रविवार, 15 अक्तूबर 2017

अधिरचना की प्रणाली में राज्य - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां इतिहास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेरक बल के रूप में वर्ग और वर्ग संघर्ष पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज की अधिरचना की प्रणाली में राज्य पर चर्चा शुरू करेंगे

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।

अधिरचना की प्रणाली में राज्य - १
( the state in the system of the superstructure - 1 )

राज्य ( state ) हमेशा विद्यमान नहीं था। समाज के वर्गों ( classes ) में विभाजित होने तक सैकड़ों-हज़ारों वर्ष के दौरान लोग राज्य तथा शासकीय निकायों व एजेंसियों के बिना ही काम चला लिया करते थे। तो फिर राज्य का जन्म क्यों हुआ? और यह है क्या?

अंग्रेज दार्शनिक टामस हाब्स (१५८८-१६७९) यह मान कर चले कि प्राकृतिक दशाओं में लोग लगातार एक दूसरे से लड़ते हैं क्योंकि ‘आदमी आदमी का दुश्मन है’। कभी बंद न होनेवाले इस संघर्ष में, न मरने के लिए लोग एक सामाजिक अनुबंध ( contract ) करने और सार्विक पुनर्मिलन ( universal reconciliation ) के एक निकाय ( body ) के रूप में, एक राज्य बनाने के लिए विवश हो गये। बाद में बुर्जुआ सिद्धांतकारों ने इस विचार को ही कई संस्करणों में विस्तारित ( elaborate ) किया और आज हमारे युग में भी कमोबेश यही विचार जारी है। वे दावा करते हैं कि राज्य समाज में मेल-मिलाप कराने और, वर्गीय तथा प्रतिरोधी अंतर्विरोधों सहित, सारे अंतर्विरोधों के नियमन ( regulation ) का निकाय है। इसलिए समाज के सारे संस्तरों ( strata ) को चाहिए कि वे एक ऐसे संस्थान ( institution ) के रूप में राज्य का समर्थन करें, जो संपूर्ण समाज के तथा प्रत्येक व्यक्ति के हितों में काम करता है, न कि कुछ निजी समूहों या वर्गों के।

ऐसे विचार वास्तविकता ( reality ) से मेल नहीं खाते हैं। तथ्य यह दर्शाते हैं कि दासों पर स्वामित्ववाला पहला राज्य समाज के वर्गों में बंटने के बाद बना। राज्य, प्रभावी वर्गों ( dominant classes ) के हितों के लिए संघर्ष करने तथा उनकी रक्षा करनेवाले लोगों के विशेष समूहों की सकलता ( ensemble ) है

वास्तव में, राज्य ‘एक वर्ग का दूसरे वर्ग पर प्रभुत्व क़ायम रखने का कार्यतंत्र ( mechanism ) है’। शोषक राज्य ( exploiter state ) कई घरेलू और विदेशी कार्य करता है। इसका मुख्य घरेलू कार्य शोषित ( exploited ) वर्गो के वर्ग संघर्ष ( class struggle ) को दबाना है। इस काम को अंजाम देने के लिए उसमें कई अभिकरण ( agencies ), संगठन और संस्थान शामिल किये जाते हैं, जैसे सेना, पुलिस, जासूसी और प्रतिजासूसी सेवाएं, अदालतें, दंडाधिकारी, सरकार तथा उसकी कार्यकारी एजेंसिया और विधि ( legislative ) निकाय। विधी निकाय, क़ानूनी प्रणाली ( क़ानून, मानक, क़ायदे ) को निरूपित करता है, जो सामाजिक व्यवस्था पर प्रभुत्वशाली वर्गों के हितों तथा दृष्टिकोणों को अभिव्यक्त करते हैं और उनके संकल्प ( will ) तथा प्राधिकार ( authority ) को सुदृढ़ बनाते हैं।

अदालतें तथा क़ानून लागू करने वाले निकाय, इन क़ानूनों के सख़्ती से अनुपालन को सुनिश्चित बनाते हैं, अपराधियों का पीछा करते हैं और उन्हें निर्ममता से दंड देते हैं। यह बात प्रभुत्वशाली वर्ग के उन अलग-अलग सदस्यों पर भी लागू होती है, जो प्रभावी वर्गों के लिए लाभप्रद क़ानून को तोड़ते हैं या क़ानून द्वारा स्थापित व्यवहार के मानदंड का अनुपालन नहीं करते हैं। राज्य, व्यक्तिगत हितों ( personal interests ) की नहीं, बल्कि वर्ग के समान हितों ( common interests ) की रक्षा करता है। इसलिए पूंजीवादी सिद्धांतकारों द्वारा. प्रभुत्वशाली वर्गों के अलग-अलग सदस्यों के ख़िलाफ़ राजकीय उपायों और दंडात्मक कार्रवाइयों के तथ्य को, वर्ग समाजों में राज्य के राष्ट्रीय स्वभाव के साक्ष्य ( evidence ) के रूप में पेश करने के प्रयास नितांत सारहीन ( insubstantial ) हैं।

कोई भी शोषक राज्य, एक या दूसरे प्रभुत्वशाली वर्ग की तानाशाही ( dictatorship ) होता है। इसके अनुसार शोषक राज्यों के तीन प्रकारों में भेद किया जाता है: दासप्रथात्मक ( slave-owning ) राज्य, सामंती ( feudal ) राज्य तथा पूंजीवादी ( capitalist ) राज्य। फलतः, राज्य का प्रकार अंततोगत्वा स्वामित्व ( ownership ) की प्रचलित क़िस्म पर और इस क़िस्म के ही आधार पर बनने वाले प्रमुख उत्पादन संबंधों ( relation of production ) पर निर्भर करता है। अपने कार्य करते हुए राज्य अपने आधार को दृढ़ बनाता और उसकी रक्षा करता है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

समाज में वर्ग और वर्ग संघर्ष

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज के आधार और अधिरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम इतिहास के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेरक बल के रूप में वर्ग और वर्ग संघर्ष पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज में वर्ग और वर्ग संघर्ष
( classes and class struggle in the society )

राज्यों के तथा राजनीतिक पार्टियों के जन्म तथा उनकी कार्यात्मकता ( functioning ) का कारण वर्ग और वर्ग संघर्ष है। समाज के मामलों में वर्गों की महत्वपूर्ण भूमिका, समाज के इतिहास पर उनके संघर्ष के प्रभाव और समाज की दिशा का उसके द्वारा निर्धारण होने के तथ्य की खोज बुर्जुआ इतिहासकारों तथा अर्थशास्त्रियों ने ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) की उत्पत्ति से पहले ही कर ली थी। नियमतः, वे वर्ग विभाजन ( class division ) के कारणों को कुछ लोगों की अन्य पर आत्मिक या नस्लीय श्रेष्ठता ( spiritual or racial superiority ) या  उनकी अंतर्जात ‘कुलीनता’ ( innate nobility ) में देखते थे। यह सच है कि फ्रांसीसी प्रबोधक जां जाक रूसो ( १७१२-१७७८) ने इस आशय की दलील दी थी कि सामाजिक असमानता और वर्ग विभाजन निजी संपत्ति ( private property ) की उत्पत्ति के परिणाम हैंमार्क्स  ने उनकी इस दलील का बहुत ऊंचा मूल्यांकन किया था। किंतु रूसो की ग़लती यह थी कि वे निजी स्वामित्व की स्थापना को व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता ( personal arbitrariness ) का कृत्य समझते थे। उनका कहना था कि यदि पहले-पहले संपत्तिवानों का विरोध किया जाता तो मनुष्य जाति का बाद का इतिहास नितांत भिन्न होता। 

आधुनिक पूंजीवादी सिद्धांतकार समाज के वर्ग विभाजन को मान्यता तो देते हैं, किंतु उसे या तो शाश्वत ( eternal ) या अनुच्छेदनीय ( unabolishable ) मानते हैं या यह दावा करते हैं कि वर्ग हितों ( class interests ) के पारस्परिक विरोध को सार्विक समृद्धि ( universal prosperity ) के समाज की रचना से, किंतु निजी संपत्ति को हाथ लगाये बिना, ख़त्म किया जा सकता है। ऐतिहासिक भौतिकवाद की एक महानतन उपलब्धि वर्गों तथा वर्ग संघर्ष की उत्पत्ति के वस्तुगत कारणों ( objective reasons ) को खोजना और इस प्रस्थापना ( proposition ) को प्रमाणित करना था कि इन कारणों के लुप्त हो जाने पर विश्व इतिहास में अंततः एक नयी अवस्था का, यानी वर्गहीन समाज ( classless society ) की अवस्था का सूत्रपात हो जायेगा। वर्गों और वर्ग संघर्ष की उत्पत्ति के कारण क्या हैं? और वर्ग क्या है?

