शनिवार, 29 जनवरी 2011

संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाएं

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने वाक् का विकास, संप्रेषण और सामाजिक प्रतिमान पर विचार किया था, इस बार हम संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाओं पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।




संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाएं
( roles-expectations in communication-processes )

अन्योन्यक्रियाओं में सामाजिक नियत्रंण संप्रेषण में भाग लेनेवालों की भूमिकाओं के अनुसार किया जाता है। भूमिका ( role ) से मनोविज्ञानियों का आशय व्यक्ति से उसकी सामाजिक हैसियत ( पद, लिंग, आयु, परिवार में स्थिति, आदि ) के अनुसार अपेक्षित व्यवहार के मानक रूप में स्वीकृत मॉडल से होता है। व्यक्ति शिक्षक अथवा छात्र, चिकित्सक अथवा रोगी, वयस्क अथवा बच्चे, अफ़सर अथवा मातहत, माता अथवा दादी, पुरुष अथवा स्त्री, मेहमान अथवा मेज़बान, किसी की भी भूमिका अदा कर सकता है। हर भूमिका को कुछ निश्चित अपेक्षाएं और इर्द-गिर्द के लोगों की विभिन्न आशाएं पूरी करनी होती हैं।

सामान्यतः एक ही व्यक्ति अलग-अलग संप्रेषणात्मक परिस्थितियों में अलग-अलग भूमिकाएं निभाता है। उदाहरण के लिए, एक ही व्यक्ति कारख़ाने में प्रबंधक, डॉक्टर के लिए रोगी ( यदि वह बीमार है ), घर में मां का आज्ञाकारी बेटा, मेहमानों के लिए अच्छा मेज़बान, आदि सभी कुछ हो सकता है। भूमिकाओं की अनेकता बहुत बार उनके बीच टकराव, भूमिकाओ का टकराव, पैदा कर देती है। उदाहरण के लिए, शिक्षाशास्त्री के रूप में शिक्षक अपने पुत्र की कमियों को देखता है और इससे कड़ाई से पेश आने की आवश्यकता महसूस करता है, किंतु पिता के नाते वह कभी-कभी उसके नख़रे बर्दाश्त कर जाता है और इस तरह उसके चरित्र के नकारात्मक पहलुओं को बढ़ावा देता है। कक्षा से अनुपस्थित रहनेवाले मां-बाप से मिलने जाने पर शिक्षक को मेहमान के नाते अपने मेज़बानों को उनके बच्चे के व्यवहार से संबंधित अप्रिय लगनेवाली बातें नहीं बतानी चाहिए, मगर शिक्षक के नाते ऐसा करना उसका कर्तव्य है।

विभिन्न भूमिकाएं अदा करनेवाले लोगों की अन्योन्यक्रिया का नियमन ( regulation ) भूमिका-अपेक्षाओं से होता है। व्यक्ति की वास्तविक इच्छाएं कुछ भी क्यों ना हो, उसके परिवेश के लोग उससे एक निश्चित ढ़ंग के व्यवहार की अपेक्षा करते हैं। समाज भूमिका-निर्वाह के ढ़ंग का नियंत्रण तथा मूल्यांकन करता है और मानक ( standards ) से किसी भी प्रकार के गंभीर विचलन ( deviation ) को निंदनीय ठहराता है।

उदाहरण के लिए, सामान्यतः माना जाता है कि माता-पिता को अपने बच्चे के प्रति दयालु, स्नेहपूर्ण तथा नरम होना चाहिए। ऐसा रवैया ( attitude ) भूमिका-अपेक्षा के अनुरूप है और समाज उसे मान्य ठहराता तथा बढ़ावा देता है। किंतु मां-बाप द्वारा बच्चे को अतिशय प्यार दिये जाने और उसकी सभी ग़लतियां माफ़ किये जाने की कठोर भर्त्सना की जाती है। समाज की दृष्टि में मां-बाप द्वारा बच्चे के प्रति अत्यधिक कड़ाई बरता जाना, उन्हें लाड़-प्यार न दिया जाना वैसे ही निंदनीय है, जैसे अतिशय लाड़ करना। इन दो ध्रुवों के बीच वे बहुत सारे रवैये आते हैं, जिन्हें समाज ने माता-पिता की भूमिका का अंग बनाया और मान्य ठहराया है। यही बात परिवार के अन्य बड़ी पीढ़ी के सदस्यों पर भी लागू होती है।
जहां तक बच्चे का संबंध है, तो उसकी भूमिका की अपेक्षाएं हर कोई जानता है, हर कोई उसे विनम्र तथा मेहनती, बड़ों का आदर करनेवाला और पढ़ाई में मन लगानेवाला, आदि देखना चाहता है। घर में भी और बाहर भी बड़े लोग बच्चे को यह बताने का अवसर कभी नहीं चूकते कि वह उनकी आशाओं के अनुकूल निकल रहा है या नहीं।

संप्रेषण की प्रक्रिया सफल तभी हो सकती है, जब उसमें भाग लेनेवाले पक्षों का व्यवहार उनकी पारस्परिक ( mutual ) अपेक्षाओं को पूरा करता है। संप्रेषण की प्रक्रिया में शामिल होने पर हर व्यक्ति न्यूनाधिक सही ढ़ंग से तय कर लेता है उसके शब्दों तथा कार्यों के संबंध में प्रक्रिया के दूसरे भागीदारों की क्या अपेक्षाएं होंगी। दूसरों की अपेक्षाओं का सही पूर्वानुमान और उनके अनुरूप व्यवहार करने की व्यक्ति की क्षमता तथा योग्यता को व्यवहारकुशलता कहा जाता है

बेशक इसका यह अर्थ नहीं कि व्यवहारकुशल आदमी को हमेशा और सभी परिस्थितियों में इन अपेक्षाओं को उचित ठहराने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि ऐसी स्थिति पैदा होती है कि आदमी के सिद्धांत और विश्वास, उससे की जा रही अपेक्षाओं से मेल नहीं खाते, तो वह व्यवहारकुशलता को ताक में रखकर दृढ़ता का प्रदर्शन कर सकता है। गैलीलियो के इन प्रसिद्ध शब्दों को कि "फिर भी वह घूमती है" बेशक उससे अपने ‘पृथ्वी के सूर्य के चारो ओर घूमने वाले’ मत का पूर्ण तथा बिलाशर्त त्याग की अपेक्षा करनेवालों के संबंध में व्यवहारकुशलता का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। इसे सिद्धांतनिष्ठा, वैज्ञानिक ईमानदारी और नागरिक साहस की अनुपम मिसाल ही कहा जा सकता है।

फिर भी दैनंदिन जीवन में दूसरे लोगों की अपेक्षाओं का ग़लत अर्थ लगाने या उनकी अवहेलना करने को व्यवहारकुशलता की कमी ही माना जाएगा। इससे संप्रेषण की प्रक्रिया में लोगों की अपेक्षाओं पर तुषारपात होता है, संप्रेषण में भाग लेनेवाले व्यक्तियों की अन्योन्यक्रिया में बाधा पड़ती है और कभी-कभी द्वंद की स्थितियां भी पैदा हो जाती हैं। व्यवहारकुशलता की कमी अपेक्षाकृत अहानिकर भी हो सकती हैं, जैसे, उदाहरण के लिए, तब, जब कोई आदमी इस औपचारिक-से प्रश्न के उत्तर में कि ‘आप कैसे हैं?’ अपने और अपने नाते-रिश्तेदारों की सेहत के बारे में और नवीन, किंतु मामूली घटनाओं के बारे में विस्तार से बताने लगता है। किंतु अधिकांशतः व्यवहारकुशलता के नियमों के उल्लंघन के, विशेषतः शैक्षिक संप्रेषण में, गंभीर परिणाम निकलते हैं। इसकी एक मिसाल देखिए।

एक शिक्षक ने सस्वर पाठ की कला सीखने के इच्छुक छात्रों की मंडली बनाई, सप्ताहांत की सांस्कृतिक बाल-सभा में इसकी प्रस्तुतियां सराही जा रही थीं। किंतु एक दिन की अप्रिय घटना ने मंडली के ताने-बाने को हिला दिया। शिक्षक ने अभ्यास के लिए एक नीतिकथा सुझाई, किंतु ज्यों ही उसने उसे पढ़कर सुनाना शुरु किया, एक छात्र ने उठकर कोई और नीतिकथा चुनने को कहा। जब शिक्षक ने कारण जानना चाहा, तो छात्र ने धीमे स्वर में जवाब दिया कि वह कारण नहीं बता सकता। शिक्षक ने उसके अनुरोध को मामूली सनक समझकर उससे बैठ जाने को कह दिया। किंतु जब नीतिकथा का पाठ करते हुए शिक्षक इन अंतिम पंक्तियों तक पहुंचा कि ‘ अंत में भाग्य उसका यह निकला, पति जो मिला वह था लंगड़ा,’ तो वह समझ गया कि अनर्थ हुआ है। मंडली में बोझिल ख़ामोशी छाई हुई थी, लड़कों के चेहरों पर आक्रोश का भाव था और एक लड़की की आंखों में आंसू छलक आए थे। शिक्षक को तब याद हो आया कि मंडली में एक ऐसा लड़का था, जो कोई दो साल पहले एक सड़क दुर्घटना में अपनी एक टांग गंवा बैठा था और उस ड़बडबायी आंखोंवाली लड़की के प्रति वह भावनात्मक लगाव रखता था।

यह सदा याद रखना चाहिए कि व्यक्तियों के किसी भी समूह में सभी ज़िंदा इंसान होते हैं और उनमें से हर एक की भावनाओं का समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए। समूह में परस्पर मनोवैज्ञानिक संपर्क की जरा-सी कमी के भी, चाहे वह थोड़े से समय के लिए ही क्यों ना हो, गंभीर व अप्रत्याशित परिणाम निकल सकते हैं। परस्पर समझ के इस तरह बार-बार क्षीण होने से उनके बीच एक दुर्गम खाई पैदा हो जाती है, और सामूहिक लक्ष्यों की शांतिपूर्ण प्राप्ति कठिन हो सकती है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 26 जनवरी 2011

वाक् का विकास, संप्रेषण और सामाजिक प्रतिमान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने शाब्दिक और अशाब्दिक संप्रेषण पर विचार किया था, इस बार हम वाक् का विकास, संप्रेषण और सामाजिक प्रतिमान पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वाक् का विकास, संप्रेषण और सामाजिक प्रतिमान
( development of speech, communication and social patterns )

