शनिवार, 29 दिसंबर 2012

कुछ भी मौलिक नहीं होता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



कुछ भी मौलिक नहीं होता
( संदर्भ के लिए पिछली प्रविष्टि ‘सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती’ देखें )

'कोई मौलिक विचार बूझ पाना या कुछ मौलिक रच पाना बहुत ही दुष्कर कार्य है, सामान्य प्रयासों और परिस्थितियों में लगभग असंभव। आप धीरे-धीरे यह समझेंगे। ' यह कुछ समझ आता है।

इसकी पृष्ठभूमि में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि मौलिकता की अवधारणा को अधिकतर वैयक्तिकता के साथ जोडकर देखा जाता है, परंतु यह पूरा सच नहीं हैं। कुछ भी मौलिक नहीं होता, ऐसा भी कहा जाता है।

सभी भौतिक और वैचारिक अवस्थाएं एक क्रमिक विकास में होती हैं। यानि मानवजाति अपने अनुभव और ज्ञान को संचित करते हुए, उसे आगे की पीढ़ी को अंतरित करते हुए, उसका क्रमिक विकास करती हुई यहां तक पहुंची है, और यही अभी भी जारी है। यानि कि हर स्तर का ज्ञान, अपने पूर्व के ज्ञान पर ही अवलंबित होता है। हर नया विचार या खोज, मानवजाति की पूर्व के अनुभवों के इसी संचय पर निर्भर करती है।

इसका मतलब यह हुआ कि किसी ज्ञान, विचार या खोज के पीछे पूरी मानवजाति के ज्ञान की थाति अपना काम कर रही होती है, अपना योगदान कर रही होती है, उस खोज की पूर्वपीठिका तैयार करती है। कोई भी व्यक्ति शून्य से शुरू करके, मानवजाति के संचित ज्ञान से अपने को अद्यतन किए बगैर कुछ नहीं कर सकता। यानि क्या वैयक्तिकता का दावा ( यहां आप पेटेंट बगैरा को रख सकते हैं, वैयक्तिक अश्लील रॉयल्टीज़ को रख सकते हैं ) बिल्कुल ही गैरवाज़िब नहीं होना चाहिए ?

नितांत नवीन और मौलिक कार्यों के व्यक्तिगत प्रयासों के लिए थोड़ा-बहुत वैयक्तिक श्रेय दिया जा सकता है, ज्ञान की इसी क्रमबद्धता में उनके पड़ाव को उनसे जोड़कर देखा जा सकता है, उनकी सांयोगिक ऐतिहासिकता को दर्ज़ किया जा सकता है। परंतु संपूर्ण मानवसमाज के क्रमिक रूप से संचित ज्ञान और अनुभवों के आधारों पर परवान चढ़ सके इस वैयक्तिक अवदान के लिए उन्हें असामाजिक और अश्लीलता के स्तर तक पहुंचे, किन्हीं विशेष फायदों के लिए लाइसेंस नहीं दिया जा सकता।

परंतु अभी यही हो रहा है, बाज़ारवाद ऐसे वैयक्तिक अवदानों को अपने हित में प्रोत्साहित करता है, उन्हें एक भरपूर हिस्सा देता है, और उन्हें और खोजों को अपने मुनाफ़ों की सेवा में लगाए रखता है। चारों तरफ़ लूट मची है, और उस लूट में अपनी हिस्सेदारी के लिए अफरातफरी भी। पूरे मानवसमाज के क्रमिक प्रयासों से निर्मित उसकी इस दुनिया को कुछ मानवसमूह अपने हितार्थ जमकर दोहन करने में लगे हैं।

'यानि क्या वैयक्तिकता का दावा बिल्कुल ही गैरवाज़िब नहीं होना चाहिए ?' यह सवाल...

अगर इस प्रश्न का जवाब दें तो शायद यह हो, ‘ हां, वैयक्तिकता का दावा बिल्कुल ही गैरवाज़िब होना चाहिए।’ यही मंतव्य था।

यह अश्लील रॉयल्टी क्या है, समझ नहीं आया।

वैयक्तिक पेटेंट या व्यक्तिगत श्रेयों के लिए, उस का व्यवसायिक प्रयोग करके उसके ज़रिए अकूत मुनाफ़ा कमाने वाले व्यक्ति, समूह अथवा कार्पोरेट्स काफ़ी बड़ी मात्रा में रॉयल्टी के रूप में मुनाफ़े का हिस्सा पहुंचाते हैं, या वह ख़ुद इसे मोटी रकमें लेकर बेचते हैं।

इसे अश्लील, इन श्रेयों के पीछे के सामाजिक अवदानों के सापेक्ष कहा गया है जिसको पिछली बार विस्तार देने की कोशिश की गई थी। यानि जिसके पीछे पूरी मानवजाति, समाज का अवदान हो, उसे भुलाकर, या कहे नकार कर अपने लिए वैयक्तिक रूप से अय्याशी के महल खड़े कए लेना हमें तो अश्लील ही लगता है, खासकर इन हालात में जबकि मानव-समाज का बहुल हिस्सा जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति से भी महरूम है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। इस बार संवादों के बीच का एक दोस्ताना लानत-मलामती पत्र प्रस्तुत किया जा रहा है। संवादों के अंश आगे जारी रहेंगे।

आप भी इससे कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



सतही वाद-विवाद से मानसिकता नहीं बदलती

आज थोड़ा आप पर आपकी बातों पर संदर्भ से हट कर कुछ कहने का इरादा है। आपको बुरा लग सकता है, पर यही फिलहाल हमारा लक्ष्य है, ताकि अच्छा लगने की शुरुआत हो सके। बुरा लगना, पहला कदम है चिंतन को नवीन दिशा देने के लिए।

लगता है, हमारी बातचीत की दिशा, जैसा कि हम लक्षित करके शुरू हुए थे, थोड़ी अलग हो गई है। हमारा मकसद आपसी संवाद के जरिए, आपकी जिज्ञासाओं और सैद्धांतिक उलझनों पर कुछ इशारे करना था, ताकि आप अपनी सक्रियता के लक्ष्य इस वैयक्तिक और वैचारिक विकास हेतु प्रवृत्त कर सकें। पर अभी ऐसा लग रहा है कि संवाद बहस का रूप ले रहा है। निरर्थक बहसों, सहमति या असहमति के पायदानों पर पहुंचना या पहुंचाना हमारा मंतव्य नहीं रहा है। आपको सोचने और पुनर्विचार करने का अवसर पैदा करना लक्ष्य है, उसी हेतु हम कुछ गंभीर इशारे आपकी ओर उछालते रहते हैं, और उम्मीद करते हैं कि वे आपकी चिंतन प्रक्रिया में कुछ हलचल कर सकें।

आप बहुत ज़ल्दी में लगते हैं, प्रतिक्रियात्मक हैं, निष्कर्षात्मक बैचैनी से भरे हुए हैं। अहम् और श्रेष्ठता बोध से भरे हुए। यह आपकी यहां की बातचीत के अलावा भी नेट पर यत्र-तत्र देखे गए बहस-मुहाबिसों के संदर्भ में भी कहा जा रहा है। आपकी बातों में मैं, मेरा इतना होता है कि, वह भी इतना दंभ और अतिआत्मविश्वास से भरा हुआ कि हमें बैचैनी होने लगती है। सही होना ही महत्त्वपूर्ण है, वह भी अपने नज़रिए और मान्यताओं के हिसाब से नहीं, वरन् वृहत्तर मानवजाति के हितों के सापेक्षतः। सही साबित होना, गलत साबित करना या सही दिखना कोई मायने नहीं रखता। ये तात्कालिक सीमाओं में होने वाले वैयक्तिक मामले हैं, जिनके तात्कालिक परिणाम उस वक़्त की आपकी अपनी सीमाओं पर निर्भर होते हैं। जो जितना झख मारने की स्थिति में होता है, उतना ही वह टिका रहता है और टिके रहने को ही अपनी वैयक्तिक जीत समझने को अभिशप्त होता है।

विचार और बात पृष्ठभूमि में चली जाती है, और वैयक्तिकता हावी हो जाती है। श्रेष्ठताबोध हावी हो जाता है। वैसे भी, छोटे से समय के सतही वाद-विवाद से कभी भी किसी की मानसिकता नहीं बदली जा सकती, और यह बहस का रूप लिये हो तो कतई भी नहीं। इसलिए हमें गलतफहमियां नहीं पालनी चाहिए कि हम कुछ बहसों से, कुछ तथ्यों से, मनमर्जी व्याख्याओं और तर्कों से किसी के व्यक्तित्व और विचारों पर बड़ा असर डाल सकते हैं। थोड़ा बहुत असर की भी संभावनाएं भी वहीं रहती हैं जहां कि यह संवाद और आपसी विश्वास के साथ हुई ठंड़ी बातचीत में के दौरान हुआ हो।

हम किसी भी तरह के श्रेष्ठताबोध को पसंद नहीं करते, इसलिए नहीं कि यह हमारी पसंद-नापसंद का मामला है, वरन् इसलिए कि यह मनुष्यता के लिए बेहतर नहीं है। श्रेष्ठताबोध, किसी की कमतरी पर टिका हुआ होता है। यह मनुष्य-मनुष्य के बीच में गैरबराबरी, अलगाव, नफ़रत का वायस है, इसीलिए अननुकरणीय है, त्याज्य है। इसलिए धार्मिक, नस्लीय, वैयक्तिक, भाषीय, राष्ट्रीय आदि श्रेष्ठताबोधों के चश्में आधारित विचारधाराएं, मानसिकताएं हमें प्रभावित नहीं करती। किसी भी आत्मपरक लक्ष्य और रूप से व्याख्यायित की गई तथ्यात्मकता बेहतर नहीं है।

हमने आपके सामने कई गंभीर चीज़ें भी रखी, क्लिष्ट संकल्पनाएं भी। और उम्मीद की आप शायद उनसे गुजर कर थोड़ा आंदोलित होंगे, समझ नहीं आने पर उन्हीं के आसपास अपनी जिज्ञासाएं पेश करेंगे। पर ऐसा नहीं हो पा रहा है, आप सिर्फ़ तात्कालिक रूप से प्रतिक्रिया देते हैं, अपनी मान्यताओं के साथ उन पर कोई गंभीर आलोड़न-विलोड़न नहीं करते। आप सिर्फ़ उन्हें अपने चश्में से देखते हैं, तुरंत ही सहमत या असहमत होते हैं और अपनी मान्यताओं की खिलाफ़त सूंघते ही तुरंत बहस-मुहाबिसे के लिए उद्यत हो जाते हैं।

आपने अपने जरा से अनुभवों और जरा से अध्ययन से प्राप्त छुटपुट, भावुक, सतही और सामान्य से विचारों को, इतना मौलिक, इतना क्रांतिकारी, इतना जरूरी समझ लिया है कि आप इस श्रेष्ठताबोध के घटाघोप से बाहर आना ही नहीं चाहते। आपको जिस तरह यह अनोखा और नवीन सा लग रहा है, उतना ही यह एक सामान्य परिघटना है। सभी ऐसे आवेगों से गुजरते हैं, सभी को ऐसा लगता है कि उसके अनुभव, उत्पन्न विचार नितांत मौलिक और अनोखे हैं। परंतु जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते जाते हैं, पता चलता जाता है कि ये एक सामान्य परिघटना ही थे, सभी ऐसे ही आवेगों से गुजरते हैं, सभी ऐसा ही समझते भी हैं। दुनिया बहुत बड़ी है मित्र। हम जब तक किसी भी क्षेत्र में अपने से पहले रचे गए, बुने गए, कहे गए, समझे गए, स्थापित को जान और समझ नहीं लेते, आत्मसात् नहीं कर लेते, तब तक कुछ नया रच ही नहीं सकते। कोई मौलिक विचार बूझ पाना या कुछ मौलिक रच पाना बहुत ही दुष्कर कार्य है, सामान्य प्रयासों और परिस्थितियों में तो लगभग असंभव। आप धीरे-धीरे यह समझेंगे। अगर आपने समझना चाहा तो, वरना अपने श्रेष्ठताबोध के घेरे में अधिकतर सभी ही जीते ही रहते हैं, अपना पूरा जीवन निकाल देते हैं।

