शनिवार, 28 अगस्त 2010

जीवों द्वारा उपार्जित व्यवहार के रूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां अनुकूलित संबंध और सहज-क्रियाओं पर चर्चा की थी इस बार जीवों द्वारा उपार्जित व्यवहार के कुछ अन्य रूपों पर एक नज़र ड़ालेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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जीवों द्वारा उपार्जित व्यवहार के रूप

उच्चतर जीवों, विशेषतः स्तनपायियों में व्यवहार के नये, अधिक लचीले रूप पाये जाते हैं। एक ही जाति के भीतर विभिन्न सदस्यों के बीच अस्थायी संबंधों के निर्माण में ही व्यष्टिक भेद होते हैं, वे सहजवृत्ति-जन्य भेदों की तुलना में ज़्यादा स्पष्ट बन जाते हैं। कुछ व्यष्टिक सदस्य जीवों में अनुकूलित संबंध दूसरों के मुकाबले पहले पैदा हो सकते हैं। कशेरुकी, निम्नतर जीवों की अपेक्षा कहीं ज़्यादा अनुकूलित संबंध विकसित कर सकते हैं। यह स्पष्टतः देखा गया है कि विकासक्रम में जो जीव जितनी ही ऊंची सीढ़ी पर होगा, उसके अनुकूलित संबंध उतने ही पेचीदे और लचीले होंगे।

मछलियां प्रकाश, रंग, आकार, ध्वनि और स्वाद की अनुक्रियास्वरूप अपेक्षाकृत आसानी से अनुकूलित संबंध बना लेती हैं। किंतु ये संबंध ज़्यादा लचीले नहीं होते। उदाहरण के लिए, छोटी मछली को देखते ही पाइक मछली में तेज़ी से जो शिकारमूलक प्रतिक्रिया विकसित होती है, उसे ख़त्म कर पाना कठिन होता है। एक प्रयोग में छोटी मछलियों को कांच की पारदर्शी दीवार द्वारा पाइक से अलग किया गया, मगर पाइक फिर भी काफ़ी समय तक दीवार से टक्कर मारती रही और यह स्थिति तब तक जारी रही, जब तक एक नया अनुकूलित संबंध नहीं बन गया। अपनी बारी में यह नया संबंध भी तब भी जारी रहा, जब कांच की दीवार को हटा दिया गया। अब पाइक की अपने आसपास तैर रही छोटी मछलियों में कोई दिलचस्पी ही नहीं रह गई।

अनुकूलित संबंध काफ़ी कड़े हो सकते हैं और बदलते हुए परिवेश में अवयवी के व्यवहार पर उनका नगण्य-सा ही प्रभाव पड़ता है। जैव उदविकास में परावर्तन की अगली अवस्था व्यवहार की नयी कसौटी के स्वतंत्र विकास पर आधारित लचीले व्यवहार के अधिक परिष्कृत रूपों का प्रकट होना है। व्यवहार में नमनीयता लाने के लिए जीव के लिए परिवेश के अलग-अलग गुणों ( तापमान, रंग, गंध इत्यादि ) का ही नहीं, समस्त वस्तुपरक स्थितियों का विश्लेषण और संश्लेषण करना आवश्यक है।

यदि हम मुर्गी के सामने कुछ दानें बिखेरें और दानों तथा मुर्गी के बीच एक जालीदार चौखटा खड़ा कर दें, तो मुर्गी जाली को तोड़कर दानों तक पहुंचने की कोशिश करेगी। मगर ऐसी ही स्थिति में विकास के उच्चतर स्तर पर स्थित पक्षी ( उदाहरणार्थ, कौआ या मैगपाई ) दूसरे ढ़ंग से व्यवहार करेंगे। वे जाली के पार से दानों को सीधे उठाने की कुछ असफ़ल कोशिशों के बाद, जाली की बगल से जाकर दाने उठा लेंगे।

पहले मामले में व्यवहार सहजवृत्तिमूलक प्रोग्राम पर आधारित है, जबकि दूसरे मामले में स्थिति के विश्लेषण पर। यह दूसरे प्रकार का व्यवहार स्तनपायियों में विशेष स्पष्टता के साथ दिखायी देता है, जब जीव पूरी स्थितियों को जानकर तथा उनका विश्लेषण करके अपने को बदलती अवस्थाओं के अनुकूल बनाने और व्यवहार का नियमन करने लगता है। सहजवृत्ति पर आधारित व्यवहार-संरूपों के साथ-साथ उच्चतर जीव अन्य प्रकार के व्यवहार भी दिखाते हैं, जो अलग-अलग जीवों में अलग-अलग होते हैं। ये व्यवहार-संरूप हैं आदतें और बौद्धिक क्रियाएं

