शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

प्रत्यक्ष की स्थिरता तथा सार्थकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में प्रत्यक्ष और उसके विशिष्ट स्वरूप पर विचार किया था, इस बार हम प्रत्यक्ष की स्थिरता और सार्थकता पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रत्यक्ष की स्थिरता
( stability of perception )

प्रत्यक्षकर्ता से अपनी स्वतंत्रता के असंख्य स्तरों और उसके सामने अत्यंत विभिन्न परिस्थितियों में प्रकट होने के कारण बाह्य जगत की वस्तुएं अपना रूप निरंतर बदलती और अपने नये-नये गुण व विशेषताएं दिखाती रहती हैं। इसी के अनुसार प्रत्यक्षमूलक प्रक्रियाएं भी बदलती रहती हैं। किंतु प्रत्यक्ष-तंत्र ( अर्थात प्रत्यक्षण की दत्त क्रिया सुनिश्चित करनेवाले विश्लेषकों की समष्टि ) की इन परिवर्तनों का प्रतिसंतुलन ( counterbalance ) करने की योग्यता की बदौलत हम वस्तुओं की आकृति, आकार, रंग, आदि को अपेक्षाकृत स्थिर, अपरिवर्तित समझते हैं।

प्रत्यक्ष के इस गुण को आकार की विशिष्ट मिसाल लेकर समझा जा सकता है। ज्ञात है कि किसी भी वस्तु का बिंब ( दृष्टिपटल पर पड़नेवाला बिंब भी ) उसके और ग्राही के बीच की दूरी घटने के साथ बढ़ता और दूरी बढ़ने के साथ घटता जाता है। किंतु प्रेक्षण की दूरी के साथ दृष्टिपटल ( retina ) पर पड़नेवाले बिंब ( image ) में परिवर्तन होबे पर भी वस्तु के प्रत्यक्षीकृत आयाम ( percepted dimension ) लगभग अपरिवर्तित रहते हैं। किसी भी थियेटर में दर्शकों पर दृष्टिपात करें, सभी के चहरे आकार में लगभग एक बराबर लगते हैं, हालांकि पीछे की क़तारों में बैठे लोगों के चहरों के बिंब वास्तव में हमारे नज़दीक स्थित अगली क़तारों के लोगों के चहरों के बिंबों से छोटे हैं। अब अपने हथेलियों को आगे-पीछे थोड़ा दूर रखकर उंगलियों को देखें, वे आपको समान आकार की लगेंगी, हालांकि उनके दृष्टिपटल पर बनने वाले बिंब असमान आकार के होंगे।

प्रत्यक्ष की स्थिरता का स्रोत क्या है ? क्या यह उसका सहज गुण ( innate properties ) है ?

इस प्राक्कल्पना ( hypothesis ) की जांच के लिए मनोविज्ञानियों ने ऐसे लोगों के प्रत्यक्ष का अध्ययन किया, जो एक घने जंगल में रहते थे और जिन्होंने वस्तुओं को बहुत अधिक दूरी पर कभी नहीं देखा था। जब इन लोगों को ऐसी दूर की वस्तुएं दिखाई गईं, तो उन्हें वे दूर नहीं, बल्कि छोटी लगीं। प्रत्यक्ष के ऐसे ही दोष बहुत अधिक ऊंचाई से नीचे देखनेवाले मैदानी लोगों में भी मिले। जब हम किसी गगनचुंबी इमारत की एक ऊपरी मंज़िल से नीचे सड़क पर लोगों या कारों को देखते हैं, तो हमें उनका आकार छोटा लगता है। किंतु ऐसी ऊंचाइयों पर काम करनेवाले निर्माण मज़दूरों को भूतल की वस्तुएं उनके वास्तविक आकार की ही दिखाई देती हैं।
प्रत्यक्ष की स्थिरता के उसका एक सहज गुण होने की प्राक्कल्पना का खंडन निम्न तथ्य से भी होता है। बचपन में अंधा हुआ एक आदमी जब प्रौढ़ावस्था में आंखों के ऑपरेशन के बाद फिर से देखने लगा, तो वह सोचता था कि वह अपने वार्ड़ की खिड़की से नीचे ज़मीन पर कूद सकता है और उसे कोई चोट नहीं पहुंचेगी, हालांकि खिड़की ज़मीन से १०-१२ मीटर की ऊंचाई पर थी। ऊंचाई का उसका ग़लत अनुमान शायद दूर ज़मीन की चीज़ों को मात्र छोटा समझने का परिणाम था।

प्रत्यक्ष की स्थिरता का वास्तविक स्रोत स्वयं प्रत्यक्ष-तंत्र ( perception-system ) की क्रियाशीलता है। ग्राहियों की गतियों के बहुविध और परिवर्तनशील प्रवाह ( multifarious and variable flow ) और जवाबी संवेदनों में से मनुष्य प्रत्यक्ष का विषय बनी हुई वस्तु की एक अपेक्षाकृत स्थिर तथा अपरिवर्तनशील संरचना को चुनता है। उन्हीं वस्तुओं का विभिन्न परिस्थितियों में बार-बार प्रत्यक्षण इन परिवर्तनशील परिस्थितियों और ग्राही की गतियों के संदर्भ में प्रात्यक्षिक बिंब की निश्चरता को सुनिश्चित करता है और इस बिंब को स्थायित्व तथा स्थिरता प्रदान करता है।

वस्तुओं के प्रत्यक्ष को प्रभावित करनेवाली परिवेशी परिस्थितियों की अंतहीन विविधता के परिणामस्वरूप होनेवाली अपरिहार्य त्रुटियों को ठीक करने और सही बिंब बनाने की हमारे प्रत्यक्ष-तंत्र की योग्यता का प्रमाण ऐसे विशेष चश्मों की मदद से किये जानेवाले प्रयोगों से मिलता है, जो बिंबों को उलटकर, सीधी रेखाओं को वक्र रेखाएं बनाकर या किसी और ढंग से चाक्षुष प्रत्यक्षों को विकृत कर देते हैं। जब मनुष्य ऐसे चश्में लगाता है और उसे अपरिचित परिवेश में रखा जाता है, तो वह पहले शनैः शनैः विकृतियों को सही करना सीखता है और फिर उनपर ध्यान देना ही बंद कर देता है, हालांकि उसके दृष्टिपटल पर वे पूर्ववत् परावर्तित होती रहती हैं।

इस प्रकार स्थिरता का स्रोत प्रतिपुष्टि के तंत्र ( feedback system ) और अपने को प्रत्यक्षीकृत वस्तु तथा उसके अस्तित्व की परिस्थितियों के अनुरूप ढालने की योग्यता से युक्त एक विशिष्ट स्वनियामक ( self regulatory ) क्रिया के रूप में प्रत्यक्ष की प्रकृति ( nature ) ही है। मनुष्य की वस्तुसापेक्ष सक्रियता के दौरान पैदा होनेवाली प्रत्यक्ष की स्थिरता उसके जीवन की एक अनिवार्य शर्त है। ऐसी स्थिरता के बिना मनुष्य इस अति वैविध्यपूर्ण तथा परिवर्तनशील विश्व में दिग्भ्रमित ( confused ) हो जाएगा। प्रत्यक्ष की स्थिरता वस्तुओं और उनके अस्तित्व की परिस्थितियों की एकता को प्रतिबिंबित करते हुए परिवेशी विश्व की आपेक्षिक स्थिरता को सुनिश्चित करती है।

प्रत्यक्ष की सार्थकता
( meatiness or meaningfulness of perception )

यथार्थ प्रत्यक्ष ग्राहियों पर क्षोभकों की क्रिया का परिणाम होता है, फिर भी प्रात्यक्षिक बिंब उनके कर्ता के लिए किसी न किसी रूप में सदा सार्थक होते हैं। मनुष्य में प्रत्यक्ष, चिंतन से, वस्तु के सारतत्व ( essence ) की समझ से घनिष्ठतः जुड़ा हुआ होता है। किसी वस्तु का सचेतन रूप से प्रत्यक्षण करने का अर्थ है मन में उसे कोई नाम देना, अर्थात उसे वस्तुओं के एक निश्चित समूह अथवा श्रेणी में रखना, उसे शब्द में सामान्यीकृत ( generalized ) करना। जब हम कोई अज्ञात वस्तु देखते हैं, तो हम उसका ज्ञात वस्तुओं से कोई साम्य खोजने और उसे किसी श्रेणी में रखने का प्रयत्न करते हैं। प्रत्यक्ष हमारी ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव डलनेवाले क्षोभकों पर निर्भर नहीं होता, बल्कि वह उपलब्ध जानकारी की सर्वोत्तम व्याख्या या स्पष्टीकरण की एक सक्रिय खोज है। इस संबंध में वे तथाकथित द्वयर्थक चित्र उल्लेखनीय हैं, जिन्हें कभी आकृति माना जाता है और कभी पृष्ठभूमि ( देखें साथ का चित्र )। ये चित्र स्पष्ततः दिखाते हैं कि वस्तु के प्रत्यक्ष में उसका अभिज्ञान ( recognition ) और वर्गीकरण ( classification ) शामिल रहते हैं ( दो पार्श्वचित्र और एक आधारयुक्त कटोरा )।