निजी संपत्ति की उत्पत्ति से पहले समाज में कोई वर्ग नहीं थे। यह तब बनी जब उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) ऐसे पर्याप्त स्तर पर पहुंच गयी, जहां भोजन, कपड़े, शरण, आदि की फ़ौरी जरूरतों की पूर्ति के बाद कुछ अधिशेष ( surplus ) का उत्पादन होने लगा था। इस स्तर पर पहुंच जाने के उपरांत, इस अधिशेष के ज़रिये दूसरों के श्रम ( labour ) को काम में लाना, उसका शोषण करना संभव हो गया। उससे चंद लोगों के पास संपदा ( wealth ) का संचय होने लगा और उसे समाज के अन्य सदस्यों पर आर्थिक शक्ति ( power ) व प्राधिकार ( authority ) की प्राप्ति के लिए इस्तेमाल में लाया जाने लगा। उस प्रक्रिया से समाज भिन्न-भिन्न वर्गों में बंट गया।

सारे सामाजिक समूह, वर्ग नहीं हैं। "वर्ग, लोगों के बड़े-बड़े समूहों को कहते हैं, जो सामाजिक उत्पादन की इतिहास द्वारा निर्धारित पद्धति में अपने स्थान की दृष्टि से, उत्पादन के साधनों ( means of production ) के प्रति अपने संबंधों की दृष्टि से ( अनेक मामलों में क़ानूनों द्वारा निश्चित तथा प्रतिपादित ), श्रम के सामाजिक संगठन में अपनी भूमिका ( role ) की दृष्टि से और फलस्वरूप सामाजिक संपदा के उस भाग की, जो उनके पास रहता है, प्राप्ति की विधि तथा आकार की दृष्टि से भिन्न होते हैं।"

इन लक्षणों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण, उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व ( ownership ) है। जिन वर्गों के पास ऐसी संपत्तियां होती हैं और जो उसे अन्य लोगों के श्रम के परिणामों का विनियोजन करने के लिए इस्तेमाल करते हैं, शोषक वर्ग हैं, जबकि जिन वर्गों के पास ऐसी संपत्ति नहीं होती, उनका शोषण होता है, वे शोषित वर्ग हैं। इसलिए समाज के वर्ग विभाजन के आधार में कुछ संबंध ( relations ) निहित होते हैं और वे उत्पादक शक्तियों के विकास के स्वभाव व स्तर को नियंत्रित ( govern ) करते हैं।

किसी प्रदत्त ऐतिहासिक अवधि में, प्रचलित उत्पादन पद्धति के अनुरूप ही उसके मुख्य वर्ग होते हैं। एक युग में वे थे दास और दास स्वामी ( slaves ans slave-owners ), दूसरे में भूदास और सामंती भूपति ( serfs and feudal lords ) और तीसरे में उजरती मज़दूर और पूंजीपति ( wage workers and capitalists )। समाजवादी समाज में, जहां उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व नहीं होता है और फलतः कोई शोषक वर्ग नहीं होता है, मुख्य वर्ग हैं मज़दूर वर्ग ( working class ) और सहकारी किसानों का समुदाय ( co-operative peasantry )।

मुख्य वर्गों के अलावा अन्य सामाजिक संस्तर भी होते हैं, जो मुख्य नहीं होते और जो अन्य लोगों के श्रम का शोषण नहीं करते हैं ( अलग-अलग किसान, कारीगर तथा दस्तकार, जो पण्य उत्पादक होते हैं ) और कुछ ऐसे विशेष सामाजिक संस्तर भी हैं, जिनकी उत्पादन प्रणाली में कोई सुपरिभाषित स्थिति नहीं होती है, मसलन, बुद्धिजीवी ( intelligentsia ), जो शोषक समाज में नियमतः प्रभावी वर्ग का पल्ला थामें रहते हैं और उनके हितों की सेवा करते हैं। समाजवादी समाज में, जहां मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण नहीं होता, अधिकतर बुद्धिजीवी मज़दूरों और किसानों के परिवारों के होते हैं और उनके हित और लक्ष्य मज़दूर-किसानों के हितों के तदनुरूप होते हैं।

चूंकि समाज के वर्ग विभाजन का कारण सामाजिक उत्पादन का वस्तुगत विकास ( objective development ) है, इसलिए वर्ग भी कुछ निश्चित वस्तुगत अवस्थाओं ( objective conditions ) में ही लुप्त हो सकते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व का उन्मूलन है। चूंकि निजी संपत्ति का प्राबल्य ( prevalence ) होने पर समाज के मुख्य वर्गों के हित, एक दूसरे के विरोधी और असमाधेय ( irreconcilable ) होते हैं, इसलिए उनके बीच वर्गों की उत्पत्ति के समय से ही कटु संघर्ष होता चला आ रहा है। जिन समाजों में कुछ वर्ग अन्य वर्गों की क़ीमत पर अस्तित्वमान हैं, उनमें वर्ग संघर्ष हिंसक और निर्मम है। ऐसे समाजों को प्रतिरोधी समाज ( antagonistic society ) कहते हैं।

उत्पादक शक्तियों और उत्पादन संबंधों के बीच आंतरिक प्रतिरोधी अंतर्विरोध ( antagonistic contradictions ) इसी संघर्ष से हल किये जाते हैं, समाज के संगठन के पुराने रूप विघटित हो जाते हैं और नये रूपों की रचना होती है। जहां तक वर्गों का संबंध है, वे अपने आर्थिक और राजनीतिक लक्ष्यों को जानते-समझते हैं और उन लक्ष्यों की प्राप्ति और अपने विरोधी वर्गों को पराजित करने के लिए आवश्यक कुछ दृष्टिकोण ( views ), मत ( doctrines ) और सिद्धांत ( theories ) पेश करते हैं। वर्ग संघर्ष, उत्पादन तथा आर्थिक क्रियाकलाप से लेकर सामाजिक चेतना तक, समाज के जीवन के सारे पक्षों पर असर डालता है और, इस तरह, साबित कर देता है कि इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेरक बल ( motive force ) वर्ग संघर्ष ही है।

चूंकि शोषक वर्ग, समाज में नियमतः अल्पसंख्यक होते हैं, इसलिए उन्हें ऐतिहासिक विकास की प्रत्येक अवस्था में अपने आर्थिक हितों की हिफ़ाज़त करने और सामाजिक उत्पादन की प्रणाली में अपनी प्रभावी स्थिति को बनाए रखने के लिए विशेष संस्थानों और संगठनों की ज़रूरत होती है। इन सामाजिक संस्थानों में सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं राज्य  ( state ) और पार्टियां ( parties )। ये सारे वर्ग समाजों की अधिरचना का अंग हैं और महत्वपूर्ण क़ानूनी व राजनीतिक कार्य संपन्न करते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

शनिवार, 30 सितंबर 2017

समाज के आधार और अधिरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के आधार और अधिरचना को समझने और सुपरिभाषित करने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।

समाज के आधार और अधिरचना
( basis and superstructure of the society )

ऐतिहासिक प्रत्ययवाद/भाववाद ( historical idealism ) के दृष्टिकोण से समाज अलग-अलग व्यक्तियों और ऐसे एकल व्यक्तियों का समुच्चय है, जो निर्णय लेते हैं और ख़ुद जोखिम उठाकर लागू करते हैं। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति   जैसे एक वीरान द्वीप में अकेले रहनेवाला, एक प्रकार का रॉबिन्सन क्रूसो है। ऐसे विचार घोर व्यक्तिवाद ( extreme individualism ) को व्यक्त करते हैं। बेशक, समाज के मामलों में व्यक्तिगत पहल, अविष्कार तथा उद्यम ( enterprise ) ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनके द्वारा अनेक जटिल समस्याओं का समाधान हुआ है, किंतु व्यक्तिवाद का अर्थ, व्यष्टिक ( individual ) क्रियाकलाप के महत्व को मानने तथा उसे उचित ठहराने में नहीं, बल्कि उसे जनगण की सामूहिक, संयुक्त कार्र्वाइयों और जनता की एकजुटता की संभावना ही के ख़िलाफ़ खड़ा करने और सामूहिक/सामाजिक मूल्यों और आधारों को नकारने में निहित है। परंतु इसके बावजूद, वर्ग संघर्ष, ट्रेड-यूनियनों, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के कार्यों, आदि कि बुनियाद में समान लक्ष्यों तथा हितों के आधार पर निर्मित ऐसी ही एकजुटता अंतर्निहित होती है।