जो कौम ऐसी श्रेष्ठताबोधों से निकलने को राजी ही नहीं होती, निकलना ही नहीं चाहती वह कुछ भी नया और वास्तविक श्रेष्ठ रच ही नहीं सकती। यही हमारी टिपिकल सामान्य भारतीय मानसिकता है। धार्मिकता और अवैज्ञानिक दृष्टिकोण से लबालब, सामंती प्रवृत्तियों से लबरैज, अपने ही बुने-चुने श्रेष्ठताबोधों से भरी-उफनी हुई। यही कारण रहा है, और है कि प्राचीन समय को छोड़कर अभी तक ना तो कुछ नया रच पाये हैं, ना कुछ नया कर पाये हैं। हमारे पास एक भी मौलिक वैज्ञानिक नहीं है, ढंग का टेक्नोक्रेट नहीं है। इसलिए इससे मुक्ति पाना, और दिलाना हमारा अभीष्ट होना चाहिए। ना कि इसी मानसिकता को तुष्ट करता कोई नया सा घटाघोप।

यह बहस करने के लिए, आपके विचार जानने के लिए, आपकी राय, आपकी सहमति या असहमति प्राप्त करने के लिए लिखा दस्तावेज़ नहीं है। अगर आपको इसमें कुछ ठीक लगे तो इसे छोड़कर आगे बढ़ना, गलत लगे तो भी छोड़ कर आगे बढ़ना। क्योंकि यह जरूरी नहीं कि यह आपके सापेक्ष सही ही हो, बस यह है और आवेग में लिख दिया गया है। कुछ आपके सापेक्ष सही हो तो बेहतर करने की चेष्टा, कुछ नहीं हो तो उसको दिल सा ना लगाने की प्रवृत्ति, हमें विकसित करनी चाहिए।

हम आपमें इसे समझ पाने और अन्यथा नहीं लेने की क्षमता महसूस करते हैं, आपमें संभावनाएं देखते हैं, इसीलिए यह जरूरी समझ रहे हैं और लिख पा रहे हैं। आगे भी जब भी जरूरी लगा, कुछ ऐसा-वैसा लिखते रहेंगे। उम्मीद है कि हमेशा की तरह ही आप आपकी शान में की गई इन गुस्ताखियों को आया-गया करते रहेंगे।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

हिप्नोटिज़्म और होम्योपैथी

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



हिप्नोटिज़्म और होम्योपैथी

पहले जानना चाहता हूँ कि ये हिप्नोटिज्म क्या है और इसके लाभ क्या हैं? मुझे तो ये कुछ अजब और चमत्कारी किस्म का लगता है क्योंकि कोवूर सहित तर्कशील सोसाइटी हरियाणा और पंजाब के लोगों की किताबों में बहुत से मानसिक रोगों खासकर भूत आदि का वर्णन मिलता है जिन्हें वे हिप्नोटिज्म से ठीक करते हैं। ये कैसे सम्भव है? क्या इसका लाभ इतना है कि व्यक्ति अपने पर और  कुछ समस्याओं में दूसरों की सहायता कर सकता है? अगर हाँ तो कैसे? क्या इसे सीखना होता है और कैसे होगा ये? बार-बार पढ़ने से इसके बारे में सवाल करने की इच्छा हुई इसलिए पूछा।

हमें इसके बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। पर यह तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपना कर जाना ही जा सकता है कि प्राकृतिक नियमों से परे के चमत्कारों के दावे खोखले होते हैं। सम्मोहन ( हिप्नोटिज़्म ) की अवधारणा, जैसा कि चमत्कारी रूप में इसे प्रचारित किया जाता है, सभव नहीं है। हां, दिमाग़ की कार्यपद्धतियों की अपनी सीमाएं हैं और इसे जानकर दिमाग़ को बखूबी भ्रमित किया जा सकता है। इसी का फायदा उठाकर इससे हो सकता है कुछ सकारात्मक क्रियाएं भी संपन्न की जा सकती हैं। पर यह भ्रम ऐसा भी नहीं होता, जैसा कि समझा जाता है या बताया जाता है कि कोई व्यक्ति कुछ रहस्यमयी हरकतें करके किसी दूसरे की चेतना पर अपना संपूर्ण नियंत्रण स्थापित करले कि वह उसके निर्देशानुसार कार्य करने को मजबूर हो जाए।

सम्मोहन इसके शाब्दिक अर्थ में ही अधिक उचित जान पड़ता है। यानि कि किसी व्यक्ति को, दूसरे व्यक्ति के गुण, उसकी सुंदरता, उसका व्यक्तित्व, उसका ज्ञान इतना प्रभावित करले कि यह कहा जा सके कि उसने मुझे मोह लिया है, मोहित कर लिया है।

अविकसित, अपरिपक्व चेतनाओं को, किसी विशेष लक्ष्यों या सिद्धांतों के लिए, उसके विश्वासों से, उसकी आस्थाओं से, उसके अज्ञान का फ़ायदा उठाते हुए अनुकूलित कर लेना भी सम्मोहन की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसी तरह के सम्मोहित करने वाले प्रभावों और कार्यवाहियों से ही अंधराष्ट्रवादी, धार्मिक कट्टरता, आतंकवाद जैसी मानवविरोधी कार्यवाहियों के लिए किसी को उकसाया या तैयार किया जा सकता है। शायद यही सम्मोहन है।

किसी मानसिक अपरिपक्व और अस्थिर व्यक्ति को, मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग के जरिए जिस तरह से विकसित और स्थिर करने की कोशिश की जाती है, यह भी एक तरह का सम्मोहन ही है। अपने से अधिक जानकार से लगते, चमत्कारी से लगते व्यक्ति के सामने, या अपनी समस्याओं से मुक्ति की संभावनाओं के चमत्कारों के मद्देनज़र, अक्सर सापेक्षतः अपरिपक्व व्यक्तियों को मानसिक और यदि यह असर अधिक गहरा गया हो तो शारीरिक समर्पण करते हुए देखा जा सकता है। धार्मिक और योगी बाबाओं के यहां जुटती और मरती भीड़ में क्या यही सम्मोहन का मनोविज्ञान नहीं काम करता है।

आगे आप ख़ुद दिमाग़ लड़ाएं, इस पर और जानें।

एक जिज्ञासा है, लेकिन विषय से बाहर। होमियोपैथी को अवैज्ञानिक और झूठा कहा जाता है। इसका सत्य क्या है?…प्रतीक्षारत आपके दिशा-निर्देश के लिए।

फिलहाल के विषय से बाहर की जिज्ञासा को अभी छोड़ ही दिया जाए तो ठीक रहेगा। यह तो कहा ही जा सकता है कि चीज़ों को समझने के लिए उनकी ऐतिहासिकता को ध्यान में रखा जाना अत्यावश्यक होता है। यानि उनके कालखण्ड़ और उस काल की सामान्य अभिलाक्षणिकताओं के साथ ही उनका विश्लेषण और संश्लेषण किया जाना चाहिए।

अब आप खु़द इसे समझने की कोशिश कर सकते हैं कि होम्योपैथी पद्धति का काल क्या था, उस वक़्त मनुष्य के ज्ञान और समझ की अवस्थाएं क्या थीं, विज्ञान के विकास का आलम क्या था। यानि कि किसी काल खण्ड़ की उपलब्धियों में उतनी ही वैज्ञानिकता हो सकती है जितना कि उस वक़्त के विज्ञान का स्तर था। लगता है यह इशारा काफ़ी है।

जहां तक उन उपलब्धियों से समस्याओं के निस्तारण की बात है, तो जिन सामान्य समस्याओं का बखूबी निस्तारण उनसे उस कालखण्ड़ में किया जा सकता था, यदि उस जैसी ही सामान्य समस्याएं आधुनिक कालखण्ड़ में भी हैं तो उनका निस्तारण अभी भी उन्हीं के ज़रिए भी किया ही जा सकता है। व्यावहारिक प्रभाव और संतुष्टि का स्तर उनकी आगे की उपयोगिता या प्रांसगिकता को तय कर ही देगा। कहने या मानने के लिए भले ही कुछ भी हो, परंतु वास्तविक दैनंदिनी जीवन-व्यवहार में तो निश्चित ही इसका असर दिखेगा।

होमियोपैथी या अन्य चिकित्सा विधियों में ऐसी दवाएँ क्यों हैं जो असहज लक्षणों को दूर करने में सहायक बताई जाती हैं। खासकर होमियोपैथी में ऐसी दवाएँ बताई जा रही हैं। उन्हें हम क्या समझें। जैसे वह भीड़ वाली असहजता के लिए भी वहाँ उपाय बताए जाते हैं। ऐसी दवाएँ कारगर नहीं होतीं? माजरा समझ नहीं आता। कुछ बताइए।

होमियोपैथी पर शायद हम पहले भी कुछ कह चुके हैं। ये पद्धतियां भी अपने तात्कालिक ज्ञान और सीमाओं के अंतर्गत मनुष्य की व्याधियों से पार पाने की कोशिश कर रही थीं, और अपनी तात्कालिकता में उन्होंने कई सामान्य चीज़ों के लिए कारगर समाधान प्रस्तुत भी किए। व्याधियां यदि वैसी ही हैं तो उसी तरह के समाधान ये अभी भी प्रस्तुत करेंगी ही, इसमें हर्ज़ क्या है। यदि नहीं कर पाती हैं तो मनुष्य वैकल्पिक रास्ते भी तलाशता ही है।

असहज लक्षणो के लिए, चूंकि ये वास्तविकताओं की सही पहचान करवा पाने में असक्षम होते हैं, अधिकतर मानसिक अपरिपक्वताओं से संबंधित होते हैं, रहस्यमयी से हो उठते हैं, अक्सर इनके मानसिक सलाहिक उपचारों से समाधान की कोशिशे की जानी चाहिए। कई चीज़ें समय के साथ, मानसिक परिपक्वताओं और समझ के साथ, परिस्थितियों से निपटारे के साथ स्वतः समाप्त हो जाती है, पर इस दौर के लिए मानसिकतः अपरिपक्व मनुष्य को एक मानसिक सहारे की जरूरत होती है। ऐसी ही परिस्थितियों में इस तरह की कई दवाएं कारगर साबित होती दिखती हैं, कारगर रहती हैं। जो शरीर में वास्तव में कुछ कर रही होती हैं वे भी, और अन्य कई तरह के टोटके भी, मसलन पूजापाठ, पत्थर-नगीने, धागे-तावीज़, झाड़-फूंक आदि भी, कारगर महसूस किए जाते हैं।

अब यदि कोई व्यक्ति कुछ परिस्थितियों में असहजता महसूस करता है, और उनके बीच सक्रियता की हिम्मत नहीं जुटा पाता, उनके बीच किसी रहस्यमयी कारणों की उपस्थिति महसूस करता है, तो ऐसे में उपरोक्त सभी उसे एक हिम्मत देते हैं, मानसिक आधार देते हैं, उसे यह आभास देते हैं कि उसने उनसे निपटने का एक उपाय कर लिया है इसलिए उनका भय समाप्त हो जाता है, और वह उन परिस्थितियों में अधिक सहजता के साथ सक्रिय होता है और अपने भयों और असहजता पर वास्तविक रूप से काबू पा लेता है, और इसका श्रेय वह उन्हीं टोटकों को दे दिया करता है।

सामान्यतः मनुष्य समझ में आती सामान्य व्याधियों के लिए उपलब्ध इंतज़ामों पर ही भरोसा करता है, पर जब कुछ असहज और असामान्य सा घटाघोप महसूस करता है तभी वह अपनी असहज समस्याओं के लिए इसी तरह के किसी असहज समाधानों की तरफ़ मुड़ता है और इनका प्रयोग करने में कुछ हर्ज़ नहीं समझता।

होमियोपैथी और अन्य प्राचीन पद्धतियां जो कि तात्कालिक सीमित रूप के विज्ञान आधारित ही है, ( जहां तथा जिन मामलों ये कई तरह के भाववादी प्रक्षेपणों और व्याख्याओं से जुडी हुई हैं, उन्हें छोड दिया जाए ) कई सामान्य मामलों में, और कई तरह के मानसिक असहजताओं के मामले में कारगर रहती ही हैं। खासकर उन लोगों के लिए तो यह एक वास्तविकता ही है जो इनमें मानसिक गहराइयों से विश्वास भी करते हैं। जो समझते हैं कि इसके पीछे की वास्तविकताएं क्या है, वे तो अपने आप ही अपनी मानसिक उलझनों से लड ही लेते हैं, उन्हें किसी तरह के काल्पनिक सहारे की क्या आवश्यकता हैं और इन पद्धतियों का प्रयोग कई तरह की सामान्य व्याधियों में कर भी लिया करते हैं।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

कोरी भावुक राष्ट्रीयता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



कोरी भावुक राष्ट्रीयता

एक जानकारी के तहत मैकाले ने कहा था कि पूरे भारत और अरब की सारी किताबें यूरोपियन पुस्तकालय के एक शेल्फ़ इतनी भी काम की नहीं है। अब बताइए कि यह बात क्या अपमान नहीं है।....ब्रूनो और गैलीलियो को कहाँ जलाया या जान से मार दिया गया। यूरोप में या भारत में? यह कोई लफ़्फ़ाजी नहीं है, यह तो इतिहास ही बताता है। क्या अपने अतीत की खोज का काम बुरा है?