आदतों से आशय जीवों की उन क्रियाओं से है, जो अनुकूलित संबंधों पर आधारित हैं और स्वतः की जाती हैं। सहजवृत्तियों की भांति आदतें विकास के निम्नतर चरण में भी पायी जाती हैं, किंतु उनकी स्पष्ट अभिव्यक्ति वे केवल उन जीवों के व्यवहार में पाती हैं, जिनमें प्रमस्तिष्कीय प्रातंस्था विकसित हो चुकी है। जीव-जंतुओं की आदतों के प्रेरक घटकों में जाति के अनुभव को पुनर्प्रस्तुत करने वाली सहज हरकतें और सांयोगिक हरकतों की पुनरावृत्ति के जरिए मजबूत बनें अनुकूलित प्रतिवर्त शामिल हो सकते हैं। नीचे दिये गये उदाहरणों से हरकतों के इन रूपों का स्वरूप जाना जा सकता है।

जानवरों को साधने वाला आसानी से ख़रगोश को ढ़ोल बजाना सिखा सकता है। यह एक विशिष्ट हरकत है : साल में एक निश्चित समय पर सभी खरगोश जंगल में ठूंठों या गिरे हुए पेड़ो के तनों, आदि को ढ़ोल जैसे बजाते हैं। दूसरी प्रकार की हरकतों की मिसाल चेन से बंधे कुत्ते की प्रेक प्रतिक्रियाएं हैं। एक प्रयोगकर्ता ने कुत्ते के सामने गोश्त का टुकड़ा रखा, किंतु वह कुत्ते की पहुंच से बाहर था। गोश्त एक रस्सी से बंधा हुआ था और रस्सी कुत्ते की पहुंच में थी। उत्तेजना के कारण पंजों से खरोंचने की कुछ असफल हरकतें करने के बाद कुत्ते ने संयोगवश रस्सी खींच ली और गोश्त को पकड़ लिया। बार-बार किये जाने पर्यह हरकर आदत बन गई और कुत्ते ने खाने को बिना किसी कठिनाई के पाना सीख लिया। इसके बाद गोश्त को कुत्ते के अगले पैरों की पहुंच से बाहर रखा गया। पुराने तरीके से गोश्त को पाने में असफल रहकर कुत्ते ने पीठ फेरी और पिछले पैर से रस्सी खीच ली, और उसे गोश्त मिल गया।
 ( साथ का चित्र देखें )


यह प्रयोग दिखाता है कि जानवर द्वारा सीखी हुई आदतों से, बदली हुई स्थितियों में भी काम लिया जा सकता है। दत्त मामले में प्रयोग की परिस्थितियां और पेचीदी हो गई थीं, किंतु कुत्ते ने अपने वांछित लक्ष्य को पाने के लिए आदत को आगे के पैरों से पिछले पैरों में अंतरित करके परिवर्तन के अनुरूप प्रतिक्रिया दिखाई।

इस तरह आदतें एक दूसरी से तात्विकतः भिन्न हो सकती हैं साथ ही एक ओर वे सहजवृत्तियों से मिलती-जुलती ( अपने स्वचालित स्वरूप के कारण ) हो सकती हैं वहीं दूसरी ओर, व्यवहार के बौद्धिक रूपों से समानता रखने वाली हो सकती हैं।

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इस बार इतना ही। अगली बार हम पशुओं में बौद्धिक व्यवहार के कुछ रूपों पर चर्चा करेंगे।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 21 अगस्त 2010

अनुकूलित संबंध और सहज-क्रियाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां व्यवहार के सहज रूप और सहजवृत्तियों पर हमने एक चर्चा शुरू की थी जिसे विस्तार से समझने के लिए इस बार इसे और आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि इनकी सीमाएं लांघ कर जीव किस तरह अनुकूलित संबंध विकसित करते हैं।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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अनुकूलित संबंध और सहज-क्रियाएं

उल्लेखनीय है कि कतिपय सहजवृत्तियां एक जाति के सभी प्राणियों में समान होने पर भी, अपने को उनमें से हरेक में कुछ अलग ढ़ंग से प्रकट करती है। सहजवृत्तियों के साकारीकरण में ऐसी सापेक्ष असमानता की बदौलत ही जाति अपने परिवेश में सहसा परिवर्तन होने की सूरत में जीवित रह पाती हैं। युवा प्राणियों की सहजवृत्तिमूलक क्रियाओं का प्रेक्षण दिखाता है कि ये क्रियाएं बिना किसी पूर्व-प्रशिक्षण के और मानक ढ़ंग से की जाती हैं। किंतु उनमें थोड़ा-सा कुशलता का अभाव भी होता है। उनके व्यष्टिक विकास की प्रक्रिया में उनकी क्रियाओं की प्रभावोत्पादकता बढती जाती है और इस तरह उनका जीवनानुभव उनके व्यवहार के अंतर्जात प्रोग्राम की पूर्ति में सहायक बनता है।


प्रकृतिविज्ञानियों ने पाया है कि कीट अपने जीवनकाल में बहुत सारे अनुकूलित संबंध विकसित करते हैं। ये संबंध विभिन्न ग्राहियों के कार्य का परिणाम हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, वे गति-संकेतों पर आधारित शारीरिक क्रियाओं की स्मृति अथवा वस्तुओं के रंग या आकार की चाक्षुष स्मृति से व्युत्पन्न हो सकते हैं।

