शनिवार, 17 अप्रैल 2010

क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर, थोड़ी सी कम रूचिपूर्ण पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थापना पर चर्चा की थी। इस बार जैसा कि पिछली बार कहा था, हम देखेंगे कि चिंतन और चेतना को कंप्यूटर के संदर्भ में हम कहां पाते हैं। क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

चलिए शुरू करते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित हैं।
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क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकता है?

वर्तमान में विज्ञान के क्षेत्र में साइबरनेटिकी, सूचना सिद्धांत, कृत्रिम बुद्धि का सिद्धांत, आदि का विकास द्रुत इलैक्ट्रोनिक कंप्यूटरों के निर्माण से जुड़ा हुआ है। इनका विशिष्ट लक्षण यह है कि अन्य यंत्रों से भिन्न इन्हें मनुष्य के दैहिक श्रम के बजाए मानसिक श्रम को हल्का करने के लिए बनाया गया। आधुनिक कंप्यूटर अपने पूर्वर्तियों से हजारों गुना श्रेष्ठ हैं, और एक सेकंड़ में करोड़ो संक्रियाएं कर सकते हैं। सुपर कंप्यूटर भी हैं, जो बेहद अल्प समयावधि में ऐसी अत्यंत जटिल तार्किक तथा संगणकीय संक्रियाएं कर सकते हैं जिनमें सूचना का विराट परिणाम निहित होता है।

सूचना सिद्धांत और कृत्रिम बुद्धि सिद्धांत कंप्यूटरों के लिए ऐसे जटिल प्रोग्रामों के विकास में मदद कर रहे हैं, जिन्हें विशिष्ट कृत्रिम गणितीय भाषाओं में लिखा जाता है और जो एक समस्या का समाधान करते समय कंप्यूटर द्वारा की जाने वाली संक्रियाओं के सेट और अनुक्रम का निर्धारण करने वाले हजारों नियमों के समुच्चय होते हैं। आधुनिक कंप्यूटर उत्पादन प्रक्रिया की एक बड़ी संख्या तथा बेहद जटिल गणनाओं को पूर्णतः स्वचालित करने में समर्थ होते हैं। अपने प्रोग्राम स्वयं बना सकने वाले ऐसे कंप्यूटर हैं, जो उनमें प्रविष्ट कराये गये प्रोग्रामों के आधार पर उनसे बेहतर प्रोग्राम बाणा लेते हैं, वे प्रोग्रामरों द्वारा की हुई ग़लतियां सुधारते हैं और अन्य स्वचालित इलैक्ट्रोनिक यंत्रों की रचना भी कर सकते हैं। इस समय संसार में लाखों इलैक्ट्रोनिक स्वचालित यंत्र तथा रोबोट काम कर रहे हैं। इस क्षेत्र में निरंतर कार्य चल रहा है, नये और अधिक जटिल प्रोग्राम बन रहे हैं और अधिक सटीक व द्रुततर कंप्यूटर तथा संचालन यंत्र बन रहे हैं।

इस सिलसिले में अक्सर यह प्रश्न उठते हैं कि क्या कंप्यूटर सोच-विचार कर सकते हैं? क्या एक इलैक्ट्रोनिक मशीन में चेतना और चिंतन का अस्तित्व हो सकता है? क्या वे मनुष्य की तर्कबुद्धि तथा अक़्ल को प्रतिस्थापित कर सकती हैं? क्या वे चिंतनशील सत्व के रूप में मनुष्य को ही तो विस्थापित नहीं कर देंगे? इन प्रश्नों की केवल दार्शनिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक-राजनीतिक संगतता भी है। कृत्रिम बुद्धि के सिद्धांत के क्षेत्र में खोजबीन, जटिल कार्यों को संपन्न करने में समर्थ विशेषज्ञ प्रणालियों की रचना और स्वचालित रोबोटों के निर्माण में बहुत तरक़्क़ी हो जाने के बावज़ूद, कम से कम निकट भविष्य में, इस तरह की आशंका के लिए कोई आधार नहीं हैं।

चलिए हम इस समस्या पर चिंतन और चेतना के स्वभाव के विश्लेषण की दृष्टि से देखते हैं। मनुष्य के मानसिक क्रियाकलाप में उसके उच्चतम रूप, निश्चित नियमों के अनुसार होने वाला तार्किक चिंतन ही शामिल नहीं है, बल्कि यथार्थता के परावर्तन के अनेक भावनात्मक रूप ( जैसे सुख, क्रोध, भय, संतोष, प्रेम, मैत्री, शत्रुता, भूख, तुष्टि, आदि ) और विविध प्रकार की अचेतन मानसिक प्रक्रियाएं भी शामिल हैं।