कहने का सार यह है कि प्रत्यक्ष बहुत सारी प्रत्यक्षज्ञानात्मक क्रियाओं से युक्त एक सक्रिय प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य किसी वस्तु का तदनुरूप बिंब बनाना है। प्रत्यक्ष की क्रियाशीलता मुख्यतः विश्लेषकों के प्रेरक-घटकों की प्रत्यक्ष की प्रक्रिया में भाग लेने में व्यक्त होती है ( जैसे स्पर्श में हाथ चलना, चाक्षुष प्रत्यक्ष में नेत्रों का गति करना, आदि )। क्रियाशीलता इसके अलावा बृहदस्तर पर भी आवश्यक है, ताकि प्रत्यक्षकर्ता मनुष्य वस्तु के संबंध में अपन स्थिति तुरंत बदल सके।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

प्रत्यक्ष और उसका विशिष्ट स्वरूप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में संवेदन और मनुष्य के जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका पर विचार किया था, इस बार हम प्रत्यक्ष और उसके विशिष्ट स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्रत्यक्ष और उसका विशिष्ट स्वरूप
( perception and its specific format )

प्रत्यक्ष ( perception ) वस्तुओं या परिघटनाओं का ज्ञानेन्द्रियों पर उनके सीधे प्रभाव के फलस्वरूप मनुष्य की चेतना में होने वाला परावर्तन हैं। प्रत्यक्ष के दौरान संवेदन ( sensation ) वस्तुओं और घटनाओं के बिंबों में समेकित ( consolidated ) हो जाते हैं।

संवेदनों के विपरीत, जो क्षोभकों के अलग-अलग गुणधर्मों को परावर्तित करते हैं, प्रत्यक्ष वस्तु को समग्रतः और उसके गुणधर्मों की एकता के रूप में परावर्तित करता है। प्रत्यक्ष अलग-अलग संवेदनों की समष्टि नहीं, बल्कि ऐंद्रिक ज्ञान की एक गुणात्मकतः नई अवस्था है, जिसके अपने विषिष्ट लक्षण होते हैं। प्रत्यक्ष की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताएं वस्तुपरकता ( objectiveness ), समग्रता ( totality ), संरचनात्मकता ( structuredness ), स्थिरता ( stability ) तथा सार्थकता ( meaningfulness )। हम इन्हें थोड़ा विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे।

प्रत्यक्ष की वस्तुपरकता तथाकथित वास्तवीकरण ( realization ) की क्रिया में, यानि बाह्य जगत से प्राप्त जानकारी को इस बाह्य जगत से संबद्ध ( related ) करने में व्यक्त होती है। ऐसी वस्तुसापेक्षता के बिना प्रत्यक्ष मनुष्य के व्यावहारिक कार्यकलाप में दिग्दर्शन ( referent ) तथा नियमन ( regulation ) का कार्य नहीं कर पाएगा। प्रत्यक्ष की बाह्य वस्तुओं से संबद्धता सहज गुण नहीं है। मनुष्य क्रियाओं की एक निश्चित पद्धति के ज़रिए, जिसमें स्पर्श और गति मुख्य भूमिका अदा करते हैं, विश्व के वस्तुपरक रूप का पता करता है। वस्तुपरकता का गुण उन प्रक्रियाओं के आधार पर पैदा होता है, जो अपने को हमेशा स्वयं वस्तु से संपर्क सुनिश्चित करनेवाली बाह्य प्रेरक क्रियाओं में प्रकट करती हैं। गति के बिना हमारे प्रत्यक्ष वस्तुसापेक्ष, अर्थात वस्तुजगत से संबद्ध नहीं होंगे।

एक ऐसे ही विशेष केस में, जिसमें रोगी का चाक्षुष प्रत्यक्ष क्षतिग्रस्त होने पर भी उसके चाक्षुष विश्लेषक की क्षमता ज्यों की त्यों बनी हुई थी। मस्तिष्क पर आघात से उसके नेत्रगोलक पूरी तरह गतिशून्य हो गये थे। वह जो कुछ भी देखता था, उसे लगता था कि यह या तो प्रकाश की अजस्र धारा है या ऐसा कुहरा कि जिसे एक प्रकाश किरण भेदने की कोशिश कर रही है। शुरुआती ईलाज़ के दौरान उसे धब्बे दिखाई देने लगे, जो अस्पष्ट तथा निरर्थक और चमक तथा आकार की दृष्टि से अलग-अलग तरह के थे। फिर भी रोगी की दृष्टि संवेदनों से आगे न जा सकी और वह किसी भी वस्तु अथवा उसकी विशेषताओं का मौखिक अथवा काग़ज़ पर चित्र प्रस्तुत करने में असमर्थ था। केवल तीन महिने बाद ही वह प्रत्यक्ष की क्षमता पुनः प्राप्त कर सका।

यानि कि यहां ग्राही पर क्षोभक द्वारा पड़ने वाले प्रभाव से दृष्टि संवेदन तो पैदा हो रहे थे, पर प्रत्यक्षमूलक क्षमता के बिना रोगी उस क्षोभक वस्तु का प्रत्यक्ष करने में, उसका वस्तुपरक बिंब अपनी चेतना में परावर्तित करने में असमर्थ था। इससे स्पष्ट है कि दृष्टि संवेदन स्वयं ही वस्तु का चेतना में परावर्तन सुनिश्चित नहीं कर देते।

अक्सर मेंढ़क के दृष्टिपटल को ‘कीटों का संसूचक’ कहा जाता है। ज्यों ही, उदाहरणार्थ किसी मक्खी की छाया दृष्टिपटल पर पड़ती है, यह ‘संसूचक’ जिह्वा में परावर्ती गतियां पैदा कर देता है। मेंढ़क की आंख किसी भी वस्तु के कुछेक लक्षणों को ही दर्ज करती है, मस्तिष्क को उसकी गति तथा उसकी आकृति में कोणों की मौजूदगी की ही सूचना पहुंचाती है और अन्य सभी जानकारियों की उपेक्षा कर देती है। ऐसी स्थिति में क्या मेंढक मक्खी का वस्तुपरक बिंब बना सकता है? उत्तर स्पष्टतः नकारात्मक होगा और उसके सही होने की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि चारों ओर मरी हुई मक्खियां पड़ी होने पर भी मेंढक भूख से मर सकता है।

प्रत्यक्ष के एक गुण के रूप में वस्तुपरकता, व्यवहार के नियमन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। मिट्टी की ईंट या बारूद का डला देखने या छूने में एक जैसे हो सकते हैं, किंतु उनके गुण बिल्कुल भिन्न हैं। हम वस्तुओं को सामान्यतः बाह्याकृति से नहीं, बल्कि व्यवहार में हम उन्हें जिस ढंग से इस्तेमाल करते हैं, उससे या उनके मुख्य गुणों से पहचानते हैं। इसमें प्रत्यक्ष की वस्तुपरकता हमारी मदद करती हैं। वस्तुपरकता स्वयं प्रत्यक्षमूलक प्रक्रियाओं के आगे के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। जब मनुष्य बाह्य जगत और उसके परावर्तन के बीच असंगति पाता है, तो उसे प्रत्यक्ष की ऐसी नई प्रणालियां खोजनी पड़ती हैं, जो अधिक सही परावर्तन सुनिश्चित कर सकें।

प्रत्यक्ष की एक और विशेषता उसकी समग्रता है। जहां संवेदन ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव डालने वाली वस्तु के अलग-अलग गुणों को परावर्तित करता है, वहीं प्रत्यक्ष दत्त वस्तु का एक समेकित बिंब प्रस्तुत करता है। निस्संदेह यह समेकित बिंब विविध संवेदनों के रूप में प्राप्त वस्तुओं की विशेषताओं और गुणधर्मों के हमारे ज्ञान के सामान्यीकरण से पैदा होता है।

प्रत्यक्ष की समग्रता से ही घनिष्ठतः जुड़ी हुई उसकी संरचनात्मकता है। प्रत्यक्ष हमारे क्षणिक संवेदनों से तात्विकतः भिन्न होता है और वह उनका योगफल भी नहीं है। वास्तव में हम इन संवेदनों के एक अपाकर्षण का ही प्रत्यक्षण करते हैं, जो एक ऐसी सामान्यीकृत संरचना है कि जिसके पैदा होने में समय लगता है। जब आदमी कोई धुन सुनता है, तो पहले के स्वर उसके कानों में तब भी गूंजते रहते हैं, जब वह वास्तव में नया स्वर सुन रहा होता है। प्रायः श्रोता संगीत-रचना को समझता है, अर्थात उसकी संरचना को समग्रता में ह्रदयंगम करता है। स्पष्ट है कि अंत में सुने हुए स्वर ही रचना को समझने का आधार नहीं बन सकते, श्रोता का मस्तिष्क सभी परस्परसंबद्ध घटकों सहित धुन की समस्त संरचना को याद रखता है।