मिसाल के लिए, यदि हम मधुमक्खियों के छत्ते को उसकी जगह से दो मीटर दूर हटा दें , तो फूलों का रस और पराग लेकर घर लौट रही मधुमक्खियां उस जगह हवा में एकत्र होंगी, जहां छत्ता पहले स्थित था। कई मिनट तक वे काल्पनिक द्वार के गिर्द मंडराएंगी और इसके बाद ही छत्ते की ओर मुड़ेंगी। इसका मतलब यह है कि दिक् में मधुमक्खियां मुख्यतः गति-संकेतों से निदेशित होती हैं और दृष्टि का उपयोग केवल असफलता की सूरत में करती हैं। वे आसानी से अनुकूलित संवेदनशीलता विकसित कर लेती हैं, जिससे उन्हें फूलों की आकृतियों में, विभिन्न वस्तुओं के चमकने की मात्राओं में अंतर करने में मदद मिलती है।

प्रेक्षणों ने दिखाया है कि कीटों के सबसे अच्छे अनुकूलित संबंध उन उत्तेजकों के सिलसिले में बनते हैं, जो सामान्यतः व्यवहार के सहजवृत्ति-जन्य प्रोग्रामों को प्रवर्तित करते हैं।

प्रयोगों में पाया गया कि मधुमक्खियों को जटिल डिज़ायनों की बजाए त्रिभुजों और चतुर्भुजों के बीच भेद करना सिखाना कहीं अधिक कठिन है। अप्रत्याशित से लगने वाले ये परिणाम वास्तव में जटिल ज्यामितीय आकृतियों के जैव महत्व के परिचायक हैं, क्योंकि मधुमक्खियां जिन फूलों से मधु एकत्र करती हैं, वे उनकी आकृति से साम्य रखती हैं।

अतः गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्रवाले जीव उन वस्तुओं के मामले में अस्थायी संबंध बड़ी आसानी से विकसित कर लेते हैं, जिनके गुण जैविक दृष्टि से महत्वपूर्ण संकेत होते हैं : आश्रित संबंध केवल सहजवृत्तिमूलक व्यवहार प्रोग्रामों के दायरे में ही बनाए जाते हैं

व्यवहार के सहजवृत्तिमूलक रूप आर्थोपोडा में ही नहीं , सभी उच्चतर कशेरुकियों ( मछलियों, उभयचरों, सरीसृपों तथा स्तनपायियों ) में पाये जाते हैं। मछलियों की कतिपय जातियां अपनी संतान को बचाने की बड़ी ही जटिल सहजवृत्ति का प्रदर्शन करती हैं।

उदाहरण के लिए, नर स्टिकलबैक जलाशय के तल में एक गड्ढ़ा बनाता है, उसमें नीचे शैवाल बिछाता है, पानी में उगने वाले ज़्यादा बड़े पौधों की पत्तियों से उसकी दीवारें तथा छत बनाता है और अपने शरीर की श्लेष्मा से उन्हें चिपकाता है। इसके बाद वह मादा को अंडे देने के लिए उसमें धकेलता है और तब तक गुफा की रक्षा करता है, जब तक अंडों से पोने नहीं निकल आते।

संतान को पालने, जनने, खिलाने, बचाने, आदि से संबंधित बड़ी जटिल सहजवृत्तियां अधिकांश कशेरुकियों में पाई जा सकती है। पक्षियों और स्तनपायियों में नीड़-निर्माण और शिशुओं की देखभाल की सहजवृत्ति बहुत ही कार्यसाधक प्रतीत होती है। किंतु यह कार्यसाधकता पूर्णतः बाह्य कारकों पर निर्भर होती है तथा बड़ी सतही है। सहजवृत्ति-जन्य क्रियाओं की एक पूरी श्रृंखला को जन्म देने वाली निश्चित परिस्थितियों में किंचित् परिवर्तन आने पर सारा विशद कार्यक्रम गड़बड़ा जाता है। पक्षी अपने शावकों को छोड़ सकते हैं और स्तनपायी अपने बच्चों को दांतों से काटकर मार सकते हैं।

जीवजंतुओं के सहजवृत्ति-जन्य प्रतिरक्षात्मक व्यवहार में भी अत्यधिक जड़ता देखी जाती है। इसकी अनगिनत मिसाले हैं। उनमें से एक यह है।

उत्तरी अमरीका में काली खालवाला एक छोटा जीव पाया जाता है, जिस पर अन्य जीव हमला करने की हिम्मत नहीं करते। वे उसकी काली पीठ पर बनी सफ़ेद धारी के कारण उसे दूर से ही पहचान जाते हैं। इस जीव को स्कंक कहते हैं। उसके शरीर में एक ऐसी ग्रंथि होती है, जिससे बहुत ही बदबूदार द्रव निकलता है। ज्यों ही उसे कोई ख़तरा महसूस होता है, वह शत्रु की ओर पीठ कर देता है, फिर पूंछ उठाता है और बदबूदार द्रव का ऐसा गुबार छोड़ता है कि बड़े से बड़ा हिंस्र जानवर भी घंटों तक होश में नहीं आ पाता।