इसी तरह मनुष्य की रचनात्मकता ( creativity ) विशेष दिलचस्पी की चीज़ है। यह एक ऐसी घटना ( phenomenon ) है, जो पहले से निर्धारित क़ायदों से संनियमित ( governed ) नहीं होती। इसके विपरीत इस रचना प्रक्रिया में ही, इसके दौरान ही नये क़ायदे बनाए जाते हैं, गुणात्मकतः नये विचारों तथा सक्रियता के उसूलों को विकसित किया जाता है। यदि ऐसा न होता, तो लोग पशुओं की तरह आनुवंशिकता से उन तक संप्रेषित क्रियाकलाप के अंतर्जात ( innate ) प्रकारों के एक ही समुच्च्य को लगातार करते रहते। रचनात्मकता मनुष्य की मानसिक, चित्तवृतिक ( psychic ) विशेषता ही है, जो पर्यावरण को गुणात्मकतः परिवर्तित करने की, कोई सर्वथा नई चीज़ रचने की उसकी क्षमता में व्यक्त होती है और जो उसे अन्य सारे जीवित प्राणियों से मूलतः विशिष्ट बना देती है

यहां एक ऐसी सुस्पष्ट सीमा रेखा है, जो सर्वोत्तम कंप्यूटरों तथा किसी भी सामान्य व्यक्ति की संभावनाओं को विभाजित करती है। कंप्यूटर स्वयं चिंतन नहीं कर सकता है, वह पूर्ण परिपथों और इलैक्ट्रोनिक यांत्रिक विधियों के ज़रिए सिर्फ़ उन क़ायदों का पालन करता है, जो मनुष्य द्वारा उसमें ड़ाले गये प्रोग्रामों में शामिल होते हैं। कंप्यूटर संक्रियाओं की गति के मामले में और अपनी स्मृति ( स्मृति की युक्तियां ), अपनी अनथकता में और अनेक वर्षों तक काम करने की क्षमता, आदि में मनुष्य से बेहतर होता है। किंतु, जैसा कि हम जानते हैं, रचना प्रक्रिया को पूर्णतः क़ायदों के मातहत नहीं रखा जा सकता है और उनके जरिए वर्णित नहीं किया जा सकता है. इसलिए उसका प्रोग्रामन करके उसे कंप्यूटर के ‘हवाले’ नहीं किया जा सकता है। जाहिर है कि विज्ञान, इंजीनियरी तथा कला को रचना के बिना विकसित नहीं किया जा सकता है : इसी तरह, वास्तविक चिंतन भी उसके बिना असंभव है

कोई भी कंप्यूटर, नियत क़ायदों के मुताबिक संगीत बनाने वाला कंप्यूटर भी, ए. आर. रहमान को प्रतिस्थापित नहीं कर सकता है। बोधगम्य पाठ तैयार करने के लिए प्रोग्रामित कंप्यूटर प्रेमचंद की कृति ‘गोदान’ नहीं लिख सकता है। कुल मिला कर लाबलुब्बोआब यह कि एक कंप्यूटर सामान्यतः ऐसी कोई समस्या नहीं सुलझा सकता है, जो उसमे प्रविष्ट कराये गए प्रोग्राम में शामिल नहीं हो।

विक्टर ह्यूगो के पंद्रहवीं सदी के अंत की घटनाओं का वर्णन करने वाले एक उपन्यास ‘नोत्रे देम’ का एक पात्र एक पांडुलिपी तथा एक छपी हुई पुस्तक की तुलना करते हुए यह आशंका व्यक्त करता है कि छापे की मशीन ( जिसका अविष्कार हुआ ही था ) के कारण लोग लिखना भूल जाएंगे और साक्षरता लुप्त हो जाएगी। आज हम जानते हैं कि यह आशंका और भविष्यवाणी सत्य साबित नहीं हुई। पढ़ना-लिखना जानने लोगों की संख्या संसार भर में लगातार बढ़ रही है, शिक्षा का सामान्य स्तर बढ़ रहा है और ऐसा छापे की मशीन के कारण ही हो रहा है।