मनुष्य की आवश्यकताओं की तुष्टि अन्य लोगों से संपर्क बनाकर तथा उनके साथ मिलकर कार्य करने से ही हो सकती है। यह बुनियादी शर्त व्यक्ति के लिए यह जरूरत पैदा करती है कि वह अपने साथियों को वह चीज़ बताये, जो उनके लिए बड़ी महत्त्वपूर्ण है और अर्थ रखती है।

बच्चे में उच्चारित वाक् के प्रथमांकुर पहले वर्ष के अंत में प्रकट होते हैं। वह कुछ सहजता से बोली जा सकने वाली ध्वनियों का उच्चारण करने लगता हैं, बड़े इन ध्वनियों को निश्चित व्यक्तियो तथा वस्तुओं से जोड़ते हैं और इस तरह बच्चे के मस्तिष्क में इनमें से हर ध्वनि की उसके प्रत्यक्ष परिवेश के किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु से संबद्धता जड़े जमा लेती हैं। आगे चलकर इनमें से हर ध्वनि बच्चे के लिए एक शब्द का रूप ले लेती है, जिसे वह वयस्कों से अपनी अन्योन्यक्रिया के गठन ( formation ) के लिए इस्तेमाल करता है। शब्द उसकी आवश्यकताओं की तुष्टि का जरिया, संप्रेषण का साधन बन जाते हैं। बाद में बच्चे का शब्द भंडार बड़ी तेज़ी से बढ़ता है, और वह दूसरे वर्ष के अंत तक व्याकरणिक रूपों के सही प्रयोग की क्षमता भी दिखाने लगता है, उसके वाक्य धीरे-धीरे लंबे और जटिलतर बनते जाते हैं।

वाक् का विकास और अशाब्दिक संप्रेषण के साधनों जैसे कि भाव-भंगिमाएं ( expression-gestures ), लहजा ( tone ) आदि का विकास साथ-साथ होता है। इस काल में बच्चा संभाषी के भावों को पढ़ना, उनके लहजे में छिपे अनुमोदन ( approval ) अथवा निंदा को पहचानना, अंग-संचालनों के अर्थ को समझना सीखते हुए संप्रेषण की प्रक्रिया में प्रतिपुष्टि ( feedback ) के संबंध विकसित करता है। इस सबसे उसे अपनी क्रियाओं में सुधार करने तथा लोगों के साथ परस्पर समझ बढ़ाने में मदद मिलती है।

भाषा के प्रति, जो संप्रेषण का साधन है और वाक् के प्रति, जो संप्रेषण की प्रक्रिया है, बच्चे का सचेतन ( conscious ) रवैया ( attitude ) स्कूल में बनता है। पहले पढ़ना और लिखना सीखने के पाठों में और फिर भाषा तथा साहित्य के पाठों में। इस तरह भाषा, छात्रों के सामने संकेतों की एक ऐसी जटिल पद्धति के रूप में प्रकट होती है, जिसके अपने सामाजिकतः निर्धारित नियम हैं और जिसके इन नियमों के आत्मसात्करण से वे न केवल सही पढ़, लिख व बोल सकेंगे, बल्कि मानवजाति द्वारा उनसे पहले सृजित ( created ) समस्त आत्मिक संपदा का उपयोग भी कर सकेंगे।

संप्रेषण करते हुए, यानि किसी से कुछ पूछते, अनुरोध करते, आदेश देते, समझाते या बताते हुए मनुष्य अपरिहार्यतः अपने सामने दूसरे मनुष्य को प्रभावित करने, उससे वांछित उत्तर पाने, उसे अपने कार्य की पूर्ति के लिए प्रेरित करने और जो बात उसकी समझ में नहीं आई है, उसे समझाने का उद्देश्य रखता है। संप्रेषण के उद्देश्य लोगों की संयुक्त सक्रियता की आवश्यकता को प्रतिबिंबित ( reflected ) करते हैं। बेशक इसका मतलब यह नहीं कि लोग निरर्थक बातें, निरुद्देश्य संप्रेषण, संप्रेषण की ख़ातिर संप्रेषण बनाए रखने के लिए संप्रेषण के साधनों का व्यर्थ उपयोग नहीं करते।

यदि संप्रेषण निरुद्देश्य नहीं है, तो इसका दूसरे लोगों के व्यवहार और सक्रियता के परिवर्तन के रूप में अनिवार्यतः कुछ परिणाम निकलता है या निकलना चाहिए। यहां संप्रेषण अंतर्वैयक्तिक अन्योन्यक्रिया ( interpersonal interaction ) का, यानि व्यक्तियों के संयुक्त कार्यकलाप की प्रक्रिया में पैदा होनेवाले संबंधों तथा परस्पर प्रभावों की समष्टि का रूप ग्रहण करता है। अंतर्वैयक्तिक अन्योन्यक्रिया एक दूसरे के कार्यों के बारे में व्यक्तियों की प्रतिक्रियाओं की श्रृंखला है: एक व्यक्ति के द्वारा अपनी क्रिया से दूसरे के व्यवहार को बदलना, दूसरे की प्रतिक्रियाओं को जन्म देता है, जो अपनी बारी में फिर से पहले वाले के व्यवहार को प्रभावित करती है।

संयुक्त सक्रियता और संप्रेषण सामाजिक प्रतिमानों (social patterns ), यानि व्यक्तियों की अन्योन्यक्रिया तथा परस्पर संबंधों के लिए समाज द्वारा स्वीकृत व्यवहार के मानकों ( standards ) पर आधारित सामाजिक नियंत्रण की परिस्थितियों में संपन्न होते हैं।

यह आशा की जाती है कि समाज ने अनिवार्य प्रतिमानों की एक विशिष्ट पद्धति के रूप में व्यवहार के जो मानक विकसित तथा स्वीकृत किये हैं, उनका हर व्यक्ति पालन करेगा। इन मानकों का उल्लंघन सामाजिक निग्रह ( prohibition, repression ) की यथोचित युक्तियों ( निंदा, दंड ) को सक्रिय बना देता है और इस तरह विपथगामी के व्यवहार को सुधारने का प्रयत्न किया जाता है। व्यवहार के मानकों के अस्तित्व तथा मान्यता का प्रमाण यह है कि शेष सबके व्यवहार से भिन्न व्यवहार करनेवाले के संबंध में आसपास के लोग एक जैसी प्रतिक्रिया दिखाते हैं। सामाजिक प्रतिमानों का दायरा बहुत व्यापक होता है और उसके अंतर्गत श्रम-अनुशासन, सैन्य कर्तव्य तथा देशभक्ति की अपेक्षाएं पूरी करनेवाले व्यवहार के मॉडलों से लेकर शिष्टाचार के नियमों तक, सब कुछ आ जाता है। अपने कार्यस्थल पर ईमानदारी से काम और पहली कक्षा के छात्र द्वारा इस नियम का पालन कि शिक्षक के कक्षा में प्रवेश करने पर उसे खड़ा हो जाना चाहिए, सामाजिक प्रतिमानों के अनुसार व्यवहार की मिसालें हैं।

सामाजिक प्रतिमानों का आदर लोगों को अपने व्यवहार के लिए उत्तरदायी ( responsible ) बनाता है और अपने कार्यों का मूल्यांकन करते हुए, कि वे अपेक्षाओं के अनुरूप हैं या नहीं, उनका नियंत्रण करने की संभावना देता है। प्रतिमानों से निर्देशित होकर व्यक्ति अपने व्यवहार के रूपों का मानकों से मिलान करता है, समाज द्वारा मान्य रूपों को चुनता तथा अमान्य रूपों को ठुकराता है और अन्य लोगों से अपने संबंधों का नियमन ( regulation ) करता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 22 जनवरी 2011

शाब्दिक और अशाब्दिक संप्रेषण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण और भाषा पर विचार किया था, इस बार हम शाब्दिक और अशाब्दिक संप्रेषण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



शाब्दिक संप्रेषण : वाक्

वाक् ( speech ) शाब्दिक ( verbal ) संप्रेषण, अर्थात भाषा ( language ) की सहायता से संप्रेषण की प्रक्रिया ( process ) है। शाब्दिक संप्रेषण के माध्यम के नाते शब्दों को सामाजिक अनुभव द्वारा निश्चित अर्थ दिये हुए होते हैं। शब्दों को ज़ोर से बोला, मन में दोहराया, कागज़ या किसी और चीज़ पर लिखा जा सकता है। जैसा कि मूक-बधिरों के मामले में होता है, उनका स्थान निश्चित अर्थों से युक्त विशेष इशारे भी ले सकते हैं। वाक् लिखित ( written )  और मौखिक ( oral ), दो प्रकार की होती है और अपनी बारी में मौखिक वाक् को संवादात्मक ( dialogue ) तथा एकालापात्मक ( monologue ) में बांटा जाता है।

मौखिक वाक् का सरलतम रूप संवाद ( dialog ) या बातचीत है, जिसमें दो या अधिक व्यक्ति किन्हीं प्रश्नों पर संयुक्त रूप से परिचर्चा करते हैं। संवादात्मक वाक् में संभाषियों के कथनों, किन्हीं शब्दों अथवा शब्द-समूहों की पुनरावृत्तियों, प्रश्नों, स्पष्टीकरण, केवल संभाषियों द्वारा समझे गये इशारों, विभिन्न सहायक शब्दों, विस्मयादिबोधकों को शामिल किया जाता है। इस वाक् की विशेषताएं काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर होती हैं कि संभाषी एक दूसरे को कितना समझते हैं और उनके बीच कैसे संबंध हैं। अधिकांशतः कोई अध्यापक अपने घर में जिस ढंग से बातचीत करता है, वह कक्षा में उसके बोलने के ढंग से बहुत भिन्न होता है। बातचीत का संवेगात्मक स्तर भी बड़ा महत्त्वपूर्ण है। संभ्रम, आश्चर्य, आह्लाद, भय अथवा क्रोध की अवस्था में आदमी का ना केवल लहज़ा बदल सकता है, बल्कि वह भिन्न क़िस्म के शब्द तथा मुहावरे भी इस्तेमाल करता है।

