणाम लक्ष्यों के अधिकाधिक अनुरूप होते हैं और वे उन्हें प्राप्त कर पाते हैं, क्योंकि इस मामले में स्वयं लक्ष्यों को वस्तुगत ऐतिहासिक नियमितताओं पर समुचित ध्यान देकर प्रस्तुत व निरूपित किया जाता है।

एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में इतिहास की संकल्पना ( concept ) मानव क्रियाकलाप के भौतिक पक्ष की निर्धारक भूमिका की मान्यता ( recognition ) पर आधारित है। साथ ही, यह इस तथ्य को भी ध्यान में रखती है कि इस क्रियाकलाप का आत्मिक/प्रत्ययिक पक्ष महत्वपूर्ण सक्रिय भूमिका निभाता है। यह भौतिक पक्ष पर सुस्पष्ट प्रभाव डाल सकता है, हालांकि यह प्रभाव स्वयं लोगों की जीवन क्रिया की भौतिक दशाओं से निर्धारित एवं सीमित होता है। प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के इन दो पक्षों की अंतर्क्रिया ( interaction ) तथा पारस्परिक प्रभाव को अच्छी तरह से समझने के लिए निम्नांकित महत्वपूर्ण प्रस्थापनाओं ( propositions ) को ध्यान में रखने की जरूरत है।

"...‘इतिहास’ ऐसा कोई विशिष्ट व्यक्तित्व नहीं है, जो स्वयं अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मनुष्य को एक साधन की शक्ल में इस्तेमाल करता हो ; इतिहास, अपने लक्ष्यों का अनुसरण करते हुए मनुष्य के क्रियाकलाप के सिवा और कुछ नहीं है।"

"...मानवजाति अपने लिए हमेशा केवल ऐसे ही कार्यभार ( tasks ) निर्धारित करती है, जिन्हें वह संपन्न कर सकती है। कारण यह है कि मामले को ग़ौर देखने पर हम पायेंगे कि स्वयं कार्यभार केवल तभी उपस्थित होता है, जब उसे संपन्न करने के लिए जरूरी भौतिक परिस्थितियां पहले से तैयार होती हैं, या कम से कम तैयार हो रही होती हैं।"

उपरोक्त प्रस्थापनाओं से यह बात आसानी से समझ में आ जाती है कि सामाजिक चेतना तथा सामाजिक विकास के लक्ष्यों और कार्यभारों के निरूपण ( formulation ) की कितनी बड़ी भूमिका है। और साथ ही यह भी कि इन कार्यभारों का स्वभाव तथा अंतर्वस्तु ( content ), भौतिक दशाओं से तथा मानव क्रियाकलाप के साधनों से निर्धारित होती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि ऐतिहासिक भौतिकवाद का विरोध करनेवाले वस्तुस्थिति को विरूपित ( distort ) करते हैं, मानव क्रियाकलाप के प्रत्ययिक, मानसिक पक्ष के महत्व का समुचित आकलन नहीं कर पाते हैं, वे या तो उसे अतिरिक्त महिमामंडित ( glorify ) करते हैं या उसके महत्व का अवआकलन ( underestimate ) करते हैं। इसके साथ ही, वे यह भी नहीं समझ पाते हैं कि इतिहास की वास्तविक अंतर्वस्तु के रूप में लोगों के सोद्देश्य क्रियाकलाप को समुचित मान्यता देने से, इस वास्तविकता के साथ कोई अंतर्विरोध या खंडन नहीं होता कि इस क्रियाकलाप का निर्धारक पक्ष ( determinant side ) भौतिक दशाएं तथा उनके क्रियान्वयन के साधन ( means of realisation ) हैं।