समाज की प्रत्ययवादी तथा व्यक्तिवादी संकल्पना के विपरीत ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) इसे एक जटिल प्रणाली ( complex system ) या एक ऐसा सामाजिक अंगी ( social organism ) मानता है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति विभिन्न सामाजिक बंधनों और संबंधों के ज़रिये अन्य सबसे जुड़ा होता है। समाज को समझने और उसके विकास तथा उसकी कार्यात्मकता ( functioning ) के नियमों का अध्ययन करने के लिए ज़रूरी है कि सबसे पहले मौजूदा सामाजिक बंधनों ( ties ), संबंधों और प्रक्रियाओं को समझा जाये। ऐसे स्थायी बंधनों और संबंधों ही के कारण, पीढ़ियों में परिवर्तन के बावजूद समाज की मुख्य विशेषताएं सदियों तक बनी रहती हैं, वह एक ही वस्तुगत प्रतिमान ( objective patterns ) से संचालित होता है। अतः समाज की जीवन को समझने की कुंजी अलग-अलग ‘रॉबिन्सन क्रूसोओं’ के अध्ययन में नहीं, बल्कि उन सामाजिक संबंधों व संयोजनों ( connections ) के अध्ययन में निहित है, जो लोगों के विभिन्न समूहों और अलग-अलग व्यक्तियों को अपने दायरे में ले लेते हैं।

इनमें से कौनसे संबंध निर्धारक ( determinant ) हैं? उत्पादन पद्धति ( mode of production ) को समाज के विकास तथा उसकी कार्यात्मकता के आधार के रूप में मान्यता देकर ऐतिहासिक भौतिकवाद इस बात को मान्यता देता है कि उत्पादन संबंध ( relation of production ) ही निर्धारक हैं। अन्य सारे संबंध और क्रियाकलाप के रूप ( मसलन, पारिवारिक-घरेलू, क़ानूनी, नैतिक, राजनीतिक, कलात्मक, सौंदर्यात्मक, सैनिक, राष्ट्रीय व अन्य संबंध ) और उनके अनुरूप चेतना भी, वस्तुतः उत्पादन संबंधों के आधार पर ठीक वैसे ही बनते हैं, जैसे आधारशिलाओं पर एक इमारत बनायी जाती है। इसलिए समाज की आर्थिक प्रणाली की रचना करनेवाले उत्पादन संबंधों को समाज का आधार ( basis ) और वैचारिक, क़ानूनी तथा राजनीतिक संबंधों तथा उन सार्वजनिक संगठनों व संस्थानों को, जिनके ज़रिये ये संबंध कार्यान्वित होते हैं, समाज की अधिरचना ( superstructure ) कहा जाता है। अधिरचना में सामाजिक चेतना के वे विभिन्न रूप भी शामिल हैं, जो वस्तुगत सामाजिक घटनाओं तथा प्रक्रियाओं को परावर्तित ( reflect ) करते हैं।

अधिरचना, आधार पर निर्मित तथा उससे निर्धारित ही नहीं होती, बल्कि आधार पर एक सक्रिय प्रतिप्रभाव ( active feedback effect ) भी डालती है। इसलिए हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि वर्ग समाजों ( class societies ) की अधिरचना में वे सार्वजनिक संगठन व संस्थान शामिल होते हैं, जो विभिन्न सामाजिक समूहों तथा वर्गों के हितों ( interests ) को व्यक्त करते हैं और इस कारण से आधार पर भिन्न-भिन्न ढंग से प्रभाव डालते हैं। कुछ, उन वर्गों और सामाजिक समूहों के हितों को व्यक्त करते हुए उसे मजबूत और ठोस बनाते हैं, जिनके लिए यह आधार समाज में प्रभावी स्थिति ( dominant position ) को सुनिश्चित बनाता है। अधिरचना के, अधिकारविहीन व सत्ताविहीन शोषित वर्गों और समूहों के हितों को व्यक्त करनेवाले अन्य तत्व, आधार को कमजोर बनाते हैं और उसे परिवर्तित करने तथा अंततः नये उत्पादन संबंधों, नयी उत्पादन पद्धति और फलतः एक नयी सामाजिक प्रणाली की स्थापना का प्रयास करते हैं। वर्ग समाजों में अधिरचना के सबसे महत्वपूर्ण तत्व राज्य और राजनीतिक पार्टियां हैं। अब हम अधिरचना की इन सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटनाओं की तरफ़ ध्यान देंगे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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समय अविराम

रविवार, 24 सितंबर 2017

समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति - ३

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार यहां समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा जारी थी, इस बार हम उसी चर्चा को और आगे बढ़ाएंगे

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में 
उत्पादन पद्धति - ३
(mode of production as the basis of the development and functioning of society - 3)

आधुनिक पूंजीवादी समाज में उत्पादक शक्तियां ( productive forces ), स्वचालित मशीनों तथा रोबोटों का उपयोग करनेवाली जटिल तकनीकों ( complex technologies ) पर आधारित हैं। उत्पादन की प्रक्रिया में लाखों लोगों को शामिल किया गया है। फलतः उत्पादक शक्तियों का स्वभाव सामाजिक है। परंतु उत्पादन के संबंध, स्वामित्व ( ownership ) के उस निजी ( private ) पूंजीवादी रूप पर आधारित हैं, जो उन उत्पादक शक्तियों के विकास के स्वभाव व स्तर के अनुरूप था, जो पूंजीवाद के विकास की प्रारंभिक अवस्थाओं में बनी थीं। उस काल में उत्पादन के पूंजीवादी संबंध, समाज की उत्पादक शक्तियों के साथ बहुत अधिक पूर्णता के साथ मेल खाते थे और उनके द्रुत विकास के लिए गुंज़ाइश बनाते थे। अब उत्पादन के पूंजीवादी संबंध, उत्पादक शक्तियों के स्वभाव तथा विकास के स्तर से मेल नहीं खाते हैं। यद्यपि ये संबंध तकनीकी प्रगति को नहीं रोक सकते हैं, तथापि वे उसकी गति को बहुत मंद कर देते हैं और उत्पादक शक्तियों के विकास को रोकते हैं। 

फलतः लोगों के संकल्प व इच्छा से अलग, उत्पादक शक्तियों के सामाजिक स्वभाव के अनुरूप ही, उत्पादन के साधनों पर नये, सामूहिक, समाजवादी स्वामित्व की स्थापना करने की एक वस्तुगत ऐतिहासिक आवश्यकता पैदा हो जाती है। इसका तात्पर्य है कि पूंजीवादी शोषण तथा प्रतियोगिता के संबंधों के स्थान पर उत्पादन के नये संबंध, अर्थात पारस्परिक सहायता व मदद के और समाजवादी प्रतिद्वंद्वता व सहयोग के संबंध निश्चय ही वस्तुगत रूप से बनेंगे।

अतः उत्पादक शक्तियों के साथ उत्पादन संबंधों की अनुरूपता के नियम के प्रभावांतर्गत जब नये प्रकार के स्वामित्व की स्थापना होती हैं, तो फलतः स्वामित्व के संबंधों द्वारा निर्धारित अन्य संबंध भी बदलते हैं। ऐसा मुख्यतः भौतिक संपदा के वितरण ( distribution ) के क्षेत्र में होता है। पूंजीवादी समाज में जो बड़ी पूंजी ( capital ) के स्वामी होते हैं, वे सबसे ज़्यादा मुनाफ़े ( profit ) भी प्राप्त करते हैं। अमीर ज़्यादा अमीर और ग़रीब ज़्यादा ग़रीब बनते जाते हैं। इसके विपरीत समाजवादी समाज में भौतिक संपदा ( material wealth ) और सामाजिक कोशों ( social funds ) को, सर्वोपरि रूप से, श्रम के परिमाण ( quantity ) तथा गुणवत्ता ( quality ) के अनुसार वितरित किया जाता है। फलतः उत्पादन की पद्धति में परिवर्तन के साथ उत्पादन संबंध पूर्णतः भिन्न हो जाते हैं।