इस जीव को एक अलग ही जलवायु का आदी बनाने का फ़ैसला किया गया। पहले उसके बच्चों को बाड़ों में रखा गया और लोगों द्वारा उनकी देखभाल किये जाने के लिए उनकी उक्त ग्रंथियां निकाल दी गईं। फिर उन्हें वन में छोड़ दिया गया। मगर जब कुत्ते उनपर हमला करने लगे, तो उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की, बल्कि पीछा करने वालों की ओर पीठ कर दी और इस तरह आसानी से उनका शिकार बन गये। बाद में उनकी देखभाल करने के अन्य तरीक़े खोजे गये और उनकी ग्रंथियां निकालना बंद कर दिया गया।

सहज प्रतिक्रियाएं, सामान्य उद्दीपनों की अनुक्रियास्वरूप पैदा होती हैं, जो व्यवहार के जन्मजात संरूपों को सक्रिय बनाते हैं। इस संबंध में जीव-जंतुओं के व्यवहार के सहज रूपों का अध्ययन करने वाले कुछ जीव-पारिस्थितिकीविदों की खोजें काफ़ी दिलचस्प हैं। वे दिखाती हैं कि सहज क्रियाएं सर्वथा निश्चित संकेतों का परिणाम होती हैं

उदाहरणार्थ, मेंढ़क ज्यों ही अपने सामने किसी कीट को हरकत करते देखता है, त्यों ही वह उस पर झपट पड़ता है। यह एक तेज़ी से चलते क्षोभक से संबंधित प्रतिक्रिया है, यदि हम पतले धागे पर कागज़ का टुकड़ा बांधकर मेंढ़क के आगे हिलायें, तो मेंढ़क निश्चय ही उसकी ओर लपकेगा। स्तनपायियों में भी सहजक्रियाएं किसी एक क्षोभक के उत्तर में शुरू होती हैं और विभिन्न जातियों के जीवों की विभिन्न उद्दीपनों के संबंध में वही प्रतिक्रिया हो सकती है।

मिसाल के लिए, मालूम है कि बच्चा कुत्ते का हो या भेड़ का, वह पैदा होते ही मां के स्तन खोजने लगता है और ज्यों ही वह मिल जाता है, त्यों ही ताक़त लगाकर उसे चूसने लग जाता है। पाया गया है कि इन क्रियाओं के प्रोग्रामों पर अमल विभिन्न संकेतों के फलस्वरूप शुरू होता है। पिल्ला केवल गरम रोयों पर ही प्रतिक्रिया दिखाता है। यदि हम कुतिया की जगह पर गरम पानी की बोतल रख दें, तो पिल्ला कोई खोजमूलक प्रतिक्रियाएं पैदा नहीं करेगा। किंतु यदि एक गरम खाल का टुकड़ा रख दिया जाए, तो वह तुरंत मां का स्तन खोजने लग जाएगा।

मेमना सिर के ऊपरी भाग के ढ़के जाने पर प्रतिक्रिया करता है। जब उसके मुंह में दूध पिलाने की बोतल लगाई गई, तो उसने चूसने की कोई क्रिया नहीं की, किंतु जब साथ ही उसके सिर के ऊपरी भाग को ढ़का गया, तो वह बोतल को तुरंत चूसने लगा।

अतः सहज क्रियाएं बड़ी संख्या में विविध क्षोभकों का परावर्तन नहीं होती, वे सिर्फ़ निश्चित संकेतों का परिणाम होती हैं। कहा जा सकता है कि वे कशेरुकियों की परावर्तन क्षमता को सीमित कर देती हैं। कशेरुकियों में एक नलिकाकार तंत्रिका-तंत्र ( मेरूरज्जु और प्रमस्तिष्क सहित ) विकसित होता है, जो उनकी परिवेशीय परिवर्तनों के अनुरूप प्रतिक्रिया करने की योग्यता को और बढ़ा देता है। गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र वाले जीवों की तुलना में कशेरुकियों में ग्राहियों का विभेदीकरण ( विशिष्टीकरण ) कहीं ज़्यादा होता है। उदविकास की प्रक्रिया द्वारा पेश की गई संभावनाओं को मात्र सहज व्यवहार द्वारा ही यथार्थ में परिणत नहीं किया जा सकता। इस हेतु परावर्तन कई नये आयाम विकसित करता है।

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इस बार इतना ही। अगली बार हम इन नये आयामों के रूप में अवयवियों द्वारा उपार्जित व्यवहारों के उदाहरणों पर चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

व्यवहार के सहज रूप और सहजवृत्तियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां क्षोभनशीलता पर हम एक संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया गया था। इस बार व्यवहार के सहज रूप और सहजवृत्तियों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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व्यवहार के सहज रूप और सहजवृत्तियां


( पिछली बार हमने क्षोभनशीलता पर चर्चा करते हुए गुच्छिकीय तंत्रिका-तंत्र वाले जीवों में बाह्य क्षोभकों पर प्रतिक्रियास्वरूप उत्पन्न सक्रियता को समझने की कोशिश की थी। यही उनका व्यवहार सुनिश्चित करती है। इस बार हम जीवों के व्यवहार के इन्हीं संरूपों को, उनके उत्सों को समझने की कोशिश करेंगे। यहां प्रचलित दृष्टिकोणों से अलग से लगते कुछ इशारे मिल सकते हैं, जो अपना एक वैज्ञानिक आधार रखते हैं। इसलिए थोड़ी सी एकाग्रता और गंभीरता की दरकार है )