हम यहां पहले भूतद्रव्य ( matter ) तथा चेतना के संबंध पर विचार करते समय प्रमाणित कर चुके हैं कि भूतद्रव्य वह वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) है, जो मस्तिष्क के उत्पादों से परे ( outside ) तथा उनसे स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान ( independently exist ) है। इसके विपरीत चेतना ( consciousness ) मस्तिष्क के क्रियाकलाप का परिणाम है और इस अर्थ में आत्मगत ( subjective ) है। इस वर्णन के साथ सादृश्य ( analogy ) के अनुसार ही हम आगे मानव क्रियाकलाप के वस्तुगत यानी भौतिक, और प्रत्ययिक यानी मानसिक पक्षों के बारे में तथा सामाजिक विकास के वस्तुगत और आत्मगत कारकों ( factors ) के बारे में भी चर्चा करेंगे। उनकी अंतर्क्रिया की बेहतर समझ हासिल करने के लिए हमें मानव क्रियाकलाप के विविध रूपों की सविस्तार जांच करनी होगी तथा उनके आधार में निहित वस्तुगत नियमों को प्रकाश में लाना होगा।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

शनिवार, 26 अगस्त 2017

मनुष्य व उसके क्रियाकलाप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां विषय-प्रवेश करते हुए भाववादी दृष्टिकोणों की कुछ मूल प्रस्थापनाओं और उनकी सीमाओं को प्रस्तुत किया था, इस बार हम इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधारों के रूप में मनुष्य व उसके क्रियाकलाप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य व उसके क्रियाकलाप 
( man and activity )
इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधार
( preconditions for the materialist conception of history )

ऐतिहासिक भौतिकवाद के प्रमुख उसूल ( principles ) क्या हैं? समाज व उसके इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना का क्या आशय है?

उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें उस प्रस्थान-बिंदु या आधारिका को निर्धारित व परिभाषित करना होगा, जहां से हम अपने विचार-विमर्श की शुरुआत कर सकते हैं। मानव क्रियाकलाप के विशिष्ट लक्षण क्या हैं?

प्रकृति में सारे परिवर्तन वस्तुगत ( objective ) होते हैं। वे चिंतन ( thought ) या किसी भी प्रकार की चेतना ( consciousness ) से जुड़े हुए नहीं होते हैं। इसके विपरीत, मनुष्य के क्रियाकलाप का मुख्य विशिष्ट लक्षण यह है कि उसकी प्रत्येक क्रिया में दो अंतर्संबंधित पक्ष ( interconnected aspects ) होते हैं : भौतिक ( material ) और प्रत्ययिक ( ideal ), जिसमें चिंतन भी शामिल है। नींद या रुग्ण, अचेतावस्था में किये गये कृत्यों को छोड़कर, एक स्वस्थ, सामान्य व्यक्ति की कोई भी क्रिया चेतना के किसी कृत्य के साथ जुड़ी होती है। कार्य कर सकने से पहले एक व्यक्ति अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित करता है। यह लक्ष्य किसी ऐसी चीज़ के बारे में एक बिंब, संकल्पना या धारणा होता है, जिसका अस्तित्व नहीं है, किंतु जिसके लिए उसे प्रयास करना ही है। व्यक्ति का लक्ष्य कुछ वस्तुएं हासिल करना, एक मकान बनाना, आदि हो सकता है। एक श्रम समष्टि का लक्ष्य किसी उत्पादन प्रक्रिया को सुधारना, एक नया औद्योगिक समुच्चय बनाना, आदि हो सकता है। एक समाज का लक्ष्य जीवन की भौतिक दशाओं को बदलना और एक नयी समाज व्यवस्था बनाना हो सकता है।

