शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

द्वंद्ववाद श्रॄंखला समाप्ति और डाउनलोडेबल पीडीएफ़

हे मानवश्रेष्ठों,

द्वंद्ववाद पर चल रही श्रृंखला अब समाप्त होती है। कुछ ही समय में फिर किसी नयी श्रॄंखला की यहां पर शुरुआत की जाएगी। कोई सार्थक सामग्री प्रस्तुत की जाएगी।

जैसा कि यहां की परंपरा है, द्वंद्ववाद ( द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ) पर प्रस्तुत सामग्री को डाउनलोडेबल पीडीएफ़ पुस्तिकाओं के रूप में उपलब्ध करा दिया गया है। इस श्रृंखला की सामग्री को चार भागों में समेकित करके अलग-अलग पुस्तिकाओं का रूप भी दे दिया गया है ताकि पाठक अपनी रुचि की सामग्री को अलग से भी डाउनलोड कर सकते हैं। संपूर्ण सामग्री भी एक अलग पुस्तिका के रूप में भी उपलब्ध है।

लिंक यहां दिये जा रहे हैं, जिनसे इच्छित सामग्री शीर्षकों पर क्लिक करके पीडीएफ़ रूप में डाउनलोड की जा सकती है। इन्हें साइड बार में भी डाल दिया गया है, जहां ये बाद में भी उपलब्ध रहेंगे।



द्वंद्ववाद - भाग १ - द्वंद्ववाद का परिचय
(dialectics - a introduction) - in hindi pdf - free download

इस भाग में द्वंद्ववाद का सामान्य परिचय है। जिसमें द्वंद्ववाद की भूमिका, द्वंद्ववाद की संकल्पना का संक्षिप्त इतिहास, द्वंद्ववाद क्या है?, अधिभूतवाद, तीन महान खोजें, क्रमविकास किस प्रकार होता है?, क्या गति का उद्‍गम है?, तथा द्वंद्ववाद और संकलनवाद पर सामग्री है।

द्वंद्ववाद - भाग २ - बुनियादी उसूल, नियम और प्रवर्ग
(basic principle, rules and categories of dialectics) - in hindi pdf - free download

इस भाग में द्वंद्ववाद के बुनियादी उसूल - सार्विक संपर्क का उसूल, विकास का उसूल, द्वंद्ववाद के नियम - विरोधियों की एकता तथा संघर्ष का नियम, परिमाण से गुण में रूपांतरण का नियम, निषेध के निषेध का नियम, तथा भौतिकवादी द्वंद्ववाद के प्रवर्ग - व्यष्टिक, विशिष्ट और सामान्य ( सार्विक ), अंतर्वस्तु और रूप, आभास और सार, कारण और कार्य, अनिवार्यता और संयोग, संभावना और वास्तविकता पर सामग्री है।

द्वंद्ववाद - भाग ३ - ज्ञान का सिद्धांत
(dialectical theory of knowledge) - in hindi pdf - free download

इस भाग में संज्ञान पर अज्ञेयवाद, तर्कबुद्धिवाद, क्लासिकी प्रत्ययवाद, तथा तत्वमीमांसीय भौतिकवाद की ज्ञानमीमांसीय मतों का विवेचन है और संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत का व्यवस्थित निरूपण है। जिसमें परावर्तन के रूप में संज्ञान, ज्ञान के स्रोत, संज्ञान की प्रक्रिया, व्यवहार - संज्ञान का आधार और कसौटी, संज्ञान की प्रक्रिया में संवेदनों की भूमिका, संज्ञान की प्रक्रिया में अपकर्षण की भूमिका, प्रत्ययवाद/भाववाद की ज्ञानमीमांसीय जड़ें, संवेदनात्मक संज्ञान या जीवंत अवबोधन, तर्कमूलक संज्ञान या अमूर्त चिंतन पर सामग्री है। इसी भाग में सत्य के बारे में द्वंद्ववादी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक संज्ञान के रूप - सिद्धांत और प्राक्कल्पना, प्रयोग और प्रेक्षण तथा वैज्ञानिक संज्ञान की पद्धतियां - निगमनात्मक विधियां, आगमनात्मक विधियां, साम्यानुमान पद्धति, विश्लेषण और संश्लेषण, तार्किक और ऐतिहासिक विधियां आदि पर भी सामग्री है।

द्वंद्ववाद - भाग ४ - सत्य क्या है
(what is truth - a dialectical understanding) - in hindi pdf - free download

इस भाग में सत्य के बारे में द्वंद्ववादी दृष्टिकोण को संज्ञान सिद्धांत से ही यहां अलग से पुस्तिका रूप दिया गया है, ताकि सत्य के बारे में विशिष्ट रुचि और जिज्ञासा रखने वाले मानवश्रेष्ठ इसे अलग से डाउनलोड कर सकें। इसमें सत्य की संकल्पना, सत्य की निर्भरता, वस्तुगत सत्य, सापेक्ष और निरपेक्ष सत्य, सत्य की द्वंद्वात्मकता, तथा संज्ञान में व्यवहार की भूमिका पर सामग्री है।



द्वंद्ववाद - समग्र (सभी भाग) - द्वंद्वात्मक भौतिकवाद
(dialectics - dialectical materialism) - in hindi pdf - free download

यह द्वंद्ववाद - द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर यहां प्रस्तुत संपूर्ण सामग्री है। इसमें उपरोक्त सभी भाग एक साथ उपलब्ध हैं। द्वंद्ववाद की एक निश्चित समझ बनाने के लिए यह अपेक्षित है कि इस अंतर्संबंधित संपूर्ण सामग्री को समग्रता में ही आत्मसात किया जाये। साथ ही दर्शन और चेतना पर साइडबार में उपलब्ध सामग्री को भी डाउनलोड करके इसी के समानांतर पढ़ा-समझा जाए।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

द्वंद्ववाद श्रॄंखला - समाहार

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत आधुनिक विज्ञान में गणित के अनुप्रयोग पर चर्चा की थी, इस बार हम द्वंद्ववाद श्रॄंखला का समाहार प्रस्तुत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



द्वंद्ववाद श्रॄंखला - समाहार

भौतिकवादी द्वंद्ववाद एक बड़ी सैद्धांतिक उपलब्धि है। इसके ऐतिहासिक महत्व तथा मानव समाज के वर्तमान तथा भावी विकास में इसके मूल्य को कम करके नहीं आंका जा सकता है। यह मानवीय क्रियाकलाप के हर क्षेत्र - दर्शन व विशेष विज्ञान, भौतिक व आत्मिक उत्पादन की सारी धाराओं - में निरपवाद रूप से परिव्याप्त है। द्वंद्ववाद के मूल सिद्धांत अपने गहन विश्वदृष्टिकोण, उसूलों, नियमों व प्रवर्गों की अध्ययन पद्धति, उनकी वैधता और विशुद्ध वैज्ञानिक प्रकृति के कारण, वैज्ञानिक संज्ञान के लिए और इस पर आधारित व्यवहार के लिए वस्तुगत रूप से आवश्यक हो उठते हैं।

भौतिकवादी द्वंद्ववाद प्रकृति, समाज तथा चिंतन के सर्वाधिक सामान्य नियमों का विज्ञान है, जो सारे क्षेत्रों में विकास की वस्तुगत नियमानुवर्तिताओं कों वैज्ञानिक ढंग से परावर्तित करता है। यह विज्ञान और व्यवहार को विश्वदृष्टिकोण तथा अध्ययन-पद्धति से लैस करता है, उन्हें नूतन, प्रगतिशील और विकास की ओर ले जाता है। वहीं दूसरी ओर, इतिहासपरकता के उसूलों का सुसंगत उपयोग करके भौतिकवादी द्वंद्ववाद, मानवजाति की प्रगति के असीम परिप्रेक्ष्य को दर्शाता है और जनगण की चेतना को प्रगतिशीलता एवं भविष्य की ओर उन्मुख करता है

भौतिकवादी द्वंद्ववाद अन्य सारी दार्शनिक संकल्पनाओं से इस बात में भिन्न है है कि यह नियमों और प्रवर्गों की विज्ञान द्वारा प्रमाणित और तार्किक रूप से अंतर्संबंधित प्रणाली है और यही नहीं, यह वैज्ञानिक तथा व्यावहारिक प्रगति के आधार पर बनी ऐसी प्रणाली भी है, जो ऐतिहासिक विकास के साथ अपने को विकसित करती रहती है। प्रकृति, समाज तथा चिंतन के विकास को सही-सही परावर्तित करवे वाली पद्धति के रूप में भौतिकवादी द्वंद्ववाद निरंतर बदलता, विकसित होता तथा स्वयं को समृद्ध बनाता रहता है और नयी संकल्पनाओं के समावेश तथा पुरानी संकल्पनाओं के सत्यापन से अपने प्रवर्गीय उपकरण को अधिक पूर्ण बनाता है।

यह स्वयं को क्रमविकास के एक सिद्धांत के और साथ ही संज्ञान के सिद्धांत और सैद्धांतिक चिंतन के तर्क के रूप में उद्घाटित करता है। विशेष विज्ञानों के लिए यह, ज्ञान की इन शाखाओं में सामान्य सैद्धांतिक और दार्शनिक समस्याओं को हल करने के लिए विश्वदृष्टिकोणात्मक तथा अध्ययन-पद्धतिपरक आधार का काम देता है, और उन्हें प्रेक्षण, प्रयोग तथा प्रतिरूपण के वैज्ञानिक उपकरणों से लैस करता है। भौतिकवादी द्वंद्ववाद की इन पद्धतियों के सचेत उपयोग से प्राकृतिक व सामाजिक, दोनों क्षेत्रों के विशेष विज्ञानों की प्रगति में तेज़ी आ जाती है।

भौतिकवादी द्वंद्ववाद मनुष्यों के क्रांतिकारी व्यवहार और रूपांतरणकारी कार्यकलाप में विशेष महत्वपूर्ण है। किसी व्यावहारिक समस्या के समाधान के तरीक़ों व उपायों को निरूपित करने में इसका सचेत और कुशलतापूर्वक उपयोग सफलता की पूर्वशर्त है, जबकि इसके बगैर संज्ञान तथा व्यवहार, दोनों में ही गंभीर ग़लतियों और भारी भ्रांतियों का होना अनिवार्य है।

भौतिकवादी द्वंद्ववाद आधुनिक विज्ञान व संस्कृति की शैली तथा प्रकृति से पूर्णतः मेल खाता है। यह विज्ञान और व्यवहार में वैज्ञानिक अनुसंधान को प्रेरित करता है, ऐसे विचारों के चयन व प्रतियोगिता को प्रोत्साहित करता है, जिससे लोगों के लिए घटनाओं के सार को अधिकाधिक गहराई से समझना संभव हो जाता है। यही नहीं, वह इस काम को शुद्ध वैज्ञानिक पद्धतियों से निष्पन्न करता है, वह विज्ञान में मुख्य रूप से उन वस्तुगत प्रक्रियाओं को खोजता है, जो अनुसंधान करनेवालों को द्वंद्वात्मक ढंग से सोचने के लिए विवश करती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण पर चर्चा की थी, इस बार हम आधुनिक विज्ञान में गणित के अनुप्रयोग को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



गणित का अनुप्रयोग और आधुनिक विज्ञान
( application of mathematics and modern science )

एक चौकोर मैदान के क्षेत्रफल को नापने के वास्ते एक मापने के दंड का उपयोग करने के बजाय हम केवल उसकी दो समलंब भुजाएं माप सकते हैं और फिर प्राप्त अंकों को गुणा करके पल भर में सारे मैदान का क्षेत्रफल नाप सकते हैं।