मौखिक वाक् का दूसरा भेद एकालाप ( monolog ) है, जिसमें एक ही व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों को संबोधित करते हुए बोलता है। यह भाषण, कहानी, रिपोर्ट या ऐसी ही कोई अन्य चीज़ हो सकती है। एकालापात्मक वाक् की संरचना अधिक जटिल होती है और उसमें अधिक विस्तार से विषय का प्रतिपादन, संगति बनाए रखने और व्याकरण तथा तर्क के नियमों का ज़्यादा कड़ाई से पालन करने की अपेक्षा की जाती है। इसके उन्नत रूप व्यक्तित्वविकास के अपेक्षाकृत बाद के चरण में प्रकट होते हैं। ऐसे वयस्क प्रायः मिल जाते हैं, जो आपस में बातचीत तो बड़ी सहजता से कर लेते हैं, किंतु भाषण करने, रिपोर्ट पेश करने आदि में हकलाने लगते हैं। यह आम तौर पर शिक्षक और अभिभावकों के द्वारा उनकी एकालापात्मक वाक् के विकास पर पर्याप्त ध्यान न दिये जाने का परिणाम होती है।

मानवजाति के इतिहास में लिखित वाक् बहुत बाद में जाकर प्रकट हुई। उसकी उत्पत्ति समय और स्थान द्वारा विभाजित लोगों के बीच संप्रेषण की आवश्यकता के कारण हुई। उसने चित्राक्षरों से, यानि एक पूरे विचार अथवा प्रत्यय को व्यक्त करने वाले चित्रों या चित्रलेखों से आधुनिक वर्णमाला तक का, जो थोड़े-से वर्णों या अक्षरों की मदद से हज़ारों शब्द लिखना संभव बना देती है, लंबा रास्ता तय किया है।

लेखन मानवजाति द्वारा संचित अनुभव को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरित करने का सर्वाधिक विश्वसनीय तरीक़ा सिद्ध हुआ है, क्योंकि मौखिक वाक् द्वारा इस अनुभव के अंतरण में विकृति ( distortion ) तथा बदलाव का और यहां तक कि पूर्ण विलोपन का भी ख़तरा छिपा हुआ है। लिखने और पढ़ने से, मनुष्य के बौद्धिक क्षितिज के विस्तार में, उनके द्वारा नये ज्ञान के अर्जन ( acquisition ) तथा संप्रेषण में बड़ी मदद मिलती है। लिखित वाक् सटीक शब्दों का प्रयोग करने, तर्क तथा व्याकरण के नियमों को ध्यान में रखने, विषय की गहराई में जाने और विचारों में संगति बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है। प्रायः कोई चीज़ लिख लेने से उसे समझ लेना और याद रखना आसान हो जाता है।

अशाब्दिक संप्रेषण

लोगों के बीच संप्रेषण की तुलना तार-संचार से नहीं की जा सकती, जिसमें सिर्फ़ शाब्दिक संदेशों का विनिमय ( exchange ) मात्र होता है। मानव संप्रेषण में अनिवार्यतः उसमें भाग लेने वाले की भावनाएं समाविष्ट रहती हैं। वे एक निश्चित ढ़ंग से संदेशों की विषयवस्तु तथा संप्रेषण के भागीदारों से जुडी होती हैं और शाब्दिक संदेश का अंग बनकर सूचना के विनिमय के एक विशिष्ट पहलू का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसे अशाब्दिक ( nonverbal ) संप्रेषण कहा जा सकता है। अशाब्दिक संप्रेषण के साधन हैं इशारे, भंगिमाएं, लहजा, विराम, मुद्राएं, हास्य, आंसू, इत्यादि, जो शाब्दिक संप्रेषण के माध्यम शब्दों की अनुपूर्ति और कभी-कभी उनका स्थान भी ले लेनेवाली संकेत पद्धति का काम करते हैं। उदाहरण के लिए, अपने मित्र के साथ घटी दुखद घटना के बारे में जानकर आदमी उससे अपनी सहानुभूति शब्दों के साथ-साथ अशाब्दिक संप्रेषण के संकेतों से भी प्रकट करता है, जैसे चहरे पर विषाद का भाव, नीची आवाज़, गाल हथेली पर टिकाना तथा सिर हिलाना, कंधे पर हाथ रखकर दबाना या थपथपाना, गहरी सांसे लेना, वग़ैरह।

संवेगों की एक विशिष्ट भाषा के तौर पर अशाब्दिक संप्रेषण के साधन भी शब्दों की भाषा के जैसे ही, सामाजिक विकास के उत्पाद होते हैं और अलग-अलग संस्कृतियों में अलग-अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए बुल्गारियाई आदमी सिर नीचे झटकाकर अपनी असहमति व्यक्त करता है, जबकि भारतीय आदमी के लिए यह सहमति और पुष्टि का संकेत होता है। विभिन्न आयु वर्गों के लोग अशाब्दिक संप्रेषण के विभिन्न तरीक़े इस्तेमाल करते हैं। मसलन, छोटे बच्चे बड़ों से कुछ करवाने या उन्हें अपनी इच्छाएं बताने के लिए रुलाई का सहारा लेते हैं। शाब्दिक संप्रेषण का प्रभाव काफ़ी हद तक संभाषियों की संस्थिति पर भी निर्भर होता है, जैसे कि मुंह जरा-सा पीछे मोड़ कर कुछ कहना प्रापक के प्रति, संप्रेषक के उदासीनता अथवा अवज्ञाभरे ( disobedience ) रवैये का परिचायक होता है।

अशाब्दिक संप्रेषण के साधनों और शाब्दिक संदेशों के उद्देश्यों तथा अंतर्वस्तु ( content ) की परस्पर-अनुरूपता ( congruence ), संप्रेषण की संस्कृति का एक तत्व है। यह परस्पर-अनुरूपता काफ़ी महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि एक ही शब्द, अलग-अलग लहजों के साथ, अलग-अलग अर्थ संप्रेषित कर सकता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 19 जनवरी 2011

संप्रेषण और भाषा

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण की अवधारणा पर चर्चा की थी, इस बार हम सूचना के विनिमय के रूप में संप्रेषण और भाषा पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संप्रेषण और भाषा

संप्रेषण की यह परिभाषा कि वह एक ऐसी साझी चीज़ का उत्पादन है, जो लोगों को उनकी अन्योन्यक्रिया ( Interaction ) तथा संयुक्त सक्रियता ( Joint activity ) के दौरान एक सूत्र में पिरोती है, इस धारणा पर आधारित है कि वह साझी चीज़ सर्वप्रथम भाषा है, जो संप्रेषण का साधन है। भाषा एक दूसरे के संपर्क में आनेवालों के बीच संप्रेषण सुनिश्चित करती है, क्योंकि इसे दोनों ही पक्षों द्वारा समझा जाता है, जो कोडित रूप में, यानि विशेषतः चुने गये शब्दों के अर्थों के रूप में सूचना अंतरित करता है, उसके द्वारा भी और जो विकोडित करके, यानि इन अर्थों को समझ कर इस सूचना को ग्रहण करता है तथा तदनुसार अपना व्यवहार बदलता है, उसके द्वारा भी।

दूसरे को सूचना देनेवाले व्यक्ति ( संप्रेषक ) और यह सूचना पानेवाले व्यक्ति ( प्रापक ) को संप्रेषण और संयुक्त सक्रियता के उद्देश्य से एक ही तरह की कोडन और विकोडन पद्धति इस्तेमाल करनी चाहिए, यानि ‘साझी भाषा’ बोलनी चाहिए। अगर वे अलग-अलग कोडन पद्धतियां इस्तेमाल करते हैं तो वे एक दूसरे को कभी नहीं समझ पाएंगे और अपनी संयुक्त सक्रियता में सफल नहीं होंगे। बाइबिल में बाबुल की मीनार की एक कहानी मिलती है, जो कभी नहीं बन सकी, क्योंकि अचानक सभी बनानेवाले अलग-अलग भाषाएं बोलने लग गये। यह कहानी दिखाती है कि भाषाओं में अंतर के कारण कोडन तथा विकोडन प्रक्रियाओं के रुक जाने से कैसी गंभीर कठिनाइयां पैदा होती हैं और अन्योन्यक्रिया तथा संयुक्त सक्रियता असंभव बन जाती है।

सूचना का आदान-प्रदान तभी संभव होता है, जब प्रयुक्त संकेतों ( शब्दों, इशारों, चित्राक्षरों, आदि ) को दिये गये अर्थ, संप्रेषण में भाग लेनेवाले दोनों पक्षों को मालूम होते हैं। संकेत परिवेशी विश्व के संज्ञान का एक माध्यम हैं और अर्थ संकेत का अंतर्वस्तु से संबंधित पहलू है। जिस प्रकार लोग औजारों के माध्यम से श्रम करते हैं, उसी प्रकार संकेत उनकी संज्ञानात्मक सक्रियता ( cognitive activities ) तथा संप्रेषण के माध्यम का काम करते हैं।

शाब्दिक संकेतों की पद्धति, भाषा को सामाजिक-ऐतिहासिक अनुभव के वास्तवीकरण ( realization ), आत्मसात्करण ( absorption ) और अंतरण ( transference ) का माध्यम बनाती है

सामाजिक अनुभव के संचय तथा अंतरण के माध्यम के रूप में भाषा का जन्म श्रम की प्रक्रिया में हुआ और आदिम समाज के उषाकाल में ही उसका विकास शुरू हो गया। एक दूसरे को आवश्यक सूचना देने के लिए लोगों ने उच्चारित ध्वनियों का इस्तेमाल शुरू किया, जिनसे शनैः शनैः कुछ निश्चित अर्थ जुड़ गये। संप्रेषण के साधन के रूप में उच्चारित ध्वनियां बहुत सुविधाजनक थीं, विशेषतः तब, जब आदिम मानव के हाथ खाली नहीं होते थे, यानि वह उनमें कोई चीज़ या औजार पकड़े हुए होता था और आंखों का हाथों की गतियों को देखते रहना जरूरी था। ध्वनियां तब भी सुविधाजनक होती थीं, जब संप्रेषक तथा प्रापक एक दूसरे से दूर होते थे या अंधेरा अथवा कोहरा छाया होता था या पेड़ों-झाड़ियों की वजह से एक दूसरे को देख पाना मुमकिन न था।

भाषा के जरिए संप्रेषण की बदौलत व्यक्ति के मस्तिष्क में विश्व का परावर्तन ( reflection ) , अन्य व्यक्तियों के मस्तिष्क में हुए परावर्तनों के आपसी विनिमय से निरंतर विकसित होता गया। लोग आपस में अपने विचारों और प्रेक्षणों ( observations ) का विनिमय करते हुए इसे और समृद्ध करते रहे।