लोग ऐसे दूरगामी सामाजिक सुधारों से अवगत हो सकते हैं और उन्हें बढ़ावा दे सकते हैं या वे उन प्रभुत्वशाली वर्गों के हितों की रक्षा करते हुए उनका विरोध भी कर सकते हैं जिन्हें पुराने उत्पादन संबंधों को बनाए रखने की चिंता रहती है। परंतु वे, एक ऐतिहासिक प्रक्रिया ( historical process ) के रूप में उत्पादन के समाजवादी संबंधों की देर-सवेर होने वाली स्थापना को रोक नहीं सकते, क्योंकि यह स्थापना उत्पादक शक्तियों के विकास के वस्तुगत स्वभाव ( objective character ) पर आश्रित होती है। उत्पादन पद्धति की लाक्षणिकता को दर्शानेवाले उत्पादन संबंधों की क़िस्म और, सर्वोपरि, उत्पादन के अन्य सारे संबंधों का निर्धारण करनेवाले स्वामित्व की क़िस्म का ठीक इसी अर्थ में वस्तुगत स्वभाव होता है और वे लोगों के संकल्प और उनकी इच्छाओं पर निर्भर नहीं होते। लोग उत्पादन के विकास के नियमों और सर्वोपरि उत्पादन की शक्तियों के विकास स्तर के साथ अनुरूपता के नियम की संक्रिया को कमोबेश बढ़ावा दे सकते हैं या उसमें रुकावट डाल सकते हैं, लेकिन वे इन नियमों का उच्छेदन ( abolish ) नहीं कर सकते, उन्हें रूपांतरित ( transform ) नहीं कर सकते और उनकी क्रिया को रोक नहीं सकते।

इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना पर सचमुच पारंगति हासिल करने के लिए यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि ऐतिहासिक युग इस बात में एक दूसरे में भिन्न नहीं होते कि लोग क्या-क्या उत्पादित करते हैं, बल्कि इस बात में भिन्न होते हैं कि वे कैसे उत्पादित करते हैं, यानी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) में भिन्न होते हैं। लोग केवल भौतिक वस्तुओं का ही उत्पादन नहीं करते, वे धार्मिक, दार्शनिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का, कलात्मक वस्तुओं, नैतिक मानकों तथा मानदंडों, न्यायिक क़ानूनों, आदि का भी ‘उत्पादन’ करते हैं, यानी उनकी रचना, विकास तथा विस्तारण करते हैं। इनकी रचना बौद्धिक ( intellectual ), आत्मिक उत्पादन के अंतर्गत आती है, लेकिन ये सब अधिकांशतः भौतिक संपदा की उत्पादन पद्धति पर निर्भर हो्ते है। बेशक, कलाकृति व साहित्य की रचना के लिए समुचित भौतिक वस्तुओं तथा दशाओं की ज़रूरत होती है। 

फलतः संपदा की उत्पादन पद्धति में परिवर्तन, आत्मिक उत्पादन में परिवर्तन पर प्रभाव डालता है तथा उत्पादन प्रक्रिया में लोगों के क्रियाकलाप और उसके आधार पर उत्पन्न होने वाले संबंध, सामाजिक क्रियाकलाप तथा सामाजिक संबंधों के अन्य सारे रूपों का निर्धारण करते हैं। इस प्रकार भौतिक उत्पादन पद्धति समाज के विकास तथा कार्यात्मकता का आधार सिद्ध होती है और उसे संचालित करनेवाले वस्तुगत नियम, सामाजिक विकास की अन्य सारी नियमसंगतियों की बुनियाद है।



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शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 17 सितंबर 2017

समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में 
उत्पादन पद्धति - २
(mode of production as the basis of the development and functioning of society - 2)

उत्पादन कार्य करते समय लोग उत्पादन के संबंधों की स्थापना में भाग लेते हैं, जो उनके संकल्प ( will ) व चेतना ( consciousness ) पर निर्भर नहीं होते। उत्पादन संबंध उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग की प्रक्रिया में लोगों के बीच बनने वाले संबंध हैं। अतः भौतिक संपदा के उत्पादन की प्रक्रिया या उत्पादन की प्रणाली के दो अंतर्संबंधित पक्ष होते हैं - उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) और उत्पादन के संबंध ( relations of production )। उत्पादक शक्तियां उत्पादन पद्धति की अंतर्वस्तु हैं और उत्पादन के संबंध उसका रूप हैं। अंतर्वस्तु किसी भी घटना का निर्धारक या प्रमुख पक्ष होती है। लेकिन रूप भी एक महत्वपूर्ण सक्रिय भूमिका अदा करता है। यह घटना के अनुरूप होने पर उसके विकास को बढ़ावा देता है और जब यह अनुरूपता गड़बड़ा जाती है तो यह विकास में बाधक बन जाता है।

उत्पादन पद्धति के दो पक्षों के बीच एक वस्तुगत ( objective ) व अनिवार्य, यानी नियमसंचालित संबंध होता है। इस संबंध को ऐतिहासिक भौतिकवाद के संस्थापकों ने खोजा, उसका अध्ययन किया और उसे उत्पादन पद्धति के विकास का संचालन करनेवाले विशेष वस्तुगत नियम की शक्ल में निरूपित किया। इस नियम को उत्पादक शक्तियों के स्वभाव तथा विकास स्तर के साथ उत्पादन संबंधों की अनुरूपता ( correspondence ) का नियम कहते हैं। यह इस बात पर बल देता है कि उत्पादन संबंध, उत्पादक शक्तियों के जितने ज़्यादा अनुरूप हों भौतिक उत्पादन उतनी ही सफलता से विकसित होता है। परंतु यह अनुरूपता, निरपेक्षतः पूर्ण तथा स्थिर कभी नहीं होती है। किसी भी उत्पादन पद्धति के सर्वाधिक गतिशील पक्ष ( mobile side ) होने के नाते उत्पादक शक्तियां, देर-सवेर, अपने विकास में उत्पादन संबंधों से आगे निकल जाती हैं। उनके बीच अननुरूपता ( non-conformity ) या सांमजस्यहीनता ( disharmony ) उत्पन्न हो जाती है। उत्पादन संबंध, अपरिवर्तित रहकर उत्पादन में प्रेरक बल ( motive force ) होने की बजाय उसमें बाधक हो जाते हैं और तब नये उत्पादन संबंध बनाने की वस्तुगत आवश्यकता पैदा हो जाती है। इसके फलस्वरूप एक नयी उत्पादन पद्धति ( mode of production ) उत्पन्न होती है और साथ ही साथ सारे सामाजिक संबंध तथा सामाजिक क्रियाकलाप के अन्य सारे रूपों में भी बदलाव हो जाता है।

जैसा कि हम देखते हैं, उत्पादन संबंध, उत्पादन पद्धति के विकास तथा परिष्करण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। जब हम कहते हैं कि ये संबंध लोगों के संकल्प तथा इच्छाओं से स्वतंत्र रूप में स्थापित होते हैं, तो हम उनके वस्तुगत, भौतिक स्वभाव ( material character ) पर बल देते हैं। किंतु, आख़िरकार, एक दूसरे के साथ संबंध क़ायम करते हुए, उदाहरणार्थ, सहयोग के या प्रतिद्वंद्विता और प्रतियोगिता के, पारस्परिक सहायता या संघर्ष के संबंध क़ायम करते हुए लोग यह समझते हैं कि वे क्या कर रहे हैं और उन्हें अपने कर्मों के बारे में कुछ न कुछ हद तक ज्ञान होता है। तो हम यह कैसे कह सकते हैं कि उत्पादन पद्धति की प्रक्रिया में बने उनके संबंध वस्तुगत होते हैं?

आइये, उत्पादन संबंधों पर कुछ अधिक विस्तार से विचार करें। उनके निम्नांकित घटक हैं : (१) उत्पादन के बुनियादी साधनों, सर्वोपरि, श्रम के उपकरणों पर स्वामित्व ( ownership ) के संबंध, (२) उत्पादन की प्रक्रिया में उत्पन्न प्रत्यक्ष संबंध, और अंतिम (३) श्रम के उत्पादों के वितरण ( distribution ) से जुड़े संबंध, यानी वितरण के संबंध। उत्पादन के इन सारे संबंधों में निर्धारक है स्वामित्व के संबंध ( property relations ), शेष सब उन पर आश्रित हैं। सामाजिक विकास की किसी भी अवस्था में विद्यमान उत्पादन पद्धति की क़िस्म भी, स्वामित्व की क़िस्म पर निर्भर होती है। स्वामित्व के प्रकारों में भेद के अनुरूप ही उत्पादन पद्धति की पांच मुख्य क़िस्में हैं : आदिम-सामुदायिक, दास-प्रथात्मक, सामंती, पूंजीवादी और समाजवादी।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि स्वामित्व, जैसा कि पूंजीवादी दार्शनिक और अर्थशास्त्री कहते हैं, वस्तुओं का विशिष्ट लक्षण नहीं है। एक ही मशीन पूंजीवादी व्यवस्था में निजी संपत्ति है और समाजवादी व्यवस्था में सामाजिक संपत्ति। स्वामित्व, उत्पादन के साधनों के संदर्भ में संबंध का एक विशेष रूप है, जो वस्तुगत ऐतिहासिक आवश्यकता के फलस्वरूप लोगों के बीच स्थापित होता है और जो समाज की उत्पादक शक्तियों के विकास के स्वभाव और स्तर पर निर्भर होता है। मसलन, आदिम समाज में पत्थर के औज़ारों का अस्तित्व था, उस हालत में लोग निजी संपत्ति ( private ownership ) तथा पूंजीवादी मुनाफ़े के विनियोजन ( appropriation ) पर आधारित पूंजीवादी संबंधों की स्थापना नहीं कर सकते थे। उस काल में विद्यमान उत्पादक शक्तियों के निम्न स्तर के लिए मुनाफ़े के उत्पादन को सुनिश्चित बनाना असंभव था। इसलिए, उत्पादन के साधनों पर आम स्वामित्व ( common ownership ) पर आधारित आदिम समाज के सामूहिक संबंध उन आदिम लोगों के संकल्प तथा उनकी चेतना द्वारा नहीं, बल्कि भौतिक उत्पादन की शक्तियों के विकास के स्वभाव तथा स्तर के अनुरूप बने थे।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 10 सितंबर 2017

समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज के विकास पर चर्चा की थी, इस बार हम समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में उत्पादन पद्धति पर चर्चा शुरू करेंगे

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज के विकास तथा कार्यात्मकता के आधार के रूप में 
उत्पादन पद्धति - १
(mode of production as the basis of the development and functioning of society - 1)

वास्तविक जीवन में, लोग विविध प्रकार के कामधाम करते हैं, जैसे पारिवारिक-घरेलू कार्य और उत्पादन, राजनीतिक, वैज्ञानिक, अध्यापकीय, धार्मिक, सैनिक, क्रीड़ा-कलाप, आदि। इनमें से किसी भी कार्य को संपन्न करने में वे एक दूसरे के साथ कुछ निश्चित संबंध क़ायम करते हैं। पहले के युगों के चिंतकों ने, जो नियमतः समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों ( dominant classes ) के हितों को व्यक्त करते थे, मुख्य भूमिका बौद्धिक क्रियाकलाप ( intellectual activity ) को दी। ऐसा इसलिए हुआ कि बौद्धिक क्रियाकलापों से जुड़ी आत्मिक संस्कृति का उत्पादन, यानी दार्शनिक, धार्मिक, राजनीतिक, वैज्ञानिक और अन्य विचारों का विस्तारीकरण प्रभुत्वशाली, शासक वर्गों का विशेषाधिकार ( privilege ) था।

ऐतिहासिक भौतिकवाद की असाधारण उपलब्धि यह समझ है कि समाज के विकास का वास्तविक आधार ( और बौद्धिक क्रियाकलापों सहित अन्य सारी क़िस्मों के कार्यों का आधार ) श्रम की प्रक्रिया, यानी भौतिक संपदा का उत्पादन है। यह प्रस्थापना, जो हमें सरल और बोधगम्य जान पड़ती है, अपने समय के लिए ( जब इसे पेश किया गया था ) समाज के जीवन की समझ में एक वास्तविक क्रांति थी।

जैसा कि हम यहां पहले देख चुके हैं, श्रम और लक्ष्योन्मुख व्यावहारिक कार्यकलाप ही वह मुख्य कारण था, जिसने मनुष्य को जंतु जगत से विलग किया और साथ ही चेतना की उत्पत्ति का आधार था। श्रम ऐतिहासिक विकास और समाज की कार्यात्मकता का आधार है

श्रम प्रक्रिया क्या है? और इसकी संरचना क्या है? इस प्रक्रिया के मूलभूत तत्व निम्नांकित हैं : (१) मनुष्य और उसका ज्ञान व कुशलताएं ; (२) श्रम के औज़ार, यांत्रिक विधियां, उपकरण तथा तकनीकी युक्तियां ; (३) काम की वस्तुएं, जिन्हें मनुष्य प्रकृति से हासिल करता या जिनकी रचना करता और जिन्हें औज़ारों के ज़रिये तैयार माल बनाता है। औज़ारों और श्रम की वस्तुओं को संयुक्त रूप से उत्पादन के साधन ( means of production ) कहा जाता है। वे भौतिक हैं और वस्तुगत रूप में विद्यमान होते हैं। मनुष्य और उसके ज्ञान व कुशलताओं और उत्पादन के समुपयुक्त साधनों से समाज की उत्पादक शक्तियां ( productive forces ) निर्मित होती हैं। यह उत्पादन का वह पक्ष है, जिससे मनुष्य प्रकृति को प्रभावित करता है। औज़ारो के ज़रिये बाह्य जगत पर क्रिया करते हुए मनुष्य उसे परिवर्तित करता है, बाह्य घटनाओं व प्रक्रियाओं को एक ऐसा रूप प्रदान करता है, जो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक उपयुक्त होता है। अपने परिवेशीय जगत को परिवर्तित करते हुए वह स्वयं को भी परिवर्तित करता है। 

मेहनतकशों के ज्ञान व कुशलताओं में परिवर्तन व विकास, औज़ारों तथा संपूर्ण उत्पादन साधनों में परिवर्तन के बाद आते हैं। इसके फलस्वरूप उत्पादक शक्तियों के विकास का स्तर भी ऊंचा उठता है और वे अधिक अच्छी और परिष्कृत हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, कृत्रिम रेशों जैसी नयी कृत्रिम सामग्री ( श्रम की वस्तु ) की रचना के फलस्वरूप नयी कताई मशीनों का अविष्कार हुआ, उसके लिए नये उत्पादन ज्ञान तथा कुशलताओं की जरूरत पड़ी। अपनी बारी में पश्चोक्त ने इन मशीनों को और उत्पादन की सारी तकनीक को सुधारना संभव बनाया, जिसने सामान्यतः उत्पादन शक्तियों के विकास को बढ़ावा दिया।

इस तरह, हम देखते हैं कि उत्पादक शक्तियों में विशुद्ध भौतिक घटक ( औज़ार, यंत्रादि ), और मानसिक, बौद्धिक घटक ( उत्पादन का ज्ञान व कुशलताएं ) दोनों शामिल हैं, किंतु उत्पादन के विकास का प्रमुख, निर्धारक पक्ष भौतिक घटक है। इससे भी अधिक, श्रमिक रूपी मनुष्य प्रमुख उत्पादक शक्ति है, क्योंकि औज़ारों को काम में लानेवाला वही है और वही उत्पादन के समस्त साधनों को परिवर्तित करने में भी योग देता है। हमारे युग में, उत्पादक शक्तियों के विकास के विकास के लिए विशेष वैज्ञानिक ज्ञान की ज़रूरत होती है। यही कारण है कि विज्ञान एक प्रत्यक्ष उत्पादक शक्ति बन रहा है और ज्ञान की भूमिका लगातार बढ़ रही है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 3 सितंबर 2017

प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज का विकास

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधारों के रूप में मनुष्य व उसके क्रियाकलाप पर चर्चा की थी, इस बार हम उसी चर्चा को आगे बढ़ाएंगे और देखेंगे कि समाज का विकास एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया है।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज का विकास
( development of society as a natural-historical process )

एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समाज के विकास का सिद्धांत इस प्रश्न का उत्तर देता है कि मानव क्रियाकलाप के दोनों पक्षों, भौतिक ( material ) और प्रत्ययिक ( ideal ), में से कौन सा पक्ष प्राथमिक और निर्धारक है और कौनसा पक्ष द्वितीयक और निर्धारित है।

प्रकृति में जारी प्रक्रियाओं में से कोई भी मनुष्य के संकल्प ( will ) व उसकी चेतना पर निर्भर नहीं होती। वे सब वस्तुगत ( objective ) या प्राकृतिक होती हैं। अतः, प्रकृति की घटनाओं का विनियमन ( govern ) करनेवाले नियम वस्तुगत हैं। क्या समाज के विकास के वस्तुगत नियम, यानी ऐसे कुछ नियम हो सकते हैं, जो जनगण की चेतना पर निर्भर नहीं होते? याद रहे कि लोगों के क्रियाकलाप में दो पक्ष होते हैं - भौतिक और प्रत्ययिक। इतिहास की भौतिकवादी समझ इस प्रश्न का स्वीकारात्मक उत्तर देती है। इतिहास के अनुभव का सामान्यीकरण ( generalisation ) करते हुए यह समझ इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि सामाजिक विकास के नियम उतने ही वस्तुगत ढंग से और अनिवार्यतः काम करते हैं, जितने कि प्रकृति के नियम, मात्र बुनियादी अंतर यह है कि वे लोगों के क्रियाकलाप के ज़रिये संक्रिया ( operate ) करते हैं। यही कारण है कि समाज के विकास को एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया कहा जाता है।