विज्ञान, इंजीनियरी तथा व्यावहारिक क्रियाकलाप में गणित का महत्व और अनुप्रयोग इस तथ्य पर आधारित है कि हम नापजोख के विभिन्न साधनों के द्वारा भौतिक वस्तुओं तथा उनके अनुगुणों पर कुछ अंकों को आरोपित कर सकते हैं और उसके उपरांत वस्तुओं के साथ श्रमसाध्य क्रियाएं करने के बजाय कुछ गणितीय नियमों के अनुसार इन अंकों के साथ संक्रियाएं ( operations ) कर सकते हैं। उसके पश्चात हम प्राप्त अंकों को पुनः भौतिक वस्तुओं पर लागू कर सकते हैं और उन्हें वस्तु के अन्य अनुगुणॊं तथा विशेषताओं को जानने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। परिमाण ( quantity ) और गुण ( quality ) का द्वंद्वात्मक संयोजन इस बात में स्पष्टतः अभिव्यक्त होता है। गणित कुछ सीमाओं के अंदर वस्तुओं के परिमाणात्मक लक्षणों के ज़ारिये उनकी असीम व विविधतापूर्ण गुणात्मक विशेषताओं का वर्णन करना संभव बना देता है। चूंकि परिमाणात्मक लक्षणों का वर्णन सापेक्षतः सुस्पष्ट, सरल सूत्रों तथा समीकरणों में व्यक्त गणितीय क़ायदों से किया जा सकता है, इसलिए वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) के संज्ञान की प्रक्रिया सरलीकृत, द्रुत और सुविधापूर्ण हो जाती है।

हमारे युग में गणित ने विज्ञान की अनेक शाखाओं में पैठ बना ली है। अब वैज्ञानिकगण ऐसे अधिकाधिक जटिल अमूर्तों, अपकर्षणों ( abstractions ) का उपयोग करने लगे हैं, जिन्हें संवेद बिंबों ( sensory images ) में परिणत नहीं किया जा सकता है, इसलिए नियमों तथा सिद्धांतों को जटिल गणितीय समीकरणों के ज़रिये निरूपित करना होता है। बीसवीं सदी के मध्य से कंप्यूटरों का बहुत तेज़ी से विकास हुआ और अब उनकी बदौलत अत्यंत जटिल गणनाओं को पूर्वलिखित कार्यक्रमों ( programmes ) के ज़रिये शीघ्रता से और विश्वसनीय ढंग से करना और उन समस्याओं को हल करना संभव हो गया है जो पहले व्यक्ति के लिए या तो बेहद कठिन या अत्यंत श्रमसाध्य होती थीं।

गणित, ऐसे पूर्णतः प्रमाणित प्रमेयों ( theorems ) तथा क़ायदों ( rules ) पर आधारित है, जो वस्तुगत सत्य हैं, किसी के संकल्प या इच्छाओं पर निर्भर नहीं है और इसीलिए हमारे परिवेशीय जगत के बारे में निश्चित ज्ञान हासिल करना संभव बनाता हैं। किंतु जिस प्रकार परिणाम को गुण से विच्छेदित नहीं किया जा सकता, ठीक उसी प्रकार संज्ञान की गणितीय विधि को विभिन्न विज्ञानों की गुणात्मकतः भिन्न अन्य विधियों से विच्छेदित नहीं किया जा सकता है। समसामयिक वैज्ञानिक ज्ञान की सारी विधियों का एकत्व ( unity ) ही, उनके वस्तुगत सत्य की और वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति पर उनके प्रभाव की गारंटी करता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियों पर चर्चा की थी, इस बार हम वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान में मॉडल और मॉडल निर्माण
( models and modelling in scientific cognition )

आधुनिक विज्ञान में प्रयुक्त एक सबसे सामान्य विधि मॉडल निर्माण ( modelling ) है। मॉडल तथा मॉडल निर्माण क्या है? शब्द "मॉडल" का मतलब है एक नमूना, प्रतिरूप या रूपांकन अथवा एक त्रिआयामीय चित्रण, किंतु यह स्वयं अपने आप में कोई स्पष्टीकरण नहीं है, क्योंकि विज्ञान में संकल्पना "मॉडल" ने एक विशेष आशय ग्रहण कर लिया है।

वस्तुएं अक्सर छानबीन के लिए समुपयुक्त नहीं होतीं। वे बहुत बड़ी या बहुत क़ीमती हो सकती हैं, बहुत जटिल या अनुपलब्ध हो सकती हैं। इस स्थिति में एक ऐसी वस्तु बनायी या खोजी जाती है जो कुछ सारभूत मामलों में दिलचस्पी की वस्तु या प्रक्रिया के समान हों, यानी स्थानापन्न ( substitute ) हों। यदि इस वस्तु का अध्ययन हो सकता हो और प्राप्त परिणामों को समुचित त्रुटि सुधारों तथा समंजनों ( adjustments ) के साथ अध्ययनाधीन वस्तु के संज्ञान के लिए प्रयुक्त या लागू किया जा सकता हो, तो इसे मॉडल कहा जायेगा। एक मॉडल की रचना या चयन, उसका अध्ययन तथा प्राप्त परिणामों को मुख्य वस्तु के संज्ञान के लिए इस्तेमाल करने को मॉडल निर्माण कहते हैं।

मानवसम वानर ( anthropoid apes ) कुछ मामलों में मनुष्य के समान होते हैं। वैज्ञानिकों ने बहुत पहले यह खोज की कि मेकाक बंदर की रीसस ( rhesus ) प्रजाति का रुधिर मनुष्य के रुधिर के समान होता है। इस रुधिर का अध्ययन करके उन्होंने विशेष अनुगुणों की खोज की जो रीसस-फ़ैक्टर कहलाता है। रुधिर की समानता को आधार बनाकर उन्होंने प्राप्त परिणामों को मानव रुधिर पर लागू किया और पता लगाया कि उसमें भी वैसे ही अनुगुण होते हैं। इस मामले में बंदर का रुधिर, मानव रुधिर का मॉडल था।

इंजीनियरी में मौलिक वस्तु या प्राक्-रूप ( prototype ) को बनाने से पहले अक्सर मॉडल का निर्माण तथा अध्ययन किया जाता है, ताकि बाद में किये जानेवाले निर्माण में कई ग़लतियों और कठिनाइयों से बचा जा सके। एक विशाल बिजलीघर के निर्माण से पहले उसका एक समानुपातिक तकनीकी मॉडल बनाया जाता है और उसे लेकर कई प्रयोग किये जाते हैं। इससे प्राप्त जानकारी को वास्तविक बिजलीघर बनाते समय ध्यान में रखा जाता है।

इन उदाहरणों में मॉडल की भूमिका नितांत भौतिक वस्तुओं द्वारा अदा की गयी है। किंतु आधुनिक विज्ञान में तथाकथित वैचारिक, प्रत्ययिक मॉडलों ( ideal models ) का व्यापक उपयोग होने लगा है। उनमें, मसलन, तथाकथित मानसिक प्रयोग शामिल हैं। एक अतिजटिल, खर्चीला प्रयोग शुरू करने से पहले एक वैज्ञानिक अपनी कल्पना में अपेक्षित औज़ारों के एक पूरे सेट की रचना करता है और उन्हें लेकर विभिन्न कार्यकलाप करता है और कभी-कभी सहायक साधनों के रूप में नक़्शों, रेखाचित्रों तथा आरेखों का उपयोग भी करता है। वह इन सारी कार्रवाइयों के बाद ही अपना असली प्रयोग करने का इरादा या तो त्याग देता है ( यदि मानसिक प्रयोग असफल हुआ है ) अथवा उसके व्यावहारिक कार्यान्वयन में जुट जाता है।

मॉडलों तथा मॉडल निर्माण की एक क़िस्म गणितीय मॉडल निर्माण है। इसमें स्थानापन्न वस्तु के रूप में भौतिक वस्तुओं या प्रक्रियाओं को लेने के बजाय गणितीय समीकरणों की एक प्रणाली का उपयोग किया जाता है। इन समीकरणों में प्रेक्षणों तथा प्रयोगों से प्राप्त विविध आंकिक आधार-सामग्री को प्रतिस्थापित करके तथा उन समीकरणों को हल करके वैज्ञानिक विभिन्न प्रक्रियाओं के परिमाणात्मक अभिलक्षणों ( quantitative characteristics ) का सही-सही मूल्यांकन कर सकता है और उन कठिनाइयों का पूर्वानुमान लगा सकता है, जो व्यवहार में पैदा हो सकती हैं। आधुनिक विज्ञान के सारे क्षेत्रों में, विशेषतः इंजीनियरी तथा नियंत्रण ( control ) के सिद्धांत में गणितीय मॉडलों का व्यापक प्रयोग किया जाता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 26 सितंबर 2015

संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की विश्लेषण और संश्लेषण की पद्धतियों पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियां
( Logical and Historical methods of cognition )

प्रकृति तथा समाज में कोई प्रणाली कितनी ही जटिल क्यों न हो, उसे दो दृष्टिकोणों से जांचा जा सकता है। पहले उपागम ( approach ) में ज्ञान को प्रदत्त व निरूपित तथा कुछ हद तक पूर्ण माना जाता है। दूसरे में वस्तु के विकास तथा रचना की प्रक्रिया के अध्ययन पर जोर दिया जाता है। पहले उपागम से अध्ययनाधीन वस्तु की कार्यात्मकता ( functioning ) या जीवन क्रिया के नियमों को प्रकाश में लाना संभव हो जाता है, दूसरे में उसके विकास, रचना, उत्पत्ति और परिवर्तन के वस्तुगत ( objective ) नियमों को खोजा तथा उनका अध्ययन किया जाता है।

पहले उपागम में हम संज्ञान की जिस विधि का उपयोग करते हैं, वह तार्किक विधि ( logical method ) कहलाती है। इसमें बुनियादी, सबसे महत्वपूर्ण सारभूत विशेषताओं, अनुगुणों और लक्षणों को प्रकाश में लाया जाता है और इन अनुगुणों व विशेषताओं को परावर्तित करनेवाली आरंभिक संकल्पनाओं ( concepts ) से उन अधिक जटिल मूर्त संकल्पनाओं में निरंतर संक्रमण किया जाता है, जो हमें अध्ययनाधीन घटनाओं तथा प्रक्रियाओं के बारे में अधिक पूर्ण व सर्वांगीण ज्ञान प्रदान करती हैं। इस विधि के उपयोग से एक वस्तु के संज्ञान की प्रक्रिया में, उसकी सारभूत विशेषताओं के साथ यथातथ्य जानने में मदद मिलती है।

दूसरे उपागम में हम ऐतिहासिक विकास की वास्तविक प्रक्रिया को क़दम-ब-क़दम पुनःप्रस्तुत करते हैं जो हमेशा सहज व सीधी प्रक्रिया नहीं होती है। संज्ञान की ऐतिहासिक विधि ( historical method ) में अध्ययनाधीन प्रक्रियाओं या घटनाओं की रचना, विकास तथा उनके रूपायित ( shaping ) होने की, सारी अवस्थाओं की अनुक्रमिक, सतत जांच तथा वर्णन किया जाता है। इसमें विकास की जटिल वास्तविक प्रक्रिया के सारे सर्पिलों ( spiral ) का, उसके सभी टेढ़े-मेढ़े रास्तों व पश्चगमनों ( retreats ) सहित, अध्ययन किया जाता है। इसलिए ऐतिहासिक विधि बहुत श्रम-साध्य होती है और भारी शक्ति तथा समय की मांग करती है। साथ ही यह उन कई प्रश्नों का उत्तर देने में मदद देती है, जिनका सर्वांगीण उत्तर तार्किक विधि से नहीं मिल सकता है। इन प्रश्नों में अध्ययनाधीन वस्तुओं ( विषयों ) के क्रम तथा ऐतिहासिक विकास की दिशा से संबंधित प्रश्न भी शामिल हैं। अतः तार्किक व ऐतिहासिक विधियां एक दूसरे का विरोध नहीं करतीं, बल्कि एक दूसरे की संपूरक ( supplement ) हैं।