लय के प्रत्यक्षण की प्रक्रिया भी इसी से मिलती-जुलती है। हम एक बार में एक ही ताल सुन सकते हैं, किंतु लय तालों का योगफल नहीं, बल्कि एक दूसरी से एक निश्चित ढंग से जुड़ी हुईं तथा थिरकन पैदा कर देनेवाली तालों की पद्धति है। तालों की इस परस्परसंबद्धता पर ही लय का प्रत्यक्ष निर्भर होता है। प्रत्यक्ष की समग्रता तथा संरचनात्मकता का स्रोत, एक ओर, परावर्तित वस्तुओं के गुण हैं और, दूसरी ओर, मनुष्य की वस्तुसापेक्ष सक्रियता



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

संवेदन और मनुष्य की जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण में प्रतिपुष्टि और प्रक्षिक्षण पर विचार किया था, इस बार हम संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को समझने की कड़ी के रूप में संवेदन और मनुष्य की जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञानात्मक प्रक्रियाएं ( cognitive processes )

संवेदन और मनुष्य की जीवन-सक्रियता में इनकी भूमिका
( sensation and their role in human life-activity )

हम परिवेशी विश्व की बहुविधता का, ध्वनियों तथा रंगों, गंधों तथा ताप, आकारों तथा बहुत सारी दूसरी चीज़ों का ज्ञान अपनी ज्ञानेन्द्रियों ( sense organs ) के ज़रिए पाते हैं, जो मानव शरीर को संवेदनों के रूप में बाह्य तथा आंतरिक परिवेशों की अवस्था के बारे में विपुल जानकारी प्रदान करती हैं

संवेदन ( sensation ) एक सामान्य मानसिक प्रक्रिया है, जो ग्राहियों ( receptors ) पर भौतिक क्षोभकों ( exciter ) के प्रत्यक्ष प्रभाव से शुरू होती है और वस्तुजगत् के गुणधर्मों ( properties ) तथा परिघटनाओं ( phenomena ) और शरीर की आंतरिक दशाओं को प्रतिबिंबित करती है

ज्ञानेन्द्रियां सूचना पाती, छांटती तथा संचित करती हैं और फिर मस्तिष्क को संप्रेषित करती हैं, जो उसके अंतहीन प्रवाह का निरंतर संसाधन करके यथार्थ जगत का और शरीर की दशाओं का चेतना में समुचित प्रतिबिंबन ( परावर्तन ) करता है। इस आधार पर पैदा होनेवाले तंत्रिका-आवेग शरीर के तापमान के नियमन, पाचक अंगों, प्रेरक-तंत्रों तथा अंतःस्रावी ग्रंथियों के कार्य, स्वयं ज्ञानेन्द्रियों की क्रियाप्रणाली, आदि के लिए उत्तरदायी कार्यकारी अंगों तक पहुंचते हैं। प्रति सैकंड हज़ारों संक्रियाओंवाला यह अत्यंत जटिल कार्य अनवरत रूप से जारी रहता है।

वास्तव में संवेदन परिवेश को, बाह्य विश्व ( external world ) को मनुष्य की चेतना ( consciousness ) से जोड़नेवाली एकमात्र कड़ी है। यदि संवेदन न हों तो हमें पदार्थ और गति के रूपों के बारे में कुछ नहीं मालूम हो पाएगा। ज्ञानेन्द्रियां परिवेशी जगत में मनुष्य का मार्गदर्शन करती हैं। यदि मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियां काम नहीं करती, तो वह नहीं जान सकता कि उसके चारों ओर क्या हो रहा है, वह न किसी से संप्रेषण कर सकता है, न खाना खोज सकता है और न खतरे से ही बच सकता है।

मनुष्य को अपने चारों ओर की दुनिया से स्थायी संपर्क बनाए रखने की ज़रूरत होती है। व्यापक अर्थ में लिये जाने पर शरीर का परिवेश से अनुकूलन, परिवेश तथा शरीर के बीच सूचना के एक निश्चित संतुलन की अपेक्षा करता है। यदि सूचनाधिक्य या सूचनाभाव के कारण यह संतुलन भंग हो जाता है, तो शरीर के कार्य में गंभीर गड़बड़ियां आ जाती हैं।

इसकी पुष्टि अंतरिक्ष अनुसंधान कार्यक्रम के अंतर्गत किये गये परिवेश से संवेदनात्मक संपर्क के परिसीमन ( limitation ) से संबंधित आयुर्वैज्ञानिक व जीववैज्ञानिक अध्ययनों के परिणामों से भी होती है। जब अध्ययनाधीन व्यक्ति को विशेष कक्षों में रखा गया, जो उन्हें बाह्य विश्व से पूरी तरह अलग कर देते थे ( उनमें हर समय एक उबाऊ आवाज़ ही सुनी जा सकती थी, धुंधले कांचों से केवल जरा-सा प्रकाश अंदर आता था, बाहों और टांगों पर सुरक्षात्मक सिलेंडर आवरण चढ़े होने के कारण उनसे किसी भी प्रकार का स्पर्शमूलक संवेदन पाना असंभव था ), तो वे कुछ ही घंटों में बेहद घबड़ा गये और प्रयोग रोके जाने की मांग करने लगे। आंशिक संवेदनात्मक वंचन ( उदारहणार्थ, शरीर के कुछ भागों को बाह्य प्रभावों से अलग-थलग रखने ) के प्रयोगों ने दिखाया है कि ऐसे भागों की स्पर्श, पीड़ा और ताप से संबंधित संवेदनशीलता क्षीण हो गई। जिन लोगों को लंबे समय तक एक ही रंग के प्रकाश में रखा गया, उनमें दृष्टि-विभ्रांतियां पैदा हो गईं।

ये और बहुत सारे अन्य प्रयोग दिखाते हैं कि कि मनुष्य का शरीर संवेदनों के रूप में परिवेश के संपर्क की घोर आवश्यकता अनुभव करता है। मनुष्य की जीवन-सक्रियता के लिए संवेदनों के महत्त्व का अतिमूल्यांकन शायद ही किया जा सकता है, क्योंकि विश्व तथा अपने विषय में हमारे ज्ञान का स्रोत ये ही हैं। तो संवेदनों का सारतत्व क्या है?

संवेदनों की भौतिकवादी परिभाषा बताती है कि वस्तुएं और उनके गुणधर्म मूल हैं और संवेदन ज्ञानेन्द्रियों पर पदार्थ की क्रिया ( प्रभाव ) के परिणाम। वह यह भी कहती है कि संवेदन हमें यथार्थ वास्तविकता की सही प्रतिकृति देते हैं, यानि वे विश्व को वैसा प्रतिबिंबित करते हैं, जैसा वह वास्तव में है। संवेदनों की और यथार्थ के किसी भी अन्य परावर्तन की प्रामाणिकता ( authenticity ) की कसौटी व्यवहार है, मनुष्य की सक्रियता है

ज्ञानेन्द्रियों का विशेषीकरण लंबे उदविकास का परिणाम है और स्वयं इन्द्रियां, उनकी संरचनागत विशेषताएं तथा गुणधर्म परिवेश से मनुष्य के अनुकूलन को प्रतिबिंबित करते हैं। मनुष्य की संवेदनों में सूक्ष्म भेद करने की क्षमता उसके सामाजिक व श्रमिक कार्यकलाप और उसके समस्त इतिहास व सामाजिक विकास का परिणाम हैं। ज्ञानेन्द्रियां शरीर का परिवेशी विश्व से अनुकूलन सुनिश्चित करती हैं किंतु अपना यह कार्य वे सफलतापूर्वक तभी कर सकती हैं, जब वे परिवेश के वास्तविक गुणधर्मों का सही-सही परावर्तन करें। इसलिए संवेदनों का विशिष्ट स्वरूप जानेन्द्रियों के विशिष्ट स्वरूप की उपज नहीं, बल्कि ज्ञानेन्द्रियों का विशिष्ट स्वरूप संवेदनों के विशिष्ट स्वरूप ( बाह्य विश्व के विशिष्ट गुणों ) की उपज है

संवेदन, मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव डालनेवाली और मन से स्वतंत्र रूप से विद्यमान भौतिक विश्व की वस्तुओं तथा परिघटनाओं के यथार्थ गुणों को प्रतिबिंबित करते हैं।