परस्पर संपर्क के दौरान मनुष्य लगातार महत्त्वपूर्ण को महत्त्वहीन से, आवश्यक को सांयोगिक से अलग करना, वस्तुओं के बिंबों से उनके सामान्य गुणधर्मों को अलग करना और फिर उन्हें शब्दों के अर्थ में प्रतिबिंबित करने की ओर बढ़ना सीखता रहता है। शब्दों का अर्थ वस्तुओं के पूरे वर्ग की बुनियादी विशेषताओं को इंगित करता है और ठीक इसी कारण वह किसी निश्चित वस्तु से भी संबंध रख सकता है। जैसे कि, जब हम ‘समाचारपत्र’ कहते हैं, तो हमारा आशय दत्त क्षण में हमारे हाथ में मौजूद समाचारपत्र से ही नहीं होता, बल्कि वस्तुओं के जिस वर्ग में समाचारपत्र आता है, उस पूरे वर्ग को और अन्य मुद्रित सामग्रियों से इसके अंतरों को भी इंगित करते हैं।

हर शब्द का एक निश्चित अर्थ, अर्थात वास्तविक जगत से निश्चित संबंध होता है और जब कोई उस शब्द को इस्तेमाल करता है, तो उसको सुननेवाला उसे एक निश्चित परिघटना से ही जोड़ता है और इस संबंध में उन्हें कोई भ्रम नहीं होता। अर्थों की पद्धति मनुष्य के जीवन-भर बढ़ती तथा समृद्ध होती रहती है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 15 जनवरी 2011

संप्रेषण की अवधारणा

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत सक्रियता के प्रमुख रूप श्रम पर विचार किया था, इस बार हम संप्रेषण की अवधारणा पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संप्रेषण की अवधारणा

संप्रेषण का जटिल स्वरूप

परिवेशी विश्व के साथ लोगों की अन्योन्यक्रिया उन वस्तुपरक संबंधों के दायरे में विकसित होती है, जो लोगों के बीच उनके सामाजिक जीवन में और मुख्यतः उनकी उत्पादन-सक्रियता के दौरान बनते हैं। लोगों के किसी भी यथार्थ समूह में वस्तुपरक संबंधों, जैसे निर्भरता, अधीनता, सहकार, परस्पर साहायता, आदि के संबंधों का पैदा होना अनिवार्य है। समूह के सदस्यों के अंतर्वैयक्तिक संबंधों व सहकार के अध्ययन का मुख्य उपाय विभिन्न सामाजिक कारकों और दत्त समूह के सदस्यों की अन्योन्यक्रिया का गहराई में विश्लेषण करना है। लोगों के वास्तविक इरादों और भावनाओं का अनुमान उनके कार्यों से ही लगाया जा सकता है

किसी भी तरह के उत्पादन के लिए संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता होती है। उत्पादन करने के लिए लोगों का एकजुट होना आवश्यक है। फिर भी कोई भी समुदाय तब तक सफल संयुक्त कार्य नहीं कर सकता, जब तक इस कार्य में भाग लेने वालों के बीच संपर्क न हो, जब तक उनके बीच पर्याप्त समझ न हो। संयुक्त सक्रियता के लिए आपस में संप्रेषण के संबंध क़ायम करना आवश्यक है। संप्रेषण को यों परिभाषित किया जा सकता है : संप्रेषण लोगों के बीच संपर्क स्थापित व विकसित करने की एक जटिल प्रक्रिया है, जिसकी जड़ें संयुक्त रूप से काम करने की आवश्यकता में होती हैं

संप्रेषण में सयुक्त सक्रियता में भाग लेनेवालों के बीच जानकारी का आदान-प्रदान शामिल रहता है ( प्रक्रिया का संसूचनात्मक पहलू )। अपने परस्पर संपर्क में लोग संप्रेषण के एक प्रमुख साधन के तौर पर भाषा का सहारा लेते हैं। संप्रेषण का दूसरा पहलू संयुक्त कार्यकलाप में भाग लेनेवालों की अन्योन्यक्रिया, यानि शब्दों ही नही, अपितु क्रियाओं का भी आदान-प्रदान है। जब आदमी कोई चीज़ खरीदता है तो वह ( ग्राहक ) औए विक्रेता, दोनों आपस में कोई शब्द कहे बिना भी संप्रेषण करते हैं : ग्राहक पैसे देता है और विक्रेता उसे माल थमाता है और यदि कुछ पैसे वापस करने हैं तो उन्हें वापस करता है।

संप्रेषण का तीसरा पहलू अंतर्वैयक्तिक समझ है। उदाहरण के लिए, बहुत कुछ इसपर निर्भर करता है कि संप्रेषण में भाग लेनेवाला कोई पक्ष दूसरे पक्ष को भरोसेमंद, चतुर और जानकार व्यक्ति मानता है या उसके बारे में बुरी राय रखता है तथा उसे भोंदू व बेवक़ूफ़ समझता है। इस तरह संप्रेषण की एक ही प्रक्रिया में हम जैसे कि तीन पहलू पाते हैं : संसूचनात्मक ( जानकारी का विनिमय ), अन्योन्यक्रियात्मक ( प्रक्रिया में भाग लेनेवालों की संयुक्त सक्रियता ) और प्रत्यक्षात्मक ( एक दूसरे के बारे में धारणा )। इन तीन पहलुओं की समष्टि के रूप में देखे जाने पर संप्रेषण संयुक्त सक्रियता के संगठन और उसके सहभागियों के बीच संबंधों की स्थापना के एक साधन के रूप में सामने आता है।

संप्रेषण और सक्रियता की एकता

संप्रेषण और संयुक्त सक्रियता के बीच घनिष्ठ संबंध स्वतः स्पष्ट है। फिर भी प्रश्न उठता है कि क्या संप्रेषण संयुक्त सक्रियता का घटक है या दोनों समानतः स्वतंत्र प्रक्रियाएं हैं? संयुक्त सक्रियता में व्यक्ति को अनिवार्यतः अन्य लोगों से मिलना और उनसे संप्रेषण करना पड़ता है। दूसरे शब्दों में, वह संपर्क बनाने, परस्पर समझ के लिए प्रयत्न करने, आवश्यक सूचना पाने तथा बदले में सूचना देने, आदि के लिए विवश होता है। यहां संप्रेषण सक्रियता के अंग, उसके महत्त्वपूर्ण सूचनात्मक पहलू और पहले प्रकार के संप्रेषण ( संप्रेषण - १ ) के रूप में सामने आता है।

किंतु सक्रियता की प्रक्रिया में, जिसमें संप्रेषण-१ शामिल है, कोई वस्तु बना लेने ( कोई औजार बनाना, विचार प्रकट करना, परिकलन करना, मशीन की मरम्मत करना, आदि ) के बाद मनुष्य वहीं पर नहीं रुक जाता : उसने जो वस्तु बनाई है, उसके जरिए वह अपने को, अपनी विशेषताओं को और अपने व्यक्तित्व को दूसरे लोगों तक पहुंचाता है। मनुष्य द्वारा सृजित कोई भी वस्तु ( घर, कविता, मशीनी पुरज़ा, पुस्तक, गीत, लगाया हुआ वृक्ष, आदि ) एक ओर सक्रियता का विषय होती है और, दूसरी ओर, एक ऐसा साधन कि जिससे मनुष्य सामाजिक जीवन में अपनी हैसियत जताता है, क्योंकि यह वस्तु दूसरे लोगों के लिए बनाई गई है। यह वस्तु लोगों के बीच संबंध स्थापित करती है और एक ऐसी साझी वस्तु के उत्पादन के अर्थ में संप्रेषण को जन्म देती है कि जो उत्पादक और उपभोक्ता, दोनों की समान रूप से है।

परंतु वर्तमान व्यवस्था में, श्रम के फलों के कारण लोगों के बीच साझी वस्तु के उत्पादन के अर्थ में समझे गये संप्रेषण में बाधा पड़ती है। अपने श्रम को किसी वस्तु में साकार बनाकर उत्पादक यह निश्चित नहीं कर सकता कि वह अपने को उनमें सुरक्षित रखेगा, जिनके लिए वह वस्तु बनाई गई थी। क्योंकि उसके श्रम का उत्पाद वह वस्तु, जो उसकी नहीं रह पाती, अब उसके व्यक्तित्व का नहीं, अपितु उस वस्तु के स्वामी के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती है। इस प्रकार संप्रेषण, परस्पर समझ और परस्पर आदर में आरंभ से ही विघ्न पड़ता है। आदर्श स्थिति वह होगी, जब व्यक्तित्व को किसी अन्य के आर्थिक हितों के लिए बलिदान नहीं किया जाता और श्रम के उत्पाद उनके होते हैं जो उन्हें पैदा करते हैं।

मनुष्य अपने को मनुष्य में ही जारी रख सकता है, इसी में उसका अमरत्व, उसका सौभाग्य और उसके जीवन की सार्थकता है। जीव-जंतुओं के विपरीत मनुष्य जब अपनी वंश-वृद्धि करता है, तो वह अपने वंशजों के लिए अपने आदर्श, सौंदर्यकांक्षाएं और जो भी उच्च तथा उदात्त है, उसके प्रति प्रतिबद्धता भी छोड़ जाता है। अपने को दूसरे में जारी रखने के रूप में संप्रेषण दूसरे प्रकार का संप्रेषण है, जिसे हम संप्रेषण-२ कह सकते हैं। यदि संप्रेषण-१ संयुक्त सक्रियता का सूचनात्मक पहलू है, तो संप्रेषण-२ सामाजिक दृष्टि से मूल्यवान और व्यक्तिगत दृष्टि से महत्त्वपूर्ण वस्तु के उत्पादन की ओर लक्षित संयुक्त सक्रियता का अन्योन्यक्रियात्मक पहलू है। यहां संबंध उलट जाता है और सक्रियता संप्रेषण की एक आवश्यक पूर्वापेक्षा के रूप में सामने आती है।

इस प्रकार सक्रियता संप्रेषण का एक अंग तथा एक पहलू है और संप्रेषण सक्रियता का एक अंग, एक पहलू है। दोनों ही सूरतों में संप्रेषण तथा सक्रियता परस्पर अविभाज्य हैं