संक्षेप में, संपूर्ण क्रियाकलाप और क्रियाकलाप का प्रत्येक घटक, दो पक्षों, भौतिक और प्रत्ययिक पक्षों का एक एकत्व ( unity ) होता है। एक व्यक्ति की कोई भी भौतिक क्रिया ( चलना-फिरना, लकड़ी चीरना, खराद पर काम करना, आदि ) यह मांग करती है कि किये गये कार्यों का आशय समझा जाये, क्रियाकलाप के क़ायदों की जानकारी हो, कुछ कुशलता प्राप्त हो तथा कार्य करनेवाले को अपने लक्ष्य की जानकारी हो। इन बातों के बिना मनुष्य के क्रियाकलाप असंभव हैं। इसके विपरीत, भौतिक दैहिक क्रियाकलाप के बिना, भौतिक साधनों और औज़ारों के उपयोग के बिना, व्यक्ति का एक भी विचार, एक भी लक्ष्य कार्यान्वित नहीं हो सकता है। एक व्यक्ति के स्वयं विचार भी, किसी अन्य की समझ के लिए केवल भाषाई क्रियाकलाप से ही सुलभ हो सकते हैं, जो कि एक नितांत भौतिक क्रिया है। इस प्रकार मनुष्य के क्रियाकलाप में भौतिक और प्रत्ययिक पक्ष घनिष्ठता से जुड़े और अविभाज्य हैं। यह एक द्वंद्वात्मक एकता ( dialectical unity ) है, जिसमें प्रतिपक्षी ( opposites ) एक दूसरे को संपूरित ( supplement ) करते हैं और अंतर्गुथित ( intertwine ) होते हैं।

परंतु प्रश्न उठता है कि मानव क्रियाकलाप के भौतिक और प्रत्ययिक पक्षों के संबंध में प्राथमिक और निर्धारक ( determinant ) कौन है?

जहां तक इस प्रश्न का संबंध है, अंग्रेज इतिहासकार तथा दार्शनिक कॉलिंगवुड ( १८८९-१९४३ ) ने दावा किया कि मनुष्य के क्रियाकलाप में मुख्य चीज़ उसका ‘आंतरिक पक्ष’, यानी विचार, भावनाएं, प्रेरणाएं, इरादे, लक्ष्य तथा सचेत निर्णय हैं। ‘बाह्य पक्ष’, यानी संवेद द्वारा प्रत्यक्षीकृत ( sense-perceived ) भौतिक कर्मों व क्रियाओं पर केवल उसी सीमा तक विचार करने की ज़रूरत है, जिस सीमा तक वे मानव चेतना की गहराई में पैठने में सहायता करती हैं। उनके दृष्टिकोण से, इतिहास को समझने का अर्थ लोगों के प्रयोजनों, इरादों तथा लक्ष्यों को समझना है। यह इतिहास की लाक्षणिक भाववादी संकल्पना ( idealist conception ) है। इसके आधार पर यह स्पष्ट करना असंभव है कि मिलती-जुलती ऐतिहासिक दशाओं में लोगों के बीच मिलते-जुलते लक्ष्य, आकांक्षाएं और इरादे कैसे विकसित हो जाते हैं ; ये लक्ष्य, आकांक्षाएं और इरादे भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों और वर्गों के सदस्यों के बीच भिन्न-भिन्न क्यों होते हैं ; और अंतिम, कुछ निश्चित दशाओं में लोगों के कुछ लक्ष्य तथा इरादे कार्यान्वित किये जा सकते हैं और कुछ अन्य कार्यान्वित नहीं होते और अनेपक्षित परिणामों पर और यहां तक कि उल्टे परिणामों पर क्यों पहुंचा देते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य अपने को, अपनी जीवन क्रिया की भौतिक दशाओं से, केवल कल्पना में ही अलग कर सकता है।

समाज के जीवन के विशिष्ट स्वभाव तथा इतिहास को समझने के लिए, मानव क्रियाकलाप को भौतिक और प्रत्ययिक, दोनों पक्षों को एक एकत्व के रूप में, एक को दूसरे से पृथक किये बिना तथा उन्हें एक दूसरे के मुक़ाबले में रखे बग़ैर, उनके अंतर्संयोजन ( interconnections ) में देखना अनिवार्य है। इसके वास्ते इस प्रश्न का जवाब देना जरूरी है कि इस क्रियाकलाप का कौन सा पक्ष प्राथमिक और निर्धारक है और कौनसा पक्ष द्वितीयक और निर्धारित है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 20 अगस्त 2017

समाज के भाववादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

जैसा कि पिछली बार कहा गया था, हम यहां ऐतिहासिक भौतिकवाद पर एक शृंखला शुरू कर रहे हैं। इस बार यहां विषय-प्रवेश करते हुए, अगली बार से हम विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सामाजिक सत्ता और सामाजिक चेतना के अंतर्संबंधों को समझने की कोशिश करते हुए चर्चा को आगे बढ़ाते रहेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज की भौतिकवादी संकल्पना और इसका इतिहास