संवेदन वस्तुपरक विश्व ( objective world ) के आत्मपरक बिंब ( subjective images ) हैं। फिर भी संवेदन शरीर पर किसी भौतिक क्षोभक की क्रिया से ही नहीं, अपितु स्वयं शरीर की सक्रियता से भी उत्पन्न होता है। इस सक्रियता को या तो केवल आंतरिक प्रक्रियाओं से व्यक्त किया जा सकता है, या फिर आंतरिक प्रक्रियाओं और बाह्य गतियों, दोनों से। पर उसे हमेशा होना चाहिए। संवेदन एक निश्चित क्षण पर ग्राही पर क्रिया करनेवाले क्षोभक की विशिष्ट उर्जा के तंत्रिका-प्रक्रियाओं की उर्जा में रूपांतरण के फलस्वरूप पैदा होता है। अतः संवेदन, चेतना में प्रतिबिंबित होने वाला बिंब या उसका घटक ही नहीं है, वह सक्रियता या उसका घटक भी है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

संप्रेषण में प्रतिपुष्टि और प्रशिक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्रों पर विचार किया था, इस बार हम संप्रेषण में प्रतिपुष्टि के महत्त्व तथा संप्रेषण-प्रक्षिक्षण पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संप्रेषण में प्रतिपुष्टि
( feedback in communication )

संप्रेषण मात्र सूचना का सामान्य अंतरण ही नहीं है, उसके सफल होने के लिए उसमें प्रतिपुष्टि ( feedback ) यानि व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के साथ संप्रेषणात्मक अन्योन्यक्रिया ( communicative interaction ) के परिणामों से संबंधित जानकारी पाना भी शामिल होना चाहिए

जब कोई आदमी किसी अन्य आदमी को कोई जानकारी देता है, कुछ करने को कहता है, अनुरोध करता है या प्रश्न पूछता है, तो उसे अपनी इन क्रियाओं की कारगरता के बारे में निरंतर सूचनाएं मिलती रहती हैं। परावर्तन के बिना संप्रेषण एक अधूरी क्रिया है। इस जवाबी सूचना से निदेशित ( directed ) होकर आदमी अपने व्यवहार में परिवर्तन, अपनी क्रियाओं की पद्धति का पुनर्गठन ( restructuring ) और शाब्दिक संप्रेषण के साधनों में सुधार करता रहता है, ताकि उसे सही-सही समझा जाए और वांछित ( desired ) परिणाम प्राप्त हो सकें। आत्मपरक ( subjective ) दृष्टि से संप्रेषक को इस प्रतिपुष्टि की जानकारी होना जरूरी नहीं है, किंतु अनजाने में वह हमेशा उसका सहारा लेता है।

संप्रेषणकर्ता प्रतिपुष्टि की भूमिका में किसी कारणवश विघ्न ( disturbance ) पड़ने पर ही उग्रता अनुभव करता है। दूरभाष के जरिए, श्रोता की जानी-पहचानी अनुक्रिया के अभाव में सामान्य बातचीत तक में कठिनाई होती है, हिचक पैदा होती है, बोलने का सामान्य लहज़ा बदल जाता है, वग़ैरह। यदि वक़्ता अपने सहभागी को देख नहीं सकता, तो वह अपने को बंधा हुआ-सा महसूस करता है और अपनी आंगिक क्रियाएं भूल जाता है। सामने वाले यानि संभाषी के व्यवहार के, संप्रेषण के साथ-साथ किये जा रहे प्रत्यक्षण के दौरान प्राप्त संकेत मनुष्य को अपनी आगे की क्रियाएं सुधारने और जो बातें वह कहने वाला है, उनमें आवश्यक परिवर्तन करने की संभावना देते हैं।

संप्रेषण के दौरान संभाषी अथवा श्रोता को देखना या जानना परस्पर समझ की एक महत्त्वपूर्ण पूर्वापेक्षा ( prerequisites ) है। यदि शिक्षक इस बारे में प्राप्त प्रतिपुष्टि-सूचना पर ध्यान नहीं देता है कि उसे छात्रों द्वारा किस हद तक समझा जा रहा है, तो अन्योन्यक्रिया असंभव हो जाएगी और शैक्षिक संप्रेषण टूट जाएगा। यही कारण है कि संप्रेषण के एकालापात्मक ( monologue ) रूप संवादात्मक ( dialogue ) रूपों की तुलना में अधिक कठिन होते हैं। अनुभवी शिक्षक कक्षा में बैठे दर्जनों छात्रों की मुख-मुद्राओं, इशारों से बोलने के ढ़ंग, आदि का अर्थ तुरंत समझ जाता है, उनकी मानसिक अवस्था, भयों, आशाओं, दुख तथा इरादों को भांप जाता है, अपने व्यवहार को उनके अंतर्जगत की अपनी समझ के मुताबिक़ बदलता है और उनपर प्रभाव डालने की सर्वाधिक उपयुक्त विधियां चुनता है। इस तरह अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण की प्रक्रियाओं में प्रतिपुष्टि सूचनात्मक तथा स्वनियात्मक भूमिकाएं ( informative and self-appointed roles ) अदा करती हैं।

संप्रेषण की प्रक्रिया में इसका ध्यान रखा जाना चाहिए कि आदमी के बाह्य रूप के कुछ घटक ( चहरा, हाथ, कंधे ), उसकी भंगिमाएं, अंगविक्षेप और लहज़ा भी सूचना के वाहक होते हैं। प्रतिपुष्टि के संकेतों की दृष्टि से संभाषी अथवा श्रोता का चहरा विशेष सूचनात्मक महत्त्व रखता है। अनुभवी वक़्ता सामने वाले के चहरे को देखकर बता सकता है कि वह उसे ध्यान से सुन रहा है ( ‘भावशून्य आंखें’ ), उसकी बातों का विश्वास कर रहा है अथवा नहीं कर रहा है ( ‘संदेहसूचक भाव’ )। वास्तव में दूसरा पक्ष संप्रेषक को समझ रहा है या नहीं, इसका सबसे अच्छा अनुमान इस पक्ष से मिलनेवाले तरह-तरह के संकेतों और मुख्यतः उसकी क्रियाओं से लगाया जा सकता है। शिक्षक के डांटते समय छात्र उसकी बातें ध्यान से सुनता हुआ लग सकता है, किंतु असल में वह बड़ी व्यग्रता से डांट ख़त्म होने और अपने साथियों के साथ खेलने जा पाने की प्रतीक्षा कर रहा हो सकता है।

संप्रेषण का प्रशिक्षण
( training of communication )

फलप्रद संप्रेषण की योग्यताएं या तो स्वतःस्फूर्त ( spontaneous ) ढ़ंग से विकसित होती हैं या फिर वे प्रशिक्षण का उपोत्पाद ( by-product ) होती हैं ( शुरुआती कक्षा के छात्र को ‘पूरा उत्तर’ देना, बड़े द्वारा संबोधित किये जाने पर उसे खड़ा होकर सुनना, आदि सिखाया जाता है )। बड़ी कक्षाओं के छात्र संप्रेषण के मानकों की जानकारी शिष्टाचार विषयक पुस्तकें पढ़कर पाते हैं। फिर भी संप्रेषण-कौशल का विकास एक विशेष कार्य है और उसके लिए विशेष प्रशिक्षण, सामाजिक-मनोवैज्ञानिक ( social-psychological ) या संप्रेषण प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। शिक्षक के लिए इस प्रशिक्षण का बहुत महत्त्व है।

सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण के दो उद्देश्य होते हैं, एक, संप्रेषण के नियमों और विशेषतः शैक्षिक संप्रेषण के नियमों का अध्ययन और दो, शैक्षिक संप्रेषण की तकनीक सीखना, यानि अपने में व्यावसायिक शैक्षिक संप्रेषण की आदतें और कौशल विकसित करना।

इसलिए मनोविज्ञान-विशेषज्ञ सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण की समस्या के सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक पहलुओं में भेद करते हैं। व्यावहारिक पहलू के अंतर्गत वे अभ्यास आते हैं, जिनका उद्देश्य शिक्षक को छात्रों से संप्रेषण की आदतें व कौशल विकसित करने में मदद देता है। इन आदतों व कौशलों में निम्न शामिल हैं, पाठ के सभी चरणों में सुसंगत ढ़ंग से काम करने की योग्यता ( जिसे मुख्यतः व्यावहारिक पाठों के दौरान विकसित किया जाता है ), पाठ के दौरान पेशियों को तनावरहित बनाने की योग्यता, ऐच्छिक ध्यान को बांटने की योग्यता और प्रेक्षण योग्यता। वाक् कला के वे अभ्यास विशेषतः महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं, जिनका उद्देश्य मौखिक वाक् के मानकों को सुधारना होता है और जो प्रतिपुष्टिकारी श्रव्य टेपों ( audio tapes ) के उपयोग पर आधारित होते हैं। वीडियो रिकार्डिंग की तकनीक से हाव-भाव तथा अंगविक्षेपों का परिष्कार ( refinement ) करने में मदद मिलती है। हर कोई जानता है कि कि टेप पर अपनी आवाज़ सुनकर या पर्दे पर अपने को देखकर, जो कि किसी अन्य व्यक्ति को सुनने या देखने के समान है, मनुष्य अपने बोलने के ढ़ंग, हाव-भाव, अंग-संचालन, आदि की कमियां दूर कर सकता है।