यह हो सकता है कि लोग इससे अवगत ( aware ) न हो कि उनके क्रियाकलाप, उनके संकल्प तथा इरादों से परे अंततः वस्तुगत सामाजिक नियमों से संचालित होते हैं। ऐसे मामलों में, वे कहते हैं कि समाज स्वतःस्फूर्त ढंग से ( spontaneously ) विकसित होता है। स्वतःस्फूर्तता का यह मतलब नहीं है कि लोग नितांत अचेतन ढंग से ( unconsciously ) काम करते हैं। सामान्य, स्वस्थ लोगों के लिए ऐसा करना बिल्कुल असंभव है। स्वतःस्फूर्त अवस्था में लोगों को केवल अपने सीधे व्यक्तिगत तथा समूहगत लक्ष्यों की जानकारी होती है और वे उन्हीं को निरूपित करते हैं तथा उन्हें हासिल करने के लिए ऐसे साधनों का चयन करते हैं, जो सामाजिक विकास के नियमों पर निर्भर नहीं होते। इस मामले में ऐसा भी हो सकता है कि उनके क्रियाकलाप के परिणाम निश्चित लक्ष्यों के अनुरूप ( correspond ) न हों। जब लोग सामाजिक विकास के वास्तविक, सच्चे नियमों के प्रति सचेत ( conscious ) हों, तो उनके क्रियाकलाप समुचित अर्थों में सचेत होते हैं। सचेत सामाजिक क्रियाकलाप की अवस्था में ही उसके परिणाम लक्ष्यों के अधिकाधिक अनुरूप होते हैं और वे उन्हें प्राप्त कर पाते हैं, क्योंकि इस मामले में स्वयं लक्ष्यों को वस्तुगत ऐतिहासिक नियमितताओं पर समुचित ध्यान देकर प्रस्तुत व निरूपित किया जाता है।

एक प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में इतिहास की संकल्पना ( concept ) मानव क्रियाकलाप के भौतिक पक्ष की निर्धारक भूमिका की मान्यता ( recognition ) पर आधारित है। साथ ही, यह इस तथ्य को भी ध्यान में रखती है कि इस क्रियाकलाप का आत्मिक/प्रत्ययिक पक्ष महत्वपूर्ण सक्रिय भूमिका निभाता है। यह भौतिक पक्ष पर सुस्पष्ट प्रभाव डाल सकता है, हालांकि यह प्रभाव स्वयं लोगों की जीवन क्रिया की भौतिक दशाओं से निर्धारित एवं सीमित होता है। प्राकृतिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के इन दो पक्षों की अंतर्क्रिया ( interaction ) तथा पारस्परिक प्रभाव को अच्छी तरह से समझने के लिए निम्नांकित महत्वपूर्ण प्रस्थापनाओं ( propositions ) को ध्यान में रखने की जरूरत है।

"...‘इतिहास’ ऐसा कोई विशिष्ट व्यक्तित्व नहीं है, जो स्वयं अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए मनुष्य को एक साधन की शक्ल में इस्तेमाल करता हो ; इतिहास, अपने लक्ष्यों का अनुसरण करते हुए मनुष्य के क्रियाकलाप के सिवा और कुछ नहीं है।"

"...मानवजाति अपने लिए हमेशा केवल ऐसे ही कार्यभार ( tasks ) निर्धारित करती है, जिन्हें वह संपन्न कर सकती है। कारण यह है कि मामले को ग़ौर देखने पर हम पायेंगे कि स्वयं कार्यभार केवल तभी उपस्थित होता है, जब उसे संपन्न करने के लिए जरूरी भौतिक परिस्थितियां पहले से तैयार होती हैं, या कम से कम तैयार हो रही होती हैं।"

उपरोक्त प्रस्थापनाओं से यह बात आसानी से समझ में आ जाती है कि सामाजिक चेतना तथा सामाजिक विकास के लक्ष्यों और कार्यभारों के निरूपण ( formulation ) की कितनी बड़ी भूमिका है। और साथ ही यह भी कि इन कार्यभारों का स्वभाव तथा अंतर्वस्तु ( content ), भौतिक दशाओं से तथा मानव क्रियाकलाप के साधनों से निर्धारित होती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि ऐतिहासिक भौतिकवाद का विरोध करनेवाले वस्तुस्थिति को विरूपित ( distort ) करते हैं, मानव क्रियाकलाप के प्रत्ययिक, मानसिक पक्ष के महत्व का समुचित आकलन नहीं कर पाते हैं, वे या तो उसे अतिरिक्त महिमामंडित ( glorify ) करते हैं या उसके महत्व का अवआकलन ( underestimate ) करते हैं। इसके साथ ही, वे यह भी नहीं समझ पाते हैं कि इतिहास की वास्तविक अंतर्वस्तु के रूप में लोगों के सोद्देश्य क्रियाकलाप को समुचित मान्यता देने से, इस वास्तविकता के साथ कोई अंतर्विरोध या खंडन नहीं होता कि इस क्रियाकलाप का निर्धारक पक्ष ( determinant side ) भौतिक दशाएं तथा उनके क्रियान्वयन के साधन ( means of realisation ) हैं।

हम यहां पहले भूतद्रव्य ( matter ) तथा चेतना के संबंध पर विचार करते समय प्रमाणित कर चुके हैं कि भूतद्रव्य वह वस्तुगत यथार्थता ( objective reality ) है, जो मस्तिष्क के उत्पादों से परे ( outside ) तथा उनसे स्वतंत्र रूप से अस्तित्वमान ( independently exist ) है। इसके विपरीत चेतना ( consciousness ) मस्तिष्क के क्रियाकलाप का परिणाम है और इस अर्थ में आत्मगत ( subjective ) है। इस वर्णन के साथ सादृश्य ( analogy ) के अनुसार ही हम आगे मानव क्रियाकलाप के वस्तुगत यानी भौतिक, और प्रत्ययिक यानी मानसिक पक्षों के बारे में तथा सामाजिक विकास के वस्तुगत और आत्मगत कारकों ( factors ) के बारे में भी चर्चा करेंगे। उनकी अंतर्क्रिया की बेहतर समझ हासिल करने के लिए हमें मानव क्रियाकलाप के विविध रूपों की सविस्तार जांच करनी होगी तथा उनके आधार में निहित वस्तुगत नियमों को प्रकाश में लाना होगा।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

शनिवार, 26 अगस्त 2017

मनुष्य व उसके क्रियाकलाप

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां विषय-प्रवेश करते हुए भाववादी दृष्टिकोणों की कुछ मूल प्रस्थापनाओं और उनकी सीमाओं को प्रस्तुत किया था, इस बार हम इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधारों के रूप में मनुष्य व उसके क्रियाकलाप पर चर्चा करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



मनुष्य व उसके क्रियाकलाप 
( man and activity )
इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना के पूर्वाधार
( preconditions for the materialist conception of history )

ऐतिहासिक भौतिकवाद के प्रमुख उसूल ( principles ) क्या हैं? समाज व उसके इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना का क्या आशय है?

उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें उस प्रस्थान-बिंदु या आधारिका को निर्धारित व परिभाषित करना होगा, जहां से हम अपने विचार-विमर्श की शुरुआत कर सकते हैं। मानव क्रियाकलाप के विशिष्ट लक्षण क्या हैं?