वही प्रवृत्तियां जिन्होंने हमारे यहां वस्तुगत ज्ञान का भरसक रास्ता रोका, बाहर भी, हर जगह हावी हैं। उनमें से कुछ लोग अपने श्रेष्ठताबोधों, दंभों में हैं और हम भी इसके जवाब में अपने श्रेष्ठताबोधों, दंभों से उनका सामना करना चाहते हैं। यानि कि जो प्रवृत्तियां हमें खु़द बुरी लग रही हैं, हम भी वैसे ही हो जाना चाहते हैं। शायद बेहतर हो, आप स्वयं देखिए।

जो धार्मिक-भाववादी प्रवृत्तियां यहां चार्वाकों और लोकायतिकों को नष्ट कर रही थी, बौद्धों का अपने उत्स देश से ही समूल नाश कर रह थीं, वही प्रवृत्तियां वहां भी ब्रूनों, गैलीलियों की राह का नाश करना चाहती थी। पर यह तो तथ्य हैं ही, अंतत्वोगत्वा वहां वस्तुगत वैज्ञानिक प्रवृत्तियों ने लड़ाई लड़ी और अपनी सीमाओं को लांघते हुए अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ करवाई। वहां की भौतिक परिस्थितियों ने जो जरूरत पैदा की उसकी वज़ह से इनकी राह थोड़ा आसान हुई, और धीरे-धीरे जीवन के साधन जुटाने की मानवाकांक्षा निर्णायक साबित हुई। धर्म को उन्हें राह देनी ही पड़ी।

अपने अतीत की खोज जरूरी है, पर यह प्रश्न अपनी जगह है कि, क्या यह खोज सिर्फ़ गौरवगान के आत्मपरक लक्ष्यों तक ही सीमित होनी चाहिए?

भाषाओं का इतिहास समझने की बात तो है ही। वैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे हैं कि संस्कृत भाषा कम्प्यूटर के लिए सर्वाधिक उचित है......यह समझ नहीं आता कि वह कौन से कारक थे जिसके चलते भारत में नागरी लिपि या भाषा पैदा हुई और अब तक की समृद्धतम और वैज्ञानिक लिपि क्यों है?.........अगर आप बता सकें तो कृपा कर के कुछ कहें वरना भाषा विज्ञान का इतिहास आदि देखना पड़ेगा।

आप जानते ही हैं कि कंप्यूटर की अपनी कोई भाषा नहीं होती। वह उर्जा की उपलब्धता या अनुपलब्धता ( वोल्टेज नहीं हैं या हैं, यानि ० या १ ) के आधार पर इसी भाषा में समझता और काम करता है। अब आप कंप्यूटर की इस भाषा को किसी भी निर्गम ( output ) संकेतों, भाषाओं में कोडित कर लें जो आपको समझ में आता हो। इसी तरह इसे उसकी भाषा में कोडित करके उसे देदें, वह अपना काम अपनी ही भाषा में करेगा। तो अब यह कहने की क्या उपयोगिता होगी कि कौनसी भाषा उसके लिए अधिक या कम उचित होगी, यह आप ही ज़्यादा बेहतर से समझ सकते हैं।

हमारे पास ऐसी कोई आत्मपरकता नहीं थी कि हम इस श्रेष्ठताबोधी सवाल पर कि ‘भारत में ही नागरी लिपि या भाषा पैदा हुई और अब तक की समृद्धतम और वैज्ञानिक लिपि क्यों है?’ पर माथापच्ची करना चुनते, इसलिए इसके बारे में हमारी सीमाएं हैं। आपको भाषावैज्ञानिक अध्ययनों से गुजरना होगा। और यदि आपको वाकई इस सवाल से इसी नज़रिए के साथ जूझना हो तो वैज्ञानिक अध्ययन को नहीं बल्कि किसी ऐसे ही नज़रिए वाले विद्वान का शोध चुनना होगा जिसने भाषाई श्रेष्ठता के आधारों को ढूढ़ने के आधार पर काम किया हो नाकि वस्तुगत वैज्ञानिक आधारों पर।

विज्ञान पर या मानव के किसी खोज पर किसी का एकाधिकार नहीं हो सकता लेकिन पेटेंट जैसी व्यवस्था भी पश्चिम की है जिसके चलते लोगों का शोषण आज भी किया जाता है। वैज्ञानिक आविष्कारों को भी पैसों से तौलने का काम भी पश्चिमी देन है।

विज्ञान खोजें करता है, उनका उपयोग करना और उनमें उद्देश्य भरना मानवजाति का काम है। और स्पष्ट कहें तो समाज के प्रभुत्व प्राप्त वर्गों का काम है। यानि कि विज्ञान की सार्विकता को यदि कुछ समूह इस तरह नियंत्रित कर पाते हैं तो यह उनकी पूंजीगत साम्राज्यवादी व्यवस्था की देन है। सारी ताकत का पूंजी में सिमटा होना है। यानि कि मुख्य लड़ाई इसी पूंजीवादी साम्राजी व्यवस्था से होनी चाहिए जो पूरी मानवजाति की थाति को अपने नियंत्रण में रख कर इसे मनुष्य द्वारा मनुष्य का, और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण का साधन बनाए हुए है। और यही प्रवृत्तियां हमारे यहां भी काम कर रही हैं, उनसे भी। यानि इस साझा दुश्मन को पहचानना और उससे संघर्ष करना हमारा ध्येय होना चाहिए। वह देश के बाहर हो या देश के अंदर। सिर्फ़ कोरी भावुक राष्ट्रीयता देश के अंदर की इसी पूंजीवादी और साम्राजी प्रवृत्ति को नहीं देख पाती, जो आजकल धार्मिक-भाववादी शक्तियों के साथ नाभिनालबद्ध हुई पड़ी है और प्रभुत्व में है, निर्णायक बनी हुई है।

एक बात और जानने की इच्छा है। यूरोप की संस्कृति पर कहा गया है कि वहाँ दास जैसी अमानवीय प्रथा रही है।.............यूरोप में स्त्री को आत्माहीन माना गया। हमारे यहाँ भी बहुत कुछ कहा गया। लेकिन मेरा सवाल है कि यूरोप में ऐसी संस्कृति रही तो इसे क्या कहें?

अगर आप पूरी मानवजाति के इतिहास को वस्तुगत रूप से समग्रता से देखने की कोशिश करेंगे तभी आप यह समझ पाएंगे। लगभग समान रूप से ही, थोड़े से अंतरों के साथ सभी जगह इसी तरह के विकास संस्तरों से मानवजाति गुजरी है। आज की नैतिकता और मूल्यों के सापेक्ष जब हम इतिहास पर नज़र डालते हैं तो सभी संस्कृतियों में ऐसी अवस्थाएं रही हैं।

यूरोप में अमानवीय दासप्रथा रही, तो हमारी संस्कृति में शुद्रों, दलितों और महिलाओं के हालात भी मानवीय नहीं रहे हैं। अभी भी हमारे यहां के सामाजिक जातीय संस्तरों के हालातों से आप भली-भांति परिचित ही होंगे। जो बुरा है, सभी जगह बुरा है, उसे सभी जगह ही बदल देना, त्याज्य देना चाहिए। जो अच्छा है, वह कहीं का भी है, उसे अपना ही लेना चाहिए।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

भाववादी-आध्यात्मिक घटाघोप

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



भाववादी-आध्यात्मिक घटाघोप

मेरा मतलब यही है। आखिर हम उस वजह को जानना चाहते हैं कि ऐसा क्यों हुआ? मध्यकालीन भारत के बाद अचानक भारत में 5-700 वर्षों तक किस वजह से यह सब होता है? मैं मानता हूँ कि गुलाम मानसिकता और देश नया चिन्तन कम करते हैं या नहीं करते या नयी खोज नहीं ही करते। पूरा इतिहास इसका साक्षी है। यह कोई काल्पनिक बात नहीं है।

उसी बात में इसके कारणों की तरफ़ भी इशारा था, पर आपने ध्यान नहीं दिया। ‘इस लौकिक ज्ञान की परंपराओं और धाराओं पर, काल्पनिक, अलौकिक तथा आध्यात्मिक चिंतन और ज्ञान हावी हो गया।’ आपको अभी इतिहास के वस्तुगत ( objective ) से गुजरना होगा, तभी आपको वस्तुस्थिति का पता चल पाएगा। हमने जिस प्रक्रिया का जिक्र किया है, वह अभी ५-७०० वर्ष पूर्व की नहीं है, जैसा कि आप इसे ‘गुलामी की मानसिकता’ वाली बात के साथ जोड़ कर देखना चाहते हैं।

जगत का वस्तुगत ज्ञान प्राप्त करने की ओर लक्षित यह भौतिकवादी धारा शुरुआत से ही साथ चली है। जब से समाज में वर्ग संरचना उभरना शुरु हुआ, यानि ऐसे वर्गों का उभार होना शुरु हुआ जो समाझ में प्रभुत्व प्राप्त करते जा रहे थे, और श्रम प्रक्रिया से विलग रहकर भी साधनों का उपभोग करने में सक्षम थे, और इसीलिए उनके पास अवसर था कि वह जगत की दार्शनिक संकल्पनाओं के लिए काल्पनिक चिंतन की उड़ान भर सकें, तभी से यथास्थिति बनाए रखने और उसे धार्मिक जामा पहनाने की कवायदें शुरू हुई और साथ ही लोक की इस भौतिकवादी समझ और व्याख्याओं पर अवरोध डालना शुरू कर दिया गया।

बाद का इतिहास इनके विरोधों से भरा हुआ है। चार्वाकों, लोकायतों, न्याया-वैशेषिकों, योग आदि की भौतिकवादी धाराओं का या तो समूल नाश कर दिया गया, या उन्हें भाववाद के मुलम्मे में प्रक्षिप्त। बुद्ध और बाद के काल में यह धारा और परंपरा थोड़ा सापेक्षतः अधिक विकसित हुई, परंतु बौद्धों के सांस्थानिक नाश के बाद से, गुप्त काल में, ब्राह्मण पुनरुत्थान में इन पर सर्वाधिक हमले हुए और इन धाराओं का यह हाल बना दिया कि इनका विकास अवरुद्ध हो गया या ये भाववादी मुलम्मे के साथ ही अपने-आपको छुटपुट रूप से बनाए रखने में बमुश्किल सफल रह पाई।

तभी तक जो काम बमुश्किल हो चुका था, वही हो पाया, उसके बाद तो जो कूपमंडूकता के हालात चले वे कमोबेश अभी तक जारी हैं। धार्मिकता और भाववादी काल्पनिक ज्ञान ने, जगत के वस्तुगत ज्ञान को परवान चढ़ने ही नहीं दिया, सर्वत्र आध्यात्मिकता हावी हो गई। हर जिज्ञासा का समाधान काल्पनिक चिंतन प्रस्तुत करने लगा, हर मुसीबत और जरूरत के लिए अलौकिक शक्तियों के आगे गुहार करने की प्रवृत्ति चला दी गई। आदमी के सारे प्रयास इसी पूजा-पाठ, ताबीज़-डोरों, ग्रह-शांतियों में ही खपने लगे। कुछ ठीक हो जाए तो प्रभु की कृपा, और ना हो तो प्रभु की लीला, पूर्वजन्मों के कर्मों का खेल। अब खाक कुछ हो पाने की संभावनाएं बची। आप जिस अकर्मण्यता का उत्स ‘गुलाम मानसिकता’ में देखना चाहते हैं, हम उन्हें इसी भाववादी-आध्यात्मिक घटाघोप में देखा करते हैं।