समाज के भाववादी/प्रत्ययवादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

( idealist and materialist conceptions of society )

जिस तरह कि हम भूतद्रव्य ( matter ) और चेतना ( consciousness ) के मामले में पहले देख चुके हैं, सामाजिकआस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) के बीच संबंध और प्राथमिकता वाले प्रश्न, यानी कि किस चीज़ को आद्य ( primitive ), प्राथमिक, निर्धारक, दुनिया का आधार माना जाये - सत्ता या चेतना को? का उत्तर सभी कालों के दार्शनिकों को दो मूल विरोधी शिविरों - भौतिकवादी और भाववादी - में विभाजित कर देता है। इन मूल धाराओं की कई थोड़ी अलग-अलग धाराएं अस्तित्व में आती जाती हैं जो कि कुछ सैद्धांतिक मत-भिन्नताएं रखती हैं फिर भी उनके सारतत्व ( essence ) के अनुसार वे अंततः किसी एक धारा के अंतर्गत पहचानी जा सकती है।

समाज के भौतिकवादी और भाववादी दृष्टिकोणों के बीच मूलभूत अंतर को स्पष्ट करने के लिए हम यहां उनकी कुछ मूल प्रस्थापनाओं को देख सकते हैं।

आत्मगत भाववादियों ( subjective idealists ) के अनुसार भौतिक वस्तुएं एक दूसरे से मिलती जुलती होती हैं किंतु लोगों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी अद्वितीय व्यष्टिकता ( inimitable individuality ) है, जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) करती है। वे निष्कर्ष निकालते हैं कि लोगों के क्रियाकलाप के कोई वस्तुगत ( objective ) नियम नहीं होते क्योंकि वे व्यक्तिगत अद्वितीय लक्ष्यों द्वारा निर्देशित होते हैं। और जो भी अद्वितीय तथा सांयोगिक है, वह नियमों से संचालित नहीं हो सकता। इसलिए वे समाज में मुख्य चीज़, उसके लक्ष्य ( aims ), संकल्प ( will ) तथा अलग-अलग लोगों के इरादों को मानते हैं। यह धारा सबसे अधिक दिलचस्पी महान व्यक्तियों में दिखाती है क्योंकि वे समूहों को अपनी और आकृष्ट करते हैं, एक ऐसे चयनित पथ पर उनका नेतृत्व करते हैं जिसका कोई पूर्वज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि वे रचनात्मक व्यक्ति होते हैं। इनका मानना है कि समाज के विकास के बारे में बातें करना निरर्थक है, केवल अलग-अलग व्यक्तियों के विकास की ही बातें की जा सकती हैं।