प्रकृति में सारे परिवर्तन वस्तुगत ( objective ) होते हैं। वे चिंतन ( thought ) या किसी भी प्रकार की चेतना ( consciousness ) से जुड़े हुए नहीं होते हैं। इसके विपरीत, मनुष्य के क्रियाकलाप का मुख्य विशिष्ट लक्षण यह है कि उसकी प्रत्येक क्रिया में दो अंतर्संबंधित पक्ष ( interconnected aspects ) होते हैं : भौतिक ( material ) और प्रत्ययिक ( ideal ), जिसमें चिंतन भी शामिल है। नींद या रुग्ण, अचेतावस्था में किये गये कृत्यों को छोड़कर, एक स्वस्थ, सामान्य व्यक्ति की कोई भी क्रिया चेतना के किसी कृत्य के साथ जुड़ी होती है। कार्य कर सकने से पहले एक व्यक्ति अपने लिए कोई लक्ष्य निर्धारित करता है। यह लक्ष्य किसी ऐसी चीज़ के बारे में एक बिंब, संकल्पना या धारणा होता है, जिसका अस्तित्व नहीं है, किंतु जिसके लिए उसे प्रयास करना ही है। व्यक्ति का लक्ष्य कुछ वस्तुएं हासिल करना, एक मकान बनाना, आदि हो सकता है। एक श्रम समष्टि का लक्ष्य किसी उत्पादन प्रक्रिया को सुधारना, एक नया औद्योगिक समुच्चय बनाना, आदि हो सकता है। एक समाज का लक्ष्य जीवन की भौतिक दशाओं को बदलना और एक नयी समाज व्यवस्था बनाना हो सकता है।

संक्षेप में, संपूर्ण क्रियाकलाप और क्रियाकलाप का प्रत्येक घटक, दो पक्षों, भौतिक और प्रत्ययिक पक्षों का एक एकत्व ( unity ) होता है। एक व्यक्ति की कोई भी भौतिक क्रिया ( चलना-फिरना, लकड़ी चीरना, खराद पर काम करना, आदि ) यह मांग करती है कि किये गये कार्यों का आशय समझा जाये, क्रियाकलाप के क़ायदों की जानकारी हो, कुछ कुशलता प्राप्त हो तथा कार्य करनेवाले को अपने लक्ष्य की जानकारी हो। इन बातों के बिना मनुष्य के क्रियाकलाप असंभव हैं। इसके विपरीत, भौतिक दैहिक क्रियाकलाप के बिना, भौतिक साधनों और औज़ारों के उपयोग के बिना, व्यक्ति का एक भी विचार, एक भी लक्ष्य कार्यान्वित नहीं हो सकता है। एक व्यक्ति के स्वयं विचार भी, किसी अन्य की समझ के लिए केवल भाषाई क्रियाकलाप से ही सुलभ हो सकते हैं, जो कि एक नितांत भौतिक क्रिया है। इस प्रकार मनुष्य के क्रियाकलाप में भौतिक और प्रत्ययिक पक्ष घनिष्ठता से जुड़े और अविभाज्य हैं। यह एक द्वंद्वात्मक एकता ( dialectical unity ) है, जिसमें प्रतिपक्षी ( opposites ) एक दूसरे को संपूरित ( supplement ) करते हैं और अंतर्गुथित ( intertwine ) होते हैं।

परंतु प्रश्न उठता है कि मानव क्रियाकलाप के भौतिक और प्रत्ययिक पक्षों के संबंध में प्राथमिक और निर्धारक ( determinant ) कौन है?

जहां तक इस प्रश्न का संबंध है, अंग्रेज इतिहासकार तथा दार्शनिक कॉलिंगवुड ( १८८९-१९४३ ) ने दावा किया कि मनुष्य के क्रियाकलाप में मुख्य चीज़ उसका ‘आंतरिक पक्ष’, यानी विचार, भावनाएं, प्रेरणाएं, इरादे, लक्ष्य तथा सचेत निर्णय हैं। ‘बाह्य पक्ष’, यानी संवेद द्वारा प्रत्यक्षीकृत ( sense-perceived ) भौतिक कर्मों व क्रियाओं पर केवल उसी सीमा तक विचार करने की ज़रूरत है, जिस सीमा तक वे मानव चेतना की गहराई में पैठने में सहायता करती हैं। उनके दृष्टिकोण से, इतिहास को समझने का अर्थ लोगों के प्रयोजनों, इरादों तथा लक्ष्यों को समझना है। यह इतिहास की लाक्षणिक भाववादी संकल्पना ( idealist conception ) है। इसके आधार पर यह स्पष्ट करना असंभव है कि मिलती-जुलती ऐतिहासिक दशाओं में लोगों के बीच मिलते-जुलते लक्ष्य, आकांक्षाएं और इरादे कैसे विकसित हो जाते हैं ; ये लक्ष्य, आकांक्षाएं और इरादे भिन्न-भिन्न सामाजिक समूहों और वर्गों के सदस्यों के बीच भिन्न-भिन्न क्यों होते हैं ; और अंतिम, कुछ निश्चित दशाओं में लोगों के कुछ लक्ष्य तथा इरादे कार्यान्वित किये जा सकते हैं और कुछ अन्य कार्यान्वित नहीं होते और अनेपक्षित परिणामों पर और यहां तक कि उल्टे परिणामों पर क्यों पहुंचा देते हैं। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य अपने को, अपनी जीवन क्रिया की भौतिक दशाओं से, केवल कल्पना में ही अलग कर सकता है।

समाज के जीवन के विशिष्ट स्वभाव तथा इतिहास को समझने के लिए, मानव क्रियाकलाप को भौतिक और प्रत्ययिक, दोनों पक्षों को एक एकत्व के रूप में, एक को दूसरे से पृथक किये बिना तथा उन्हें एक दूसरे के मुक़ाबले में रखे बग़ैर, उनके अंतर्संयोजन ( interconnections ) में देखना अनिवार्य है। इसके वास्ते इस प्रश्न का जवाब देना जरूरी है कि इस क्रियाकलाप का कौन सा पक्ष प्राथमिक और निर्धारक है और कौनसा पक्ष द्वितीयक और निर्धारित है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 20 अगस्त 2017

समाज के भाववादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

हे मानवश्रेष्ठों,

जैसा कि पिछली बार कहा गया था, हम यहां ऐतिहासिक भौतिकवाद पर एक शृंखला शुरू कर रहे हैं। इस बार यहां विषय-प्रवेश करते हुए, अगली बार से हम विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत सामाजिक सत्ता और सामाजिक चेतना के अंतर्संबंधों को समझने की कोशिश करते हुए चर्चा को आगे बढ़ाते रहेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


समाज की भौतिकवादी संकल्पना और इसका इतिहास

समाज के भाववादी/प्रत्ययवादी और भौतिकवादी दृष्टिकोण

( idealist and materialist conceptions of society )

जिस तरह कि हम भूतद्रव्य ( matter ) और चेतना ( consciousness ) के मामले में पहले देख चुके हैं, सामाजिकआस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) के बीच संबंध और प्राथमिकता वाले प्रश्न, यानी कि किस चीज़ को आद्य ( primitive ), प्राथमिक, निर्धारक, दुनिया का आधार माना जाये - सत्ता या चेतना को? का उत्तर सभी कालों के दार्शनिकों को दो मूल विरोधी शिविरों - भौतिकवादी और भाववादी - में विभाजित कर देता है। इन मूल धाराओं की कई थोड़ी अलग-अलग धाराएं अस्तित्व में आती जाती हैं जो कि कुछ सैद्धांतिक मत-भिन्नताएं रखती हैं फिर भी उनके सारतत्व ( essence ) के अनुसार वे अंततः किसी एक धारा के अंतर्गत पहचानी जा सकती है।

समाज के भौतिकवादी और भाववादी दृष्टिकोणों के बीच मूलभूत अंतर को स्पष्ट करने के लिए हम यहां उनकी कुछ मूल प्रस्थापनाओं को देख सकते हैं।

आत्मगत भाववादियों ( subjective idealists ) के अनुसार भौतिक वस्तुएं एक दूसरे से मिलती जुलती होती हैं किंतु लोगों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी अद्वितीय व्यष्टिकता ( inimitable individuality ) है, जो उन्हें एक दूसरे से विभेदित ( distinguish ) करती है। वे निष्कर्ष निकालते हैं कि लोगों के क्रियाकलाप के कोई वस्तुगत ( objective ) नियम नहीं होते क्योंकि वे व्यक्तिगत अद्वितीय लक्ष्यों द्वारा निर्देशित होते हैं। और जो भी अद्वितीय तथा सांयोगिक है, वह नियमों से संचालित नहीं हो सकता। इसलिए वे समाज में मुख्य चीज़, उसके लक्ष्य ( aims ), संकल्प ( will ) तथा अलग-अलग लोगों के इरादों को मानते हैं। यह धारा सबसे अधिक दिलचस्पी महान व्यक्तियों में दिखाती है क्योंकि वे समूहों को अपनी और आकृष्ट करते हैं, एक ऐसे चयनित पथ पर उनका नेतृत्व करते हैं जिसका कोई पूर्वज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि वे रचनात्मक व्यक्ति होते हैं। इनका मानना है कि समाज के विकास के बारे में बातें करना निरर्थक है, केवल अलग-अलग व्यक्तियों के विकास की ही बातें की जा सकती हैं।