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 12 जनवरी 2011

श्रम - सक्रियता का प्रमुख रूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत अधिगम और अध्ययन पर विचार किया था, इस बार हम इसी के अंतर्गत श्रम पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



श्रम
( श्रम पर एक प्रविष्टि ‘चेतना के आधार के रूप में श्रम’ पहले भी थी, उससे गुजरना भी समीचीन रहेगा। )

श्रम का शास्त्रीय मतलब है, मनुष्य द्वारा अपने किसी विशेष प्रयोजन के लिए प्रकृति में किया जा रहा सचेत परिवर्तन। श्रम एक ऐसी सक्रियता है, जिसका उद्देश्य निश्चित समाजिकतः उपयोगी ( अथवा समाज द्वारा उपयुक्त ) उत्पादों को पैदा करना है, जो भौतिक और आत्मिक, दोनों तरह के हो सकते हैं। श्रम मनुष्य की सक्रियता का प्रमुख और बुनियादी रूप है। श्रम के बिना मानवजाति का अस्तित्व कभी का ख़त्म हो गया होता। इसलिए श्रम को लोगों के जैविक जातिगत व्यवहार का एक विशिष्ट रूप कहा जा सकता है, जो उनकी उत्तरजीविता, अन्य जैविक जातियों पर विजय और प्रकृति की शक्तियों व संसाधनों का विवेकसंगत उपयोग सुनिश्चित करता है।

श्रम-सक्रियता के लक्ष्य वे वस्तुएं हो सकती हैं, जिन्हें लोगों द्वारा उपयोग किया जाता है और जो ऐसी उपभोज्य वस्तुओं, मसलन रोटी, मशीनों, फ़र्नीचर, उपकरणों, कपड़ों, कारों, आदि के उत्पादन के लिए आवश्यक हैं। श्रम का उद्देश्य ऊर्जा ( ताप, प्रकाश, विद्युत, गति आदि ) और सूचना-साधनों ( पुस्तकों, चित्रों, फ़िल्मों, आदि ) का उत्पादन भी है। उसके परिणाम वैचारिक उत्पाद ( वैज्ञानिक अविष्कार, कलाकृतियां, विचार, आदि ) और लोगों के व्यवहार तथा श्रम के संगठन की ओर लक्षित क्रियाएं ( प्रबंधन, नियंत्रण, संरक्षण, शिक्षा, आदि ) भी हो सकते हैं।

यह आवश्यक नहीं है कि श्रम के उत्पाद व्यक्ति द्वारा अपनी आवश्यकताओं की तुष्टि के लिए ही इस्तेमाल किये जाएं। मुख्य यह है कि उत्पाद समग्रतः समाज की आवश्यकता हो। इसलिए मनुष्य की व्यष्टिक सक्रियता के लक्ष्य उसकी अपनी ही आवश्यकताओं से निर्धारित नहीं होते। व्यक्ति के लिए उन्हें समाज तय करता है और इसलिए व्यक्ति की सक्रियता बहुत कुछ एक निश्चित सार्वजनिक दायित्व की पूर्ति जैसी बन जाती है। मनुष्य की सक्रियता बुनियादी तौर पर सामाजिक सक्रियता है और इसे समाज की आवश्यकताएं प्रेरित, निदेशित तथा नियमित करती हैं।

श्रम के सामाजिक स्वरूप का एक महत्त्वपूर्ण पहलू और भी है। आज के समाज में श्रम के विभाजन के कारण व्यक्ति कभी भी अपनी आवश्यकता की सभी वस्तुएं स्वयं नहीं पैदा करता, न वह कभी किसी वस्तु के उत्पादन की शुरू से लेकर आख़िर तक सारी प्रक्रिया में भाग ही लेता है। इस कारण व्यक्ति को अपने अस्तित्व के लिए आवश्यक सब कुछ समाज से अपने श्रम के एवज़ में पाना होता है। वैसे भी व्यक्ति की आवश्यकताओं की तुष्टि समाज द्वारा, न कि उसके अपने श्रम द्वारा, की जाती है। तुष्टि के इस विशिष्ट तरीक़े का स्रोत समाज में प्रचलित उत्पादन-संबंधों की पद्धति है। इसलिए समाज में किसी भी चीज़ का उत्पादन साथ ही, लोगों के बीच श्रम की प्रक्रिया में और उसके उत्पादों के वितरण, विनिमय तथा उपभोग के दौरान निश्चित संबंधों का निर्माण भी है।

मनुष्य द्वारा श्रम-सक्रियता के दौरान की जानेवाली क्रियाएं उसकी अपनी शारीरिक आवश्यकताओं द्वारा नहीं, बल्कि उत्पादन के लक्ष्य द्वारा और इस लक्ष्य को पाने के दौरान अन्य लोगों से बने संबंधों के द्वारा निर्धारित होती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं का निष्पादन तथा नियमन कर पाने के लिए मनुष्य को सूचना का संसाधन करने की उच्चतर प्रक्रियाओं, विशेषतः कल्पना और चिंतन का उपयोग करना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष भी निकलता है कि मानव मन की इन असामान्य योग्यताओं के स्रोत का स्पष्टीकरण करने के लिए ‘आत्मा’ के किन्हीं विशेष गुणधर्मों का आविष्कार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इन योग्यताओं का स्रोत और कोई नहीं, बल्कि मनुष्य की सक्रियता की नियमसंगतियां ही हैं। दूसरे शब्दों में, वे श्रम करने वाले सामाजिक प्राणी के रूप में मानव के अस्तित्व की ही उपज हैं।

मानवजाति के इतिहास में सामूहिक श्रम-सक्रियता ने मनुष्य से अपनी उच्चतम मानसिक क्षमताओं के उपयोग की मांग करते हुए साथ ही उन क्षमताओं के विकास के लिए आवश्यक पूर्वापेक्षाएं तथा परिस्थितियां भी पैदा की हैं।

उदाहरण के लिए, आदिम शिकारी यूथ में हांका करनेवाले के व्यवहार को लें। उसकी क्रियाएं अपने आप में शिकार को पकड़ने की ओर लक्षित नहीं होती थीं। इतना ही नहीं, यदि वह अकेला होता , तो परिणाम उल्टा ही निकलता, शिकार आसानी से बच निकलता और वह भूखा ही रह जाता। उसकी सारी सक्रियता सार्थक तभी बनती है, जब वह अन्य शिकारियों की सक्रियता के साथ संपन्न की जाती है। इस लक्ष्य को पाने के लिए हांका करनेवाले को शिकारियों की क्रियाओं को भी ध्यान में रखना पड़ता था, यानि हिरण का पीछा करने के साथ-साथ उसे शिकारियों की ओर खदेड़ना भी पड़ता था।

इस तरह उसके लक्ष्य ने अपना जैविक अर्थ खो दिया और सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लिया। वह अब आंतरिक सहजवृत्तिमूलक अनुभवों के रूप में नहीं, बल्कि बाह्य वस्तुओं पर क्रियाओं के अवबोधन के जरिए अपने को प्रकट करता था। इस तरह मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप ने ही वस्तुओं और वस्तुसापेक्ष क्रियाओं के बिंबों को मनुष्य को सक्रियता के लिए उकसानेवाली जैव आवश्यकताओं के अनुभव से पृथक किया।

श्रम की जो मुख्य विशेषता उसे प्राकृतिक उत्पादों के साधारण हस्तगतकरण से भिन्न बनाती है, वह औजारों का निर्माण तथा प्रयोग, यानि कुछ वस्तुओं के ज़रिए अन्य वस्तुओं पर काम करना है। इस तरह श्रम एक दूसरे के संबंध में वस्तुओं के यथार्थ गुणधर्मों को प्रकट करता है। हर प्रकार की श्रम-सक्रियता वस्तुओं के जैव महत्त्व की बजाए इन यथार्थ गुणधर्मों पर आधारित होती है। उदाहरण के लिए, हड्डी का बल्लम-सिरा बनाने के लिए हड्डियों की आपेक्षिक कठोरता को ध्यान में रखना पड़ता है, न कि उनके खाद्य गुण को। हड्डी की वस्तुओं के निर्माण के लिए आवश्यक क्रियाएं हड्डियों के इन यथार्थ गुणधर्मों से निदेशित होती हैं, न कि उनके स्वाद अथवा पौष्टिकता से।

इस प्रकार वस्तुओं के नये अर्थ और उनके प्रति नये रवैये, मनुष्य की व्यावहारिक सक्रियता और सामाजिक श्रम से पैदा हुए हैं। सामूहिक सक्रियता वस्तुओं के यथार्थ गुणधर्मों में भेद करती है, उसकी बदौलत लोग आपस में जानकारियों का आदान-प्रदान करते हैं और उन्हें वाक् नामक विशेष संप्रेषणात्मक क्रियाओं में ठोस रूप देते हैं। सामूहिक सक्रियता के माध्यम से ही व्यक्ति अपने को और अन्य व्यक्तियों को सक्रियता में भाग लेने वाले के रूप में जान सकता है। इसके अलावा, यह भी सामूहिक सक्रियता ही है कि जो मनुष्य को अपने सामने निश्चित प्रात्ययिक लक्ष्य रखना और सामाजिक अनुभव को अपनी क्रियाओं में मार्गदर्शन के लिए इस्तेमाल करना सिखाती है।

यथार्थ के प्रति यह रवैया ही चेतना का आधार है। वही मनुष्य को वस्तुओं के संबंध में सक्रियता का कर्ता और लोगों के संबंध में व्यक्ति बनाती है। यह रवैया ही मनुष्य को परिवेशी विश्व के दास से उसके स्वामी में परिणत करता है, उसे इस विश्व का रूपांतरण करने तथा दूरस्थ लक्ष्यों की ओर बढ़ने में समर्थ बनाता है और उसकी क्रियाओं को सचेतन, सुनियोजित सक्रियता में तथा पृथ्वी पर उसके अनुकूलनमूलक अस्तित्व को अर्थपूर्ण तथा उदात्त लक्ष्योंवाले सक्रिय जीवन में रूपांतरित करता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 8 जनवरी 2011

अधिगम और अध्ययन

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका पर विचार किया था, इस बार हम इसी के अंतर्गत अधिगम और अध्ययन पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