मिसाल के लिए, जब एक डॉक्टर रोगलक्षणों का अध्ययन करता है, तो वह सबसे महत्वपूर्ण चिह्नों को पृथक कर लेता है : तापमान में परिवर्तन, रुधिर की अवस्था में परिवर्तन, कुछ सूक्ष्म जीवाणुओं की उपस्थिति, अलग-अलग अंगों में परिवर्तन। अंत में वह प्राप्त तथ्यों को तार्किक ढंग से जोड़ते तथा मिलाते हुए एक निदान ( diagnosis ) पर पहुंचता है, यानी वह रोगी के स्वास्थ्य तथा बीमारी की स्थिति के बारे में नितांत ठोस ज्ञान प्राप्त करता है। किंतु कारगर उपचार ( effective treatment ) के लिए यह निदान काफ़ी नहीं होता।  डॉक्टर को बीमारी के इतिहास, लक्षणों के प्रकट होने के क्रम, बीमारी के अलग-अलग प्रकटीकरणों के विकास, अंगों की विविध विशेषताओं में परिवर्तनों और रोगी की अनुभूतियों, आदि के बारे में भी जानना होता है। इस ऐतिहासिक सूचना से अपने पूर्व अर्जित ज्ञान को संपूरित करके ही डॉक्टर अंततःअपने निदान को अधिक सटीक बनाता है और रोग के कारगर इलाज के लिए हिदायतें देता है। इससे भी अधिक, स्वयं रोग का उपचार यह मांग करता है कि उसके विकास, गतिकी तथा परिवर्तनों में सुधार प्रक्रिया की लगाता जांच करते रही जाये।

संज्ञान की तार्किक और ऐतिहासिक विधियां विभिन्न सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में भी एक दूसरे को द्वंद्वात्मक ( dialectical ) ढंग से संपूरित करती हैं। उदाहरण के लिए, जब हम किसी देश की समसामयिक अर्थव्यवस्था का अध्ययन करते हैं, तो हमें सबसे पहले उसकी संरचना को उद्घाटित करने, उसके मुख्य उत्पादन संबंधों का विश्लेषण करने, अर्थव्यवस्था के मुख्य घटकों ( उद्योग, कृषि, व्यापार, सेवाक्षेत्र, वित्त, कर प्रणाली, अदि ) की जांच करने का प्रयत्न करते हैं ; अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों तथा तकनीकों की छानबीन करते हैं। यह अनुसंधान तार्किक उपागम के संदर्भ में किया जाता है, जिससे आर्थिक प्रणाली के प्रमुख केंद्रों और उनके संपर्कों, अंतर्क्रिया, पारस्परिक प्रभाव, आदि को विभेदित करना संभव हो जाता है।

किसी प्रदत्त देश में अमुक-अमुक स्थिति कैसे बनी, उसके विकास की प्रवृत्तियां और परिप्रेक्ष्य क्या है, कुछ सूचकांकों में अन्य देशों से क्यों भिन्न है - इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए ऐतिहासिक उपागम को अपनाना और अर्थव्यवस्था के सारे घटकों को उनके उत्थान ( rise ), स्थापना ( establishment ), निकट तथा दूर भविष्य में उनके अलग-अलग तत्वों के दुर्बलीकरण या दृढ़ीकरण की सविस्तार जांच करना आवश्यक है।

तार्किक और ऐतिहासिक विधियां घनिष्ठता से संयोजित तथा एक दूसरे की संपूरक हैं। किसी एक आर्थिक प्रणाली के मुख्य घटकों तथा संयोजनों को अलग छांटकर तार्किक विधि यह दर्शाती है कि इस प्रणाली के ठीक किस क्रियातंत्र का विश्लेषण किया जाये, आज की आर्थिक स्थिति को समझने के लिए ऐतिहासिक अनुसंधान के लिए कौन से क्रियातंत्र सबसे महत्वपूर्ण है। परंतु ऐतिहासिक विधि इस आर्थिक प्रणाली के उत्थान के क्रम तथा कार्य-कारण संबंधों और पूर्ववर्ती अवस्थाओं से मौजूदा अवस्था में उसके संक्रमण ( transition ) की जांच करके हमें तार्किक विश्लेषण द्वारा उद्घाटित नियमितता को अधिक अच्छी तरह से समझने और इस आर्थिक स्थिति के विशिष्ट लक्षणों तथा विशेषताओं का स्पष्टीकरण देने में मदद करती है।

इस तरह, तार्किक और ऐतिहासिक विधियों के बीच एक गहन आंतरिक संपर्क होता है। तार्किक विधि उन महत्वपूर्ण घटकों को सामने लाती है, जो ऐतिहासिक अध्ययन के विषय हैं और ऐतिहासिक विधि, तार्किक विधि के परिणामों को ठोस, परिष्कृत बनाने तथा संपूरित करने में मदद देती हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 19 सितंबर 2015

विश्लेषण और संश्लेषण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की साम्यानुमान पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम विश्लेषण और संश्लेषण की पद्धतियों को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



विश्लेषण और संश्लेषण
( Analysis and Synthesis )

जब वैज्ञानिकगण किसी नयी वस्तु का अध्ययन शुरू करते हैं, तो उन्हें उसके बारे में नियमतः अत्यंत सामान्य अमूर्त ( abstract ) ज्ञान होता है, जो उस वस्तु के अलग-अलग अनुगुणों ( properties ) और लक्षणों ( characteristics ) को परावर्तित करता है। यह ज्ञान अध्ययन की हुई घटना या प्रक्रिया को व्यावहारिक कार्यों में लागू करने के लिए तो दूर की बात, उसकी गहरी समझ के लिए भी पर्याप्त नहीं होता।

उनके बारे में सारी की सारी अपेक्षित जानकारी हासिल करने और उन्हें संनियमित ( govern ) करने वाले नियमों को खोजने के लिए प्रदत्त वस्तु को एक विशेष प्रणाली ( system ) के रूप में प्रस्तुत करना जरूरी है। इसके बाद इस प्रणाली को विखंडित करके उसके पृथक-पृथक तत्वों तक के विविध स्तरों की उपप्रणालियों में विस्तारित किया जाता है। एक प्रणाली को उसकी उपप्रणालियों तथा तत्वों में विखंडित करना और उन उपप्रणालियों व तत्वों का क़दम ब क़दम अध्ययन करना विश्लेषण ( analysis ) कहलाता है। दूसरे शब्दों में, विश्लेषण साकल्य ( whole ) का सरलतर घटक अंगों, पक्षों और अनुगुणों में मानसिक विखंडन है, उनका सोद्देश्य और सुव्यवस्थित अध्ययन है। इसके दौरान अध्ययनाधीन वस्तु के अलग-अलग अनुगुनों व लक्षणों, अंशों और तत्वों के बारे में सूचनाएं संचित की जाती है। विषय-वस्तु का उसके घटक अंगों में मानसिक विंखंडन और उनकी जांच अनुसंधानकर्ता को उनकी संपूर्ण विविधता से सर्वाधिक मौलिक, सारभूत और आंतरिक विशेषताओं को छांटने में, उन्हें गौण, सांयोगिक तथा बाह्य विशेषताओं से पृथक करने में समर्थ बना देता है। ऐसी मानसिक संक्रियाओं से उस मूलतः सामान्य विशेषता को प्रकट करना संभव हो जाता है, जो संपूर्ण विविध तत्वों को प्रदत्त वस्तु की गुणात्मक विशेषता ( qualitative determinacy ) में एकीभूत करता है।

परंतु संज्ञानात्मक प्रक्रिया ( cognitive process ) विश्लेषण पर ही समाप्त नहीं हो जाती, क्योंकि इसके दौरान एक प्रकार के साकल्य के रूप में वस्तु की मूल प्रारंभिक संकल्पना ( concept ) वस्तुतः लुप्त हो जाती है। वस्तु के बारे में नया और इस बार नितांत ठोस व समृद्ध ज्ञान प्राप्त करने के लिए संज्ञान की एक नयी अवस्था को अमल में लाना आवश्यक होता है। इस अवस्था को संश्लेषण कहते हैं। संश्लेषण ( synthesis ) विश्लेषण का तार्किक अनुक्रम ( continuation ) है, उसका दूसरा पक्ष है जो विविधता की एकता के रूप में मूर्त ( concrete ) का पुनरुत्पादन करता है। इसमें विश्लेशण के दौरान प्राप्त सारे ज्ञान को कुछ नियमों के अनुसार ऐसे समेकित व परस्पर संयोजित किया जाता है कि वे अध्ययनाधीन वस्तु की उपप्रणालियों तथा तत्वों के अनुगुणों, लक्षणों, संबंधों तथा उनके बीच संयोजनों को सर्वाधिक सटीकता ( exactly ) तथा पूर्णता से परावर्तित करते हैं। दूसरे शब्दों में, संश्लेषण विश्लेषित के अंगों, पक्षों तथा तत्वों के संपर्कों और संबंधों का मानसिक संयोजन तथा पुनरुत्पत्ति है, और साकल्य की एकता में उसका बोध ( comprehension ) है। जब ज्ञान का समेकन या संश्लेषण पूरा हो जाता है, तब हमें वस्तु की एक अखंडित संकल्पना तथा एकीकृत ज्ञान फिर से हासिल होता है।

किंतु, मूल प्रारंभिक ज्ञान के विपरीत यह अपकर्षित या अमूर्त नहीं, बल्कि मूर्त होता है और सूचनाओं का एक ऐसा परिमाण उपलब्ध कराता है, जिससे अध्ययन की गयी वस्तुओं को बदलना, रूपांतरित ( transform ) करना और उन्हें नियोजित ( planned ) उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए व्यावहारिक क्रियाकलाप में इस्तेमाल करना संभव हो जाता है। मूर्त की और अग्रसरण ( advancing ), विचाराधीन वस्तु के संपर्कों और संबंधों की विविधता व पूर्णता में उसकी मानसिक पुनरुत्पत्ति, एक पेचीदा विश्लेषण-संश्लेषणात्मक प्रक्रिया है। विश्लेषण से संश्लेशण में संक्रमण की प्रक्रिया को अनेक बार दोहराया जा सकता है। इस कार्यविधि की प्रत्येक नयी पुनरावृत्ति से मानो ज्ञान का एक नया सर्पिल ( spiral ) प्राप्त होता जाता है। संज्ञान की विधियां दोहरायी जाती हैं, किंतु संज्ञान के द्वंद्वात्मक सर्पिल के एक नये, उच्चतर स्तर पर।

संज्ञान की वैज्ञानिक पद्धतियों के रूप में विश्लेषण और संश्लेषण को पृथक नहीं किया जा सकता है। साकल्य को समझने के लिए विश्लेषण की मदद से उसके घटकों का अध्ययन करना जरूरी है, दूसरी तरफ़, घटकों की भूमिका और कार्य को संश्लेषण के द्वारा साकल्य के संज्ञान से ही समझा जा सकता है। विश्लेषण अनुसंधानकर्ता को संवेदनात्मक-मूर्त से अमूर्त की ओर, और संश्लेषण अमूर्त से मानसिक रूप से मूर्त की तरफ़ बढ़ने में मदद करता है। विश्लेषण और संश्लेषण का उपयोग वैज्ञानिक अनुसंधान तक ही सीमित नहीं है, उन्हें सभी सैद्धांतिक या व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में इस्तेमाल किया जाता है।