यह प्रक्षिक्षण व्यावसायिक खेलों के रूप में भी आयोजित किया जा सकता है, जिनमें अधिक यथार्थपरक परिस्थितियों का प्रतिरूपण किया जाता है। ऐसे खेलों में सभी नये कौशलों के विकास का उद्देश्य भागीदारों के भावी कार्य को आसान बनाना होता है। संप्रेषण का अभ्यास मनोवैज्ञानिक प्रभाव की कारगरता बढ़ाने का एक साधन है। वह व्यक्ति की संप्रेषण तथा सामूहिक सक्रियता में कारगर भाग लेने की क्षमता और वैयक्तिक गुणों में वृद्धि करता है।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्र

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मित्रों के बीच और परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण पर विचार किया था, इस बार हम परस्पर समझ को विकसित करने के लिए एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्रों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्र

संप्रेषण में कम से कम दो पक्ष होते हैं और इस प्रक्रिया में मनुष्य का प्रत्यक्ष सामना दूसरे लोगों के केवल बाह्य रूप, व्यवहार और संप्रेषण के साधन के तौर पर प्रयुक्त क्रियाओं से होता है। परस्पर समझ विकसित करने के लिए, उनमें से प्रत्येक दूसरे के बारे में, उसके अंतर्जगत के बारे में उसके बाह्य व्यवहार के आधार पर ही कोई धारणा कैसे बना सकता है? इसे जानने के लिए हमें अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण के तीन मुख्य क्रियातंत्रों, तादात्म्यीकरण, परावर्तन और रूढ़ीकरण को समझना होगा।

तादात्म्यीकरण सचेतन अथवा अचेतन ढ़ंग से अपने को दूसरे व्यक्ति का समरूप मानकर उस व्यक्ति को समझने की प्रणाली है। अन्योन्यक्रिया की प्रक्रिया में पैदा होनेवाली विभिन्न परिस्थितियों में लोग दूसरों की आंतरिक अवस्था, इरादों, विचारों, अभिप्रेरकों, भावनाओं आदि का अपने को उनकी स्थिति में रखकर अनुमान लगाते हैं। प्रवेश परीक्षा के लिए परीक्षा केंद्र के बाहर घबड़ाये हुए छात्रों को व्यग्रतापूर्वक पुस्तक के पन्ने पलटता देखकर, उस कॉलेज का कोई भी विद्यार्थी उस दिन की याद करके उनकी मानसिक अवस्था का अंदाज़ लगा लेता है, जब वह ख़ुद इसी तरह घबड़ाया हुआ परीक्षा केंद्र के बाहर खड़ा परीक्षा शुरू होने का इंतज़ार कर रहा था।

किंतु संप्रेषक के लिए दूसरे पक्ष को बाहरी आदमी जैसे निरपेक्ष तटस्थ भाव से समझना ही जरूरी नहीं है, बल्कि उसके लिए यह जानना भी महत्त्वपूर्ण है कि स्वयं उसे, दूसरे पक्ष द्वारा कैसे देखा और समझा जाएगा। संप्रेषक की, दूसरे पक्ष के मन में बनी, अपने बिंब की चेतना को परावर्तन कहा जाता है। परावर्तन दूसरे व्यक्ति को जानने-समझने की प्रक्रिया का अंग है। दूसरे व्यक्ति को समझने का मतलब, प्रत्यक्षण के कर्ता के नाते अपने बारे में उस व्यक्ति के रवैये को जानना भी है। अतः एक व्यक्ति को जानने-समझने की तुलना आमने-सामने रखे गये दो दर्पणों में लड़नेवाली छाया से की जा सकती है। दूसरे आदमी को अपने मन में परावर्तित करते हुए आदमी उसके अवबोध के दर्पण में स्वयं को भी परावर्तित करता है। संप्रेषण की प्रक्रियाओं में तादात्म्यीकरण और परावर्तन परस्पर अविभाज्य होते हैं।

यदि मनुष्य को संप्रेषण में सहभागियों के बारे में सदा पूरी और विज्ञानसम्मत जानकारी होती, तो वह उनके साथ अपनी अन्योन्यक्रिया की कार्यनीति को बिल्कुल सटीकता के साथ ठीक तय कर लेता। किंतु दैनंदिन जीवन में उसे ऐसी कोई सही जानकारी नहीं होती, जिससे वह दूसरों की क्रियाओं का कारण ख़ुद उन्हें ही समझने को विवश होता है। दूसरे व्यक्ति पर किन्हीं निश्चित भावनाओं, इरादों, विचारों और व्यवहार के अभिप्रेरकों का आरोपण करके, उन्हें उस दूसरे व्यक्ति की क्रियाओं का कारण बताने को कारणात्मक आरोपण या कारणात्मक व्याख्या कहा जाता है। कारणात्मक आरोपण सामान्यतः अचेतन रूप से किया जाता है, या तो दूसरे से अपना तादात्म्यीकरण करके, यानि उसमें वे ही भावनाएं और अभिप्रेरक आरोपित करके जो व्यक्ति के अनुसार वैसी ही परिस्थिति में ख़ुद उसमें होते, या फिर दूसरों को ऐसे लोगों की कोटि में शामिल करके, जिनके संबंध में उसके मन में पहले से ही कुछ रूढ़ धारणाएं बनी हुई हैं।

रूढ़ीकरण, व्यवहार के रूपों और उनकी कारणात्मक व्याख्याओं का ( कभी-कभी बिना किसी गंभीर कारण के भी ) उनको पहले से ज्ञात अथवा ज्ञात लगनेवाली, यानि सामाजिक रूढ़ धारणाओं से मेल खानेवाली परिघटनाओं की कोटि का मानकर वर्गीकरण करना है। इस लिहाज़ से रूढ़ धारणा मनुष्य का एक स्थिर, अपरिवर्तनीय बिंब है, जिसे ठप्पे जैसा इस्तेमाल किया जाता है। रूढ़ीकरण, अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण के कर्ता द्वारा अपने निजी अनुभवों, पुस्तकों, फ़िल्मों, टीवी, आदि से प्राप्त जानकारी और दिमाग़ में टिकी रह गई मित्रों तथा परिचितों की रायों के सामान्यीकरण का परिणाम है। इस तरह से प्राप्त जानकारियां न केवल संदिग्ध, बल्कि सीधे-सीधे मिथ्या भी हो सकती हैं। किंतु अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण की रूढ़ धारणाओं को प्रायः सुपरीक्षित मानकों के रूप में लिया जाता है, जो मानो दूसरे लोगों को समझने की कुंजी प्रदान करते हैं।

एक सर्वे से प्राप्त जानकारियों ने दिखाया कि व्यक्ति के बाह्य रूप तथा उसके चरित्र की विशेषताओं के प्रत्यक्ष सहसंबंध के बारे में पूरी तरह ग़लत रूढ़ धारणाएं व्यापकतः प्रचलित हैं। सर्वे में पूछे गये ७२ व्यक्तियों में से ९ की धारणा थी कि चौकोर ठोड़ीवाले दृढ़ संकल्पयुक्त लोग होते हैं, १७ ने बताया कि चौड़ा माथा दिमाग़दार होने का लक्षण है, ३ का विश्वास था कि कड़े बाल आदमी के अक्खड़पन के परिचायक होते हैं, ५ की राय थी कि छोटा क़द दबंग, दमदार और सत्ता के भूखे व्यक्तित्व को दिखाता है, ५ का सोचना था कि सुंदर शक्लवाले लोग बेवक़ूफ़ या आत्मप्रेमी होते हैं और २ आदमी इस मत के थे कि जिसके पतले होंठ होते हैं, वह अवश्य ही घुन्ना और ढ़ोंगी क़िस्म का होगा।

अब यह कहने की जरूरत नहीं रह जाती है कि इन सब रूढ़ धारणाओं का, अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्षण की प्रक्रिया को प्रभावित करना, संप्रेषण में भाग लेनेवाले अन्य लोगों के बिंब को बिगाड़ना और सामान्य संप्रेषण में बाधक होना अनिवार्य ही है। अश्वेत लोगों के व्यवहार की इस नस्लवादी व्याख्या की जड़ में कि वे अतिकामुक, चालाक, मनमौजी, आदि होते हैं, कारणात्मक आरोपण के क्रियातंत्र के तौर पर रूढ़ीकरण ही मौजूद है। इस तरह से, यहां रूढ़ीकरण पूर्वाग्रह का रूप ले लेता है।

कारणात्मक आरोपण का स्वरूप बहुत-सी परिस्थितियों पर निर्भर होता है और मनोविज्ञानी उन्हें अच्छी तरह जानते हैं। उदाहरण के लिए, किसी अनजान व्यक्ति के बारे में हमारी धारणा या राय काफ़ी हद तक उसके बारे में आरंभ में मिली जानकारी के आधार पर बनती है।