‘चिंतनशील’ कंम्प्यूटरों के बारे में भी इससे मिलती जुलती कोई बात कही जा सकती है। कुछ कलनीय तार्किक संक्रियाओं को निष्पादित करके रोबोट व कंम्प्यूटर लोगों को दैनंदिन, उबाऊ तथा भारी काम से छुटकारा दिलाते हैं। जिस प्रकार पुस्तक प्रकाशन से सार्वभौमिक साक्षरता में वृद्धि हुई, उसी प्रकार से कंम्प्यूटरों का फैलाव मानव चिंतन के और अधिक विकास को बढ़ावा दे रहा है। एक सही और सामाजिक प्रतिबद्धता से सम्पन्न व्यवस्था में इसके सदुपयोग के द्वारा लोगों की शिक्षा और संस्कृति में और उनकी रचनात्मक क्षमताओं के विकास में छलांगनुमा प्रगति ही होगी।

कंप्यूटर के द्वारा मानवजाति को अपने मानसिक क्रियाकलाप को विकसित और परिष्कृत बनाने की दिशा में तथा जनगण की विशाल बहुसंख्या के हित में विश्व को समझने तथा तर्कसम्मत ढ़ंग से इसे बदलने की दिशा में एक और कदम बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसलिए कंम्प्यूटरों के और विशेषतः सूक्ष्म इलैक्ट्रोनिकी के विकास में मानव चिंतन के प्रतिद्वंद्वी के ख़तरे को नहीं, बल्कि उसके और अधिक विकास तथा सुधार के आधारों को देखना चाहिए।

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इस बार इतना ही।
अगली बार हम चेतना संबंधी इस श्रृंखला का समाहार प्रस्तुत करने की कोशिश करेंगे।

विषयगत आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का सापेक्ष स्वभाव

हे मानवश्रेष्ठों,

पिछली बार हमने मानव चेतना के आधार के एक रूप में भाषा और इसके जरिए चिंतन के विकास पर चर्चा की थी। इस बार हम भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर, थोड़ी सी कम रूचिपूर्ण पर एक महत्वपूर्ण प्रास्थापना पर चर्चा करेंगे। चेतना पर शुरू हुई यह श्रृंखला धीरे-धीरे अपने अंत की ओर बढ़ रही है।

चलिए शुरू करते हैं। यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित हैं।

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भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का सापेक्ष स्वभाव
( the Relative character of the Opposition of Matter and Consciousness )


अब तक का श्रृंखलित विवेचन, दर्शन के बुनियादी सवाल के जवाब के मद्देनज़र चेतना की उत्पत्ति और भूतद्रव्य के साथ उसके संबंधों की विस्तृत पड़ताल कर रहा था। हमने यह जाना कि भूतद्रव्य के विपरीत चेतना शाश्वत नहीं है। यह भूतद्रव्य के विकास का एक उत्पाद है। यह भी कि चेतना भूतद्रव्य के एक विशेष अनुगुण, अर्थात परावर्तन ( reflection ), का उच्चतम और सर्वाधिक जटिल रूप है।

भूतद्रव्य चेतना के बिना विद्यमान हो सकता है और क्रमिक विकास के दौरान चेतना से पहले मौजूद था, किंतु चेतना भूतद्रव्य के बिना अस्तित्वमान नहीं हो सकती है। इस अर्थ में यह द्वितीयक तथा व्युत्पन्न है, और इसी में भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता निहित है। हमारे गिर्द वस्तुएं भौतिक हैं, जबकि चेतना ( जो हमारे मस्तिष्कों में उत्पन्न होती है ) प्रत्ययिक ( ideal ) है, इसमें भी इनकी प्रतिपक्षता व्यक्त होती है। परंतु यह प्रतिपक्षता स्वयं में निरपेक्ष ( absolute ) नहीं, वरन सापेक्ष ( relative ) होती है। यह प्रतिपक्षता दर्शन के बुनियादी सवाल के संदर्भ में ही सार्थक है, यानि जब हमें यह जानने में दिलचस्पी होती है कि इनमें से कौन प्राथमिक है, चेतना भूतद्रव्य से कैसे संबधित है और क्या यह हमारे परिवेशीय जगत को जान सकती है।