कृमियों का व्यवहार सीलेंटरेटा की अपेक्षा अधिक जटिल होता है। उनके व्यवहार की मुख्य विशेषता सक्रिय खोज है।

उदाहरण के लिए, केंचुए पहले गिरे हुए पत्तों को उनके नुकीले सिरों से पकड़ते हैं और इसके बाद ही उन्हें अपने छिद्रों में खींचते हैं। अनेक अनुसंधानों ने दिखाया है कि कृमियों का "सोद्देश्य" व्यवहार पत्ते के सिरे पर मौजूद रासायनिक पदार्थ की प्रतिक्रिया है, न कि पत्ते के आकार की प्रतिक्रिया। कृमियों में हमें जातीय स्मृति की अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति मिलती है, जो अपने को सहज अननुकूलित प्रतिवर्तों में प्रकट करती है। उदाहरण के लिए, कतिपय एनेलिडा प्रजातियों की मादाएं अपने बच्चों की देखभाल की आनुवंशिक क्षमता प्रदर्शित करती हैं। वे अपनी वासयोग्य नलिका के भीतर अंडे देने के बाद अपने को ज़ोर से इधर-उधर हिलाने लगती हैं और इस तरह भ्रूणों के सांस लेने के लिए नलिका में ताज़ा पानी पहुंचाती हैं।

किंतु यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि अननुकूलित प्रतिवर्त सर्वथा सुनिश्चित परिवेशीय परिस्थितियों में ही पैदा होते हैं। दूसरी ओर, परिवेश निरंतर बदलता रहता है और इसलिए जातीयतः निर्धारित आनुवंशिक प्रतिक्रियाओं के अमली रूप लेने में बाधा पड़ सकती है। गुच्छिकामय तंत्रिका-तंत्रों वाले जीवों की परावर्तन-योग्यताएं अननुकूलित प्रतिवर्तों तक ही सीमित नहीं है। अपने जीवनकाल में वे बाह्य प्रभावों से संबंधित अनुक्रिया के नये रूप विकसित करते हैं, जो सहज प्रतिक्रियाओं से अधिक लचीले होते हैं। ये अनुकूलित प्रतिवर्त हैं।

यद्यपि सीलेंटरेटा भी अस्थायी संबंध ( अनुकूलित प्रतिवर्त ) विकसित कर सकते हैं.फिर भी कृमियों के अनुकूलित प्रतिवर्त स्पष्टतः उच्चतर श्रेणी के हैं, क्योंकि वे एक निश्चित सुनम्यता का प्रदर्शन करते हैं ( इसके बावज़ूद कि उन्हें भी अपने पैदा होने के लिए बड़ी संख्या में तरह-तरह के क्षोभकों की जरूरत होती है )।

एक प्रयोग किया गया, जिसमें कृमियों को अपने छिद्र तक पहुंचने के लिए लैटिन के T अक्षर के आकार की भूलभुलैया से बाहर निकलने का रास्ता खोजना था। जब निकास दायें सिरे पर होता था और कृमियों को बायीं ओर से बिजली का झटका दिया जाता था, तो वे १२०-१८० प्रयोगों के बाद दायीं ओर मुड़ना सीख जाते थे। बाद में जब बिजली के तारों को दूसरे सिरे पर स्थानांतरित किया गया और निकास को बायें सिरे पर रखा गया, तो कृमियों ने अपनी अनुक्रिया को तदअनुसार बदल लिया। मगर यह उल्लेखनीय है कि पुनर्शिक्षण-काल आरंभ में आदत बनने में लगे काल से दो-तीन गुना छोटा था।

कृमियों में जन्मजात व्यवहार-संरूपों ( भावी सहजवृत्तियों के पूर्वगामियों ) के प्रथम चिह्न भी मिलते हैं और साथ ही परावर्तन का एक अधिक नमनीय रूप, अनुकूलित प्रतिवर्त भी।  गुच्छिकामय तंत्रिका-तंत्र की ज़्यादा पेचीदी संरचना परवर्तन की ओर अधिक गुंजाइश पेश करती है।

आर्थोपोडा और खास तौर से कीटों की एक विशेषता उनमें सहजवृत्तियों की मौजूदगी है। सहजवृत्तियां, जीव की परिवेश की परिस्थितियों से संबंधित प्रतिक्रियाओं का एक जटिल जन्मजात रूप है। कुछ निश्चित क्षोभकों के प्रति प्रतिक्रियाओं का उनका एक श्रृंखलित स्वरूप होता है और उन्हीं की वज़ह से ही जीव एक के बाद एक अनुकूलनात्मक क्रियाएं करता जाता है

उदाहरण के लिए, मकड़ियों की कुछ जातियों की मादाएं अपने अंडों के लिए जाली के कृमिकोष बनाती हैं। मादा इस कॄमिकोष को संभालकर रखती है और प्रायः उसकी जगह बदलती रहती है। ज्यों ही नन्हीं मकड़ियां परकट होती हैं, मादा उनसे नज़र नहीं हटाती। मगर जैसे-जैसे समय गुजरता है और बच्चे बड़े होते हैं, उनकी मां उनकी ओर से उदासीन होती जाती है और अंत में जब वे आत्मनिर्भर बन जाते हैं, वह उन्हें छोड़ देती है।