खैर, आपको अध्ययन करना चाहिए। अगर आप वाकई वस्तुगत रूप से चीज़ों को समझना चाहते हैं तो जिस तरह, हर तरह की धाराओं का विपुल लेखन सहज रूप में अधिक उपलबध है, वैसे ही इस भौतिकवादी धारा का भी विपुल लेखन उपलब्ध है, बस वह सामान्य रूप से पहुंच में नहीं रह पाता है, उसके कारण भी उपरोक्त परिस्थितियों में ही छुपे हैं कि समाज के प्रभुत्व प्राप्त वर्ग, समूह यथास्थिति को बनाए रखने के लक्षित इसी भाववादी विचारधारा को बनाए रखना चाहते हैं, और भौतिकवादी धारा को सामने आने नहीं देना चाहते।

लेकिन जब अमेरिका या जर्मनी का आदमी आइंस्टाइन पर या अन्य वैज्ञानिकों पर गर्व कर सकता है तो हम आर्यभट्ट और अन्य पर नहीं कर सकते? इस गर्व से निश्चय ही नुकसान नहीं है।

क्यों नहीं कर सकते। करना ही चाहिए, करते ही हैं। हमें आर्यभट्ट पर भी गर्व होना चाहिए, और अन्य महानुभावों पर भी जो कहीं के भी हों, पर जिनके प्रयासों ने पूरी मानवजाति को फायदा पहुंचाया है। इसे भी राष्ट्रीयता के संकीर्ण दायरे में बांधने की क्या जरूरत है। पर सिर्फ़ गर्व करने से ज़िंदगी नहीं चला करती, विकास नहीं हुआ करता। उनका उपयोग करना, उनके सिरे को पकड़कर आगे तक पहुंचाने काम, उनके आगे बढ़ने का काम होना चाहिए। वह नहीं हुआ, और हम क्या चाहते हैं आगे भी ना हो। हमारे अपने ही वैज्ञानिक मनीषियों, उनकी विचारधाराओं को हमने जानबूझकर ( हमारे समाज में प्रभुत्व प्राप्त विचारधारा ने ) भुला दिया, इनके ज्ञान की धाराओं को रोक दिया, सिर्फ़ उन्हें कुछ किताबों में जिक्र करके गर्व की चीज़ बनाए रखा, वह भी सिर्फ़ उनके नामों को, नाकि उनके काम और विचारों को सामने लाया गया ( जैसा कि एक उदाहरण, अभी भगतसिंह के साथ है, उनके नाम का ढिंढोरा तो बहुत पीटा जाता है, उनके विरोधी भी पीटते हैं, पर उनके विचारों, विचारधारा पर कोई बात नहीं होती, बल्कि उसे और दबाया, बरगलाया जाता है ) ।

हम इसी में लगे रहे, और बाकी दुनिया ने इसी ज्ञान और परंपरा को अपने में समेटते हुए, उससे लाभांवित होते हुए इसे आगे बढ़ाया और वैज्ञानिक प्रगतियां दर्ज़ की। हम ज़ीरो-ज़ीरो गाते रहे, और उन्होंने इस ज़ीरो का सदुपयोग करते हुए पूरी मानवजाति को कई अनोखी चीज़ों से भर दिया।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 24 नवंबर 2012

इतिहास की धाराओं को परखना होगा

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



इतिहास की धाराओं को परखना होगा

अब बात धर्मपाल और उनके इतिहास की....राजीव दीक्षित ने इनका जिक्र अपने व्याख्यानों में किया है...25-30 साल तक इन्होंने इस काम पर मेहनत की है, दुनिया के कई देशों के पुस्तकालय आदि छाने...मैंन इन पर संदेह किया...जिस स्रोत को बताया गया है और किताब लिखी गई है, वहाँ मैंने सब देख लिया कि लेखक सही बता रहा है...

इतिहास पर लिखने वालों की गज़ब भरमार है। कई धाराएं यहां काम कर रही हैं। कुछ लोग गंभीर काम कर रहे हैं, वे निरपेक्षता, वस्तुगतता के साथ वैज्ञानिक पद्धतियों से अपने इतिहास की पुनर्रचना में लगे हुए हैं, कुछ लोग नस्लीय आर्य श्रेष्ठता के चश्में से भारत को समूची मानवजाति का मूल सिद्ध करने की रणनीति के तहत इतिहास की मनमानी व्याख्याएं करने में लगे हैं, कुछ श्रेष्ठताबोध तलाशते हुए अतीत से इस श्रेष्ठताबोध को तुष्ट करने लायक सामग्री निकाल रहे हैं, सीमित, अधूरी, एकतरफा विवेचना कर रहे हैं, कुछ पुराणों, महाकाव्यों और मिथकों को ही इतिहास समझने और समझाने में लगें हैं।

सभी काम कर रहे हैं, महनत कर रहे हैं, लाखों पृष्ठ काले कर रहे हैं। ऐसे में सभी स्वतंत्र है, जिसको जो अपनी मानसिकता, अपनी राजनीति, अपने हितों के अनूकूल लगता है उसे उठा रहा है और उसका उपयोग कर रहा है।

राजीव दीक्षित को अपने उद्देश्यों के लिए धर्मपाल उचित जान पड़ते हैं, तो वह उनका संदर्भ लेते हैं, उन्हें चुन लेते हैं। इस चुनाव को श्रेष्ठ और समुचित बताने का प्रक्रम तो करना ही होता है। वैसे मेहनत तो करनी ही होती है, कुछ भी रचना हो। कुछ लोग जानबूझकर बदमाशी करते हैं, कुछ अपनी मानसिकता और मान्यताओं के प्रति कोरी भावुकता में अपना जीवन भी होम कर ही देते हैं। बिना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के, बिना उस वैज्ञानिक-विषय के प्रति ईमानदारी के, बिना सार्विक वैज्ञानिक पद्धतियां अपनाए, कुछ महत्त्वपूर्ण नहीं रचा सकता, चीज़ों को सही और वस्तुगत रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता।

तथ्यों का संदर्भ सही हो सकता है, परंतु बात उनकी व्याख्याओं की, इन व्याख्याओं में काम में लिये गए दृष्टिकोण और उनकी दबी-छिपी उद्देश्यपरकता की है, इनके पीछे की आत्मपरकताओं की है। कोई भी, पहले से ही कुछ मन में ठाने, पूर्वाग्रहों को चित्त में समाए, कोई हित या उद्देश्य सामने रख कर जब किसी अनुसंधान में उतरता है, तो उसके निष्कर्ष भी जाहिर है, इसी तरह के होंगे।

धर्मपाल जी की महनत अपनी जगह है, पर उनकी आंखों पर चढ़ा हुआ श्रेष्ठताबोध और राष्ट्रवादी आत्मपरकता का मुलम्मा अपनी जगह ही है। और इसीलिए वे कम महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। वे राजीव दीक्षित जी के लिए काम के हो सकते हैं, दक्षिणपंथियों, अंधराष्ट्रवादियों के काम के हो सकते हैं, विकीपीडिया पर डाले जा सकते हैं, परंतु इतिहास पर हो रहे गंभीर और वैज्ञानिक शोध और अध्ययन में इनका कोई स्थान हमें अभी तक तो नज़र नहीं आया है। इन्हें वहां संदर्भित होने का मौका भी नहीं मिलता। ऐसा नहीं है कि मंड़न और खंड़न की प्रक्रियाओं में वाद-विवादों, मत-मतांतरों में ये धाराएं एक दूसरे का संदर्भ नहीं देती हैं, हमारा कहने का मतलब यह है कि इनके काम की भागीदारी तो वहां इस वाद-विवाद के लिए भी नहीं दिखती है। वहां पर दूसरे कई इसी मानसिकता के लेखक हैं, जिनके काम को इस लायक तो समझा जाता है कि जिनका खंड़न के प्रयास किये जाते हैं।

यह हमने अपनी जानकारियां ऐसे ही पेश करदी हैं, आप ख़ुद अपने शोध जारी रखे हुए ही हैं। अपनी मान्यताएं बनाना, बिगाड़ना, गलत मानना, सही मानना, अपने दृष्टिकोण को तय करना आपका अधिकार है। आप ही अपने लिए, इसे भली-भांति कर सकते हैं।

एक किताब है 'भारतीय चित्त, मानस और काल' धर्मपाल की ही है...किताब में जिन विषयों के संस्कृत विद्यालयों में पढ़ाने की बात की है, उसमें आवश्यक और तकनीकी विषय हैं। जैसे....

ये विषय ठीक ही लग रहे हैं, तथ्यात्मकता के नज़रिए से। उस समय की भारतीय तकनीकी प्रगति के सापेक्ष ही हैं। पत्त्थर और लकड़िया काटने वाले, लौह और अन्य धातुकर्म करने वाले, धागा कातने और बुनने वाले, चूडियां मनके बनाने वाले, नमक बनाने वाले, बारूद पर काम करने वाले, साबुन बनाने वाले, नाव बनाने वाले, मछलियां पकड़ने वाले, धोबी, खाती, जूते बनाने वाले, दर्ज़ी आदि-आदि। ये तकनीकी काम हैं, और उस समय की तात्कालीन जीवनचर्या से जुडे हुए ही लगते हैं। इनमें पता नहीं आप क्या विशेष देख रहे हैं। इसमें गढ़ने लायक कुछ नहीं लग रहा, अब बात यह है कि इनको कोई भी कैसे व्याख्यायित करता है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 17 नवंबर 2012

अतार्किक आधारों से तार्किक पुनर्रचना संभव नहीं

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।




अतार्किक आधारों से तार्किक पुनर्रचना संभव नहीं

विकासवाद के आधार पर सोचें तो हम अपनी भाषा के लिए क्यों लड़ते हैं कि विदेशी भाषा हम नहीं थोपेंगे।....तो क्या हम पश्चिमी प्रभाव में मैकाले को सही ठहरा दें? अगर इन चीजों के लिए राष्ट्रवाद शब्द इस्तेमाल करता है तो बुरा क्या है?

मैकाले की शिक्षापद्धति की एक प्रवृति अंग्रेजों के लिए क्लर्क पैदा करने के लिए लक्षित थी। यह एक वास्तविकता है, किसी भी प्रभाव से देखें। मैकाले से मुक्ति पाने, और शिक्षा-पद्धतियों को स्वतंत्रचेता वैज्ञानिक मस्तिष्क पैदा करने की ओर लक्षित होना चाहिए। पर जैसा कि पहले था, सत्ता अपने आपको बनाए रखने के लिए गुलाम मानसिकता और मस्तिष्क ही पैदा करते रहना चाहती है, अभी भी वही है, आज की सामंती मानसिकता वाली पूंजीवादी सत्ताएं भी यही चाहती हैं। स्वतंत्रचेता मस्तिष्क उनकी सत्ताओं को उखाड़ फैंकने के लिए लामबंद हो सकते हैं। इसलिए वे उन्हीं उपविवेशवादी, साम्राज्यवादी पद्धतियों को बनाए रखना चाहते हैं। समाज में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही नहीं चाहते।

इसका मतलब यह कि सत्ता-व्यवस्था में परिवर्तन लाए बिना, एक ऐसी जनपक्षधर सत्ता के अस्तित्व में आए बिना इन राजनैतिक और सामाजिक आमूल-चूल परिवर्तनों को वाकई में कर पाना संभव नहीं है। पूरी व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन अपेक्षित है।

पश्चिमी प्रभाव का मतलब, क्या साम्राज्यवादी मानसिकता में ही देखा जाना चाहिए। हमारे वर्तमान का अधिकतर पश्चिमी वैज्ञानिक और वस्तुगत दृष्टिकोण की ही देन है। जरूरत इसके उपनिवेशवादी तथा साम्राज्यवादी रवैये को बाहर निकालने की, गुलाम मानसिकता पैदा करने वाली पद्धतियों से मुक्ति पाने की है। समग्र को ही पश्चिमी प्रभाव कहकर नकारा नहीं जा सकता।

आप कल्पना कीजिए, लोकतांत्रिक समानता स्वतंत्रता के मूल्यों को, तकनीकी-वैज्ञानिक विकास को, रूढ़ियो और परंपराओं के विरोध को, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों आदि को निकाल फैंकिए, हम हज़ारों साल पहले वाली सामंतवादी सामाजिक संरचना में पहुंच जाएंगे, जहां धर्म-आधारित बर्बर राज्य अस्तित्व में थे, वर्ण-व्यवस्था अपने चरम पर थी, छुआछूत और अस्पृश्यता का बोलबाला था, जीवनीय और चिकित्सीय पद्धतियां अविकसित थीं, आदि-आदि।