एक प्रयोग में एक ही व्यक्ति का चित्र छात्रों के दो समूहों को दिखाया गया। एक समूह में प्रयोगकर्ता ने कहा कि वह वैज्ञानिक है और दूसरे समूह में कहा गया कि वह अपराधी है। छात्रों को उसकी शक्ल के आधार पर उसके चरित्र का अनुमान लगाना था। पहले समूह ने उसमें परिश्रमी, दयालु, सहानुभूतिपूर्ण तथा समझदार व्यक्ति के लक्षण देखे और दूसरे समूह ने एक निष्ठुर, इरादे के पक्के और चालाक आदमी के लक्षण। चित्र की एक ही तफ़सील, आंखों, ने पहले समूह को दयालु तथा समझदार जैसे विशेषणों के प्रयोग के लिए प्रेरित किया और दूसरे समूह को निष्ठुर और चालाक जैसे विशेषणों के प्रयोग के लिए।

स्पष्ट है कि प्राथमिक जानकारी ने प्रत्यक्षण की प्रक्रिया को बहुत अधिक इकतरफ़ा झुकाव दे दिया था, जिससे छात्र व्यक्ति की आकृति के बारे में अपनी राय को वैज्ञानिक या अपराधी विषयक रूढ़ धारणाओं के अनुरूप बना बैठे। इसी तरह शैक्षिक संप्रेषण में रूढ धारणाएं शिक्षक को छात्रों के पक्ष या विपक्ष में झुकाते हुए उसके आत्मपरकतावाद को जन्म देती हैं। खेद है कि शिक्षक की आत्मपरकता बहुत बार छात्र के बाह्य रूप के बारे में उसकी राय से जुड़ी होती है।

पूर्वाग्रह और आत्मपरकता, दोनों प्रायः प्राथमिक जानकारी की उपज होते हैं। एक प्रयोग किया गया, जिसका उद्देश्य यह मालूम करना था कि पूर्वाग्रहपूर्ण मत के निर्माण में प्राथमिक सूचना की क्या भूमिका होती है।

जैसा कि मालूम है, बहुत सारी पश्चिमी शिक्षा संस्थाओं में छात्रों के बौद्धिक स्तर को बुद्धि-लब्धि ( आईक्यू ) से नापा जाता है। बुद्धि-लब्धि मालूम करने के लिए मानसिक आयु को वास्तविक आयु से विभाजित और फिर फल को १०० से गुणा किया जाता है। इस विशेष मामले में कॉलेज में नये भरती हुए छात्रों के दो समूहों को उनकी बुद्धि-लब्धि ( आईक्यू ) के लिए जांचा गया, ताकि बाद में उन्हें अलग-अलग वर्गों में रखा जा सके। जांचों के परिणाम छात्रों को तो नहीं बताये गये, मगर प्राध्यापकों को अवश्य बताया गया कि अमुक छात्र का आईक्यू नीचा है और अमुक छात्र का बहुत ऊंचा। असल में प्राध्यापकों को जान-बूझकर ग़लत जानकारी दी गई थी।
कुछ समय बाद प्रयोगकर्ताओं ने उन छात्रों की प्रगति की जांच की। पाया गया कि तथाकथित ऊंचे आईक्यूवाले छात्रों की प्रगति सामान्यतः संतोषजनक थी और प्राध्यापक उनसे खुश थे। जहां तक ताकथित नीचे आईक्यूवाले छात्रों का सवाल था, उनकी हालात बदतर थी और जैसे-तैसे खींचे जा रहे थे। कुछेक अपवादों को छोड़कर सामान्यतः हर वर्ग में स्थिति यही थी।
परिणाम क्या बताते हैं? प्राध्यापकों को चूंकि ‘मालूम’ था कि उनके सामने प्रतिभाशाली छात्र है, इसलिए उन्होंने उसकी प्रतिभाओं के प्रस्फुटन में हर तरह से सहयोग दिया,, जबकि दूसरी ओर कथित रूप से प्रतिभाहीनों पर उन्होंने अपना समय गंवाना उचित नहीं समझा और उन्हें साफ़-साफ़ हिक़ारत की नज़रों से देखा, जिसका उनपर और उनकी सामान्य प्रगति पर प्रभाव पड़ना अनिवार्य ही था।
प्राध्यापकों को दी गयी प्राथमिक जानकारी ने छात्रों के प्रति उनके रवैये को पूर्वाग्रहपूर्ण बना दिया और उसे सही ठहराने के लिए उन्होंने कोई कसर बाक़ी नहीं रहने दी।

स्वाभाविकतः प्रश्न उठता है कि क्या पढ़ाई में बच्चे की खराब प्रगति का कारण कभी-कभी शिक्षक का पूर्वाग्रहपूर्ण रवैया ही तो नहीं होता? यह रवैया, जो कभी-कभी छात्र के साफ़-सुथरा न रहने या शरारती होने का परिणाम भी हो सकता है, सर्वतोमुखी आत्मपरकता में और उसे उचित ठहराने की कोशिशों में बदल सकता है।

जिसके बारे में अनुकूल रवैया होता है, उनमें सकारात्मक गुण देखा जाना और जिनके बारे में प्रतिकूल रवैया होता है, उनमें नकारात्मक गुण देखा जाना कारणात्मक आरोपण की ठेठ मिसालें हैं। किसी व्यक्ति द्वारा प्रत्यक्षण कर्ता पर डाली गई सामान्य अच्छी छाप, कर्ता को उस व्यक्ति की उन विशेषताओं का भी सकारात्मक मूल्यांकन करने को प्रेरित करती हैं, जिनसे कर्ता का अभी तक कोई सामना नहीं हुआ है। इसके प्रतिकूल छाप नकारात्मक मूल्यांकन को जन्म देती है। इस निर्भरता को मनोविज्ञान में परिवेश प्रभाव कहा जाता है। परिवेश प्रभाव सामान्यतः तब पैदा होता, जब प्रत्यक्षण के कर्ता को प्रत्यक्षीकृत व्यक्ति के बारे में अत्यल्प जानकारी ही होती है। इस तरह कुछ शिक्षकों में अपने प्रिय छात्रों को बढ़ावा देने की शैक्षिक दृष्टि से अनुचित प्रवृत्ति अनिवार्यतः छात्रों की प्रगति का आत्मपरकतावादी मूल्यांकन करने और उनकी वैयक्तिक विशेषताओं के बारे में पूर्वाग्रहपूर्ण राय बनाने की ओर ले जाती है।

संयुक्त सामाजिकतः उपयोगी सक्रियता के दौरान ही परिवेश प्रभाव के नकारात्मक परिणाम ख़त्म किये जा सकते हैं। यह सक्रियता अंतर्वैयक्तिक प्रत्यक्ष के स्वरूप को बदल देती है और कारणात्मक आरोपण के लिए अच्छी बुनियाद पेश करती है। काम के माध्यम से बनने वाले अंतर्वैयक्तिक संबंधों और सामाजिकतः महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों पर आधारित कार्यकारी समूहों में ही लोग एक दूसरे को ठीक से समझ सकते हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

मित्रों के बीच और परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकरावों पर चर्चा की थी, इस बार हम मित्रों के बीच और परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण पर विचार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मित्रों के बीच संप्रेषण

मित्रता अंतर्वैयक्तिक संबंधों का एक विशिष्ट रूप है, जिसके लक्षण हैं स्थायी वैयक्तिक चयनात्मक संबंध ( permanent selective individual relationship ) तथा अन्योन्यक्रिया, इनमें भाग लेनेवालों के बीच परस्पर लगाव ( attachment ), संप्रेषण की प्रक्रिया से अत्यधिक संतोष और एक दूसरे से अपनी जैसी ही भावनाएं तथा पसंदें रखने की अपेक्षा। मित्रता के विकास के लिए इसके अलिखित नियमों का पालन करना आवश्यक है, जो परस्पर समझ, एक दूसरे के संबंध में स्पष्टवादिता तथा खुलेपन, सक्रिय परस्पर सहायता, एक दूसरे के मामलों में दिलचस्पी, ईमानदारी तथा निःस्वार्थभाव पर जोर देते हैं। मित्रता के नियमों के गंभीर उल्लंघन से या तो संबंध ख़्त्म हो जाएंगे, या मित्रता एक सतही संबंध बनकर रह जाएगी, या फिर हो सकता है कि वह शत्रुता का रूप ले लेगी।