अध्ययन-सामग्री का विश्लेषण-संश्लेषणात्मक प्रसंस्करण ( processing ) उसके रचनात्मक स्वांगीकरण ( assimilation ) की एक शर्त है। ऐसी सामग्री का विश्लेषण, बोध तथा व्यवस्थापन द्वंद्वात्मक चिंतन को विकसित करता है, जबकि उसे यांत्रिक ढंग से याद करना व्यर्थ होता है : एक सीमा तक उससे किसी व्यक्ति की याददाश्त बेहतर हो सकती है, लेकिन फिर यह बेकार का बोझ ही सिद्ध होता है। सच्चे वैज्ञानिक ज्ञान का तक़ाज़ा है कि विश्लेषण और संश्लेषण को उनकी एकता में इस्तेमाल किया जाये। यदि कोई व्यक्ति अपने को विश्लेषण ही तक सीमित रखता है, तो वह पूर्ण, मूर्त ज्ञान हासिल नहीं कर सकता या विचाराधीन वस्तु, प्रक्रिया अथवा घटना के सार को नहीं समझ सकता। यदि कोई व्यक्ति अपने को केवल सतही संश्लेषण तक ही सीमित रखता है, तो वह संज्ञान को अनिश्चित और बहुधा व्यर्थ प्रयास में परिणत कर देगा।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 12 सितंबर 2015

साम्यानुमान पद्धति

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की पद्धतियों निगमन और आगमन के एकत्व पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की एक और पद्धति साम्यानुमान को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



साम्यानुमान पद्धति
( Analogy method )

संज्ञान में वैज्ञानिक अपाकर्षणों ( abstractions ) की भूमिका असाधारण महत्व की होती है। लेकिन संज्ञानात्मक प्रक्रिया अपाकर्षणों की विरचना ( formulation ) पर समाप्त नहीं होती, क्योंकि वे अध्ययनाधीन विषय के संपूर्ण सार ( essence ) को प्रकट नहीं कर सकते। अपाकृष्ट चिंतन ( abstract thought ) अपूर्ण, सामान्य और अद्वंद्वात्मक होता है, जबकि द्वंद्वात्मक चिंतन ( dialectical thought ) गहन रूप से वैज्ञानिक, स्पष्ट, सुसंगत, निश्चायक, यानी मूर्त ( concrete ) होता है। आगमन और निगमन के साथ ही विचार को मूर्त बनाने का एक और प्रमुख उपकरण है साम्यानुमान ( analogy )। इसका विशिष्ट लक्षण है एक विशेष ( particular ) से दूसरे विशेष की ओर विचार की गति। साम्यानुमान आगमन और निगमन के बीच एक प्रकार की मध्यवर्ती, संक्रामी ( transitional ) स्थिति में होता है।

साम्यानुमान एक प्रकार का अनुमानित ( inferred ) ज्ञान होता है, जिसमें वस्तुओं के बीच कुछ मामलों की समानताओं को अन्य मामलों मे उनकी समानता पर निष्कर्ष निकालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसका यह मतलब है कि साम्यानुमान से पहले अध्ययनाधीन वस्तु के संबंध में प्रारंभिक संक्रियाओं ( operations ) का एक सेट पूरा हो चुकना चाहिये। ये संक्रियाएं हैं, पहली, वस्तु के अलग-अलग पक्षों, अनुगुणों, संपर्कों व संबंधों के बारे में अनुभवात्मक ज्ञान का स्वांगीकरण ( assimilation ) और उनका व्यवस्थापन; दूसरी, एक उपयुक्त तुल्यरूप ( analogue ) का ( समरूपता दर्शाने के लिए एक नमूने model का ) चुनाव, जिसके अनुगुणों का सर्वांगीण अध्ययन किया गया है तथा जिसके साथ साम्यानुमान लगाया जायेगा; और तीसरी, तुलनाधीन वस्तुओं के समान लक्षणों तथा नमूने में विद्यमान उस लक्षण के बीच आवश्यक व मौलिक संबंध का निर्धारण करना, जिसे अध्ययनाधीन वस्तु को अंतरित ( transferred ) करना है।

अनुसंधान की प्रारंभिक और सरलतम कार्य-विधि, विभिन्न वस्तुओं या घटनाओं की समान विशेषताओं को सही-सही निर्दिष्ट करना है। यहां महत्वपूर्ण यह है कि पहला, जितनी अधिक समान विशेषताएं संभव हों, उन सबको निर्धारित करना और, दूसरा, इन वस्तुओं या घटनाओं की मूलभूत, अंतर्निहित विशेषताओं में समानता पर जोर देना और गौण तथा सांयोगिक विशेषताओं को पृथक करना। अध्ययनाधीन वस्तुओं, घटनाओं या प्रक्रियाओं की समानताओं तथा भेदों को जितनी ज़्यादा पूर्णता से विश्लेषित किया जाता है, साम्यानुमान के निष्कर्ष उतने ही सही, उतने ही अधिक प्रसंभाव्य ( probable ) होते हैं

अन्य अनुगुणों या पक्षों की समानताओं के आधार पर वस्तुओं या घटनाओं के कुछ अनुगुणों या पक्षों की समानता पर निकाला गया कोई भी निष्कर्ष हमेशा प्रसंभाव्य होता है। साम्यानुमान से निकाले गये निष्कर्षों की प्रसंभाव्यता को बढ़ाने की एक अत्यंत महत्वपूर्ण शर्त यह है कि समानुरूप वस्तुओं या घटनाओं का व्यापक, सर्वांगीण और गहन अध्ययन किया जाये। अध्ययनाधीन वस्तुओं का हमारा ज्ञान जितना पूर्णतर होगा, उनकी संख्या का महत्व उतना ही कम होगा। जहां वस्तुओं का अच्छा अन्वेषण न हुआ हो, उनका सार प्रकाश में न लाया गया हो और उनके भेदों को ध्यान में न रखा गया हो, वहां साम्यानुमान से निकाले गये निष्कर्षों की अच्छी प्रसंभाव्यता का कोई आधार नहीं होता।

साथ ही, यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि तुलनाधीन वस्तुएं पूर्णतः समान नहीं भी हो सकती हैं। साम्यानुमान निश्चित विशेषताओं के अनुसार केवल कुछ ही मामलों में उनकी अनुरूपता ( correspondence ) को प्रमाणित करता है। प्रत्येक तुलना अपूर्ण होती है, प्रत्येक तुलना में तुलनाधीन वस्तुओं या धारणाओं के एक या कुछ पक्षों के संदर्भ में समरूपता दिखलायी जाती है, जबकि अन्य पक्षों को अस्थायी रूप से तथा शर्त के साथ अपाकर्षित ( abstracted ) किया जाता है। चूंकि साम्यानुमान के निष्कर्ष केवल प्रसंभाव्य होते है, इसलिए यह तार्किक प्रमाण के औज़ार का काम नहीं कर सकता है। पर इसके बावजूद यह संज्ञान की एक सबसे अधिक प्रयुक्त पद्धति है।

साम्यानुमान को लागू करने के नियमों की तथा उसका कुशलता से इस्तेमाल करने की जानकारी व्यावहारिक काम में बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। समानुरूपी प्रक्रियाओं, घटनाओं तथा जीवन की स्थितियों के विश्लेषण से विभिन्न समस्याओं के लिए इष्टतम ( optimal ) समाधान खोजना और यह फ़ैसला करना संभव हो जाता है कि ठोस स्थितियों में कैसा व्यवहार किया जाये। मिलते-जुलते संसूचकों ( indicators ) के एक सेट के आधार पर एक प्रक्रिया या घटना के विकास की दिशा का अनुमान लगाया जा सकता है और उसके अवांछित परिणामों से बचने तथा उसके सकारात्मक तत्वों को सुदृढ़ बनाने के लिए, उस पर प्रभाव डालने के तरीक़े व साधनों का निर्धारण किया जा सकता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 6 सितंबर 2015

निगमन और आगमन का एकत्व

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की गमनात्मक पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम निगमन और आगमन के एकत्व को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



निगमन और आगमन का एकत्व
( unity of deduction and induction )

बाहर से देखने पर निगमनात्मक तथा आगमनात्मक विधियां विपरीत दिशाओं में हैं, किंतु अंदर से वे वैज्ञानिक ज्ञान की सारी प्रणाली के द्रुत विकास को बढ़ावा देनेवाले एक गहन द्वंद्वात्मक एकत्व ( dialectical unity ) की रचना करती हैं। इसके साथ ही आगमनात्मक पद्धति की सीमाओं को, उनके परिणामस्वरूप प्राप्त ज्ञान की समस्यामूलक प्रकृति को भी ध्यान में रखना चाहिये। आगमन विधि की ख़ामी यह है कि यह अध्ययनाधीन वस्तु के विकास की प्रक्रिया को ध्यान में नहीं रख सकती है, जबकि निगमन विचाराधीन वस्तु के रूपांतरण की ऐतिहासिक अवस्थाओं के अनुसार संरचित होता है। इसी तरह निगमनात्मक पद्धति की भी अपनी कमजोरियां है कि वह बुनियादी सामान्य आधारिकाओं की कुल तादाद तथा उन आधारिकाओं की सत्यता को प्रमाणित करने की अक्षमता से सीमित होता है।

संज्ञान की वास्तविक प्रक्रिया में आगमन और निगमन की एकता होती है। यह एकता इन दोनों पद्धतियों के फ़ायदों को इस्तेमाल करना संभव बना देती है, इससे एक की ख़ामी का असर दूसरी के गुण से दूर हो जाता है। आगमन, निगमन से अनिवार्यतः संपूरित ( supplemented ) होता है और उसमें निगमन के तत्व शामिल होते हैं। यह विचाराधीन वस्तुओं में एक समान लक्षणों को सही-सही दर्शाने तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि उनके बीच से मूलभूत तत्वों को अलग करता है तथा उनके पारस्परिक संयोजनों व संबंधों को प्रकट करता है, जो निगमन के कुछ तत्वों के बिना असंभव है। दूसरी तरफ़, निगमन को प्रारंभिक आधारिकाओं की सच्चाई तथा तर्क-संगति को ध्यान में रखे बिना तर्कणा की प्रणाली में परिणत नहीं किया जा सकता, जो  एक ऐसी चीज़ है, जिसे आगमन के तत्वों को शामिल करके सुनिश्चित बनाया जाता है।

आगमन और निगमन की पद्धतियों के उपयोग की आवश्यकता वहां पर होती है, जहां प्राप्त सूचना के आधार पर अनुमान लगाकर ज्ञान हासिल किया जाता है। इन पद्धतियों के उपयोग में पारंगत होने से, एक ओर तो, वास्तविकता के तथ्यों तथा घटनाओं के दैनिक व्यावहारिक कार्यों के सामान्यीकरण में दूसरी ओर, सामान्य कार्यों और प्रस्थापनाओं के आधार पर व्यावहारिक समस्याओं के ठोस समाधान पाने में मदद मिलती है।