गर्व नहीं करने पग-पग पर लोगों में हीनता की भावना आ सकती है और इस तरह की भावनाओं ने ही तो देश की आजादी में लाखों लोग झोंक कर शहीद हुए और महान कहलाये।

यह कोई बेहतर तर्क नहीं है, हीनता की भावना को कम करने या रोकने के लिए कोई भी समाज या व्यक्ति अपने लिए श्रेष्ठताबोध के अवास्तविक आधार स्थापित करले। ऐसे अतार्किक. असत्य,और असहज श्रेष्ठताबोध से हम किस तरह से समाज की एक तार्किक, सहज और वास्तविक पुनर्रचना कर सकते हैं।

इसीलिए हमने कहा था कि इतिहास और परंपरा के वस्तुगत और निरपेक्ष अध्ययन के पश्चात, वास्तविकताओं से दोचार होने के बावज़ूद हमारे पास ऐसी कई चीज़ें बचेंगी जो हमें एक वास्तविक गर्व का बोध देने वाली होंगी। नहीं भी हो, तो ना हो, क्या श्रेष्ठ को ही एक सम्माननीय जीवन जीने का अधिकार मिलेगा। हम श्रेष्ठता की उत्तरजीविता के प्राकृतिक सिद्धांतों को अपनाएंगे या मानवसमाज के मानवीय मूल्यों के आधार पर हर किसी को सम्मान से जीने के अवसर उपलब्ध कराना चाहते हैं।

हमारे श्रेष्ठ होने से य़ा नहीं होने से, हमारी अस्मिता, हमारे सम्मानपूर्ण जीवन, हमारी समानता और स्वतंत्रता के हमारे अधिकार कहीं कम या ज़्यादा नहीं हो सकते। हमारी ही क्या, पूरे विश्व में भी किसी भी देश, समाज या समूह के भी नहीं हो सकते। सभी मानवो को ये अधिकार हैं, और उन्हें पाना सभी का कर्तव्य। इसलिए इस संघर्ष को जातीय, भाषिक, धार्मिक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय श्रेष्ठताबोधों की सीमाओं से मुक्त होना ही होगा जो मानव-मानव में विरोध, अंतर्विरोध और अलगाव पैदा करते हैं। राष्ट्रीय सीमाओं में जातीय, भाषिक, धार्मिक, क्षेत्रीय आदि श्रेष्ठताबोधों से और अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं में राष्ट्रीय श्रेष्ठताबोधों से निजात पानी होगी।

हमारी इसी राष्ट्रीय चेतना का विकास, अंग्रेजों के उपनिवेश के विरोध और उससे मुक्ति पाने की प्रक्रियाओं में हुआ। स्वतंत्रता आंदोलन में पूरे राष्ट्र को इन विरोधों से उठाकर एक राष्ट्रीय चेतना के अंतर्गत लाना जरूरी था। इस राष्ट्रीय चेतना का भी क्रमिक विकास हुआ था। वहां भी कई अलग-अलग धाराएं अस्तित्व में आई थीं, अलग-अलग भी बची रही और उनका समन्वय भी हुआ। शुरुआत धार्मिक मुद्दों के आसपास हुई तो अंततः धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय चेतना का भी निर्माण भी हुआ।

इसके लिए कई तरह की अवास्तविक श्रेष्ठताबोधों की रचना भी की गई। इन-सबके सह-अस्तित्व के साथ तात्कालीन परिस्थितियों में इनके अंतर्विरोध भी चलते रहे। धार्मिक राष्ट्रीय चेतना के द्विध्रुवीय उभार के कारण ही देश का विभाजन भी ऐतिहासिक सत्य बना। भाषाई राष्ट्रीय चेतना के अंतर्विरोध दक्षिण में हिंदी-विरोधी आंदोलनों में देखने को मिले।

लाखों लोग शहीद हुए, आज़ादी मिली। अवास्तविक आधारों पर मिली आज़ादी कितनी अवास्तविक थी, यह अब काफ़ी लोगों को समझ में आ रहा है। तो हमें वास्तविक श्रेष्ठताबोधों और मानवीय मूल्यों के आधारों वाली राष्ट्रीय चेतना की परंपरा को समझना चाहिए, ( क्रांतिकारी समूहों में विकसित हुई समझदारी को देखना चाहिए, जिनकी परिणति भगतसिंह के यहां देखी जा सकती है ), उनकी परंपरा से जुडना चाहिए, उसका और विकास करना चाहिए, और अधूरे लक्ष्यों यथा मानव द्वारा मानव के शोषण और राष्ट्र द्वारा राष्ट्र के शोषण से मुक्ति के लक्ष्यों से अपने आपको जोड़ना चाहिए।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 10 नवंबर 2012

ज्ञान का मामला पूर्वी-पश्चिमी नहीं होता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



ज्ञान का मामला पूर्वी-पश्चिमी नहीं होता

लेकिन क्या कणाद, आर्यभट्ट, भास्कर, सुश्रुत, चरक आदि के ग्रन्थ को बेकार मान लें। डार्विन पश्चिम के हैं तो क्या हम पश्चिम को ही ज्ञान-विज्ञान का मूल मान लें। मेरे पास एक किताब है विज्ञान का इतिहास....उसमें लिखा है कि आज के सर्जरी के उपकरण सुश्रुत से बहुत मिलते हैं। ....तो जो लोग एलोपैथी और आयुर्वेद में आयुर्वेद या स्वदेशी चिकित्सा का पक्ष ले रहे हैं, वे सब अवैज्ञानिक हैं?

समय के किसी भी कालखंड में, ज्ञान का विकास, प्राचीन ज्ञान और अनुभव के आधारों पर ही क्रमिक रूप में हुआ करता है। अचानक कहीं भी, कुछ भी नहीं टपक जाया करता। गलत सिद्ध हुई चीज़ें पीछे छूट जाया करती हैं, और वस्तुगत प्राचीन अनुभवों पर ही, उन्हें समेटते हुए ही आगे का ज्ञान विकसित होता रहता है।

ज्ञान की राह में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, कि कौन कहां का है। ज्ञान का, सत्य की राह का, सोच का मामला पूर्वी-पश्चिमी नहीं होता, यह पूरी मानवजाति की थाति होता है। गलत हर जगह गलत ही होना चाहिए, सही सही, यह हम कहें या कोई और कहे। काम की चीज़ें, तकनीक, विज्ञान क्षेत्र और अन्य सीमाओं को लांघता हुआ प्राचीन समय से ही संपर्कशील सभ्यताओं में फैलता रहा था, और आज भी फैलता ही है। ज्ञान की राह मानवीय मूल्यों को और ऊंचा उठाने की दिशा के लिए ही अभिप्रेरित होती है, होनी चाहिए।

प्राचीन ज्ञान और तकनीक की अपनी कालगत सीमाएं होती हैं, परंतु उसी कालगत उपलब्धियों के आधार पर उन्हें यथोचित सम्मान दिया भी जाता है, परंतु विकास आगे बढ़ता ही है। पूरे विज्ञान का विकास इन्हीं प्राचीन आधरों पर हुआ है। जैसे कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और तकनीक का विकास, पूरे विश्व की प्राचीन चिकित्सा परंपराओं जिनमें की आयुर्वेदिक, यूनानी, चीनी आदि सभी शामिल हैं, में से ही हुआ है।

अब यह तो नहीं हो सकता ना कि हम इस पूरी मानवजाति के अद्यतन ज्ञान और तकनीक के विकास को छोड़कर, जिनमें कि अधिकतर पश्चिमी-वश्चिमी है, बाहर का है, अपनी हज़ारों साल पहले की अवस्थाओं में पहुंच जाएं।


भारत में संस्कृत भाषा और नागरी लिपि का विकास ऐसे और क्यों हुआ। क्यो अभी तक की श्रेष्ठ और अत्यंत सक्षम लिपि वही है। आखिर मानव विकास में सब देश साथ रहे तब भारत में इस लिपि का, दशमलव का, शून्य का आविष्कार होना क्या बतलाता है। यहाँ उद्देश्य यह कहना नहीं है भारत श्रेष्ठ है लेकिन इन चीजों का आविष्कार भारत में ही किस वजह से हुआ। अगर भारत के लोग इन चीजों पर गर्व करते हैं तो क्या गलत है? गणित में मध्यकाल तक भारत आगे किस वजह से रहा? अगर कोई आदमी अलौकिक चीजों की बात करे तो गप्प मानेंगे लेकिन अगर भौतिक उपलब्धियों को तलाशे तो बुरा क्या है?

भाषा पर आपको अध्ययन करना चाहिए, इसके भाषावैज्ञानिक इतिहास का अध्ययन करना चाहिए। तभी वस्तुगत स्थिति पता चल सकती है, वरना कोई हर्ज नहीं है कि हम अपने श्रेष्ठताबोध के लिए कुछ भी श्रेष्ठ मानले और मस्त रहें। कई विकास पारिस्थितिक वज़हों से सांयोगिक और अनुपम होते हैं। भाषाविज्ञान बताता है कि मध्य एशिया में एक प्राचीन भारोपीय भाषा से ही, प्राचीन भारानी ( भारतीय-ईरानी ) अलग हुई, और फिर इससे भार्य ( भारतीय आर्य ) अलग हुई जिससे ही वैदिक संस्कृत विकसित हुई। तत्पश्चात इसी वैदिक संस्कृत से, लौकिक संस्कृत की उत्पत्ति। और यह भी कि इसने बाद में स्थानीय रूप से विकसित हुई देवनागरी लिपी को अपनाया, जिसमें ही कि उस वक़्त की यहां कि कई भाषाओं को लिपीबद्ध किया गया और उसका विकास किया गया।

मानव विकास में सभी क्षेत्र साथ रहे, यह कहना ठीक नहीं है। कई धाराएं बिल्कुल ही कट गई, कई धाराएं पारिस्थितिक सांयोगिक विकास करती रहीं, कई धाराओं में आपसी समन्वय से यह गति तेज़ हुई, और कहीं पारिस्थितिक संयोगों की ही वज़ह से ही यह अवरुद्ध भी हुई।

दशमलव और शून्य का अविष्कार बतलाता है, कि उस समय यहां की गणित और खगोलीय लौकिक ज्ञान की तकनीक पद्धतियां विकास की अवस्थाओं में सापेक्षतः आगे थीं, और उनकी तात्कालिक जरूरतों ने इन और ऐसे ही कई अन्य अविष्कारों को संभव बनाया। बाद में यह प्रक्रिया बाधित हो गई, और इस लौकिक ज्ञान की परंपराओं और धाराओं पर, काल्पनिक, अलौकिक तथा आध्यात्मिक चिंतन और ज्ञान हावी हो गया। आपको इस पर वस्तुगत दृष्टिकोण से युक्त किताबों का अध्ययन करना चाहिए।

तो यह भी किया जा सकता है, कि अपने पिछड़े होने की वास्तविकता से उपजे हीनता बोध की तुष्टि के लिए, अतीत से, इतिहास से श्रेष्ठताबोध पैदा करने वाली चीज़ें तलाशी जा सकती हैं, उनका ढोल पीटते रहा जा सकता है, उनका फायदा उठाकर, भावनाओं का मुद्दा बना कर अपनी रोटियां सैंकी जा सकती हैं, कूपमड़ूक रहते हुए अपने आपको एक कट्टरपंथी रूढ़ समाज में तब्दील किया जा सकता है। दूसरी ओर यह भी किया जा सकता है कि अपनी परंपराओं और अतीत का निरपेक्ष मूल्यांकन करते हुए, लुप्त या बाधित हुई लौकिक ज्ञान की धाराओं से अपने आपको जोड़ते हुए, वैश्विक रूप से मानवजाति के अद्यतन ज्ञान और विज्ञान के सापेक्ष इसे तौलते हुए, उन्हें काम में लेते हुए, उनके साथ चलते हुए अपने-आपको वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपृक्त करते हुए विकास की दौड में अपने आपको भी शामिल किया जा सकता है। अपनी इसी, जैसी भी है, वास्तविक समरस राष्ट्रीय चेतना को उभारकर, अपने संसाधनों पर अपने आपको आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है, समानता और शोषणरहित समाज की स्थापना के लिए एकजुट हुआ जा सकता है।