अधिगम और अध्ययन

बच्चे के व्यवहार तथा सक्रियता पर विचार करते समय हमारा एक बुनियादी महत्त्व के तथ्य से साक्षात्कार होता है। कुछेक अनुकूलित प्रतिवर्तों के अलावा व्यवहार तथा सक्रियता के उन सभी रूपों का बच्चे में शुरू में अभाव होता है, जिनका वह बाद के चरणों में प्रदर्शन करता है। व्यावहारिक और संप्रेषणात्मक व्यवहार, अभिविन्यासात्मक तथा अन्वेषणात्मक सक्रियता, पकड़ने तथा उलटने-पलटने की गतियां, रेंगना, चलना, बोलना, खेलना और सामाजिक अन्योन्यक्रिया अपने को बच्चे के जन्म के कुछ समय के बाद ही प्रकट कर देते हैं और विकास करने लगते हैं। इतना ही नहीं, हर प्रकार के व्यवहार और हर प्रकार की सक्रियता के प्रकट होने का लगभग निश्चित समय, विकास की निश्चित गतियां और परिणामात्मक तथा गुणात्मक परिवर्तनों से गुजरने के निश्चित चरण होते हैं। वे सभी बच्चे के विकास के परिचायक होते हैं, जो निश्चित जन्मजात कारकों तथा आनुवंशिक प्रोग्रामों से, शरीर की उच्चतर तंत्रिका सक्रियता के क्रियातंत्रों के निर्माण तथा विविधीकरण से अभिन्नतः जुड़ा हुआ है।

किंतु व्यवहार का इनमें से कोई भी रूप, सक्रियता का कोई भी भेद स्वतः और परिवेशी परिस्थितियों से स्वतंत्र रूप से प्रकट नहीं होता है। वे सभी बच्चे के व्यावहारिक तथा सामाजिक अनुभव के आधार पर और अन्य लोगों तथा विभिन्न वस्तुओं से उसकी अन्योन्यक्रिया के परिणाम के तौर पर पैदा तथा विकसित होते हैं। मानव बनने की प्रक्रिया में बच्चा जो कुछ भी अर्जित करता है, वह अधिगम का, अर्थात अनुभव के आत्मसात्करण का परिणाम होता है।

मानव व्यवहार जैविक नहीं, अपितु सामाजिक अनुभव से निर्धारित होता है। सामाजिक अनुभव को जैविकतः अंतरित नहीं किया जा सकता। वह शरीर के गुणों पर नहीं, अपितु व्यक्ति जिस समाज में रहता है, उस समाज की विशेषताओं पर निर्भर होता है। शरीर के जो गुण सामाजिक अनुभव और व्यवहार तथा सक्रियता के मानवीय रूपों के व्यावहारिक आत्मसात्करण के लिए आवश्यक हैं, केवल वे ही अंतर्जात गुणों के रूप में जैविकतः अंतरित किये जा सकते हैं। जैव पूर्वनिर्धारण से बच्चे के व्यवहार की यह स्वतंत्रता पशु की तुलना में मनुष्य को अत्यंत लाभकर स्थिति में रख देती है। इस लाभ के कारण ही मानव व्यवहार के रूपों तथा सक्रियता की प्रणालियों के उदविकास का निर्धारण मानव शरीर के जैव विकास ने नहीं, अपितु समाज के ऐतिहासिक विकास ने किया है।

अतः अधिगम विकास का एक प्रमुख कारक है, जिसकी मदद से बच्चे में व्यवहार तथा वास्तविकता के परावर्तन के मानवीय रूपों का निर्माण होता है।

फिर भी बच्चे के व्यवहार तथा सक्रियता के अब तक चर्चित सभी रूपों में यह अंतिम परिणाम, सामाजिक अनुभव का आत्मसात्करण स्वयं सक्रियता के उद्देश्यों से मेल नहीं खाता है। शिशु चीज़ों को इसलिए नहीं उलटता-पलटता कि उसे कुछ सीखना है। जब वह पहले डग भरता है या पहले शब्द बोलने की कोशिश करता है, तो इसके पीछे चलना और बोलना सीखने की इच्छा नहीं होती। उसकी क्रियाएं अन्वेषणात्मक क्रियाशीलता की उसकी तात्कालिक आवश्यकता की तुष्टि की ओर, वस्तुओं को पाने, आसपास के लोगों को प्रभावित करने, आदि की ओर लक्षित होती हैं। बच्चे द्वारा क्रियाओं और जानकारियों का आत्मसात्करण लक्ष्य नहीं, बल्कि किन्हीं आवश्यकताओं की तुष्टि का साधन होता है।

एक समय आता है कि जब बच्चा कोई नई सक्रियता आरंभ करता है। तात्कालिक लक्ष्य कुछ निश्चित जानकारियां, कुछ निश्चित क्रियाओं अथवा व्यवहार-संरूपों को आत्मसात् करना होता है। नई सामग्री के आत्मसात्करण अथवा शिक्षण की ओर लक्षित यह विशिष्ट सक्रियता अध्ययन कहलाती है। इसमें निम्न चीज़ें शामिल हैं : क) कुछ ख़ास प्रकार की प्रात्ययिक और व्यावहारिक सक्रियता के सफल संगठन के लिए विश्व के महत्त्वपूर्ण गुणधर्मों की जो जानकारी आवश्यक है, उस जानकारी का आत्मसात्करण ( इस प्रक्रिया के उत्पाद को ज्ञान कहते हैं ) ; ख) ऐसी प्रणालियों तथा संक्रियाओं में दक्षता प्राप्त करना, जिनसे सक्रियता की ये सभी क़िस्में बनती हैं ( इस प्रक्रिया का उत्पाद आदतें हैं ) ; ग)  किसी निश्चित कार्यभार की परिस्थितियों और निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप प्रणालियों व संक्रियाओं के सही चयन व परिवीक्षण के लिए आत्मसात्कृत सूचना के उपयोग की प्रणालियों को सीखना ( इस प्रक्रिया का उत्पाद कौशल होते हैं )।

इस प्रकार अध्ययन एक ऐसी सोद्देश्य सक्रियता है, जिसमें व्यक्ति की क्रियाएं उनके सचेतन लक्ष्य के रूप में निश्चित ज्ञान, आदतों और कौशलों के आभ्यंतरीकरण की ओर निर्दिष्ट होती है

ऊपर जो कहा गया है, उससे स्पष्ट है कि अध्ययन एक अनन्यतः मानवीय सक्रियता है। जानवर केवल सीख सकते हैं। मनुष्य भी अध्ययन करने में तभी समर्थ बनता है, जब उसमें अपनी क्रियाओं का नियमन करने की योग्यता आ जाती है और इस योग्यता को एक सचेत प्रात्ययिक लक्ष्य माना जाता है। बच्चे में यह योग्यता केवल छठे या सातवें वर्ष में ही और सक्रियता के पूर्ववर्ती रूपों - खेल, बोलना, व्यावहारिक आचरण, आदि - के आधार पर पैदा हो सकती है। सक्रियता के एक रूप के नाते अध्ययन की पहली पूर्वापेक्षा बच्चे में निश्चित जानकारियों के आत्मसात्करण और निश्चित आदतों व कौशलों के अर्जन के लिए सचेतन अभिप्रेरकों का विकास करना है।

बच्चे के विकास पर सामाजिक प्रभाव के सक्रिय वाहकों की भूमिका वयस्क अदा करते हैं। वे स्वीकृत सामाजिक संरूपों के दायरे में उसके व्यवहार तथा सक्रियता का संगठन करते हैं। बच्चे की सक्रियता व व्यवहार का मानवजाति के सामाजिक अनुभव के आत्मसात्करण की ओर सक्रिय अभिमुखन शिक्षण कहलाता है। बच्चे के व्यक्तित्व के विकास पर उसके प्रभाव की दृष्टि से इस प्रक्रिया को चरित्र-निर्माण कहते हैं। शिक्षण और चरित्र-निर्माण के मुख्य साधन निदर्शन और व्याख्या, प्रोत्साहन और दंड, कार्य-निर्धारण तथा अपेक्षाएं करना, जांच और सुधार हैं। इन उपकरणों की मदद से वयस्क बच्चे की संज्ञान-मूलक तथा व्यावहारिक सक्रियता का नियंत्रण करते हैं और उसकी क्रियाओं को प्रेरित व निदेशित करते हैं, उन पर नज़र रखते हैं तथा उन्हें सुधारते हैं।

शिक्षण की विधियों, साधनों, उद्देश्यों, प्रदत्त जानकारी के स्वरूप और जो आदतें व कौशल सिखाए जा रहे हैं, उनसे संबंधित सभी बहुविध प्रश्न शिक्षाशास्त्र के दायरे में आते हैं, जो शिक्षण के सिद्धांत और व्यवहार से संबंध रखनेवाला एक विशेष विज्ञान है।

सक्रियता के एक रूप के नाते अध्ययन, मनुष्य को सामाजिक व्यवहार के विभिन्न क्षेत्रों में उसके काम आनेवाले ज्ञान, आदतों और कौशलों से सज्जित ही नहीं करता। वह अपनी मानसिक प्रक्रियाओं का नियंत्रण करने और अपनी क्रियाओं, संक्रियाओं, आदतों तथा अनुभव का अपने समक्ष उपस्थित कार्यभारों से अनुरूप चयन, संगठन व निदेशन करने की उसकी योग्यता का विकास भी करता है। दूसरे शब्दों में, अध्ययन मनुष्य को श्रम के लिए तैयार करता है।



इस बार इतना ही। अगली बार सक्रियता के एक और मुख्य प्ररूप श्रम पर बातचीत होगी।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 5 जनवरी 2011

खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत सक्रियता के निर्माण पर चर्चा की थी इस बार हम इसी के अंतर्गत खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



खेल और सक्रियता में उसकी भूमिका

अपने जीवन के पहले वर्ष में ही बच्चा सक्रियता के सरलतम रूपों को सीखने की पूर्वापेक्षाएं विकसित कर लेता है। ऐसी पहली पूर्वापेक्षा खेल है।