शिक्षाशास्त्रीय आगमन व निगमन की विधियों के कुशल उपयोग से शिक्षा तथा काम में बहुत व्यावहारिक सहायता मिलती है। आगमन और निगमन का शिक्षाशास्त्रीय उपयोग अनुमानित ज्ञान हासिल करने की तदनुरूप पद्धतियों से इस बात में भिन्न है कि इसका लक्ष्य आधारिकाओं से निष्कर्ष निकालना नहीं, बल्कि ज्ञान की एक इकाई से दूसरी में जाना, विविध संकल्पनाओं ( concepts ) और प्रस्थापनाओं ( propositions ) को प्रकट करना होता है। अध्ययन की हुई सामग्री को व्यवस्थित करने में उसे आगमनात्मक ढंग से भी पेश किया जा सकता है और निगमनात्मक ढंग से भी। यदि वह सामग्री अलग-अलग तथ्यों से सामान्य प्रस्थापनाओं की ओर संक्रमण के रूप में व्यवस्थित व प्रस्तुत की गयी है, तो प्रयुक्त पद्धति आगमनात्मक है, और अगर समस्या का प्रस्तुतीकरण सामान्य प्रस्थापनाओं से प्रारंभ होता है और बाद में अलग-अलग तथ्यों की ओर संक्रमण किया गया है, तो प्रयुक्त पद्धति निगमनात्मक है।

लगभग सभी समस्याओं को आगमनात्मक और निगमनात्मक, दोनों ही तरीक़ों से पेश किया जा सकता है। पद्धति का चुनाव सामान्यतः प्रस्तुतिकरण के लक्ष्यों, स्वयं समस्या की विशिष्टताओं और उन लोगों की विशेषताओं के अनुसार किया जाता है, जिनके सामने वह समस्या पेश की जानी है। समस्या को पेश करने की एक सुप्रचलित, आसानी से समझ में आनेवाली विधि आगमन की सहायता से उपलब्ध होती है, जबकि पेश की जानेवाली प्रस्थापनाओं के परिशुद्ध प्रमाण के लिए निगमन की आवश्यकता होती है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के अध्ययन में इन दोनों पद्धतियों का इस्तेमाल होना चाहिये, प्रत्येक विषय में वरीयता ( preference ) उसे देनी चाहिये, जो शिक्षार्थी को समस्या की अंतर्वस्तु ( content ) को अधिक अच्छी तरह से समझने में तथा प्राप्त ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग करने में समर्थ बनाती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 29 अगस्त 2015

संज्ञान की आगमनात्मक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान की निगमनात्मक पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की गमनात्मक पद्धति को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की आगमनात्मक विधियां
( Inductive methods of cognition )

जहां निगमनात्मक ( deductive ) विधि के ज़रिये ज्ञान के सैद्धांतिक स्तर से आनुभविक स्तर की ओर जाना संभव है, वहीं आगमनात्मक ( inductive ) विधि से उल्टी दिशा में जाना संभव हो जाता है, यानी आनुभविक स्तर से सैद्धांतिक स्तर की ओर। 

व्यवहार में और वैज्ञानिक प्रेक्षण तथा प्रयोग में वैज्ञानिकगण किसी घटना, प्रकृति या सामाजिक जीवन से संबंधित एकसमान तथ्यों को कमोबेश बड़ी संख्या में संचित करते हैं। प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या संयोग तथा परिवर्तनों के अधीन अलग-अलग, असमन्वित ( uncoordinated ) तथ्यों से उनका संनियमन ( govern ) करने वाले वस्तुगत नियमों के बारे में ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है? वैज्ञानिक ज्ञान की रचना करनेवाली आगमनात्मक विधि क़ायदों का, एक तरह का ऐसा समुच्चय है, जिसकी मदद से संवेदनों द्वारा किये गये प्रेक्षणों तथा अलग-अलग तथ्यों के आनुभविक ज्ञान से उनकी बुनियाद में निहित नियमों तक, उनके सार के सैद्धांतिक ज्ञान तक पहुंचा जा सकता है।

आगमन ( induction ), चिंतन का पृथक-पृथक विशेष ( particular ) तथ्यों से सामान्य प्रस्थापना ( general proposition ) की ओर, कम सामान्य से अधिक सामान्य की ओर आना है। आगमन प्रांरभिक आधारिकाओं ( premises ) से अधिक व्यापक सामान्यीकारक निष्कर्ष निकालना संभव बनाता है। आगमनात्मक पद्धति संज्ञानात्मक प्रक्रिया की उन शुरुआती मंज़िलों में कारगर होती है, जब मनुष्य को अनुभवात्मक ज्ञान का बोध होता है, जब वह तथ्यों व आधार-सामग्री का संचय व सामान्यीकरण करता है, एक प्राक्कल्पना ( hypothesis ) को निरूपित करता है और उसकी सच्चाई को जांचता है। इस पद्धति का एक गुण यह है कि इसे केवल एक ही विशेष तथ्य के आधार पर भी विश्लेषण और सामान्यीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसकी विशेषता स्वयंसिद्ध हैं।

आगमनात्मक पद्धति के सुव्यवस्थित उपयोग से ठोस स्थितियों का विश्लेषण करने, तथ्यात्मक सामग्री का सामान्यीकरण करने, प्राक्कल्पनाओं को पेश करने तथा उनकी सच्चाई परखने की क्षमता विकसित होती है। आगमनात्मक विधि का अनुप्रयोग गणितीय सांख्यिकी तथा प्रसंभाव्यता के सिद्धांत ( theory of probability ) के वैज्ञानिक संज्ञान में व्यापक उपयोग से संबंद्ध है। प्रसंभाव्यता सिद्धांत के ज़रिये प्रयोगों, आदि की एक पूरी श्रृंखला में कुछ अनुगुणों ( properties ) के विकास की प्रसंभावना का परिमाणात्मक ( quantitative ) अनुमान लगाया जा सकता है। यदि प्रक्रिया या अनुगुण के स्थायित्व की प्रसंभाव्यता की कोटि बहुत ऊंची है, तो उनके ज्ञान को विज्ञान का नियम माना जा सकता है।

पृथक्कीकृत ( isolated ) भौतिक प्रणालियों में ऊर्जा के नियम ( क्लासिक तापगतिकी का दूसरा नियम ), प्राकृतिक वरण ( natural selection ) का डार्विनीय नियम तथा आधुनिक विज्ञान की अन्य नियमितताओं ( regularities ) तथा नियमों की खोज ऐसे ही की गयी थी। अलग-अलग आंशिक प्रेक्षणों से अधिक सामान्य सैद्धांतिक ज्ञान की तरफ़ जाना संभव बनानेवाली आगमनात्मक विधि विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 22 अगस्त 2015

संज्ञान की निगमनात्मक विधियां

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक पद्धतियों के वर्गीकरण पर चर्चा की थी, इस बार हम संज्ञान की निगमनात्मक पद्धति को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



संज्ञान की निगमनात्मक विधियां
( Deductive methods of cognition )

किसी भी विज्ञान के नियम, प्राक्कल्पनाएं तथा सिद्धांत ज्ञान का एक विशेष स्तर होती हैं जिसे सैद्धांतिक ( theoretical ) कहा जाता है। प्रत्यक्ष प्रेक्षणों तथा प्रयोगों पर, यानी संवेद प्रत्यक्षों पर आधारित ज्ञान उसका दूसरा स्तर है, जिसे आनुभविक ( empirical ) स्तर कहा जाता है। आधुनिक विज्ञान में ज्ञान के सैद्धांतिक तथा आनुभविक स्तर के बीच बड़े जटिल संबंध होते हैं। आधुनिक भौतिकी, साइबरनेटिकी, खगोलविद्या, जैविकी तथा अन्य विज्ञानों के सिद्धांत, प्राक्कल्पनाएं और नियम अत्यंत अमूर्त ( abstract ) होते हैं और उन्हें ऐसी किन्हीं दृश्य, रैखिक मॉडलों, संकल्पनाओं तथा कथनों में व्यक्त नहीं किया जा सकता है जो संवेदन द्वारा प्रत्यक्षीकृत घटनाओं के तुल्य या उन पर अनुप्रयोज्य ( applicable ) हों। ज्ञान के इन रूपों को आम तौर पर गणित के समीकरणों जैसे जटिल प्रतीकात्मक रूपों तथा अमूर्त तर्किक फ़ार्मूलों में व्यक्त किया जाता है। इनको यथार्थता ( reality ) पर लागू करने तथा उनकी सत्यता को परखने के लिए ज्ञान के आनुभविक स्तर की तुलना सैद्धांतिक स्तर से करनी पड़ती है, उनका आमना-सामना करना पड़ता है। इसके लिए संज्ञान की निगमनात्मक विधि ( deductive method ) का इस्तेमाल किया जाता है।

निगमन पद्धति में चिंतन, सामान्य ( general ) से विशेष ( particular ) की ओर जाता है। इस विधि में सामान्य सिद्धांतों, आधारिकाओं ( premises ) से, कम सामान्य या विशिष्ट निष्कर्ष प्राप्त किये जाते हैं। निगमनात्मक पद्धति सैद्धांतिक सामग्री को तार्किक क्रम तथा पूर्णता प्रदान करती है, उसे प्रमाणित व व्यवस्थित करने में मदद देती है। इस विधि में एक सिद्धांत की प्रमुख प्रारंभिक प्राक्कल्पनाओं ( hypotheses ) तथा नियमों को सुसंगत ढंग तथा सख़्ती से परिभाषित, तार्किक और गणितीय क़ायदों द्वारा रूपांतरित ( transform ) किया जाता है। इन रूपांतरणों के फलस्वरूप सूत्रों, प्रमेयों ( theorems ) या प्रस्थापनाओं ( propositions ) की एक लंबी श्रृंखला बन जाती है जो कुछ नियमितताओं को व्यक्त करती है या अध्ययनाधीन वस्तु के निश्चित अनुगुणों ( properties ) तथा संपर्कों ( connections ) का वर्णन करती है। प्रारंभिक बुनियादी नियमों और प्राक्कल्पनाओं से व्युत्पन्न ( derived ) इस ज्ञान की रचना प्रक्रिया को निगमन ( deduction ) कहते हैं और प्राप्त ज्ञान निगमनात्मक ज्ञान है।

निगमनात्मक पद्धति का एक गुण यह है कि इसकी सहायता से निकाले गये निष्कर्ष भली भांति प्रमाण्य ( demonstrable ) होते हैं और परिणामस्वरूप प्राप्त ज्ञान सच्चा और प्रामाणिक ( authentic ) होता है। सही-सही आधारिकाओं से हम तार्किक ढंग से आवश्यक सहज परिणामों को निगमित कर सकते हैं। अगर हमारे पूर्वाधार सही हैं और हम उन पर चिंतन के नियमों को सही ढ़ंग से लागू करते है, तो हमारे निष्कर्ष वास्तविकता के साथ मेल खाते है उसके अनुरूप होते हैं

निगमनात्मक विधि से एक ऐसे क्लिष्ट और अमूर्त सिद्धांतों, जिनमें की प्रत्यक्ष अनुभूतियों का, आनुभाविक स्तर की प्रामाणिकता का अभाव होता है, की बुनियादी प्रस्थापनाओं और नियमों की एक सापेक्षतः छोटी सी संख्या से विभिन्न रूपांतरणों के ज़रिये इस तरह के निष्कर्षों तथा उपप्रमेयों की एक बहुत बड़ी संख्या हासिल करना संभव हो जाता है, जिनको की प्रत्यक्ष संवेदों की अनुभूतियों द्वारा आनुभविक स्तर पर प्रमाणित किया जा सकता है। इस तरह प्रत्यक्षीकृत भौतिक यथार्थता पर अनुप्रयोज्य सिद्धांतों तथा नियमों को एक आनुभविक, यानी संवेदन द्वारा प्रत्यक्षीकृत आशय प्रदान किया जाता है।