किशोरों के लिए मित्रता और मित्रों के बीच संप्रेषण की समस्या विशेष महत्त्व रखती है। इसकी पुष्टि शिक्षकों के असंख्य प्रेक्षणों, किशोरों की डायरियों और वे मित्रता तथा प्रेम विषयक बहसों में जो रुची लेते हैं, उससे होती है। फिर भी अक्सर उनकी मित्र की खोज का अंत प्रायः मोहभंग में होता है, क्योंकि किशोरों के संबंधों के वास्तविक स्वरूप और मित्रता के नियमों के ऊंचे मानदंडों ( criteria ) के बीच खाई है। इस खाई का पता लगने से जो निराशाएं पैदा होती हैं, वे कभी-कभी किशोरों के बीच झगड़ों का कारण बन जाती हैं।

किशोरावस्था में हर कोई मित्र की आवश्यकता अनुभव करता है। मित्रों के बीच संप्रेषण के मानकों के बारे में किशोर की कमोबेश तौर पर स्पष्ट धारणा होती है, फिर भी किशोरों की सबसे बड़ी विशेषता दो व्यक्तियों के बीच की मित्रता नहीं, जिसके लिए वे लालायित रहते हैं, बल्कि साथीपन है, जो समवयस्कों के साथ व्यापकतर संप्रेषण पर ज़ोर देता है। साथीपन के संबंधों की बदौलत किशोर संप्रेषण की ऐसी प्रक्रिया में भाग लेता है, जिसमें वह अपने महत्त्वपूर्ण गुणों तथा योग्यताओं के ज़रिए अपने व्यक्तित्व का अपने समवयस्कों में विस्तार कर सकता है। किसी से उसे पुस्तकों के बारे में चर्चा करने में आनंद आता है, किसी से टेबल-टेनिस खेलने में और किसी से भावी पेशों के बारे में बातें करने में।

इस किशोरसुलभ साथीपन को साधारण सौहार्द के संबंधों से गड्डमड्ड नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि मित्रों, साथियों के बीच संप्रेषण का कर्ता अपने व्यक्तित्व के अपने लिए महत्त्वपूर्ण गुणों के ज़रिए किसी ‘साझे ध्येय’ में, समवयस्कों की सक्रियता में सहभागी बनना चाहता है,  जो उसके लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी महत्त्वपूर्ण व मूल्यवान है। किशोरों की मित्रता मित्रों के बीच संप्रेषण के विकास की एक अवस्था ही है। उसका वास्तविक महत्त्व अपने को, सामाजिक प्रौढ़ताप्राप्त वयस्कों में ही, प्रकट कर सकता है।

परस्पर समझ के रूप में संप्रेषण

संप्रेषण का अन्योन्यक्रिया और सूचना के अलावा एक प्रत्यक्षपरक पहलू भी है, जो अपने को संप्रेषण में भाग लेनेवालों के, एक दूसरे को जानने-समझने की प्रक्रिया में प्रकट करता है। संप्रेषण तभी संभव है, जब अन्योन्यक्रिया की प्रक्रिया में शामिल होनेवाला व्यक्ति, परस्पर समझ ( mutual understanding ) के स्तर को आंकने और अपने सहभागी का मूल्यांकन ( evaluation ) कर पाने की स्थिति में होसंप्रेषण में भाग लेने वाले दूसरे पक्ष के अंतर्जगत को अपनी चेतना में पुनर्सृजित ( re-creation ) करने, उसकी भावनाओं, व्यवहार के अभिप्रेरकों ( motives ) तथा महत्त्वपूर्ण चीज़ों के प्रति रवैये ( attitudes ) को समझने का प्रयत्न करते हैं।

फिर भी दूसरे व्यक्ति के अंतर्जगत को पुनर्सृजित करने का यह कार्य आसान नहीं है। मनुष्य का प्रत्यक्ष सामना दूसरे लोगों के केवल बाह्य रूप, व्यवहार और संप्रेषण के साधन के तौर पर प्रयुक्त क्रियाओं से होता है। उसे लोगों को उपलब्ध जानकारी के आधार पर समझने और उनकी योग्यताओं, विचारों, इरादों, आदि के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं। एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को जानना, समझना तथा आंकना ही संप्रेषण का प्रत्यक्षपरक पहलू है। दूसरे लोगों को जानकर व्यक्ति उनकी संयुक्त सक्रियता की संभावनाओं का अधिक सही मूल्यांकन कर पाता है। उनके संयुक्त प्रयासों की सफलता उनके अंतर्जगत की उसकी समझ के सही होने पर निर्भर रहती है।

( अगली बार हम संप्रेषण के इसी परस्पर समझ के प्रत्यक्षपरक पहलू के अंतर्गत एक दूसरे को जानने के क्रियातंत्रों पर विचार करेंगे। )




इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकराव

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर मनोविज्ञान पर कुछ सामग्री लगातार एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संप्रेषण-प्रक्रियाओं में भूमिका-अपेक्षाओं पर विचार किया था, इस बार हम मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकरावों पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां सिर्फ़ उपलब्ध ज्ञान का समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय  अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनोवैज्ञानिक संपर्क और अंतर्वैयक्तिक टकराव
( psychological contacts and interpersonal conflicts)

संपर्क के लिए संप्रेषण की प्रक्रिया का उभयपक्षी होना आवश्यक है। वह तभी बनाये रखा और बढ़ाया जा सकता है, जब सभी पक्ष एक दूसरे का आदर और विश्वास करते हैं। यदि शिक्षक अपेक्षाशील तथा सिद्धांतनिष्ठ होने के साथ-साथ अपने छात्रों का विश्वास भी करता है और उन्हें आदर भी देता है, तो वह निश्चित रह सकता है उसके द्वारा अत्यंत सरसरी तौर पर कही गई बातें भी किशोर द्वारा अनसुनी नहीं की जाएंगी, जबकि किशोर यदि महसूस करता है कि शिक्षक उसके व्यक्तित्व का सम्मान नहीं करता, तो उसके कितने भी अकाट्य और विश्वासोत्पादक तर्कों को भी वह सुनने के लिए तैयार नहीं होगा।

शिक्षक और छात्रों के संबंध न्यूनाधिक हद तक स्कूल के सामान्य वातावरण पर, बच्चे के मनोविज्ञान के बारे में शिक्षक की समझ पर और उसकी अध्यापकीय तथा मनोवैज्ञानिक व्यवहारकुशलता पर निर्भर होते हैं। जो शिक्षक कड़ाई बरतना भी जानते हैं और छात्र की गरिमा का आदर भी करते हैं, वे स्कूल में अनुकूल मनोवैज्ञानिक वातावरण पैदा करते हैं। छात्रों से संप्रेषण की प्रक्रिया में उनके प्रति आदर दिखाकर वे किशोरों में आत्मसम्मान ( self-esteem ) की भावना को प्रोत्साहित करते हैं, जो आगे के संपर्कों के लिए आधार बनती है। स्कूली बच्चों ( विशेषतः किशोरों ) के आत्मसम्मान पर भरोसा करना उनपर हितकर ( salutary ) शैक्षिक प्रभाव डालने का अचूक तरीका है।

किशोर में वयस्कों जैसी स्थिर आत्म-मूल्यांकन ( self-assessment ) की योग्यता नहीं होती। इस वज़ह से वह अपने कार्यों के मूल्यांकन के लिए उन व्यक्तियों का सहारा लेता है, जिनकी वह बड़ी कद्र करता है, जैसे माता-पिता, शिक्षक, आदि। इन बाहरी मूल्यांकनों में अंतर हो सकता है, इसलिए वह वांछित ( desired ) संप्रेषण के लिए विश्वसनीय आधार के तौर पर अपना आत्मसम्मान बनाए रखने का प्रयत्न करता है, यानि अपनी ऐसी छवि ( image ) बनाता है, जो उसकी नज़रों में उन्हें स्वीकार्य होगी। अनुभवी शिक्षक जानते हैं कि किशोरों से घनिष्ठ मनोवैज्ञानिक संपर्क स्थापित करने और बनाए रखने के लिए उनके आत्मसम्मान पर भरोसा करना कितना आवश्यक है।

इसकी एक ठोस मिसाल देखिए। सुनील पढ़ाई में कमजोर था और शेष कक्षा से पिछड़ गया था। उसने औरों के बराबर पहुंचने की आशा खो दी थी, और खराब नंबरों, सहपाथियों के मज़ाक, शिक्षकों की भर्त्सना और मां-बाप की डांट का उसपर कोई असर नहीं होता था। उसके कक्षाध्यापक ने, जो भौतिकी पढ़ाता था, इस स्थिति को सुधारने के लिए सुनील को अलग से भी पढ़ाना शुरु किया। वांछित मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करने के लिए वह उसे कक्षा के बाद नहीं, बल्कि उसे शेष कक्षा से आगे-आगे रखने के लिए पाठ से पहले ही नयी सामग्री समझा देता था। फिर जब कक्षा में शेष बच्चे नये सवालों से जूझ रहे होते थे और सबसे तेज़ लड़के भी हार-सी मान जाते थे, वह सुनील को आगे बुलाता और वह बिना किसी कठिनाई के उन सवालों को हल कर दिखाता। कक्षा का सुनील के प्रति रुख़ बदल गया और उसने भी तुरंत इसे महसूस कर लिया। कुछ समय बाद शिक्षक ने उसे कक्षा की ही एक कमजोर लड़की की मदद करने का जिम्मा सौंपा। लड़के को गर्व अनुभव हुआ कि शिक्षक ने उस पर भरोसा किया है, और वह उत्साहपूर्वक इस दायित्व को पूरा करने में जुट गया। लड़की के सामने अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए वह नई सामग्री को मन लगाकर और अपनी ही पहल पर पढ़ता और साथ ही पुरानी सामग्री को भी दोहरा लेता, जिसमें कभी वह पिछड़ा हुआ था। अपना आत्मसम्मान वापस पा लेने से अब ढ़ाई के बारे में उसका रवैया बदल गया था। शनैः शनैः सभी विषयों में वह बड़ी अच्छी प्रगति दिखाने लगा। जो चीज़ उसने आखिरकार पा ली थी, उसे, यानि अपने सहपाठियों से मिलनेवाले सम्मान और इससे जुड़े आत्मसम्मान को वह अब गंवाना नहीं चाहता था।