मधुमक्खियों में उनके सामूहिक व्यवहार-संरूपों से संबंधित बड़ी ही पेचीदी सहजवृत्तियां पायी जाती हैं।

जैसा कि मालूम है, मधुमक्खियों के हर छत्ते में एक रानी मधुमक्खी, बीसियों नर मधुमक्खियां और कई सौ बांझ कामगार मधुमक्खियां ( अविकसित जननेंद्रियोंवाली मादाएं ) होती हैं। सबसे जटिल कामगर मधुमक्खियों का व्यवहार होता है। अपने विकास के दौरान ऐसी हर मधुमक्खी अपने प्रकार्य बदलती रहती है। शुरू में वह लार्वा को खिलाया करती है, छत्ते की सफ़ाई करती है, बाद में उसका काम छत्ते की रक्षा करना, खाना लाना और कोशिकाएं बनाना हो जाता है।
बिलकारी बर्र की सहजवृत्तियां भी उसके द्वारा किये जानेवाले कार्यों की एक जटिल श्रृंखला है। ज़मीन में बिल बनाकर वह हर बार जब भी उसे खाने की तलाश में जाना होता है, बिल के मुंह पर मिट्टी का लौदा लगा देती है। जब वह लौटती है, तो पहले शिकार ( खाने ) को द्वार पर रखती है, लौंदे को हटाती है, बिल की जांच करती है और इसके बाद ही शिकार को भीतर ले जाती है।

अनजान आदमी को आर्थोपोडा का ऐसा स्पष्टतः कार्यसाधक व्यवहार आश्चर्य में ड़ाल सकता है, किंतु इसमें किसी भी तरह का कोई सचेतन प्रयास नहीं है। वास्तव में ये निश्चित बाह्य उत्तेजकों की स्वचालित प्रतिक्रियाएं ही हैं, जो दत्त जाति के सभी जीवों द्वारा एक ही ढ़ंग से की जाती हैं। सहज व्यवहार परिस्थितियां बदलने पर भी नहीं बदलता, किंतु तब वह कार्यसाधक नहीं रह जाता, और इसके लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी का बदलना या छूट जाना ही काफ़ी है। ऐसी कई परिस्थितियों के प्रेक्षण तथा अध्ययन किये गये हैं, जो सहजवृत्तियों को बेमानी बना देती हैं।

उदाहरणार्थ, बहुत बार परजीवियों द्वारा कृमिकोष के भीतर के अंडों को खा लिये जाने के बावज़ूद, मादा मकड़ी उस खोखले कृमिकोष की फिर भी रक्षा करती है और अपने साथ ले जाती है। ऐसा भी होता है कि मादा मकड़ी कृमिकोष बनाती है, अंडे देने की क्रियाएं करती हैं, किंतु असल में अंडे देती नहीं। इस असफ़लता के बावज़ूद वह आगे की सभी क्रियाएं करती है, यानि खाली कृमिकोष को बंद करती है और अपने साथ ले जाने लगती है।
मधुमक्खियों की प्रतिक्रियाओं की कार्यसाधकता भी काफ़ी सापेक्ष है। यदि छत्ते के पिछले हिस्से को काट दिया जाए, जिसमें शहद संचित किया जाता है, तो मधुमक्खी फिर भी उसमें शहद की एक निश्चित मात्रा रखकर अगले हिस्से को मोम से बंद कर देगी, जबकि पिछले हिस्से से शहद बाहर बहता रहेगा।
एक बर्र के रूढ़ अलाभकर व्यवहार का एक दिलचस्प प्रेक्षण है। जब वह एक मृतप्राय टिड्डे को पकड़कर लाई और सभी बर्रों की तरह पहले अपने बिल की जांच करने गई, तो अध्येता ने बिल के मुंह के पास रखे टिड्डे को कुछ दूर हटा दिया। बाहर आने पर बर्र ने टिड्डे को खोजा, खींचकर बिल के मुंह के पास ले आई और फिर से बिल के अंदर जांच करने गई। अध्येता ने चालीस बार टिड्डे को हटाया और हर बार बर्र फिर से उसे खोजकर बिल के मुंह के पास ले गई और फिर उसे खींचकर अंदर ले जाने से पहले बिल की जांच करने के लिए भीतर गई। अध्येता को ही बर्र की इस सहजवृत्ति से हार मान लेनी पड़ी।

ये मिसालें सहजवृत्ति की सीमाएं दिखाती हैं। सहजवृत्ति-जन्य क्रियाएं कुछ निश्चित परिस्थितियों से ही जुड़ी होती हैं। सहज व्यवहार के क्रियातंत्र को बाह्य परिस्थितियों द्वारा प्रवृत्त किया जाता है, जो प्रतिवर्ती अनुक्रिया को पैदा करती है। यह अपनी बारी में अगली और वह उससे अगली अनुक्रिया को जन्म देती है। इस प्रकार प्रतिवर्तों की सारी श्रृंखला एक आनुवंशिक प्रोग्राम बन जाती है। जैसे ही परिवेशीय परिस्थितियों के मानक रूप में परिवर्तन आता है, सहजवृत्तिमूलक क्रियाएं अपनी कार्यसाधकता खो बैठती हैं। इस तरह जीवधारियों में सहजवृत्ति पर आधारित व्यवहार-संरूप अपरिवर्तित परि्स्थितियों में ही कार्यसाधक होते हैं।