उदाहरण के लिए, फ़ार्मूलों में निहित चरों की तुलना कुछ उपस्करों ( instruments ) के पैमानों, विभिन्न विद्युतीय सुइयों या प्रदर्शन पटों के पाठ्यांकों या साधारण दृश्य और श्रव्य प्रेक्षणों, आदि से की जाती है। इस तरह, ज्ञान के सैद्धांतिक और आनुभविक स्तरों के बीच संबंध को और विस्तृतम अर्थ में प्रयोग, प्रेक्षण तथा व्यवहार के साथ सिद्धांत के संबंध को निगमनात्मक विधि से उद्घाटित किया जाता है। मसलन, क्वांटम यांत्रिकी के बुनियादी नियम, स्वयं यथार्थता ( reality ) पर प्रत्यक्ष अनुप्रयोज्य नहीं हैं और प्रायोगिक प्रेक्षणों के परिणामों के साथ तुल्य नहीं हैं। लेकिन गणितीय रूपांतरणों की बदौलत क्वांटम भौतिकी के बुनियादी नियमों की सत्यता को प्रदर्शित ही नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके अत्यंत व्यापक व्यावहारिक अनुप्रयोग ( application ) भी खोजे जा सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 15 अगस्त 2015

वैज्ञानिक पद्धतियों का वर्गीकरण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान की पद्धतियों पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम देखेंगे कि वैज्ञानिक पद्धतियों को समूहों में मुख्य रूप से किस तरह वर्गीकृत किया जा सकता है ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक पद्धतियों का वर्गीकरण

( classification of scientific methods )

विश्व के सैद्धांतिक परावर्तन ( reflection ) की सार्विकता ( universality ) व गहराई की कोटि ( degree ) तथा अध्ययनाधीन वस्तुओं और उनके आंतरिक संयोजनों व संबंधों की विशिष्टताओं के अनुसार, संज्ञान के विषय ( object ) के प्रति अनुसंधानकर्ता के रुख़ ( attitude ) और उसकी मानसिक संक्रियाओं के अनुक्रम व संगठन के अनुसार, संज्ञान की पद्धतियों को तीन मुख्य समूहों में बांटा जा सकता है।

सबसे पहली है सार्विक पद्धति ( universal method )। अपनी अंतर्वस्तु ( content ) में सार्विक पद्धति विचाराधीन वस्तुओं और घटनाओं के सबसे ज़्यादा सामान्य अनुगुणों ( properties ) के अनुरूप होती है और इसीलिए किन्हीं भी वैज्ञानिक पद्धतियों के सर्वाधिक सामान्य लक्षणों को व्यक्त करती है। भौतिकवादी द्वंद्वात्मक पद्धति, एक सार्विक पद्धति के रूप में संज्ञान के सर्वाधिक सामान्य नियमों को निरूपित करती है, इसलिए वह एक विज्ञान के विकास का सामान्यीकृत दार्शनिक सिद्धांत होती है, उसकी सामान्य अध्ययन-पद्धति होती है।

दूसरा समूह है सामान्य पद्धतियां ( general methods )। सामान्य वैज्ञानिक पद्धतियां, जो सारे या अधिकतर विज्ञानों में प्रयुक्त होती हैं, एक बड़े समूह की रचना करती हैं। ये व्यापक वैज्ञानिक उसूलों ( principles ), नियमों तथा सिद्धांतों ( theories ) पर आधारित हैं और वैज्ञानिक संज्ञान ( cognition ) के सामान्य और मौलिक लक्षणों को, स्वयं विचाराधीन वस्तुओं के सामान्य तथा सारभूत लक्षणों को व्यक्त करती हैं। संज्ञान की सामान्य वैज्ञानिक पद्धतियों में शामिल हैं प्रेक्षण, नाप-जोख ( measurement ) और प्रयोग, रूपकीकरण ( formalisation ), अमूर्त से मूर्त की ओर आरोहण ( ascent ), वस्तुओं की ऐतिहासिक व तार्किक पुनरुत्पत्ति ( reproduction ), विश्लेषण और संश्लेषण, गणितीय, सांख्यिकीय तथा अन्य पद्धतियां। प्रारंभिक तार्किक संक्रियाओं ( operations )तथा कार्य-विधियों के आधार पर, मनुष्य के व्यवहारिक कार्यों की तार्किकता के परावर्तन के ज़रिये बनी हुई ये पद्धतियां इस मामले में आम वैज्ञानिक महत्व की हैं कि वे वस्तुगत सत्य के, भौतिक जगत के नियमों व नियमानुवर्तिताओं के संज्ञानार्थ एक महत्वपूर्ण शर्त हैं।

संज्ञान की सार्विक और सामान्य पद्धतियां वस्तुओं के गहन ( in-depth ) तथा सर्वतोमुखी ( all-round ) परावर्तन के लिए अपर्याप्त हैं, क्योंकि किसी भी वस्तु की अपनी ही विशिष्टताएं, गुण ( quality ), अनुगुण, आदि होते हैं।  किसी भी विशेष समस्या के समाधान के लिए समुचित ठोस तरीक़ों और पद्धतियों के चयन की पूर्वापेक्षा की जाती है। यही कारण है कि अपने ऐतिहासिक विकास के दौरान कोई भी विज्ञान, विशेष ( particular ) वैज्ञानिक पद्धतियों की एक प्रणाली का निरूपण करता है। यही पद्धतियों का तीसरा समूह है। इनमें शामिल हैं अनुसंधान की पद्धतियां, जिन्हें एक या कई संबंधित विज्ञानों में इस्तेमाल किया जाता है, जैसे भौतिकी में वर्णक्रमीय विश्लेषण-पद्धति, पुरातत्व विज्ञान में उत्खनन की पद्धतियां, खगोलशास्त्र में राडार की पद्धतियां, आदि।

सामान्य और विशेष पद्धतियों के बीच निरपेक्ष भेद ( absolute distinction ) नहीं है। जब कोई विज्ञान तरक़्क़ी करता है और पहले से अधिक नियमानुवर्तिताओं ( uniformities ) को खोज निकालता है, तो उसकी विशेष पद्धतियां, सामान्य वैज्ञानिक पद्धतियों के रूप में विकसित हो जाती हैं। यह प्रक्रिया विज्ञानों के विकास के दौरान उनके एकीकरण ( integration ) से और भी आगे बढ़ती है। मसलन, तकनीकी और प्राकृतिक विज्ञानों के विकास से गणितीय पद्धतियों के उपयोग का क्षेत्र विस्तृत हो गया और अब वे सामान्य वैज्ञानिक पद्धतियां बन गयी हैं।

वैज्ञानिक संज्ञान की सारी पद्धतियां घनिष्ठता से अंतर्संबंधित हैं और उनका एक दूसरी से पृथक अस्तित्व नहीं है। स्वाभाविक है कि भौतिक विश्व के अध्ययन की प्रक्रिया में उन्हें भी उनके एकत्व ( unity ) में लागू किया जाता है। साथ ही, उस एकत्व के दायरे में इनमें से प्रत्येक पद्धति को किंचित स्वधीनता भी है और वे अपने ही नियमों के अनुसार काम करती हैं। परंतु कोई भी वैज्ञानिक सिद्धांत ऐसी सार्विक, सामान्य और विशिष्ट प्रस्थापनाओं ( prepositions ) पर आधारित होता है, जो भौतिक जगत के तदनुरूप अनुगुणों व नियमों को परावर्तित करती हैं। फलतः, किसी भी वैज्ञानिक अनुसंधान का सार्विक दार्शनिक और विशेष उसूलों, नियमों तथा प्रवर्गों ( categories ) से एकसाथ निर्देशित होना आवश्यक है, पर सार्विक दार्शनिक पद्धति वैज्ञानिक संज्ञान की अन्य सारी पद्धतियों पर परिव्याप्त ( permeate ) होती है, उनकी प्रकृति का निर्धारण करती है और संज्ञान की प्रक्रिया का निर्देशन करती है।

सार्विक पद्धति के रूप में भौतिकवादी द्वंद्ववाद ( materialistic dialectics ) संज्ञान की अन्य पद्धतियों के साथ बंधा है और उनकी अंतर्वस्तु होता है। इसके साथ ही, द्वंद्वात्मक भौतिकवादी पद्धति अन्य वैज्ञानिक पद्धतियों पर भरोसा करती है और प्राकृतिक व सामाजिक विज्ञानों की उपलब्धियों तथा पद्धतियों से समृद्ध बनती है। अगली बार से हम वैज्ञानिक संज्ञान की सबसे ज़्यादा प्रचलित कुछ सामान्य पद्धतियों/विधियों पर एक नज़र डालेंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 8 अगस्त 2015

वैज्ञानिक संज्ञान की पद्धतियों की प्रणाली

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों प्रयोग और प्रेक्षण की महत्ता को समझने की कोशिश की थी, इस बार हम वैज्ञानिक संज्ञान की पद्धतियों पर चर्चा शुरू करेगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान की पद्धतियों की प्रणाली
( the system of methods of scientific cognition )

आधुनिक विज्ञान तेज़ी से विकसित हो रहा है। यह मूल कणों से लेकर सितारों तक, जीवित अंगियों से लेकर रोबोटों तक, एक व्यक्ति के मन से लेकर सारे समाज के पैमाने पर सामाजिक रूपांतरणों ( transformations ) तक प्रकृति व समाज की अत्यंत विविधतापूर्ण वस्तुओं का अध्ययन करता है। यह नये विज्ञानों की रचना तथा निर्माण की ओर ले जाता है, जिसे वैज्ञानिक ज्ञान के विभेदीकरण ( differentiation ) की प्रक्रिया कहते हैं। विज्ञान के विभेदीकरण के फलस्वरूप संज्ञान की अनेक विविधतापूर्ण, विशेषीकृत वैज्ञानिक अध्ययन विधियों/पद्धतियों का विकास हो रहा है।

साथ ही एक विपरीत प्रक्रिया, यानी विज्ञान के एकीकरण ( integration ) की प्रक्रिया भी चल रही है, जो इस तथ्य में व्यक्त होती है कि कुछ विज्ञानों द्वारा विकसित नियमों तथा नियमितताओं का अन्य विज्ञानों में उपयोग होने लगता है। भौतिकी तथा रसायन में बनी संकल्पनाएं ( concepts ) जीवित अंगियों के अध्ययन में इस्तेमाल की जा रही हैं। आर्थिक नियमों को समाज के इतिहास का अध्ययन करने के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है और रोबोटों का निर्माण करने में मनोविज्ञान की उपलब्धियों का उपयोग होता है, आदि। किंतु विज्ञान के इस एकीकरण की सबसे महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति संज्ञान की आम वैज्ञानिक विधियों का विकास व गहनीकरण है, जिन्हें हर प्रकार के अनुसंधान कार्य में लागू तथा प्रयुक्त किया जाता है। उनका अध्ययन करना संज्ञान के सिद्धांत का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है।

विश्व का क्रांतिकारी रूपांतरण उसके वैज्ञानिक संज्ञान के आधार पर किया जाता है। इसके लिए आवश्यक है कि वस्तुओं, प्रक्रियाओं या घटनाओं की विशिष्टताओं, उनके आंतरिक संयोजनों ( connections ) और संबंधों पर समुचित ध्यान दिया जाये। इसलिए ही संज्ञान की पद्धतियां सिद्धांत से, विचाराधीन वस्तु, प्रक्रिया या घटना की क्रिया और विकास के नियमों के से निकटता से जुड़ी हैं। सिद्धांत ( theory ) और पद्धति ( method ) सापेक्षतः ऐसे स्वाधीन रूप हैं, जिनसे मनुष्य परिवेशीय वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) पर नियंत्रण कायम करता है। जहां सिद्धांत वैज्ञानिक ज्ञान के संगठन का एक रूप है, जो यथार्थता के एक निश्चित क्षेत्र के नियमों, मौलिक संयोजनों और संबंधों की पूर्ण रूपरेखा पेश करता है, वहीं पद्धति यथार्थता पर सैद्धांतिक और व्यावहारिक नियंत्रण हासिल करने के तरीक़ो और संक्रियाओं का साकल्य ( totality ) है, जो लोगों को उनके संज्ञानात्मक और लक्ष्योन्मुख ( goal-oriented ) रूपांतरणकारी क्रियाकलाप में निर्देशित करता है