ज्ञात है कि उछलकूद, दौड़-भाग, झूठमूठ की लड़ाई, आदि के रूप में खेल जीव-जंतुओं के बच्चों की भी विशेषताएं है। कुछ जीव चीज़ों से खेलना पसंद करते हैं, जैसे बिल्ली का बच्चा गेंद या गोले से और कुत्ते का बच्चा चीथड़े से। खेल के दौरान नन्हें जीवों के व्यवहार को मुख्य रूप से उनके शरीर की सक्रियता की आवश्यकता की पूर्ति और संचित उर्जा के उन्मोचन की अभिव्यक्ति माना जा सकता है। इसकी पुष्टि इससे होती है कि उनकी क्रीड़ात्मक व्यवहार की प्रवृत्ति भूख, अल्पपोषण तथा उच्च परिवेशी तापमान की अवस्था में, शरीर का तापमान बढ़ा या मस्तिष्क की सक्रियता को मंद कर देनेवाले रासायनिक द्रव्यों के प्रभाव की अवस्था में अवरुद्ध हो जाती है। यदि पशु को कुछ समय तक के लिए उसके खेल के साथी से वंचित कर दिया जाए, तो बाद में उसकी उत्तेजनशीलता और क्रीड़ात्मक क्रियाशीलता एकाएक बहुत अधिक बढ़ जाएगी, जो इसका प्रमाण है कि वह अपनी संचित उर्जा को उन्मोचित करना चाहता है। मनोविज्ञान में इस परिघटना को ‘खेल की भूख’ कहा जाता है।

खेल की प्रेरणा इसलिए पैदा होती है कि क्रीड़ा-सक्रियता और शरीर के उर्जा-विनिमय के बीच संबंध है। किंतु व्यवहार के वे रूप कहां से आते हैं, जिनके दायरे में क्रीड़ा-सक्रियता साकार बनती है? प्रेक्षण दिखाते हैं कि इनमें से कुछ रूप जीवों की जन्मजात, सहजवृत्तिमूलक क्रियाएं ही होते हैं। इसकी एक मिसाल बिल्ली के बच्चे का शिकार से संबंधित व्यवहार है। दूसरे रूप अनुकरण का परिणाम होते हैं, जैसे शिशु चिंपांज़ी द्वारा अपनी जाति के बड़े जीवों की अथवा लोगों की क्रियाओं को दोहराया जाना। कुछेक रूप जानवर द्वारा परिवेशी विश्व के साथ अन्योन्यक्रिया के दौरान स्वयं विकसित किये जाते हैं। इस प्रकार छोटे जानवरों द्वारा की जानेवाली क्रियाओं के स्रोत वे ही होते हैं, जो व्यस्क जानवरों की क्रियाओं के होते हैं, यानि विशिष्ट सहजवृत्तियां, अनुकरण और सीखना। इसलिए छोटों की क्रियाओं का बड़े जानवरों के विशिष्ट व्यवहार के समान होना अनिवार्य ही है। किंतु जहां व्यस्क पशुओं की क्रियाओं का उद्देश्य आहार, शत्रुओं से रक्षा, परिवेश में अभिविन्यास, ख़तरे से बचना, आदि यथार्थ जैविक आवश्यकताओं की तुष्टि होता है, वहीं इसके विपरीत अवयस्क पशुओं की क्रियाओं में ऐसी यथार्थ जैविक आवश्यकताओं का तत्व नहीं होता और वे मात्र कुछ करने के लिए ही की जाती हैं। क्रीड़ामूलक व्यवहार का मुख्य विभेदक लक्षण यही है। क्रीड़ामूलक व्यवहार का लक्ष्य स्वयं सक्रियता है, न कि इसके द्वारा प्राप्त व्यवहारिक परिणाम

अनुसंधानों ने दिखाया है कि मानव बच्चे के लिए भी खेल अपनी क्रियाशीलता को साकार बनाने का एक रूप, जीवनीय सक्रियता का एक रूप है। इस नाते यह कार्यमूलक आनंद से जुड़ा हुआ है। क्रियाशीलता की आवश्यकता इसे प्रेरित करती है और इसके स्रोत अनुकरण तथा अनुभव होते हैं। फिर भी बच्चे की क्रीड़ामूलक क्रियाएं शुरू से ही वस्तुओं को इस्तेमाल करने के मानवसुलभ तरीक़ों और मानव व्यवहार के उन रूपों के आधार पर विकसित होती है, जिन्हें बड़ों से संपर्क के दौरान तथा उनके मार्गदर्शन में सीखा जाता है। यह बच्चों के खेल की वह बुनियादी विशेषता है, जो इसके रूपों, स्रोतों, क्रियातंत्रों, कार्यों और परिणामों को जीव-जंतुओं के खेलों से भिन्न बनाती है।

अपनी व्यवहारिक सक्रियता के दौरान बच्चे का उपकरण का काम करनेवाली वस्तुओं के अलावा अन्य प्रकार की वस्तुओं - खिलौनों - से भी साक्षात्कार होता है। उनके इस्तेमाल का मनुष्य का तरीक़ा खेल, यानि उनके ज़रिए किन्हीं अन्य, वास्तविक वस्तुओं तथा क्रियाओं का चित्रण है। बच्चे खिलौने के इस्तेमाल का यह तरीक़ा बड़ों से सीखते हैं, जो उन्हें दिखाते हैं कि गुड़िया को पानी कैसे पिलाना चाहिए, कैसे उसे सुलाना चाहिए, कैसे घुमाना चाहिए, खिलौने के भालू को कैसे खिलाना चाहिए, खिलौने की कार को कैसे चलाना चाहिए, वग़ैरह।

फिर भी खिलौने के बारे में यह रवैया कि वह एक ‘वास्तविक’ वस्तु का एवज़ी है, बच्चे में तभी पैदा होता है, जब उसके खेल में एक नया तत्व शामिल हो जाता है। और यह नया तत्व है शब्द

छोटा बच्चा ( १-२ वर्ष की आयु का बच्चा ), मिसाल के लिए, झुलाने, खाना खिलाने, आदि की क्रियाओं को गुड़िया से किसी डंडी पर अंतरित नहीं कर सकता। वह संबद्ध वस्तु के बिना किसी क्रिया का अनुरूपण या इस क्रिया का एक वस्तु से दूसरी वस्तु में अंतरण नहीं कर सकता। ऐसी संक्रियाएं तभी संभव बनती हैं, जब बच्चा बोलना सीख जाता है। लकड़ी के किसी टुकड़े से गुड़िया जैसा बर्ताव करने के लिए बच्चे को गुड़िया को कोई नाम देना होगा। खिलाने की क्रिया को गुड़िया से खिलौने के घोड़े पर अंतरित करने के लिए बड़ों को उसे कहना होगा - घोड़े को खाना खिलाओ, वग़ैरह। बाद में शब्द, बच्चे को बड़ों की ‘वास्तविक’ वस्तुओं पर क्रियाओं को, जिन्हें वह देख सकता है, खिलौने पर स्वतंत्र रूप से अंतरित करने में समर्थ बना देता है। व्यवहारिक क्रियाओं के ज़रिए शब्द का अर्थ जानकर या बड़ों की क्रियाओं को देखकर बच्चा इन क्रियाओं को शब्द के साथ-साथ खेलने की चीज़ों पर अंतरित करता है। यहां खेल यह हो जाता है कि वस्तु के अर्थ को निर्धारित करने वाली क्रियाऒ को स्वयं वस्तु से अलग लिया जाता है और फिर उन्हें दूसरी वस्तु - खिलौने - पर अंतरित किया जाता है। खेल के माध्यम से बच्चा शब्द के अर्थ को वस्तु के बाह्य रूप से अलग करना सीखता है और इस अर्थ को वस्तु पर क्रिया से, मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप में इस वस्तु के प्रकार्यों से जोड़ता है।

यह प्रक्रिया जितनी ही आगे बढ़ती है, उतने ही ज़्यादा शब्द वस्तुओं से अपने प्रत्यक्ष संबंधों से मुक्त हो जाते हैं। शब्द का अर्थ पहले बाह्य क्रिया से और फिर उस क्रिया के प्रत्यय से अधिकाधिक एकाकार हो जाता है। वस्तुओं से वास्तविक क्रियाओं का काम शाब्दिक क्रियाओं से चला लेने की संभावना पैदा हो जाती है। ४-५ वर्ष की अवस्था में पहुंचने पर खेल में खिलौने के साथ वास्तविक क्रियाएं घट जाती हैं और उनका स्थान शाब्दिक क्रियाएं ले लेती हैं। गुड़िया को खाना खिलाने की प्रक्रिया को सविस्तार संपन्न करने की बजाए छोटी बच्ची चम्मच को केवल एक बार गुड़िया के मुंह से छुआकर कह सकती है - अब मैं इसे खाना खिला रही हूं...इसने खाना खा लिया है, वग़ैरह।

तीसरे वर्ष के मध्य तक बच्चा अपनी क्रियाओं की दूसरों की क्रियाओं से तुलना करने और सक्रियता तथा इच्छाओं के वाहक के रूप में अपने आपको शेष विश्व व लोगों से अलग करने लग जाता है। वस्तुओं के संबंध में क्रियाएं, वस्तुओं के संबंध में लोगों के प्रकार्यों के रूप में सामने आने लगती हैं। बच्चा भूमिकामूलक खेलों के दौर में प्रवेश करता है। भूमिकामूलक खेल में बच्चा अपने द्वारा देखे गये बड़ों के सामाजिक प्रकार्यों और व्यक्ति के रूप में बड़ों के व्यवहार की पुनर्प्रस्तुति करता है। यदि दो वर्ष की बच्ची गुड़िया को खाना खिलाते हुए खिलाने का खेल खेलती है, तो चार वर्ष की बच्ची गुड़िया को खाना खिलाते हुए उसकी मां की भूमिका भी अदा करती है, जैसे मां अपनी बच्ची को खाना खिला रही है। जैसे-जैसे बच्चे का सामाजिक अनुभव बढ़ता है, वैसे-वैसे घरेलू विषयों पर आधारित खेलों ( ‘मां’, ‘शिक्षिका’, ‘स्कूल’, ‘चिड़ियाघर’ ) में पहले तकनीक और ओद्योगिक विषयों पर आधारित खेल ( ‘बस ड्राईवर’, ‘विमान चालक’, ‘कार’, ‘फैक्ट्री’, आदि ) और फिर सामाजिक-राजनैतिक विषयों पर आधारित खेल ( ‘लड़ाई’, ‘युद्ध’, ‘चोर-सिपाही’, आदि ) जुड़ते जाते हैं। खेल की अंतर्वस्तु, वस्तुसापेक्ष क्रियाओं की पुनर्प्रस्तुति से अधिकाधिक लोगों के परस्पर-संबंधों के चित्रण में बदलती जाती है।