वस्तुगत भाववादी ( objective idealists ) उपरोक्त से भिन्न यह सोचते हैं कि लोग सामान्य नियमों के अधीन हैं और उनसे संचालित होते हैं। परंतु ये सामान्य नियम, विचारों के, सामाजिक चेतना के विकास के नियम हैं जो हर युग में व्यक्तियों, व्यष्टिक कामनाओं ( desires ) और संकल्पों को संचालित करते हैं। मसलन, मध्ययुग में लोग बड़े पैमाने पर धर्मप्रवण थे क्योंकि ईश्वर का प्रत्यय ( idea ) प्रभावी था। इंगलैंड और फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति की पूर्वबेला में स्वतंत्रता का विचार प्रमुख था और बुर्जुआ वर्ग ने सामंतवादी राज्य-तंत्रों के ख़िलाफ़ संघर्ष में इसका उपयोग किया। इनके अनुसार इसी तरह हमारे युग में यदि सार्विक कल्याण तथा वर्ग भ्रातृत्व ( class brotherhood ) के विचार आम हो जाते हैं और अगर वे लोगों के मन में घर कर लेते हैं, तो वर्ग संघर्ष ( class struggle ) सहित सारा संघर्ष ख़त्म हो जायेगा और मौजूदा सामाजिक प्रणाली हमेशा के लिए अभिपुष्ट ( confirmed ) हो जायेगी। दूसरे शब्दों में, लोग हमेशा किन्हीं विचारों के अनुसार व्यवहार करते हैं। जरूरी सिर्फ़ यह है कि इन विचारों को सही ढंग से समझा जाये।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) इन दोनों मतों के अधिभूतवादी उपागम ( metaphysical approach ) को सामने लाता है। ये मत अधिभूतवादी इसलिए हैं कि ये यथार्थता ( reality ) के एक पक्ष ( aspect ) को लेकर उसे दूसरे पक्षों के मुक़ाबले में रख देते हैं और इस तरह यथार्थ को समग्रता ( totality ) में नहीं देख पाते। आत्मगत और वस्तुगत भाववाद यह नहीं समझा सकते हैं कि समाज दासप्रथात्मक, सामंतवादी, पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं से ही होकर क्यों गुजरता है? यदि समाज में वस्तुगत नियम और प्रतिमान ( pattern ) नहीं हैं, तो इंगलैंड, फ्रांस, अमरीका, नीदरलैंड आदि देशों में संपन्न पूंजीवादी क्रांतियों के लक्षणों की समानताओं का क्या कारण है? यदि सब कुछ व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता पर निर्भर है, तो विश्व में समाज के विकास का प्रतिरूप लगभग एक जैसा क्यूं है और क्यों कुछ देशों ने समाजवाद की राह पकड़ी?

भाववाद इस तथ्य का कोई सार्थक स्पष्टीकरण नहीं दे पाता है कि कि एक युग में कुछ विचार प्रमुख होते हैं और दूसरे युग में दूसरे विचार और बहुधा विरोधी विचार प्रमुख हो जाते हैं। मसलन, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का विचार, प्राचीन काल में उत्पन्न क्यों नहीं हो सकता था? इसके अलावा, भाववादी विचार यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि अवाम एक ऐतिहासिक युग में कुछ नेताओं का अनुसरण ( follow ) करते हैं और अन्य के दृष्टिकोणों ( views ) तथा आह्वानों ( calls ) को ठुकरा देते हैं। इतिहास में ऐसी अवधियां थीं, जब अवाम ने स्वयं अपनी ही पांत के लोगों की अगुआई में चलनेवाले सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया।

आत्मगत और वस्तुगत भाववाद इनमें से किसी भी प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं देते हैं, जबकि ऐतिहासिक भौतिकवाद, जो सामाजिक समस्याओं की अत्यधिक जटिलता ( complexity ) को मान्यता देता है, ऐसे सिद्धांतों को प्रतिपादित करता है जो कि अपनी सक्रिय स्थिति को विकसित और विस्तारित ( elaborate ) कर सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

शनिवार, 12 अगस्त 2017

एक नई शृंखला की शुरुआत

एक नई शृंखला की शुरुआत


हे मानवश्रेष्ठों,

हम यहां काफ़ी समय पहले दर्शन पर एक शृंखला प्रस्तुत कर चुके हैं। दर्शन की उस प्रारंभिक यात्रा में हमने दर्शन की संकल्पनाओं ( concepts ) तथा दर्शन और चेतना के संबंधों को समझने की कोशिश की थी। तत्पश्चात हमने यहां उसे ही आगे बढ़ाते हुए, द्वंद्ववाद ( dialectics ) पर, जिसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के अंतर्गत समझा जाता है, पर एक शृंखला यहां प्रस्तुत की थी। वह सामग्री यहां उपलब्ध है ही, साथ ही उस सामग्री के समेकित पीडीएफ़ डाउनलोड़ लिंक ‘दर्शन और चेतना’ तथा ‘द्वंद्ववाद-समग्र-द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ भी साइड़बार में प्रदर्शित है। इच्छुक मानवश्रेष्ठ उससे पुनः गुजर सकते हैं।

अब हमारी योजना है कि दर्शन पर उस शृंखला को आगे बढ़ाया जाए और सामाजिक अस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) को समझने के प्रयासों के संदर्भ में इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना यानी ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) के ज्ञान और सिद्धांत से परिचित होने की कोशिशें शुरू की जाएं।