आपको यदि देवीप्रसाद चट्टोपध्याय की पुस्तकें, ‘लोकायत’, ‘भारतीय दर्शन में क्या जीवंत है और क्या मृत’ और ‘प्राचीन भारत में विज्ञान और समाज’ कहीं से उपलब्ध हो जाएं तो जरूर पढ़नी चाहिएं। आपको एक सटीक दृष्टि मिलने में मदद होगी।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 3 नवंबर 2012

चीज़ों को उनकी वस्तुगतता में समझना चाहिए

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।



आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



चीज़ों को उनकी वस्तुगतता में समझना चाहिए

क्या यह सही है कि भारतीय इतिहास को अंग्रेजों ने विकृत किया है या करवाया है? यह संदेहास्पद नहीं लगता। मैंने जिस किताब का लिंक आपको भेजा था उसमें कहा गया है कि आर्य बाहर से नहीं आए। वैसे मेरी दिलचस्पी अधिक क्या कम भी इसमें नहीं है कि आर्य बाहर से आए या नहीं क्योंकि इसका असर अब नही पड़ता।

शुरुआती तौर पर इतिहास को इतिहास की तरह लिखने का काम अंग्रेजों के प्रयत्नों से ही संभव हुआ, यह एक वास्तविक तथ्य है। वे शासक थे, और हर सत्ताधारी, प्रभुत्व संपन्न वर्ग की तरह अपनी सत्ता और प्रभुत्व बनाए रखने के लिए उन्होंने ने भी अपने आधिकारिक पुनर्लेखन में अपने हितों के चश्में से चीज़ों को व्याख्यायित करने की कोशिश की, कई जगहों पर वे सफ़ल भी हुए। परंतु ज्ञान अपनी एक अलग राह भी चला करता है, उनके कई मनोनयन किए गये वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले विद्वान, विशेषज्ञ यहां की प्राचीन चीज़ों का अध्ययन करते हुए, वैज्ञानिकता से दगा नहीं कर पाए और उन्होंने भारत में इतिहास को वस्तुपरकता के साथ देखे जाने की परंपरा की भी नींव डाली। उन्होंने कई संस्कृत के कई विशेषज्ञ विद्वान पैदा कर दिये, जो कि वैश्विक स्तर पर प्राचीन महत्त्व की सामग्री के आधारों पर मानवजाति के विकास का अध्ययन कर रही परंपरा से अपने को जोड़ते थे, जो कि विज्ञान की तरह ही वस्तुगत दृष्टिकोण के अनुसार थे।

अब आपकी दिलचस्पी है ही नहीं तो फिर आर्यों वाली बात पर लगता है कुछ कहने की जरूरत नहीं है। आपका यह कहना सही है कि अब इसका असर नहीं ही पड़ना चाहिए।

ईसाई धर्म आज दुनिया के लगभग सभी देशों में है। क्या वह स्वत: फैल गया? या उसे फैलाया गया। एक किताब है धर्मपाल जी की जिसमें ब्रिटिश संसद में 1813 में चल रहे बहस को बताया गया है कि भारत को ईसाई कैसे बनाया जाय? क्या अंग्रेजों के शोषणवादी और साम्राज्यवादी वृत्ति को देखते हुए इसे सच नहीं माना जा सकता है? मेरा इतिहास ज्ञान न के बराबर है लेकिन ये सवाल हैं। और इन्हें निष्पक्ष होकर हल करना है।

आपकी ऊपर वाली बात को यहां भी आप रख सकते हैं कि अब इससे क्या असर पड़ता है। कुछ भी हुआ हो। अभी क्या चल रहा है, उसे ही देखना चाहिए। यह खूब है कि जो चीज़ वक़्ती तौर पर हमारे श्रेष्ठताबोध के घटाघोपों के लिए मुफ़ीद लग रही हो उसे हमें निष्पक्ष होकर हल करना चाहिए और जो बात हमारी पूरी कहानी को ही उलट सकती हो उसके लिए हम कह दें उसे छोडिए उसका असर अब नहीं पड़ता। यह ठीक पद्धति नहीं होती। हमें वह दृष्टिकोण और पद्धति विकसित करनी चाहिए जिससे कि हम सभी चीज़ों को उनकी वस्तुगतता और निरपेक्षता में देख और समझ सकें।

चलिए इसे भी छोडते हैं, फिर भी इतना तो कहा जा सकता है कि विजेता के साथ उसके विश्वास, उसकी संस्कृति, उसकी भाषा, उसका धर्म भी आता है, सहज रूप से भी, और योजनागत रूप से भी। आर्थिक और राजनैतिक प्रक्रियाएं सहज रूप से भी संस्कृतियों का संक्रमण और समन्वय करती हैं और जबरन रूप से भी। सत्ता की सभी तरह की घटक शक्तियां अपना-अपना काम कर रही होती हैं। सभी साम्राज्यवादी वृत्तियां ऐसी ही होती हैं। मुख्यतया इतिहास की चालक शक्ति आर्थिक कारक हुआ करते हैं, इस तथ्य को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।

पंचायत व्यवस्था पर धर्मपाल जी की एक किताब है जिसमें मद्रास में 1830 के आस-पास की पंचायत व्यवस्था का जिक्र किया गया है। उनकी एक किताब है विज्ञान और तकनीक पर। उसमें एस्ट्रोफ़िज़िक्स पढ़ाने की बात लिखी है 1820-30 के आस-पास। क्या ये सब गलत मान लिए जाएँ। एक किताब है ब्यूटीफ़ुल ट्री जिसमें भारत में 1820 के आस-पास की शिक्षा पर पूरी रिपोर्ट तक दी गयी है। तो क्या ये सब धार्मिक कारणों से है?

एस्ट्रोफिजिक्स क्या होती है, हमें नहीं मालूम। १८२०-३० के आसपास के समय को पता नहीं आप किस नज़रिए से देख रहे हैं। उस वक़्त भारत में राजाराममोहन राय जैसे कई अन्य महानुभाव सक्रिय थे, जिन्हें सामाजिक सुधारों और शिक्षा पर किये अपने रूढ़ीविरोधी कामों के लिए ही जाना जाता है। विज्ञान और तकनीक का काफ़ी विकास हो चुका था, भौतिकी पर काफ़ी कुछ कार्य न्यूटन १६९० तक कर चुके थे, १७८९ में ही फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति हो चुकी थी यानि राजतंत्र का उन्मूलन और गणतंत्र की स्थापना हो चुकी थी, लोकतांत्रिक मूल्यों, स्वतंत्रता और समानता के मूल्यों की घोषणा हो चुकी थी। ये विचार पूरे विश्व में फैल रहे थे। डार्विन और मोर्गन अपने अध्ययनों और शोध में व्यस्त थे, जिन्होंने हुछ ही वर्षों बाद, डार्विन ने जैविक क्रम विकास की अवधारणा को और मॉर्गन ने सामाजिक क्रम-विकास की अपनी अवधारणा को सामने रखा।

आपका मंतव्य स्पष्ट नहीं हुआ। उपरोक्त तथ्य, जिनके सच ही होने की संभावनाएं ही अधिक है, और धार्मिक कारणों के बीच आप क्या अंतर्संबध देखना चाहते हैं।

आपने राममोहन राय का नाम लिया है। उनके सुधार निश्चित ही महत्व के और प्रशंसनीय रहे है।.............अब यह कैसे शुरु हुई और क्यों शुरु हुई, यह शोध और अध्ययन का विषय है।

राजाराममोहन राय का नाम सिर्फ़ उस समय की समकालिकता दर्शाने की वज़ह से लिया गया था। उन पर बहस करना मंतव्य नहीं था। यह सिर्फ़ यह दर्शाने के लिए था कि वह काफ़ी आधुनिक समय था, और काफ़ी कुछ प्रगतिशील घट रहा था, भारत में भी और पूरी दुनिया में भी। वैसे यह जरूर कहना चाहेंगे, कि किसी भी व्यक्ति या विचार को उसके समय के सापेक्ष ही बेहतरी से समझा जा सकता है। सती प्रथा पर जो आपने कहा है, उससे लगता है कि आपको अभी भारतीय समाज संरचना के बारे में काफ़ी कुछ जानना है। काफ़ी शोध और अध्ययन किये जा चुके हैं, आपकी पहुंच धीरे-धीरे हो जाएगी उन तक। यह आपके लिए खोजने और जानने का विषय जरूर है।

भरद्वाज का लिखा विमानशास्त्र वैमानिकी का ग्रंथ है।....इसे सच या उपयोगी मानना अलग बात है। ....जब यह विषय संस्कृत में लिखा जा सकता है तब आज हम हिन्दी में क्यों नही पढ़ा सकते।

हिंदी में कोई भी विषय पढ़ाया जा सकता है, हिंदी में ही क्या किसी भी भाषा में पढ़ाया जा सकता है। अगर किसी भी भाषा की वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली सीमाएं सामने आती हैं, तो नये व्युत्पन्न शब्द गढ़े जा सकते हैं, कई शब्दों को जैसे का तैसा लिया जा सकता है। ज्ञान को तो मनुष्य के पास उसकी मातृभाषा में ही समन्वित करके पहुंचना चाहिए। विशिष्ट और गहरे शोधों के लिए मूल भाषाओं का प्रयोग और उनमें दक्षता हासिल की जा सकती है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

आधारभूत जानकारी होना आवश्यक है

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



आधारभूत जानकारी होना आवश्यक है


लेकिन अगर सभी में विद्रोह कभी पैदा होता है, खासकर भारत में तब हमारा देश ऐसा क्यों है?

क्योंकि परम्पराओं से विद्रोह के इस अंकुर के पास सैद्धांतिक व्यापकता नहीं होती। समझ नहीं होती। वैकल्पिक अवधारणाएं नहीं होती। यह कूपमंडूकता वैयक्तिकता में ही उलझकर रह जाती और व्यापक सामाजिक परिवर्तनों की आकांक्षा से नाभीनालबद्ध नहीं हो पाती। कमजोर वैयक्तिक प्रयास, मजबूत सामाजिक-राजनैतिक संरचनाओं से टकरा-टकरा कर दम तोड देते हैं।

इतना तो मैं भी मानता हूँ कि गणित में भारत बहुत आगे रहा है और मैं मानता हूँ कि गुलामी ने विकसित नहीं होने दिया क्योंकि सभी गणित की खोजें 1000 के पहले हुई हैं। गुलामी स्वतंत्रता में बाधक और प्रगति में बाधक है, इससे कौन इनकार करेगा? फिर हम पश्चिम की बात अधिक क्यों करते हैं।

विषयगत रूप से कितना आगे रहा है, और वस्तुगतता क्या थी, इसका अध्ययन करना चाहिए। एक समय में यहां की तकनीकी और शुरुआती वैज्ञानिक प्रगति की स्थिति सापेक्षतः काफ़ी बेहतर थी। भौतिकवादी धारा के अंतर्गत लोकायत-चार्वाक दर्शन का विकास भी हो रहा था और चिकित्सा में भी काफ़ी प्रगति यहां की मेधाएं कर रही थीं। नालंदा विश्वविद्यालय का उत्कर्ष था, और शैक्षिक तौर पर भी काफ़ी वैज्ञानिक और तकनीकी विषयों पर काम हो रहा था। यह परवर्ती बुद्धकालीन समय था। फिर विकास बाधित हुआ, यह भी एक कड़ुवा सत्य है। इसके कारणों की पड़ताल का अध्ययन भी करना होगा, समझना होगा। गुलामी की जो अवधारणा हमारे दिमाग़ में है, क्या वैसे हालात तब तक पैदा हो गये थे या नहीं हुए थे ये भी जानना होगा।

अगर नहीं हुए थे, तो फिर और क्या कारण रहे थे जिनके चलते भौतिक-वैज्ञानिक ज्ञान की प्रगति बाधित हुई, और भारत में धार्मिक-आध्यात्मिक चिंतन की काल्पनिक ऊंचाइयां परवान चढ़ी। इन सबके सापेक्ष पश्चिम में क्या चल रहा था? उसका स्तर क्या था? वहां धर्म-चिंतन और विज्ञान के क्षेत्र में क्या चल रहा था? इन सवालों से जूझने के दौरान ही हम समझ पाएंगे कि पश्चिम की बात का मामला क्या है?