वास्तव में यह वह अवस्था है कि जब बच्चा शब्दों और परिवेशी परिघटनाओं के अर्थों का व्यावहारिक आत्मसात्करण शुरू करता है। इस प्रक्रिया में व्यस्कों के प्रकार्यों तथा रवैयों के सामाजिक अर्थों से परिचय, जिस रूप में कि वे अपने को बच्चे द्वारा देखे गये उनके व्यवहार में प्रकट करते हैं, उस रूप में परिचय शामिल है। आजकल तो रेड़ियो, टेलीविजन और फ़िल्मों की वज़ह से ऐसे प्रेक्षणों का दायरा बहुत ही व्यापक हो गया है।

डॉक्टर की भूमिका करते हुए बच्चा ‘डॉक्टर जैसे’ बर्ताव करता है। छोटे बच्चे किसी भी वस्तु को स्टेथस्कोप के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, गुड़िया को बिस्तर पर लिटाते हैं और गंभीरता से सिर हिलाते हुए कह सकते हैं कि इसे तो इंजेक्शन लगाना होगा, वगै़रह। बच्चे की क्रियाएं डॉक्टर के प्रकार्यों की उसकी समझ से निदेशित होती हैं, न कि वह दत्त क्षण में जिन वस्तुओं का इस्तेमाल कर रहा है, उन वस्तुओं के गुणधर्मों से। दूसरे शब्दों में, बच्चा अपने में अपनी क्रियाओं को ओढ़ी गई सामाजिक भूमिका तथा यथोचित आचरण की अपनी समझ के मुताबिक़ नियंत्रित करने की क्षमता पैदा करता है। भूमिकामूलक खेलों की विकसित अवस्था में पहुंचने पर बच्चा दूसरे बच्चों के साथ अन्योन्यक्रिया करने लगता है। भूमिकाएं बांटते और एक दूसरे से ओढ़ी गई भूमिकाओं ( मां-बेटी, डॉक्टर-रोगी, आदि ) के अनुरूप बर्ताव करते हुए बच्चे सामाजिक व्यवहार सीखते हैं और अपनी क्रियाओं का समूह की आवश्यकताओं के अनुसार समन्वय करने की शिक्षा पाते हैं।

अगले चरण, नियमों के अनुसार खेल, में ये प्रवृत्तियां और भी सुस्पष्ट बन जाती हैं और क्रियाएं अमूर्त अपेक्षाओं अथवा नियमों द्वारा नियंत्रित होने लगती हैं। दूसरे लोग, यानि खेल में भाग लेने वाले इन नियमों के वाहक के रूप में सामने आने लगते हैं। सामाजिक दृष्टि से सार्थक परिणाम ( खेल में जीतना ) सक्रियता का लक्ष्य बनने लगता है। इस बिंदु पर आकर खेल वास्तव में ख़त्म हो जाता है। सामाजिक मानदंडों के अनुसार, खेल ( उपयोगी उत्पाद का अभाव ) रहते हुए भी यह सक्रियता मनोवैज्ञानिक संरचना के अनुसार श्रम ( जिसमें लक्ष्य स्वयं सक्रियता नहीं, अपितु उसका उत्पाद है) और अधिगम ( जिसमें लक्ष्य खेल को सीखना है ) से मिलती-जुलती बन जाती है

इस प्रकार खेल, बच्चे में वस्तुओं तथा परिघटनाओं के भाषाई व्यवहार द्वारा स्थिरीकृत अर्थों का आभ्यंतरीकरण करने तथा इन अर्थों से व्यवहार में काम लेने की क्षमता विकसित करता है। वह उसे अपनी क्रियाओं को संक्रियाएं मानने की ओर अभिमुख करता है, उसे ऐसी संक्रियाएं आत्मनियमन ( नियमों ) के आधार पर करना सिखाता है और उसकी आत्मचेतना को अपने वस्तुसापेक्ष क्रियाओं का कर्ता होने की चेतना से अपने एक सामाजिक भूमिका का वाहक, अर्थात् मानव-संबंधों का कर्ता होने की चेतना तक विस्तारित करता है।




इस बार इतना ही। अगली बार अधिगम और अध्ययन पर बातचीत होगी।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 1 जनवरी 2011

बच्चों की आरंभिक क्रियाशीलता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने क्रियाशीलता और सक्रियता को समझने की कोशिशों की कड़ी में कौशल और उसके निर्माण की प्रक्रिया पर चर्चा की थी इस बार हम मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनके विकास के अंतर्गत सक्रियता के निर्माण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य की सक्रियता के मुख्य प्ररूप और उनका विकास

सचेतन क्रियाशीलता के रूप में मनुष्य की सक्रियता का निर्माण और विकास उसकी चेतना के निर्माण और विकास के समानांतर होता है। वह चेतना के निर्माण तथा विकास के लिए आधार और उसकी सारवस्तु के स्रोत का काम भी करती है।

सक्रियता का निर्माण
बच्चों की आरंभिक क्रियाशीलता
 
व्यक्ति की सक्रियता अन्य व्यक्तियों के साथ उसके संबंधों की पद्धति से अभिन्न रूप से जुड़ी होती है। अन्य लोगों की सहायता और सहभागिता उसके अनिवार्य अंग हैं और इस कारण वह संयुक्त सक्रियता का रूप ग्रहण कर लेती है। उसके परिणाम परिवेशी विश्व पर और अन्य लोगों पर के जीवन पर एक निश्चित प्रभाव डालते हैं। इस कारण सक्रियता हमेशा अन्य चीज़ों के प्रति ही नहीं, अन्य लोगों के प्रति भी उसके रवैये की परिचायक होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो, सक्रियता मनुष्य के व्यक्तित्व को उघाड़ती भी है और ढ़ालती भी है

संयुक्त सुसंगठित समूह की सोद्देश्य, सामाजिक रूप से उपयोगी सक्रियता में भाग लेने से व्यक्ति में सामूहिक भावना, आत्मानुशासन और अपने हितों को समाज के हितों से जोड़ने की योग्यता का संवर्धन होता है। वस्तुगत शिक्षा मनोविज्ञान में सक्रियता को व्यक्तित्व के निर्माण का एक प्रमुख कारक मानते हुए उसकी संकल्पना को अपने शैक्षिक कार्य के सिद्धांत तथा व्यवहार का आधार बनाया जाता है। इन सिद्धांतों के अनुसार बच्चों की सक्रियता क्रियाकलापों का गठन इस प्रकार से किया जाना चाहिए कि वे महत्त्वपूर्ण मानव गुणों ( संकल्प, अनुशासन, ईमानदारी, उत्तरदायित्व भावना, लक्ष्यनिष्ठा, आदि ) के विकास में सहायक सभी तरह की गतिविधियों में भाग ले सकें।

किन्हीं खास परिस्थितियों में किन्हीं खास कार्यों को करने की आवश्यकता ऐसी आदतों को जन्म देती है कि जो व्यक्तित्व के गुण बन जाती हैं। विभिन्न प्रकार की सक्रियता में मनुष्य का भाग लेना आंतरिक विकास की एक दीर्घ तथा जटिल प्रक्रिया का परिणाम होता है। बच्चे की क्रियाशीलता अभिभावकों, अध्यापकों और प्रशिक्षकों के दीर्घ प्रयास के फलस्वरूप ही, सचेतन सोद्देश्य सक्रियता का रूप ग्रहण करती है।

आरंभ में यह क्रियाशीलता अपने को आवेगी व्यवहार में प्रकट करती है। नवजात शिशु की प्रतिक्रियाएं केवल कुछ सहज अनुक्रियाओं तक ही सीमित रहती हैं, जिनका स्वरूप प्रतिरक्षात्मक ( तेज़ उजाले या ऊंची आवाज़ के प्रभाव से आंख की पुतली का सिकुड़ना, दर्द होने पर रोना तथा हाथ-पैर पटकना ), आहारान्वेषणात्मक ( चूसने का प्रतिवर्त ), लैबिरिंथी ( हिचकोले दिये जाने पर शांत हो जाना ) और कुछ बाद में अभिविन्यास तथा अन्वेषण से संबंधित ( उत्तेजक की ओर सिर घुमाना, चलती हुई वस्तु पर आंखें टिकाये रखना, आदि ) होता है।

ग्यारहवें-बारहवें दिन से शिशु के पहले अनुकूलित प्रतिवर्त बनने शुरू हो जाते हैं। वे अन्वेषणात्मक व्यवहार ( वस्तुओं को पकड़ना, जांचना, उलटना-पलटना ) के विकास का आधार बनते हैं, जिसकी शुरूआत बच्चे के जीवन के पहले वर्ष में ही हो जाती है और जो उसे बाह्य वस्तुओं के गुणों के बारे में जानकारी संचित करने और गतियों का संतुलन करना सीखने में मदद करता है। दूसरे वर्ष से बच्चा सिखाने के प्रभाव से और अनुकरण की अपनी सहजवृत्ति के भरोसे व्यवहारिक व्यवहार विकसित करना शुरू करता है और विभिन्न वस्तुओं को इस्तेमाल करने और सामाजिक व्यवहार में उनका अर्थ खोजने के मानवीय तरीक़े सीखता है ( जैसे बिस्तर पर सोना, स्टूल पर बैठना, गेंद से खेलना, पेंसिल से आकृतियां बनाना)।

क्रियाशीलता के इन रूपों की एकता से बच्चा संप्रेषणात्मक व्यवहार विकसित करता है, जो उसकी आवश्यकताओं और इच्छाओं की तुष्टि का मुख्य ज़रिया है, और समाज द्वारा की जानेवाली अपेक्षाओं की जानकारी पाता है तथा अपने लिए सूचना के विभिन्न स्रोतों के द्वार खोलता है।

आरंभ में यह व्यवहार भाषापूर्व रूपों में साकार बनता है ( अस्पष्ट आवाज़ें, चीखें, अंगसंचालन द्वारा संकेत )। सातवें या आठवें महिने से बच्चा पहले निष्क्रिय तौर पर और फिर सक्रिय रूप से मानव-संप्रेषण, अन्योन्यक्रिया तथा सूचना-विनिमय के मुख्य साधन - भाषाई व्यवहार - को सीखना शुरू कर देता है। बोलना सीखने से बिंबों को वस्तुओं तथा क्रियाओं से अलग करने और विभिन्न अर्थों को व्यवहार-नियंत्रण के उपकरणों के नाते अलग, सुनिर्धारित तथा उपयोग करने के लिए आवश्यक पूर्वाधार तैयार होता है।



इस बार इतना ही। अगली बार खेल और सक्रियता में उनकी भूमिका पर बातचीत होगी।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय
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