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इस बार इतना ही। अगली बार हम सहजवृत्तियों पर ही बात को और आगे बढ़ाएंगे, और देखेंगे कि इनकी सीमाएं लांघ कर जीव किस तरह अनुकूलित संबंध विकसित करते हैं।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

क्षोभनशीलता ( उद्दीपनशीलता ) और संवेदिता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां समकालीन मनोविज्ञान की शोध प्रणालियों पर थोड़ा-सा विस्तार से चर्चा की गई थी। इस बार क्षोभनशीलता और संवेदिता पर हम एक संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।
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क्षोभनशीलता ( उद्दीपनशीलता ) और संवेदिता

( मन और चेतना के विकास के संदर्भ में हम यहां एक पहले की प्रविष्टि "जैव जगत में संक्रमण के दौरान परावर्तन" पर कुछ चर्चा कर चुके हैं। उसे पहले पढ़ा जा सकता है, वह आज की विवेचना के लिए आधार भूमिका का कार्य करेगी। वहां पदार्थ के उदविकास के परिणामों के रूप में परावर्तन के अनेकानेक रूपों से युक्त जैवीय संरचनाओं की उत्पत्ति के कुछ इशारे थे। वहीं प्रयुक्त संकल्पना क्षोभनशीलता ( उद्दीपनशीलता ) पर आज यहां थोड़ा-सा विस्तार से चर्चा करेंगे। मन के विकास के संदर्भों में, जैविक व्यवहार तथा सक्रियता को समझने में यह शुरूआती कदम है। )

वनस्पति तथा जीव जगत के उदविकास की सभी अवस्थाओं में सभी सजीव अवयवियों में परावर्तन के एक विशेष, जैव रूप के नाते क्षोभनशीलता सदा विद्यमान रही है। क्षोभनशीलता, जैविकतः सार्थक उद्दीपन की जीवधारी द्वारा प्रतिक्रिया दिखाने की क्षमता है


 प्रारंभिक क्षोभनशीलता सरलतम एककोशीय अवयवियों ( प्रोटोज़ोआ ) में भी देखी जाती है जो बाह्य प्रभाव पड़ते ही प्रतिक्रियास्वरूप हलचल करने लग जाते हैं, और ऐसे परिवेश में रुक जाते हैं, जो दत्त जैव-कोशिका  के जीवद्रव्य की रासायनिक संरचना और ढांचे की पुनर्स्थापना में सहायक है। जीवीय कारकों की प्रतिक्रियास्वरूप होनेवाली विशिष्ट गतियों को अनुवर्तन अथवा अनुचलन कहा जाता है। इनमें प्रकाशानुवर्तन, अर्थात प्रकाश की प्रतिक्रिया, तापानुवर्तन, अर्थात ताप की प्रतिक्रिया, रसायनानुवर्तन, अर्थात एक निश्चित भौतिक व रासायनिक माध्यम खोजने की प्रवृति, स्थलानुवर्तन, अर्थात किसी यांत्रिक उद्दीपन अथवा प्रभाव की प्रतिक्रिया, आदि शामिल हैं।

वनस्पतियों के परावर्तन का रूप स्वतःनियमन की प्रक्रिया से संबद्ध अनुवर्तनों तक ही सीमित है। जीवजगत एक नये प्रकार की क्षोभनशीलता विकसित करता है, जिसे संवेदिता कहा जाता है। आनुवंशिकीय दृष्टि से संवेदिता उस परिवेशीय प्रभाव से संबंधित क्षोभनशीलता ही है, जो अवयवी को अन्य प्रभावों के संपर्क में लाती है, अर्थात संकेत का कार्य करके उसे परिवेश के अनुरूप व्यवहार करने में मदद देती है। क्षोभनशीलता से संवेदिता में संक्रमण अस्तित्व के एक नये रूप को जन्म देता है, विकसित जीवों में ज्ञानेन्द्रियां पैदा हो जाती हैं। गंध, आकृति, रंग, आदि वस्तुओं के गुण, जो अपने में उदासीन हैं ( इस अर्थ में कि इन्हें किसी शारीरिक आवश्यकता की तुष्टि के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता ) संकेतों का महत्व ग्रहण कर लेते हैं। इस तरह वनस्पतियों की तुलना में जीवों में जीवीय तथा जीवेतर अभिक्रियकों के प्रति संवेदिता उन्हें कहीं ज़्यादा क़िस्म के बाह्य प्रभावों का परावर्तन करने की संभावना देती है।