अतः सिद्धांत स्पष्टीकरण का काम करता है, यह दर्शाता है कि कौनसे आवश्यक अनुगुण ( properties ) और संयोजन वस्तु में अंतर्भूत ( immanent ) हैं और उसकी क्रिया और विकास किन नियमों से संचालित होते हैं। जहां तक पद्धति का प्रश्न है, वह एक नियामक ( regulative ) कार्य करती है, यह दर्शाती है कि विषयी ( subject ) को उस विषय ( object ) के प्रति किस प्रकार का रवैया अपनाना चाहिये, जिसे वह समझना या रूपांतरित करना चाहता है तथा अपने लक्ष्य को पाने के लिए उसे कौनसी संज्ञानात्मक या व्यावहारिक क्रियाएं करनी चाहिये। विचाराधीन विषय का वर्णन करने में सिद्धांत यह दर्शाता है कि इस समय यह विषय क्या है, पर पद्धति यह सुझाती है कि उस विषय पर क्या कार्रवाई की जाये

परंतु सिद्धांत और पद्धति काफ़ी स्वाधीन होते तथा भिन्न-भिन्न काम करते हुए भी हमेशा अंतर्संबंधित और परस्पर आश्रित होते हैं। किसी सिद्धांत के बल पर निरूपित ( elaborated ) किसी भी पद्धति के लिए संज्ञानात्मक या व्यावहारिक लक्ष्यों की प्राप्ति में कारगर होने के वास्ते यह जरूरी है कि उसके उसूल ( principles ) उस वस्तु के अनुगुणों और संबंधों को परावर्तित करे, जो संज्ञान या व्यावहारिक कार्यों की लक्ष्य है। सिद्धांत इन अनुगुणों और संबंधों को प्रकट तथा स्पष्ट करता है। इसके साथ ही सिद्धांत में उस वस्तु के अनुगुणों व संबंधों के स्पष्टीकरण की गहनता ( depth ) और प्रामाणिकता तथा व्यवहार में उसके रूपांतरण की गहराई और कारगरता ( effectiveness ), संज्ञान तथा व्यावहारिक क्रिया की समुचित ( appropriate ) पद्धतियों के उपयोग पर निर्भर होती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 1 अगस्त 2015

प्रयोग और प्रेक्षण

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा की थी, इस बार वैज्ञानिक संज्ञान के अन्य रूपों प्रयोग और प्रेक्षण की महत्ता को समझने की कोशिश करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
प्रयोग और प्रेक्षण
( experiment and observation )

जब एक खगोलविद ( astronomer ) अपनी रेडियोदूरबीन ( radio telescope ) से अंतरिक्ष की रहस्यमय गहराइयों से आनेवाली रेडियो तरंगों या एक्स-किरणों को ग्रहण करता है, तो वह एक ऐसे तारे या तारा-पुंज की खोज कर सकता है, जो सामान्य प्रकाशिक दूरबीन ( optical telescope ) के लिए अदृश्य ( invisible ) हैं। एक जैविकीविद ( biologist ) प्रयोगशाला या प्राकृतिक दशाओं में जानवरों का प्रेक्षण करके उनके व्यवहार की किसी ऐसी नियमितताओं की खोज कर सकता है, जो पहले अज्ञात थीं। प्रेक्षण ( observation ) दृश्य, श्रव्य तथा अन्य संवेदनों के द्वारा संवेदनात्मक अनुभव हासिल करने की प्रक्रिया पर आधारित होता है

हम सामान्य जीवन में काम पर या वैज्ञानिक अनुसंधान ( research ) के समय जो सूचनाएं प्राप्त करते हैं, उनमें से बहुत सारी प्रेक्षणों पर आधारित होती हैं। लेकिन वैज्ञानिक प्रेक्षण दैनंदिन प्रेक्षणों से गुणात्मकतः ( qualitatively ) भिन्न होते हैं। मसलन, ऐसे प्रेक्षण निम्नांकित तरीक़ों से किये जाते हैं : (१) विशेष उपकरणों, औज़ारों व यंत्रों के ज़रिये ; (२) विशेष कार्यक्रम या योजनानुसार, नियमतः पहले से चयनित वस्तुओं पर किये जाते हैं ; (३) वे सख़्ती से परिभाषित लक्ष्य ( aim ) के मुताबिक़ होते हैं, यानी असंबंधित तथ्यों ( facts ) को मात्र जमा करके नहीं, बल्कि ऐसे तथ्यों के संकलन से जिनसे नयी प्राक्कल्पना प्रस्तुत करना या पूर्व प्रस्तुत प्राक्कल्पनाओं की परीक्षा करना संभव हो सके ; (४) प्रेक्षण, नियमतः ऐसी वस्तुओं व घटनाओं का किया जाता है, जो दैनिक जीवन में नहीं पायी जातीं ; और अंतिम (५) प्रेक्षण ऊंची सटीकता ( high accuracy ), सूक्ष्मता ( precision ) और विश्वसनीयता ( reliability ), आदि की आवश्यकताओं के अनुरूप होने चाहिए। परंतु इस सबके बावजूद, सबसे जटिल तथा सटीक वैज्ञानिक प्रेक्षण भी हमें घटना की गहराई तथा सार ( essence ) तक पहुंचने में सक्षम नहीं बना सकते। क्यों ?

कोई भी प्रेक्षण, चाहे वह सबसे सही उपकरणों से क्यों न किया गया हो, अध्ययनाधीन वस्तु या घटना को बदले या रूपांतरित ( transform ) किये बिना उसे उसकी प्राकृतिक अवस्था ( natural state ) में ही रहने देता है। परंतु किसी भी वस्तु के गहन आंतरिक संयोजनों ( deep inter connections ) को जानने के लिए उसे रूपांतरित करना, उसमें फेर-बदल करना और यह पता लगाना आवश्यक है कि रूपांतरण की प्रक्रिया के दौरान उसका व्यवहार कैसा होता है। इसके लिए उस वस्तु को उसकी आम कड़ियों तथा दशाओं से पृथक करना, उसे दूसरी दशाओं में रखना तथा उसके क्रियाकलाप की व्यवस्था को बदलना होता है ; उसे उसके विभिन्न भागों में विभाजित करना, अन्य वस्तुओं के साथ टकराना तथा अनपेक्षित परिस्थितियों ( unexpected circumstances ) में काम तथा संक्रिया ( operation ) करने के लिए बाध्य करना होता है। यही वैज्ञानिक प्रयोग ( scientific experiment ) की या प्रायोगिक अनुसंधान की विषयवस्तु भी है। फलतः प्रयोग, व्यवहार ( practice ) का एक विशेष वैज्ञानिक रूप ( form ) है। प्रयोग के दौरान किये जानेवाले प्रेक्षण निष्क्रिय ( passive ) नहीं, बल्कि ‘जीवंत चिंतन-मनन’ ( living contemplation ) के रूप में सक्रिय ( active ) होते हैं। चूंकि प्रयोग स्थापित नियमों और पूर्वनिर्धारित लक्ष्यों यानी एक प्राक्कल्पना ( hypothesis ) की पुष्टि या खंड़न करने और नये नियमों व सिद्धांतों को निरूपित करने के लक्ष्यों के पूर्णतः अनुरूप होता है, इसलिए यह वैज्ञानिक संज्ञान और ज्ञान का एक सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है।

प्रयोगों को कई रूपों में विभाजित करने का रिवाज है : (१) अन्वेषणात्मक ( exploratory ), इसका मक़सद नयी घटनाओं, नये अनुगुणों या घटनाओं के बीच पहले से अज्ञात संपर्कों का पता लगाना है ; (२) परीक्षणात्मक ( testing or checking ), इसका लक्ष्य प्राक्कल्पना की पुष्टि या खंडन करना और उसकी सटीकता का अनुमान लगाना है ; (३) रचनात्मक ( constructive ), जिसके दौरान ऐसे नये पदार्थों, नयी संरचनाओं या नयी सामग्री की रचना की जाती है जो पहले प्रकृति में विद्यमान नहीं थी ; और (४) नियंत्रणात्मक ( control ), जिसका लक्ष्य माप उपकरणों, यंत्रों और औज़ारों की जांच तथा समंजन ( adjustment ) करना है।

प्रायोगिक क्रियाकलाप के ये सभी रूप अक्सर एक ही प्रयोग में अंतर्गुथित ( interwoven ) होते हैं। मसलन, शुक्र ग्रह तक एक अंतरिक्ष प्रयोगशाला के प्रक्षेपण से सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत की कई प्रस्थापनाओं की सटीकता की पुष्टि करना ( परीक्षणात्मक प्रयोग ), ग्रह के वायुमंडल में तथा सतह पर नयी घटनाओं की खोज करना संभव हुआ ( अन्वेषणात्मक प्रयोग ) और उस सिलसिले में नितांत नये यंत्रों तथा उपस्करों का निर्माण किया गया ( रचनात्मक प्रयोग ) और संक्रियाशील उपकरणों की विश्वसनीयता का परीक्षण किया गया ( नियंत्रणात्मक प्रयोग )।

आधुनिक विज्ञान का एक विशिष्ट लक्षण यह है कि अब संज्ञान ( cognition ) की एक सामान्य वैज्ञानिक विधि के रूप में प्रयोगों का न केवल प्राकृतिक विज्ञानों तथा इंजीनियरी में, बल्कि सामाजिक जीवन में भी व्यापक अनुप्रयोग ( application ) होता है। वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति की दशाओं में संज्ञान तथा वास्तविकता ( reality ) को रूपांतरित करने की प्रायोगिक विधियां उद्योग, कृषि, प्रबंध और प्रशासन के सारे क्षेत्रों में आम ( common ) हो गयी हैं। इसमें हम सामाजिक व्यवहार पर विज्ञान के प्रभाव के एक सर्वाधिक शक्तिशाली कार्यतंत्र ( mechanism ) को देखते हैं। यही इसका स्पष्टीकरण है कि प्रत्येक सचेत व्यक्ति को संज्ञान तथा व्यावहारिक क्रियाकलाप में प्रयोग की भूमिका ( role ) को समझने की जरूरत क्यों हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 25 जुलाई 2015

सिद्धांत और प्राक्कल्पना - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समापन करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
सिद्धांत और प्राक्कल्पना - २
( theory and hypothesis - 1 )

वैज्ञानिक सिद्धांतों ( scientific theories ) के अन्य फ़ायदे ( advantages ) भी हैं। वे हमें जैसे व्यावहारिक क्रियाकलाप के लिए हिदायतें ( instructions ) और विश्वसनीय क़ायदे ( rules ) प्रदान करते हैं और वस्तुगत जगत ( objective world ) की घटनाओं को प्रणालीबद्ध ( systematize ) तथा वर्गीकृत ( classify ) करना संभव बनाते हैं। वैज्ञानिक सिद्धांतों में निहित नियमों की इन संभावनाओं का कारण क्या है? बात यह है कि विज्ञान के नियम वस्तुगत यथार्थता ( reality ) के नियमों का परावर्तन ( reflection ) हैं। यथार्थता के नियमों का, चाहे उन्हें मनुष्य ने खोजा हो या न खोजा हो, स्वतंत्र ( independent ) अस्तित्व है। लेकिन हम अपने क्रियाकलाप में उन पर तभी भरोसा कर सकते हैं तथा उन्हें समाज की भलाई के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं, जब उनकी खोज कर ली गयी हो, वे ज्ञात हों और विज्ञान के नियमों की शक्ल में निरूपित ( formulated ) कर दिये गये हों।