कुछ इतिहास और दर्शन-विषयक पुस्तकों से आपको माथापच्ची करनी चाहिए। यह ध्यान में रखें कि इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाले महानुभावों की पुस्तकें प्राप्त करने की कोशिश करें।  इतिहास और दर्शन को वस्तुपरकता के साथ समझना एक लंबे समय का अध्ययन-मनन उद्यम है। यह इसलिए भी कि यहां काफ़ी घालमेल है, कम तथ्यों से इतिहास की पुनर्रचना करना कष्टसाध्य काम है। इसके विद्वानों के लिए भी, और अध्येताओं के लिए भी।

मेरी समझ में डार्विन का क्रमविकास कम या नहीं के बराबर आता है लेकिन मैं इसे स्वीकार करता हूँ जैसे हवाई जहाज या सापेक्षता के सिद्धान्त को बिना समझे मानता हूँ। क्योंकि यह सम्भव नहीं कि एक मानव अब इतने अधिक और विस्तृत ज्ञान और आविष्कारों की समझ अकेले रख सके और इन बातों के सबूत पर विश्वास कर सके। क्योंकि अब अरस्तू का समय नहीं है कि उपलब्ध जानकारी बहुत कम हो।

कुछ चीज़ों के लिए आपकी बात वाज़िब है, हर जटिल विषयगत वैज्ञानिक सिद्धांतों में विस्तार से पारंगत होना संभव नहीं है। परंतु जितना हो सके, विभिन्न विषयों पर आधारभूत जानकारी होना आवश्यक है, इतना तो हो ही कि कम-से-कम हम उनके अंतर्संबंधों और अपने विश्लेषणों में उन्हें काम में लाने की संभावनाएं पैदा कर सके। बाकी विस्तार से जब भी जरूरत हो, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले विशेषज्ञों के कार्यों और सिद्धांतों से संदर्भ प्राप्त किये जा सकते हैं, पर इसके लिए भी इतनी जानकारी प्राप्त करना तो आवश्यक होगा ही कि हमें इनके बारे में पता हो।

कुछ मूलभूत सिद्धांतो के बारे में तो समझ विकसित करनी ही होगी, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो विकसित करना ही होगा, कि किसे माना जाना चाहिए और किसे छोड देना चाहिए। अन्यथा इस मानने में और भाववादी दर्शन जैसे ईश्वर, आत्मा को मानने में कोई अंतर नहीं रह जाता। नये ज्ञान और सूचनाओं को, नई विचारधाराओं को भी हम वैसे ही ओढ़ सकते हैं जैसे कि धर्म और पुरानी विचारधाराओं को ओढ़ा हुआ रहता है और व्यावहारिक क्रियाविधियां हमारी वैसी ही बनी रहती है।



इस बार इतना ही।

आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

गर्व करने वाली मानसिकता

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



गर्व करने वाली मानसिकता

क्या आप मानते हैं कि भारतीय मस्तिष्क पहले ही इतना विकसित था? आखिर नास्तिक दर्शन भी भारत में ही पहले पैदा हुआ था, क्यों? भारत पुराने देशों में से है और जीवित भी है, वजह क्या है? जवाब मेल से देने का कष्ट करेंगे।

इस सवाल में से उसी अंधराष्ट्रीयवाद की गंध आ रही है, जो क्षेत्रीय, जातीय, धार्मिक, नस्लीय श्रेष्ठता की वकालत करते हैं। भारत नाम की राष्ट्रीयता आधुनिक काल की देन है, और इस क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक उपलब्धियां काफ़ी प्राचीन। यह कई तरह के नस्लीय, जातीय, संस्कृतियों के आवागमन, सम्मिलन, मिश्रण और विकास से संबंधित है।

मानवजाति का विकास, मानव मस्तिष्क का विकास सार्वभौमिक आदानप्रदान और सक्रियता का परिणाम है, जो मुख्यधारा में बने रहे। मुख्यधारा से विलगित, कई आदिवासी समुदायों के सीमित विकास को अभी भी यहीं एक साथ देखा जा सकता है। इसके अलावा मुख्यधारा में ही विभिन्न वर्गों के असमान विकास को भी आसानी से लक्षित किया जा सकता है।

एक जैसी परिस्थितियों ने लगभग एक जैसे ही प्राचीन विश्वास और मान्यताएं पैदा की, और सापेक्षतः अलग परिस्थितियों ने उनमें स्थानीयता का अंतर भी पैदा किया। कमोबेश लगभग आगे-पीछे ही, एक-दूसरों से प्रभावित होते हुए ही दर्शन, विचारधाराओं का विकास हुआ है। इसके लिए हमें मानवजाति की व्यापकता को, उसके इतिहास को, धर्म और दर्शन के इतिहास को वैश्विक व्यापकता और सापेक्षता के साथ पढ़ना और समझना होगा। और भारतीय दर्शन और इतिहास को भी वैश्विक सापेक्षता के साथ देखना और समझना होगा। आपके सवाल इसी जरूरत की आवश्यकता को प्रतिबिंबित कर रहे हैं।

यह सवाल काफ़ी व्यापक परिप्रेक्ष्य को समेटे हुए है। आपको इस संदर्भ में सवालों को थोड़ा विशेष विषयगत करना होगा, ताकि हमें इशारे करने में आसानी होगी।

आपने मेरे सवाल में अंधराष्ट्रवाद की गंध महसूस की है। अभी कल ही आपकी एक पोस्ट पर मैंने नास्तिकता को लेकर शायद रामसेतु मुद्दे पर देखा कि आपने कहा है कि हमारे पास गर्व करने लायक बहुत कुछ होगा। ऐसा तो कहा है आपने, पूछा जा सकता है क्यों?

आपकी इस तात्कालिक प्रतिक्रिया में सिर्फ़ एक प्रतिप्रश्न लक्षित कर पाया हूं, सबसे अंत में। जो कि आपने समय के एक पूर्वकथन के संदर्भ में उठाया है। वह कथन पुनः देखना हुआ, जो इस तरह से था।

"अगर आप वाकई वैज्ञानिक तरीकों से इतिहास और मानवजाति के क्रमविकास को समझना चाहते हैं तो आपकों वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ लिखे इतिहास और ऐतिहासिक समझ से गुजरना पड़ेगा। ना कि तथ्यों और निष्कर्षों का मनचाहा मानसिक जाल बुनकर अपने को तुष्ट करने का रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा। और निश्चिंत रहें, उसके बाद भी हमारे पास गर्व करने के लिए काफ़ी सामग्री होगी साथ ही ढ़ेर सारे सबक भी होंगे जिनसे भविष्य को संवारने का उचित रास्ता निकाल सकने की असीम संभावनाएं भी मौजूद रह सकें।"

उपरोक्त कथन इसी गर्व करने वाली मानसिकता के संदर्भ में लिखा गया है, इसी में इसका सही परिप्रेक्ष्य भी उपलब्ध है। इतिहास की मनचाही व्याख्या करके, उससे अपने गर्व को झूठी तसल्ली देने के बजाए, इतिहास को वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ समझने पर ही वह वास्तविक सामग्री सामने आ सकती है जिसके मानवजाति की अद्यतन स्थिति के सापेक्ष तुलना करने पर हमें अपने अतीत और अपनी परंपराओं में सच्चा गर्व महसूस करने के वास्तविक आधार निर्मित किए जा सकें। साथ ही बेहतर भविष्य रच सकने के लिए ढेर सारे सबक भी। बस यही मंतव्य है, जो यहां स्पष्ट है ही।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

राष्ट्र की अवधारणा

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



राष्ट्र की अवधारणा


अब हम राष्ट्र का सिद्धान्त बिना माने कैसे छोड़ सकते हैं। इसकी आवश्यकता नहीं है?  मेरी बातों में अंधराष्ट्रवाद अगर लगा तो यह राष्ट्रवाद क्या है?  क्या राष्ट्रवाद लाभकारी नहीं? मैं मानता हूँ किसी द्वेष के बिना यह होना चाहिए।

शायद आप राष्ट्र की अवधारणा को सुनिश्चित करना चाहते हैं। इस पर काफ़ी विद्वानों द्वारा काफ़ी कुछ कहा जा चुका है, आप देखिए और इसे समझिए। एक नज़र यहां भी डाल लेते हैं।

मानव-समुदाय अपने प्रारंभिक रूपों, रक्त-संबंधों से उत्पन्न हुए गोत्र तथा कबीलों के रूप में सहजीवन किया करते थे। उत्पादक शक्तियों के विकास तथा विनिमय-व्यापार में वृद्धि के कारण धीरे-धीरे रक्त संबंधों की अपेक्षा क्षेत्रीय संबंध अधिक महत्त्वपूर्ण होते चले गए और इसके परिणामस्वरूप जातियों तथा बाद में राष्ट्रों का आविर्भाव हुआ।

एक क्षेत्र में दीर्घकालीन सामुदायिक निवास, साझी भाषा तथा रीति-रिवाज़ बड़े जनसमुदायों की ऐतिहासिक नियति को सूत्रबद्ध करते हैं, एक सा चरित्र निरूपित करते हैं और एक समान संस्कृति के निर्माण में योग देते हैं। इस प्रकार जाति का निर्माण होता है ( इस अवधारणा को आपको भारतीय परिप्रेक्ष्य में श्रम-विभाजन के फलस्वरूप पनपने वाली शाब्दिक रूप से ‘जाति’ की अवधारणा से थोड़ा भिन्न देखना होगा )। दासप्रथा काल और सामंतवादी युग में जातियों का आविर्भाव हुआ। जैसे कि, प्राचीन मिस्री, यूनानी, रोमन जातियां, सामंतवादी युग में पश्चिमी यूरोपीय जातियां, पूर्वी स्लाव क़बीलों से रूसी जाति, भारतीय वैदिक आर्य-जाति।

जाति, समुदाय का अस्थिर रूप है। कई प्राचीन जातियों का कालांतर में विघटन हुआ, कुछ जातियों ने अन्य भिन्न जातियों का सूत्रपात किया। जाति के अस्थिर होने का कारण यह है कि उसके पास एकीकृत अर्थव्यवस्था नहीं होती, एकसमान संस्कृति के स्थानीय रूपों में बड़ा अंतर होता है और भाषा एक न रहकर स्थानीय बोलियों में बंट जाती है।

पूंजीवादी संबंधों के विकास के साथ जातियां राष्ट्र के रूप में उभरती हैं। पूंजीवाद स्थानीय सीमाओं को तोड़ डालता है, एक या अनेक जातियों को समान आर्थिक जीवन के बंधनों से आपस में सूत्रबद्ध करता है। क्षेत्रीय एकत्व के अलावा आर्थिक एकत्व भी उत्पन्न होता है और इस आधार पर समान राष्ट्रीय संस्कृति का आविर्भाव होता है, राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना का विकास होता है।

राष्ट्र लोगों की स्थायी समष्टि को कहते हैं, जिन्हें आर्थिक, क्षेत्रीय, भाषाई, सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक संबंध एकजुट करते हैं।

बात ऐसी ही है, परंतु कुछ सिद्धांतकार राष्ट्र की इस अवधारणा को इस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यों में नहीं देखकर, इसे नस्ली लक्षणों के, धर्म के आधार पर व्याख्यायित करते हैं। इसी प्रवृति को आप फ़ासिस्टों, नाज़ियों की आर्य नस्ल की श्रेष्ठता के मानवद्वेषी सिद्धांतों में और इसी तरह के भारत में हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी शक्तियों के धार्मिक हिंदू-राष्ट्रवादी सिद्धांत में देख सकते हैं।

इतिहास बताता है कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया में नस्ली, या धार्मिक लक्षण मुख्य भूमिका अदा नहीं करते। लैटिन अमरीका में कई देशों में तीन नस्लों के लोगों से एक राष्ट्र का निर्माण हुआ है। उत्तर अमरीकी राष्ट्र में गोरे लोगों के साथ नीग्रों भी शामिल हैं। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के उपनिवेश से स्वतंत्रता के संघर्षों में भारतीय राष्ट्रीयता धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि से ऊपर उठकर ही विकसित हुई। ये बात अलग है कि ये सवाल और इनके अंतर्विरोध साथ-साथ चल रहे थे, इसीलिए स्वतंत्रता के सामूहिक लक्ष्य की प्राप्ति के पश्चात कई संबंधित समूहों में अभी भी ये सवाल अहम बने हुए हैं, बनाए रखे हुए हैं।