एककोशीय जीव प्रोटोजोआ परिवेश में सक्रिय दिग्विन्यास की क्षमता और प्रतिक्रिया में एक अस्थायी व्यवहार-संरूप विकसित करने की प्रवृति रखता है। वहीं बहुकोशीय जीवों में उच्चतर किस्म का परावर्तन पाया जाता है। आद्यतम बहुकोशीय अवयवियों में सीलेंटरेटा ( हाइड्रायड, मेडूसा, आदि ) आते हैं, जो प्रोटोजोआ जैसे ही पानी में रहते हैं। अंतर उनके बहुत सारी कोशिकाओं से बने होने में ही नहीं है, उनकी सापेक्ष विषमांगता में भी है। बहुकोशीय अवयवियों में उत्तेजना-संवाहक का काम करनेवाले अत्यंत संवेदनशील जीवद्रव्य से युक्त कोशिकाएं भी होती हैं। ये अति संवेदनशील ( तंत्रिकीय ) कोशिकाएं इकट्ठी होती हैं और जीव के सारे शरीर में व्याप्त तंत्रिका-तंत्र का निर्माण करती हैं। सीलेंटरेटा में विशेषतः संवेदनशील उनके स्पर्शक होते हैं, जिनकी मदद से वह अपने शिकार को पकड़ते हैं।

सीलेंटरेटा का व्यवहार आंशिकतः उनकी जातीय स्मृति की उपज होता है। दूसरे शब्दों में, वह उन आनुवंशिक संबंधों की देन है, जो उदविकास की प्रक्रिया में निश्चित क्षोभकों और अवयवी की उनसे संबंधित प्रतिक्रियाओं ( मुख्यतः अनुचलन के रूप में ) के बीच विकसित हुए थे। सीलेंटरेटा का व्यवहार जीव के जीवनकाल में विकसित अस्थायी संबंधों, अर्थात अनुकूलित प्रतिवर्तों पर भी निर्भर होता हैं।

ऐसे संबंधों के निर्माण को निम्न प्रयोग में सहजता से देखा जा सकता है। यदि हम कागज़ का टुकड़ा एक्टीनिया के सामने ले जाएं, तो जीव उसे तुरंत पकड़ लेगा और निगल जाएगा। यदि यही क्रिया अनेक बार दोहरायी जाती है, तो एक्टीनिया कागज़ को मुंह तक लाये बिना ही परे फेंक देगा। किंतु इस प्रकार के प्रतिवर्त अस्थायी होते हैं और सामान्यतः तीन-चार घंटों के बाद ही लोप हो जाते हैं।

बहुकोशीय अवयवियों में, जो सीलेंटरेटा से उच्च स्तर के हैं और भूमि पर रहते हैं, शरीर की संरचना अस्तित्व के रूप में परिवर्तन के कारण कहीं अधिक पेचीदी है। उनमें कुछ निश्चित प्रकार के क्षोभकों के परावर्तन के विशिष्ट अंग मिलते हैं। ये ज्ञानेन्द्रियां हैं। परावर्तन के रूप भी कहीं ज़्यादा पेचीदे बन जाते हैं। शरीर की खंडीय रचना और ज्ञानेन्द्रियों के भ्रूण कृमियों में भी पैदा हो गये थे। कृमि के शरीर के हर खंड में तंत्रिका कोशिकाओं के पुंज या गुच्छिकाएं होती हैं। हर खंड में स्थित गुच्छिकाएं उसे कतिपय स्वतंत्र रूप से की गयी क्रियाओं का अपेक्षाकृत स्वायत्त वाहक बना देती हैं।


इस तरह बड़ी संख्या में तंत्रिका-गुच्छिकाएं के निर्माण से ही शरीर की संरचना में वह वस्तुतः उपयोगी जटिलता नहीं आ जाती, जो बाह्य प्रभावों के यथानुरूप परावर्तन के लिए और इसलिए परिवेश के अधिक अनुकूल ढलने के लिए भी आवश्यक है। किंतु इस तरह के उच्चतर परावर्तन के लिए अंतर्निहित क्षमता वहां अवश्य मौजूद है। वह प्रमस्तिष्कीय गुच्छिका में पायी जाती है, विभिन्न कार्य करने वाली और विभिन्न अंगों से जुड़ी तंत्रिका-कोशिकाओं का संकेन्द्रण है। यह शरीर के सभी भागों में पैदा होने वाले उत्तेजनों का एकत्रण, विश्लेषण तथा अन्य कोशिकाओं को अंतरण करती है और शरीर के विभिन्न खंडों के पेशी-तंत्रों को आवेग भेजती है। प्रमस्तिष्कीय गुच्छिका की बदौलत रेंगने और खोदने वाले कृमि, शरीर के अग्र भाग में विशेषीकृत ज्ञानेन्द्रियां विकसित कर लेते हैं। ये संवेदकों का काम करने वाले श्रृंगिकाएं और नेत्रों के भ्रूण हैं।

इस तरह हम देखते हैं कि परावर्तन का मूलभूत गुण, पदार्थ के विकास क्रम के दौरान विभिन्न जटिल रूपों में विकसित होते हुए, अपने जैवीय रूपों क्षोभनशीलता और संवेदिता को पाता है और जैवीय विकास को निरंतर जटिल बनाते हुए विभिन्न अवयवी संरचनाओं की उत्पत्ति के कारक के रूप में सामने आता है।

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इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय
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