एक उदाहरण से यह बात अधिक स्पष्ट हो सकती है। हम जानते हैं कि रासायनिक तत्वों ( elements ) का आवर्तता ( periodic ) नियम, विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की भौतिक संरचना के वस्तुगत, आवश्यक आंतरिक संयोजनों ( necessary inter connections ) तथा रासायनिक अनुगुणों ( chemical properties ) को परावर्तित करता है। इस नियम के आधार पर हम किसी भी रासायनिक तत्व के अनुगुणों को स्पष्ट कर सकते हैं, बशर्ते कि हमें तालिका में उसके स्थान की जानकारी हो और हम इस नियम से अभी भी अज्ञात तत्वों के अनुगुणों का पूर्वानुमान ( prediction ) लगा सकते हैं। स्वयं मेंदेयलेव ने कुछ अज्ञात तत्वों के अनुगुणों की भविष्यवाणी की थी और तत्पश्चात इसी के आधार पर कई और पूर्वानुमान लगाये गये, उनकी और कई नये तत्वों की खोज की गई। इसके अलावा, इस वैज्ञानिक सिद्धांत ने नये तत्व के संश्लेषण ( synthesis ) के प्रायोगिक कार्यों के वास्ते जैसी हिदायते भी दीं। हम समझ सकते हैं कि इस मामले में प्रयत्न और त्रुटि ( trial and error ) की उस विधि का इस्तेमाल करना और नई खोज करना असंभव होता, जिसे हज़ारों वर्ष पहले आसान सी, मामूली समस्याओं को हल करने के लिए उपयोग में लाया जाता था। आधुनिक खोजें केवल गंभीर वैज्ञानिक सिद्धांत के द्वारा ही की जा सकती हैं। क्वांटम यांत्रिकी तथा सापेक्षता के विशेष सिद्धांत के बग़ैर बिजली इंजीनियरी के लिए वांछित, नियंत्रित तापनाभिकीय क्रियाएं ( controlled thermonuclear processes ) करना असंभव है। इसी प्रकार, सैद्धांतिक अणुजैविकी ( molecular biology ) के बिना जीन इंजीनियरी तथा नयी जैविक जातियों ( biological species ) की रचना असंभव है।

इस तरह, वैज्ञानिक सिद्धांत संज्ञान ( cognition ) को सुविधाजनक बनाता है और उसकी रफ़्तार को दसियों और सैकड़ों गुना बढ़ा देता है, हमारे ज्ञान को गहरा व विश्वसनीय बनाता है और हमारे सारे व्यावहारिक क्रियाकलाप की बुनियाद की भांति हमें उस पर निर्माण करने में मदद देता है। यही कारण था कि भौतिकीविद लुडविग वोल्ट्ज़मान साधिकार यह कह सके थे कि, "अच्छे सिद्धांत से ज़्यादा व्यावहारिक और कुछ नहीं है।" वैज्ञानिक सिद्धांतों तथा उनके घटक नियमों की रचना कैसे की जाती है?

प्राक्कल्पना ( hypothesis ), वैज्ञानिक नियमों और सिद्धांतों के मूल का सबसे महत्त्वपूर्ण रूप ( form ) है। एक वैज्ञानिक प्राक्कल्पना सामान्य अटकल ( ordinary guess ) से भिन्न होती है और पूर्वापेक्षा ( presuppose ) करती है कि यह तथ्यों ( facts ), प्रेक्षणों ( observations ) व प्रयोगों ( experiments ) पर सुआधारित और पहले से ही प्राप्त, सुस्थापित वैज्ञानिक उपलब्धियों  के अनुरूप हो। प्राक्कल्पनाएं दो तरह से बन सकती हैं। प्रथम, यह ऐसे प्रेक्षणों की कमोबेश काफ़ी बड़ी संख्या के सामान्यीकरण के रूप में बनती है, जिन्हें किसी कारणवश पहले से विद्यमान सिद्धांतों के द्वारा स्पष्ट नहीं किया जा सकता। ऐसी प्राक्कल्पनाओं को आनुभविक ( यानी अनुभव आधारित ) सामान्यीकरण ( empirical generalization ) कहा जाता है। सागर के ज्वार-भाटे का हज़ारों बार प्रेक्षण करके वैज्ञानिकों ने बहुत समय पहले यह प्राक्कल्पना पेश की कि यह घटना चंद्रमा की स्थिति ( position ) पर निर्भर होती है। कालांतर में इस प्राक्कल्पना को सटीक गणनाओं व प्रेक्षणों से परखा गया और यह एक वैज्ञानिक नियम बन गयी। द्वितीय, एक प्राक्कल्पना किसी वैज्ञानिक की ऐसी सैद्धांतिक अटकल ( theoretical guess ) या अनुमिती ( surmise ) के रूप में प्रकट होती है, जिसमें अन्य सुस्थापित नियमों और सिद्धांतों का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है।

प्राक्कल्पनाओं की उत्पत्ति और उनमें से सर्वाधिक सत्य ( true ) तथा सटीक ( exact ) की परख तथा चयन वैज्ञानिक प्रेक्षणों और प्रयोगों के ज़रिये होता है। प्रेक्षणों और प्रयोगों से परीक्षित ( checked ) तथा परिपुष्ट ( confirmed ) प्राक्कल्पना को महज़ अटकल नहीं, बल्कि कमोबेश सत्य प्रस्थापना ( preposition ) माना जाने लगता है। वैज्ञानिक इसे विज्ञान का नियम समझने लगते हैं, यानी ऐसा वस्तुगत सत्य ( objective truth ) मानने लगते हैं जो स्वयं अध्ययन की गयी वास्तविकता के स्थायी, आवश्यक संपर्कों ( connections ) को परावर्तित ( reflect ) करता है। प्राक्कल्पना का, विज्ञान के नियम में संपरिवर्तन ( conversion ) विश्व के वैज्ञानिक संज्ञान में एक महत्त्वपूर्ण क़दम है। यह संपरिवर्तन व्यवहार ( practice ) के दारा संभव होता है, वैज्ञानिक प्रेक्षण और प्रयोग जिसके अनिवार्य तत्व होते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

शनिवार, 18 जुलाई 2015

सिद्धांत और प्राक्कल्पना - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर द्वंद्ववाद पर कुछ सामग्री एक श्रृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने संज्ञान के द्वंद्वात्मक सिद्धांत के अंतर्गत संज्ञान में व्यवहार की भूमिका का समाहार किया था, इस बार हम वैज्ञानिक संज्ञान के रूपों के अंतर्गत सिद्धांत और प्राक्कल्पना पर चर्चा शुरू करेंगे ।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस श्रृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



वैज्ञानिक संज्ञान के रूप
सिद्धांत और प्राक्कल्पना - १
( theory and hypothesis - 1 )

विज्ञान ( science ) संज्ञान ( cognition ) का उच्चतम रूप है। हमारे सामाजिक जीवन के प्रत्येक पक्ष पर इसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। इस प्रभाव का आधार उद्योग तथा सामाजिक प्रशासन में वैज्ञानिक उपलब्धियों का अनुप्रयोग ( application ) है, जिससे वैज्ञानिक-तकनीकि प्रगति होती है। वैज्ञानिक संज्ञान की सबसे महत्त्वपूर्ण और लाक्षणिक ( characteristic ) विशेषता क्या है ?

प्राचीन बेबीलोन खगोलविद ( astronomers ) तारों और ग्रहों की संस्थिति ( location ) के बारे में अच्छी तरह से जानते थे। उन्होंने सूरज और चंद्रमा के दर्जनों ग्रहणों ( eclipses ) का प्रेक्षण किया था। किंतु वे उनकी गति के प्रक्षेप पथों ( trajectories ) की गणना नहीं कर पाये, यानी भावी ग्रहणों का पूर्वानुमान नहीं लगा पाये। कमोबेश यही स्थिति प्राचीन विश्व में हर सभ्यता में थी। यही नहीं, वे यह भी नहीं बता पाये कि आकाशीय पिंड क्यों घूमते हैं और ग्रहण क्यों होते हैं। आज बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी ही नहीं, स्कूली छात्र भी इन प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं और खगोलविद केवल अलग-अलग ग्रहों की गति की अति सटीकता से भविष्यवाणी ही नहीं कर सकते, बल्कि सारे नक्षत्रों की गति की गणना भी कर सकते हैं और दूरस्थ तारों में जारी भौतिक प्रक्रियाओं का स्पष्टीकरण भी दे सकते हैं।

ऐसा क्योंकर हुआ? ऐसा इसलिए हुआ कि आधुनिक विज्ञान, वैज्ञानिक सिद्धांतों ( scientific theories ) पर भरोसा करता है और ये सिद्धांत पहले से ही विद्यमान घटनाओं का स्पष्टीकरण देने तथा नयी घटनाओं का पूर्वानुमान ( prediction ) लगाने में समर्थ होते हैं। बेबीलोन के खगोलविदों के जमाने में वैज्ञानिक सिद्धांत नहीं थे और वे स्वयं उनकी रचना करने में अक्षम थे। वैज्ञानिक सिद्धांत क्या होता है ?

एक विकसित वैज्ञानिक सिद्धांत, विज्ञान के अंतर्संबंधित नियमों ( interconnected laws ) की एक प्रणाली ( system ) या श्रृंखला ( chain ) होता है। नियमों को तर्कशास्त्र के नियमों तथा गणितीय रूपांतरणों ( transformations ) के ज़रिये अन्य नियमों से निगमित ( deduce ) किया जा सकता है। इन रूपांतरणों के दारा हमें अंततः प्रकृति की उन घटनाओं के बारे में ज्ञान प्राप्त होता है जो प्रस्तुत क्षण पर अस्तित्वमान हैं या भविष्य में होंगी। वैज्ञानिक सिद्धांत का एक सरल उदाहरण है केपलर द्वारा निरूपित सूर्य के गिर्द ग्रहों के घूमने का सिद्धांत। इसमें गणित में व्यक्त तीन नियम शामिल हैं। प्रेक्षणों से प्राप्त कुछः निश्चित प्रारंभिक आधार-सामग्री होने पर एक खगोलविद को नये प्रेक्षण करने की ( जैसा कि बेबिलोनियाइयों को करने होते थे ) कोई आवश्यकता नहीं होती। वह इस आधार सामग्री को केपलर के नियमों को व्यक्त करने वाले सूत्रों में रखकर कुछ गणनाएं कर सकता है और सही-सही बता सकता है कि प्रदत्त क्षण पर अमुक-अमुक ग्रह कहां होगा।

जब न्यूटन द्वारा अन्वेषित ( discovered ) गुरुत्व के नियमों को केपलर के नियमों से जोड़ दिया जाता है, तो हमें एक नये, अधिक शक्तिशाली सिद्धांत की प्राप्ति होती है, जिसकी सहायता से हम आकाशीय पिंडों की संस्थिति का स्पष्टीकरण तथा उसकी भविष्यवाणी ही नहीं कर सकते, बल्कि उनकी गति के कारण, आदि के बारे में भी जान सकते हैं। इसलिए, सिद्धांत भौतिक जगत की घटनाओं के कमोबेश विस्तृत क्षेत्रों को अपने में सम्मिलित ( embrace ) करते हैं, उनके बारे में अत्यंत गहन, विश्वसनीय ज्ञान प्रदान करते हैं, जिससे हम फ़िलहाल जटिल और थका देने वाले प्रेक्षणों का उपयोग किये बिना सारी अपेक्षित सूचना प्राप्त करने में समर्थ हो जाते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम
Related Posts with Thumbnails

ताज़ातरीन प्रविष्टियां