मान लीजिए के हम अपने आसपास की वस्तुओं पर विचार कर रहे हैं, उन्हें जांच रहे हैं और उनका अध्ययन कर रहे हैं। चूंकि वे हमसे परे हैं और हमारे चेतना पर निर्भर नहीं हैं और हम अपने संवेद अंगों के जरिए उनके बारे में सूचना प्राप्त करते हैं, इसलिए हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि ये सब भूतद्रव्य ( matter ) हैं, यानि वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) हैं। इन वस्तुओं के बिंब, उनकी संकल्पनाएं और हमारे ज्ञान को व्यक्त करने वाले निर्णय और कथन हमारे मस्तिष्क में हैं, हमारी चेतना के अंग हैं और उस अर्थ में आत्मगत ( subjective ) हैं। इसलिए कुछ दशाओं में आत्मगतता, वस्तुतः हमारी चेतना में वस्तुगत यथार्थता का परावर्तन है। और इसी अर्थ में, चेतना, वस्तुगत यथार्थता के रूप में भूतद्रव्य के प्रतिपक्ष में है।

अब आगे यह मान लीजिए कि अपनी दिलचस्पी की भौतिक वस्तुओं के हमारे अध्ययन के दौरान कोई अन्य व्यक्ति हमारा निरिक्षण कर रहा है, हमें जांच रहा है और हमारे क्रियाकलाफ पर विचार कर रहा है। इस व्यक्ति और उसकी चेतना के लिए हम स्वयं और हमारे मस्तिष्क व उनके क्रियाकलाप उतने ही भौतिक हैं, जितने कि हमारे परिवेशीय जगत की अन्य वस्तुएं। फलतः वह हमें और हमारे मस्तिष्कों के क्रियाकलाप के उत्पादों को वस्तुगत यथार्थता मान सकता है, ऐसी चीज़ समझ सकता है, जो उसकी चेतना से परे तथा उसके मानसिक क्रियाकलाप के बाहर है। अतएव, हमारे क्रियाकलाप के संदर्भ में हमारा चिंतन और मन एक तरफ़ तो हमारे मस्तिष्क के परावर्तन के रूप में काम करते हैं और दूसरी तरफ़ , एक अन्य प्रेक्षक के लिए उसी समय वह उसकी चेतना से परे की वस्तुगत यथार्थता के रूप में भी हो सकते हैं। इसी तरह अपनी बारी में, हम भी इस प्रेक्षक की चेतना तथा मानसिक क्रिया को, ठीक वैसे ही, वस्तुगत यथार्थता मान सकते हैं।

इस तरह, हम देखते हैं कि भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों को तय करते वक्त, वस्तुगत और आत्मगत एक दूसरे के प्रतिपक्ष में स्पष्टतः खड़े होते हैं और इसी से यह दर्शाया जा सकता है कि चेतना द्वितीयक और भूतद्रव्य से व्युत्पन्न है, कि चेतना वस्तुतः भूतद्रव्य के दीर्घकालिक विकास का उत्पाद है।

हमने यह भी देखा कि यह प्रतिपक्षता सापेक्ष होती है, और चिंतन तथा मानसिक क्रियाकलाप की संकल्प तथा अनुभूतियों जैसी अन्य अभिव्यक्तियों के वैज्ञानिक अध्ययन के वक्त इस प्रतिपक्षता को अतिरंजित करना भारी भूल होगी। चूंकि मन, मनुष्य के भौतिक क्रियाकलाप में, काम में, भाषा संबंधी क्रियाकलाप आदि में प्रकट होता है, इसलिए भूतद्रव्य और चेतना की, दैहिक और मानसिक की प्रतिपक्षता तथा एक का दूसरे से पूर्ण बिलगाव, चेतना तथा अन्य मानसिक घटनाओं के वैज्ञानिक अध्ययन में ही बाधक होगा। भूतद्रव्य और चेतना की प्रतिपक्षता का स्वभाव सापेक्ष होता है। दर्शन के बुनियादी सवाल से निपटने के बाद इन्हें इसी अंतर्द्वंद में देखना चाहिए।
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इस बार इतना ही।
अगली बार हम चर्चा को आगे एक रूचिकर मोड़ देंगे और इस पर चर्चा करेंगे कि क्या कंप्यूटर भी सोच विचार कर सकते हैं। उसके बाद श्रृंखला का समाहार प्रस्तुत करेंगे।

विषयगत आलोचनात्मक संवाद और जिज्ञासाओं का स्वागत है।

समय
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