वस्तुगत भाववादी ( objective idealists ) उपरोक्त से भिन्न यह सोचते हैं कि लोग सामान्य नियमों के अधीन हैं और उनसे संचालित होते हैं। परंतु ये सामान्य नियम, विचारों के, सामाजिक चेतना के विकास के नियम हैं जो हर युग में व्यक्तियों, व्यष्टिक कामनाओं ( desires ) और संकल्पों को संचालित करते हैं। मसलन, मध्ययुग में लोग बड़े पैमाने पर धर्मप्रवण थे क्योंकि ईश्वर का प्रत्यय ( idea ) प्रभावी था। इंगलैंड और फ्रांस में बुर्जुआ क्रांति की पूर्वबेला में स्वतंत्रता का विचार प्रमुख था और बुर्जुआ वर्ग ने सामंतवादी राज्य-तंत्रों के ख़िलाफ़ संघर्ष में इसका उपयोग किया। इनके अनुसार इसी तरह हमारे युग में यदि सार्विक कल्याण तथा वर्ग भ्रातृत्व ( class brotherhood ) के विचार आम हो जाते हैं और अगर वे लोगों के मन में घर कर लेते हैं, तो वर्ग संघर्ष ( class struggle ) सहित सारा संघर्ष ख़त्म हो जायेगा और मौजूदा सामाजिक प्रणाली हमेशा के लिए अभिपुष्ट ( confirmed ) हो जायेगी। दूसरे शब्दों में, लोग हमेशा किन्हीं विचारों के अनुसार व्यवहार करते हैं। जरूरी सिर्फ़ यह है कि इन विचारों को सही ढंग से समझा जाये।

द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) इन दोनों मतों के अधिभूतवादी उपागम ( metaphysical approach ) को सामने लाता है। ये मत अधिभूतवादी इसलिए हैं कि ये यथार्थता ( reality ) के एक पक्ष ( aspect ) को लेकर उसे दूसरे पक्षों के मुक़ाबले में रख देते हैं और इस तरह यथार्थ को समग्रता ( totality ) में नहीं देख पाते। आत्मगत और वस्तुगत भाववाद यह नहीं समझा सकते हैं कि समाज दासप्रथात्मक, सामंतवादी, पूंजीवादी और समाजवादी व्यवस्थाओं से ही होकर क्यों गुजरता है? यदि समाज में वस्तुगत नियम और प्रतिमान ( pattern ) नहीं हैं, तो इंगलैंड, फ्रांस, अमरीका, नीदरलैंड आदि देशों में संपन्न पूंजीवादी क्रांतियों के लक्षणों की समानताओं का क्या कारण है? यदि सब कुछ व्यक्तिगत स्वेच्छाचारिता पर निर्भर है, तो विश्व में समाज के विकास का प्रतिरूप लगभग एक जैसा क्यूं है और क्यों कुछ देशों ने समाजवाद की राह पकड़ी?

भाववाद इस तथ्य का कोई सार्थक स्पष्टीकरण नहीं दे पाता है कि कि एक युग में कुछ विचार प्रमुख होते हैं और दूसरे युग में दूसरे विचार और बहुधा विरोधी विचार प्रमुख हो जाते हैं। मसलन, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का विचार, प्राचीन काल में उत्पन्न क्यों नहीं हो सकता था? इसके अलावा, भाववादी विचार यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि अवाम एक ऐतिहासिक युग में कुछ नेताओं का अनुसरण ( follow ) करते हैं और अन्य के दृष्टिकोणों ( views ) तथा आह्वानों ( calls ) को ठुकरा देते हैं। इतिहास में ऐसी अवधियां थीं, जब अवाम ने स्वयं अपनी ही पांत के लोगों की अगुआई में चलनेवाले सामाजिक आंदोलनों में भाग लिया।

आत्मगत और वस्तुगत भाववाद इनमें से किसी भी प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं देते हैं, जबकि ऐतिहासिक भौतिकवाद, जो सामाजिक समस्याओं की अत्यधिक जटिलता ( complexity ) को मान्यता देता है, ऐसे सिद्धांतों को प्रतिपादित करता है जो कि अपनी सक्रिय स्थिति को विकसित और विस्तारित ( elaborate ) कर सकते हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

शनिवार, 12 अगस्त 2017

एक नई शृंखला की शुरुआत

एक नई शृंखला की शुरुआत


हे मानवश्रेष्ठों,

हम यहां काफ़ी समय पहले दर्शन पर एक शृंखला प्रस्तुत कर चुके हैं। दर्शन की उस प्रारंभिक यात्रा में हमने दर्शन की संकल्पनाओं ( concepts ) तथा दर्शन और चेतना के संबंधों को समझने की कोशिश की थी। तत्पश्चात हमने यहां उसे ही आगे बढ़ाते हुए, द्वंद्ववाद ( dialectics ) पर, जिसे द्वंद्वात्मक भौतिकवाद ( dialectical materialism ) के अंतर्गत समझा जाता है, पर एक शृंखला यहां प्रस्तुत की थी। वह सामग्री यहां उपलब्ध है ही, साथ ही उस सामग्री के समेकित पीडीएफ़ डाउनलोड़ लिंक ‘दर्शन और चेतना’ तथा ‘द्वंद्ववाद-समग्र-द्वंद्वात्मक भौतिकवाद’ भी साइड़बार में प्रदर्शित है। इच्छुक मानवश्रेष्ठ उससे पुनः गुजर सकते हैं।

अब हमारी योजना है कि दर्शन पर उस शृंखला को आगे बढ़ाया जाए और सामाजिक अस्तित्व या सत्ता ( social being ) और सामाजिक चेतना ( social consciousness ) को समझने के प्रयासों के संदर्भ में इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना यानी ऐतिहासिक भौतिकवाद ( historical materialism ) के ज्ञान और सिद्धांत से परिचित होने की कोशिशें शुरू की जाएं।

दर्शन का बुनियादी सवाल यह होता है कि परिवेशीय जगत के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और क्या मनुष्य उसे जान तथा परिवर्तित कर सकता है। इस तरह इस सवाल का पहला पक्ष परिवेश के साथ उसके संबंधों से है और आम तौर पर इसे इस तरह निरूपित किया जाता है कि आसपास की वास्तविकता ( reality ) या भूतद्रव्य ( matter ) के साथ चेतना और चिंतन का संबंध क्या है?  पूर्व में हम यहां पर भूतद्रव्य और चेतना के अंतर्संबंधों पर ‘दर्शन और चेतना’ शीर्षक से प्रस्तुत सामग्री के अंतर्गत चर्चा कर चुके हैं। किंतु मनुष्य समाज में रहता है और उसे सामाजिक विकास के नियमों में सबसे ज़्यादा दिलचस्पी होती है। उन्हें समझने के लिए दर्शन के बुनियादी सवाल को सामाजिक जीवन के संदर्भ में जांचना आवश्यक है। इसका मतलब यह है कि हमें सामाजिक अस्तित्व या सत्ता और सामाजिक चेतना के बीच संबंध का और इस बात का स्पष्टीकरण देना होगा कि जनगण के क्रियाकलाप और समाज के इतिहास में, इनमें से प्राथमिक और निर्धारक ( primary and determining ) तत्व क्या है। इसका उत्तर हमें ऐतिहासिक भौतिकवाद यानी इतिहास की भौतिकवादी संकल्पना से प्राप्त होता है।

हम इस नई श्रृंखला में ऐतिहासिक भौतिकवाद तथा इससे संबंधित विभिन्न संकल्पनाओं/अवधारणाओं को समझने की कोशिश करेंगे। हम देखेंगे कि सामान्य जीवन में हम इन दार्शनिक अवधारणाओं से अपरिचित होते हुए भी, जीवन से मिली सीख के अनुसार ही भौतिकवादी चिंतन और पद्धतियों का प्रयोग करते हैं, निर्णय और तदनुकूल व्यवहार भी करते हैं। परंतु यह भी सही है कि कई बार, कई जगह हम अपने वैचारिक अनुकूलनों ( conceptual conditioning ) के प्रभाव या सटीक विश्लेषण-संश्लेषण ( analysis-synthesis ) के अभाव के कारण कई परिघटनाओं ( phenomena ) की समुचित व्याख्या नहीं कर पाते, सही समझ नहीं बना पाते और तदनुकूल ( accordingly ) ही हमारे निर्णय और व्यवहार भी प्रभावित होते हैं। इस श्रृंखला से गुजरकर हम निश्चित ही, अपनी चिंतन प्रक्रिया और व्यवहार को अधिक सटीक तथा अधिक बेहतर बनाने में अधिक सक्षम हो पाएंगे, अपने व्यक्तित्व और समझ का परिष्कार ( refinement ) कर पाएंगे।

आलोचनात्मक संवादों और नई जिज्ञासाओं का स्वागत रहेगा ही।

शुक्रिया।

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