आत्मसम्मान एक अचूक, किंतु नाज़ुक उपकरण ( critical tool ) है। अगर वयस्क लोग किशोर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं, चाहे यह लापरवाही या अज्ञानतावश किया गया हो या जानबूझकर, तो वे बुरे प्रभावों का सामना करने की उसकी क्षमता को नष्ट करते तथा उसे अच्छी मिसालों के प्रति उदासीन बनाते हैं। बच्चा कितना भी गया-गुज़रा क्यों ना हो, जब तक उसमें आत्मसम्मान की भावना है, समाज के लिए वह असुधार्य ( incorrigible ) नहीं है, क्योंकि उसे अन्य लोगों और जिस समाज में वह रहता है, उसका आदर करना अभी भी सिखाया जा सकता है। दूसरे शब्दों में , उसके भविष्य के बारे में हम आशावादी रह सकते हैं। इसके विपरीत, यदि मनोवैज्ञानिक संपर्क टूट गया है, तो बिल्कुल संभव है कि अंतर्वैयक्तिक टकराव पैदा हो जाएं।

संप्रेषण की प्रक्रिया का सदा निर्बाध ( seamless ) होना अनिवार्य नहीं है और इसलिए यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि उसमें कोई आंतरिक विरोध नहीं पैदा होंगे। कुछ स्थितियों में संप्रेषण की प्रक्रिया में भाग लेनेवाले पक्षों के परस्पर-विद्वेषसूचक रवैये होते हैं, जिनमें दूसरे पक्ष के मूल्यों, कार्यभारों तथा लक्ष्यों ( targets ) के लिए कोई स्थान नहीं होता, और वह अंतर्वैयक्तिक टकरावों का कारण बन जाता है। इन टकरावों का सामाजिक महत्त्व अलग-अलग हो सकता है और अंतर्वैयक्तिक संबंधों के आधार का काम करनेवाले मूल्यों ( values ) पर निर्भर करता है।

अंतर्वैयक्तिक टकरावों के कारणों तथा प्रयोजनों ( purposes ) पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। संयुक्त सक्रियता के दौरान अंतर्वैयक्तिक टकराव दो प्रकार के निर्धारकों के कार्य के फलस्वरूप पैदा हो सकते हैं : वस्तुसापेक्ष व्यावसायिक मतभेद ( object-relative professional differences ) और व्यक्तिगत व्यावहारिक हितों की असमानता ( inequality of personal practical interests )।

यदि किसी सुनियोजित सामाजिकतः उपयोगी संयुक्त सक्रियता में भाग लेनेवाले लोगों की अन्योन्यक्रिया में वस्तुसापेक्ष व्यावसायिक मतभेदों की प्रधानता है, तो इससे पैदा होनेवाला टकराव विरले ही अंतर्वैयक्तिक संबंधों ( interpersonal relations ) के टूटने, संवेगात्मक तनाव ( emotional stress ) बढ़ने तथा शत्रुता में वृद्धि ( increasing hostility ) होने का कारण बनता है। विरोधी मतों पर खुली बहस के बाद किया गया निर्णय टकराव को ख़त्म कर देता है और साझा लक्ष्य ( common goal ) पाने में मदद करता है। इसके विपरीत व्यक्तिगत व्यावहारिक हितों की असमानताएं प्रायः विद्वेष ( rancor ) और कभी-कभी तो खुली शत्रुता का रूप ले लेती है। साझा ध्येय ना होने के कारण अपने संकीर्ण स्वार्थ ( self-interest ) की पूर्ति में लगे लोग प्रतिद्वंद्वी ( opponent ) बन जाते हैं, यानि अपने को एक ऐसी स्थिति में पाते हैं, जिसमें एक पक्ष की सफलता का मतलब दूसरे पक्ष के लिए हानि होता है। यह अपरिहार्यतः अंतर्वैयक्तिक संबंधों को बिगाड़ता है।

टकराव की स्थितियां संप्रेषण में अर्थविषयक बाधाओं के कारण भी उत्पन्न होती हैं, जो संप्रेषण में भागीदार पक्षों के बीच अन्योन्यक्रिया नहीं होने देतीं। अर्थविषयक बाधा का मतलब है पक्षों द्वारा मांगों, प्रार्थनाओं अथवा आदेशों की अलग-अलग ढ़ंग से व्याख्या किया जाना, जिससे परस्पर समझ और अन्योन्यक्रिया में रुकावट पैदा होती है। उदाहरण के लिए, वयस्कों और बच्चों के संबंधों में अर्थविषयक बाधा इस कारण पैदा हो सकती है कि बच्चा वयस्कों की मांगों के अर्थ को सही-सही समझते हुए भी इन मांगों को नहीं मानता है, क्योंकि वे उसके अनुभव, मत तथा दृष्टिकोण से मेल नहीं खातीं। इनको तभी दूर किया जा सकता है, जब वयस्क बच्चों के मानस, उसके हितों तथा विश्वासों, आयुगत विशेषताओं तथा विगत अनुभवों को जानते व ध्यान में रखते हैं और उसकी संभावनाओं तथा कठिनाइयों का लिहाज़ रखते हुए कार्य करते हैं।

बच्चों और बड़ों के बीच परस्पर समझ पैदा करने के लिए सबसे पहले यह आवश्यक है कि बच्चों को, बड़ों की भाषा तथा बड़ों को, बच्चों की भाषा इस्तेमाल करना सिखाया जाए। यहां तात्पर्य वाक्-प्रवृत्तियों, शब्द-भंड़ार, उच्चारण या वर्तनी से नहीं है, बल्कि इस बात से है कि सामान्यतः स्वीकृत अर्थों की पद्धति के अलावा शब्द मानव चेतना की अन्य सभी परिघटनाओं ( phenomena ) की भांति ही एक विशेष भाग, एक विशेष व्यक्तिगत अर्थ भी रखते हैं, जो अलग-अलग व्यक्तियों के मामले में अलग-अलग होता है। व्यक्तिगत भाव उससे निर्धारित होता है, जो व्यक्ति की सक्रियता के लक्ष्यों को उसके अभिप्रेरकों ( motives ) से जोड़ता है, यानि व्यक्ति की आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करता है।

एक ही शब्द, क्रिया या स्थिति के अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग भाव हो सकते हैं। शिक्षक द्वारा छात्र को पिलाई गई डांट ( ‘ तुम आज आधी छुट्टी में मोहन से फिर लड़े!’ ) का शिक्षक और छात्र के लिए एक ही अर्थ होता है और दोनों यह जानते हैं कि यह सब किस बारे में है। फिर भी इस बात का व्यक्तिगत भाव अलग-अलग हो सकता है, शिक्षक के लिए स्कूल में बच्चों का लड़ना अनुशासन का उल्लंघन है, जबकि छात्र के लिए यह अपने से शक्तिशाली छात्र मोहन को अपना मज़ाक उड़ाने से रोकने की एक और कोशिश हो सकता है।

वयस्कों को यह मुख्य लक्ष्य कि बच्चे को वयस्कों की भाषा को उसके व्यक्तिगत भावों की सारी पद्धति के साथ सीखना चाहिए, को ध्यान में रखते हुए बच्चे के व्यक्तिगत भावों की पद्धति को समझने का प्रयत्न भी करना चाहिए। यदि वह बच्चे के साथ अपना तादात्मय स्थापित कर लेता है, तो उसका कार्य बड़ा आसान हो जाएगा। शैक्षिक संप्रेषण में अंतर्वैयक्तिक टकराव प्रायः अध्यापक की स्कूली बच्चे के अंतर्वैयक्तिक भावों की पद्धति को समझने की अक्षमता अथवा अनिच्छा के कारण ही पैदा होते हैं।



इस बार इतना ही।

जाहिर है, एक वस्तुपरक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए कई संभावनाओं के द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।

शुक्रिया।

समय
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