राष्ट्रीय संबंधों के विकास के लिए दो प्रवृत्तियां लाक्षणिक होती हैं। पहली प्रवृत्ति राष्ट्रीय है, यानि लोगों के ऐतिहासिक समुदाय के रूप में राष्ट्र की चेतना का जागरण, राजनीतिक तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने, सृजनात्मक शक्तियों का विकास करने, साझी संस्कृति का उत्थान करने की इच्छा। दूसरी प्रवृत्ति अंतर्राष्ट्रीय होती है, यानि राष्ट्रों के बीच संबंध बढ़ाने, बाधाएं हटाने, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और समूचे सामाजिक जीवन का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की प्रवृत्ति। अंततः इन दोनों प्रवृत्तियों से मानव सभ्यता की प्रगति में योग मिलता है। परंतु अभी की साम्राज्यवादी शक्तियां इन दो शक्तिशाली धाराओं को आपस में मिलने न देने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाती हैं। अपनी स्वार्थ-सिद्धी के लिए राष्ट्रीय चेतना तथा भावनाओं का उपयोग करने के लिए कुछ राष्ट्रों के अन्य जातियों से श्रेष्ठ होने का प्रचार करती हैं, विभिन्न राष्ट्रों के संकीर्ण-राष्ट्रवादी भावनाओं को प्रश्रय देती हैं उन्हें भड़काती हैं।

राष्ट्रवाद की भूमिका, अपनी स्वतंत्रता के लिए, साम्राज्यवादी आधिपत्य के विरुद्ध संघर्षरत उत्पीडित जातियों के राष्ट्रवादी आंदोलन में प्रगतिशील होती है। मगर अनुभव से पता चलता है कि बाद में यह अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता के दृढीकरण में, संपूर्ण मानवजाति की प्रगति की राह में बाधा बनकर खड़ी हो जाती है, और सत्ताधारी वर्ग अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए इसका दुरुपयोग करते हैं। कई देशों में तो सरकारें इसी राष्ट्रीयता विरोध के भावनात्मक ज्वार में अपने -आपको बनाए रखने में सहूलियत महसूस करती हैं, दूसरे देशों के साथ अपने तनावों को बना कर युद्ध की स्थितियां सी बनाए रखती हैं, इससे राष्ट्रीय-भावना को उभारकर अपनी सत्ता को दूसरे सवालों से अक्षुण्ण बनाए रखती हैं। आप इसे भारत और पाकिस्तान के संदर्भ में समझ सकते हैं।

यानि राष्ट्रवाद को संकीर्ण अर्थों में ना लेकर, इसे सभी धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषाई सवालों से ऊपर उठकर एक राष्ट्रीय चेतना के निर्माण, राजनीतिक तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता पाने, सृजनात्मक शक्तियों का विकास करने, साझी संस्कृति का उत्थान करने की दिशा में लक्षित होना चाहिए। जो कि अंततः अंतर्राष्ट्रीयकृत साम्राज्यवाद के विरुद्ध लक्षित संघर्षों के अंतर्राष्ट्रीयकरण से हमसाया हो सके, और एक शोषण रहित अंतर्राष्ट्रीय मानव संस्कृति का निर्माण संभव हो सके।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय

शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

प्रेम व्यापक होता है और व्यापकता देता है

हे मानवश्रेष्ठों,

काफ़ी समय पहले एक युवा मित्र मानवश्रेष्ठ से संवाद स्थापित हुआ था जो अभी भी बदस्तूर बना हुआ है। उनके साथ कई सारे विषयों पर लंबे संवाद हुए। अब यहां कुछ समय तक, उन्हीं के साथ हुए संवादों के कुछ अंश प्रस्तुत किए जा रहे है।

आप भी इन अंशों से कुछ गंभीर इशारे पा सकते हैं, अपनी सोच, अपने दिमाग़ के गहरे अनुकूलन में हलचल पैदा कर सकते हैं और अपनी समझ में कुछ जोड़-घटा सकते हैं। संवाद को बढ़ाने की प्रेरणा पा सकते हैं और एक दूसरे के जरिए, सीखने की प्रक्रिया से गुजर सकते हैं।



प्रेम व्यापक होता है और व्यापकता देता है

लेकिन इससे पता चलता है कि लैला-मजनू जैसे किस्से सम्भव नहीं हैं क्योंकि प्रेम अस्थायी होगा ही। कुछ समय के लिए वह भले रहे या बना रहे लेकिन उसे समाप्त होना ही है।

प्रेम के आधार यदि वस्तुगत ( objective ) नहीं है, यदि वह काल्पनिकता के आसमान पर परवान चढ़ाया हुआ है, कोरी भावुकता से परिपूर्ण है, तभी हम कह सकते हैं कि प्रेम अस्थायी होगा, उसे वास्तविकता की कठोर ज़मीन पर आते ही समाप्त होना ही होगा।

प्रेम का होना बहुत जरूरी है। प्रेम ही है जो मनुष्य को अपने अस्तित्व का, अपनी जिम्मेदारियों का अहसास कराता है। उसे विशुद्ध मानवीयता का पहला पाठ पढ़ाता है, परंपराओं और यथास्थिति से विद्रोह सिखाता है, दुनिया को और बेहतर बनाए जाने की आकांक्षाओं और जुंबिशों से भर देता है। यदि प्रेम वास्तविकता के वस्तुगत आधारों पर परवान चढ़ता है, तो वह इसे सारी मानवता के दायरे तक विस्तार देता है। एक के प्रति प्रेम का अहसास, सभी के प्रति प्रेम के अहसासों से मनुष्य को भर देता है। वह सही मायने में तभी मनुष्य बनने की राह में कदम बढ़ा सकता है। सही समझ के साथ, प्रेम व्यापक होता है, और मनुष्य को व्यापकता देता है

हमारा मंतव्य प्रेम के वस्तुगत आधारों को समझने और समझाने का था, इसे सही राह दिखाने का था। ना कि इसके नकार के प्रतिमान रचना।

आपने प्रेम के मामले में कहा था कि किसी को किसी की मासूमियत पर तो किसी को खास तरह की मुस्कुराहट पर या किसी को अंग विशेष की बनावट पर दिल आ जाता है.......इस खास किस्म की पसन्द के पीछे की प्रक्रिया क्या है? यानी क्यों किसी को किसी खास किस्म की विशेषता पसन्द है? जैसे मान लेते हैं कि हमें हरा रंग अच्छा लगता है, तो हरा ही क्यों? कैसे? इसके पीछे का कारण? या फिर भोजन के मामले में खास तरह की सब्जी ही क्यों पसंद होती है या नहीं भी होती है? यह तो लगता है कि यह दीर्घकालीन संचय है। धीरे-धीरे ऐसा व्यवहार हमारे अचेतन में जमा हो जाता होगा, शायद ऐसा होता हो। इस पर आप ही सुझाएंगे।

हमने पहले यह कहा था, "यानि कि मनुष्य यदि दस व्यक्तियों को अपने सामने खड़ा करके किसी एक का चुनाव सांयोगिक रूप से करता हुआ लगता हो, और यह प्रश्न खड़ा होता हो कि वही क्यों? तो हमें यह समझना होगा कि चुनाव की इस सांयोगिकता के पीछे उस व्यक्ति के सौदर्यबोध के अपने मानदंड़ ( standards ) और अंतर्संबधों के बारे में उसकी मान्यताएं जाने-अनजाने पीछे से महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रही होती हैं।"

यहां साफ़ बात है कि व्यक्ति के इस संदर्भ में अपने विशिष्ट मानदंड और मान्यताएं विकसित हो जाती हैं। आप जानना चाह रहे हैं कि ये कैसे विकसित हो जाते हैं? आपने जो सुझाया बात लगभग वैसी ही है, यानि कि व्यवहार का, सक्रियता का, परिवेश के साथ अंतर्गुथन का दीर्घकालीन अनुकूलन। हमारे उपलब्ध परिवेश के साथ अंतर्क्रियाओं में यह अनुकूलन हमें उसका अभ्यस्त बनाता है और हम वैसी ही परिस्थितियों में सहज महसूस करते हैं, अच्छा महसूस करते हैं। इसलिए हमें हमारे परिवेश की चीज़ों की खास बुनावट, आकार, अन्य गुणधर्मों के प्रति एक खास क़िस्म का अनुराग पैदा हो जाता है, उसके पीछे होता यह है कि परिचित, अभ्यस्त बुनावट हमें सहज रखती है जबकि अपरिचित बुनावट हमारा ध्यान बांटती है, हमें उत्तेजित करती है, सहज नहीं रहने देती।

आगे बढ़ते हैं, जैसे कि मान लेते हैं किसी को अपनी मां से विशेष स्नेह है, सभी को होता है, मां एक विशेष अंदाज़ में मुस्कुराती है, मां के आंचल के सुरक्षाबोध के साथ, स्नेह और अपनत्व के साथ, सुक़ून के अहसास के साथ वह विशेष मुस्कुराहट उसकी चेतना में इतना घुलमिल जाती है कि धीरे-धीरे सिर्फ़ वह मुस्कुराहट ही इन सभी अहसासों का भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने लगती है। मतलब कि उस मुस्कुराहट को देखते ही, दिमाग़, मन इन्हीं भावनाओं और अहसासों ( सुरक्षा, स्नेह, अपनत्व, सुक़ून आदि ) की अवस्था में आ जाता है और वह मुस्कुराहट इन सबका पर्याय बनती जाती है। अब यह विशेष मुस्कुराहट यदि और भी कहीं उसे देखने को मिलती है, यानि अपनी मां से अलग, किसी और के चहरे पर, तो वहां भी उसके मानस में यही अहसास पैदा होते हैं। जाहिर है, जिसके चहरे पर ये मुस्कान की यह विशिष्ट अदा होगी वह उसे अच्छा लगेगा, पसंद आएगा। वह उसके अंदर वैसे ही व्यक्तित्व की आशा से भर उठेगा।

बाकी सौन्दर्यबोधों को भी ऐसे ही समझा जा सकता है। रंगों और स्वादों के मामलों को भी। बचपन से ही हरे रंग के बीच पला-बढ़ा बच्चा उसी रंग के साथ सहजता और सुक़ून महसूस करता है और वह उसकी पसंद बन जाता है। दादी द्वारा चूल्हे पर दाल पर हींग और लहसुन के छौंक की गंध उसके मानस पर और उसकी स्मृति में इस तरह समा जाती है कि वह हमेशा उसी तरह की प्रिय लगने वाली गंध और स्वाद के लिए हमेशा लालायित रह सकता है। एक विशेष परिवेश में पले व्यक्ति में बचपन से ही चिकन करी की गंध और स्वाद उसकी पसंद से इस तरह नाभीनालबद्ध हो सकते है कि वही उसके लिए दुनिया का बेहतरीन स्वाद हो सकता है, वहीं दूसरे परिवेश का व्यक्ति के लिए यह घृणा पैदा करने वाली गंध और स्वाद हो सकता है और वह बचपन से ही खाते आ रहे बैंगनों के साथ अधिक पसंद का लगाव रखा हो सकता है।

अब आप शुक्रिया शब्द लिखने की कृपा न करें क्योंकि मैं आपका समय ले रहा हूँ और मेरे लिए कुछ दे रहे हैं। मेरे लायक कुछ सहायता बन पड़े तो बताइएगा।

शुक्रिया, आपसी संवाद के चलते रहने और हमारी स्वयं की समझ तथा चेतना के परिष्कार की संभावनाएं देते रहने की महत्त्वपूर्ण बात पर व्यक्त किये जानेवाला औपचारिक आभार है।

संवाद हमें भी अवसर देता है आपस में कुछ सीखने का, अपने विषयगत विचारों को स्थिर और अभिव्यक्त कर पाने का। कई बार यह होता है कि समझाने की प्रक्रिया में कई चीज़ों पर हमारी समझ भी साफ़ और तार्किक होती जाती है। हमें भी कई चीज़ें और बेहतरी से समझ में आती हैं। कई नये अंतर्संबंध और बेहतर तार्किकताएं सामने आती हैं।

और आप, आपसे संवाद, यह अवसर उपलब्ध करवा रहा है, तो हमारा आपके प्रति शुक्रगुज़ार होना लाज़िमी है।



इस बार इतना ही।
आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत है ही।
शुक्रिया।

समय
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