दर्शन का बुनियादी सवाल यह होता है कि परिवेशीय जगत के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और क्या मनुष्य उसे जान तथा परिवर्तित कर सकता है। इस तरह इस सवाल का पहला पक्ष परिवेश के साथ उसके संबंधों से है और आम तौर पर इसे इस तरह निरूपित किया जाता है कि आसपास की वास्तविकता ( reality ) या भूतद्रव्य ( matter ) के साथ चेतना और चिंतन का संबंध क्या है?  पूर्व में हम यहां पर भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर ‘दर्शन और चेतना’ शीर्षक से प्रस्तुत सामग्री के अंतर्गत चर्चा कर चुके हैं। किंतु मनुष्य समाज में रहता है और उसे सामाजिक विकास के नियमों में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी होती है। उन्हें समझने के लिए दर्शन के बुनियादी सवाल को सामाजिक जीवन के संदर्भ में जांचना आवश्यक है। इसका मतलब यह है कि हमें सामाजिक अस्तित्व या सत्ता और सामाजिक चेतना के बीच संबंध का और इस बात का स्पष्टीकरण देना होगा कि जनगण के क्रियाकलाप और समाज के इतिहास में, इनमें से प्राथमिक और निर्धारक ( primary and determining ) तत्व क्या है। इसका उत्तर हमें ऐतिहासिक भौतिकवाद यानी इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना से प्राप्त होता है।

हम इस नई श्रृंखला में ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा इससे संबंधित विभिन्न संकल्पनाओं/अवधारणाओं को समझने की कोशिश करेंगे। हम देखेंगे कि सामान्य जीवन में हम इन दार्शनिक अवधारणाओं से अपरिचित होते हुए भी, जीवन से मिली सीख के अनुसार ही भौतिकवादी चिंतन और पद्धतियों का प्रयोग करते हैं, निर्णय और तदनुकूल व्यवहार भी करते हैं। परंतु यह भी सही है कि कई बार, कई जगह हम अपने वैचारिक अनुकूलनों ( conceptual conditioning ) के प्रभाव या सटीक विश्लेषण-संश्लेषण ( analysis-synthesis ) के अभाव के कारण कई परिघटनाओं ( phenomena ) की समुचित व्याख्या नहीं कर पाते, सही समझ नहीं बना पाते और तदनुकूल ( accordingly ) ही हमारे निर्णय और व्यवहार भी प्रभावित होते हैं। इस श्रृंखला से गुजरकर हम निश्चित ही, अपनी चिंतन प्रक्रिया और व्यवहार को अधिक सटीक तथा अधिक बेहतर बनाने में अधिक सक्षम हो पाएंगे, अपने व्यक्तित्व और समझ का परिष्कार ( refinement ) कर पाएंगे।

आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत रहेगा ही।

शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 4 सितंबर 2016

प्रकृति और समाज-श्रॄंखला समाप्ति-पीडीएफ़ पुस्तिका

हे मानवश्रेष्ठों,

प्रकृति और समाज’ पर चल रही श्रृंखला अब समाप्त होती है। कुछ ही समय में फिर किसी नयी श्रॄंखला की यहां पर शुरुआत की जाएगी। कोई सार्थक सामग्री प्रस्तुत की जाएगी।



प्रकृति और समाज - श्रॄंखला समाप्ति - पीडीएफ़ पुस्तिका

जैसा कि यहां की परंपरा है, ‘प्रकृति और समाज’ पर प्रस्तुत सामग्री को पीडीएफ़ पुस्तिका के रूप में उपलब्ध करा दिया गया है। नीचे प्रस्तुत लिंक से इसे डाउनलोड किया जा सकता है। इसे साइड बार में भी डाल दिया गया है, जहां ये बाद में भी उपलब्ध रहेगा ही।

प्रकृति और समाज - हिंदी - डाउनलोडेबल पीडीएफ़
nature and society - in hindi - free downloadable pdf - size 313kb - 28page



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
Related Posts with Thumbnails

ताज़ातरीन प्रविष्टियां