रविवार, 22 अप्रैल 2018

सामाजिक मानसिकता और दैनंदिन चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक मानसिकता और दैनंदिन चेतना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक मानसिकता और दैनंदिन चेतना
(social psychology and everyday consciousness)

वैचारिकी (ideology) का विकास समाज के सारे सदस्यों द्वारा नहीं, बल्कि लोगों के, विचारकों के एक समूह के द्वारा होता है, जो एक विशेष वर्ग (class) का ‘हितसाधन’ करते हैं। किंतु ये विचारक अपनी कच्ची सामग्री कहां से खोद निकालते हैं और समाज तथा मनुष्य, आदि के बारे में अपनी प्रारंभिक संकल्पनाएं (concepts) और धारणाएं (notions) कहां से लाते हैं ? वे अपनी सामग्री, सामाजिक मानसिकता (social psychology) तथा दैनंदिन यानी आम चेतना (ordinary consciousness) से हासिल करते हैं। आधुनिक समाज में विज्ञान और, सर्वोपरि, समाज को जानने से संबंधित शास्त्र, वैचारिकी के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। इसलिए ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन के लिए विज्ञान तथा वैचारिकी का अंतर्संबंध विशेष दिलचस्पी का विषय है।

सामाजिक मानसिकता विभिन्न सामाजिक समूहों की जीवन क्रिया के, यानी काम, राजनीतिक संघर्ष, पारस्परिक संसर्ग, आदि के दौरान उत्पन्न उनके अनुभवों, भावावेगों और दृष्टिकोणों की समग्रता (aggregate) है। यह सामाजिक सत्व (social being) के स्वतःस्फूर्त परावर्तन (spontaneous reflection) का एक प्रत्यक्ष रूप है।

समाज का प्रत्येक सदस्य, एक ही समय में कई सामाजिक समूहों का सदस्य भी होता है, मसलन, परिवार, उत्पादन श्रम समष्टि, ट्रेड-यूनियन, पार्टी शाखा, खेल क्लब या टीम, आदि का। सामूहिक क्रियाकलाप के सारे रूपों में लोग एक दूसरे के साथ विभिन्न प्रकार के संबंध क़ायम करते हैं। इसके फलस्वरूप एक पेचीदा ‘समामेल’(amalgam) , सामाजिक मनोदशाओं तथा मूल्यों का एक अंतर्ग्रथन (interweaving) बन जाता है। उनमें, कुछ फुटबाल प्रेमियों की मनोदशा की तरह सापेक्षतः अस्थायी होते हैं, और कुछ अन्य अधिक स्थायी (stable) होते हैं।

उनके अलावा, कुछ सकारात्मक सामाजिक मनोदशाएं (moods) तथा रुख़ (attitudes) भी होते हैं। उदाहरण के लिए, क्रांतिकारी उत्साह की मनोदशा, जैसे फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति के विजेताओं या राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों तथा कई देशों के जनगण द्वारा चलाये जा रहे उपनिवेशवादविरोधी संघर्ष के विजयी सहभागियों के बीच पैदा होती है। ऐसे सामाजिक रुख़, सामाजिक सत्व में परिवर्तनों को प्रत्यक्षतः परावर्तित (directly reflect) करते हैं। सामाजिक मानसिकता एक राष्ट्र के ऐतिहासिक अतीत पर भी बहुत निर्भर करती है। यह बात राष्ट्रीय मानसिकता में देखी जाती है, जो एक राष्ट्र या जनगण (people) के विकास तथा निर्माण के विशिष्ट पथ का सापेक्षतः स्थायी परावर्तन है। राष्ट्रीय मानसिकता की विशिष्टता देश विदेश की आत्मिक संस्कृति, भाषा, ललित कलाओं (fine arts), दैनिक जीवन के संगठन, राष्ट्रीय परंपराओं, आदतों, रुचियों, आदि में सर्वाधिक स्पष्टता से दिखायी देती है। लेकिन सामाजिक मानसिकता के राष्ट्रीय तत्वों को अतिरंजित (exaggerate) तथा पृथक्कीकृत (isolate) नहीं किया जाना चाहिए।

जनता का मानसिक छविचित्र (psychological portrait), उसके राष्ट्रीय चरित्र की विशेषताएं और उसका संपूर्ण आत्मिक और बौद्धिक जीवन, अंततः, सामाजिक विकास की विशेषताओं पर, देश की स्थिति पर तथा जनगण की जीवन क्रियाओं की स्थायी प्रवृत्तियों पर निर्भर होता है। जब एक निश्चित राष्ट्रीय संस्कृति व मानसिकता में अंतर्निहित कुछ निश्चित विशेषताएं विद्यमान होती हैं, तो उनका अंततः निर्धारण ऐतिहासिक प्रक्रिया की वस्तुगत अंतर्वस्तु (objective content), समाज के जीवन की दशाओं और राष्ट्रों के इतिहास को प्रभावित करनेवाली प्रमुख घटनाओं से होता है। इससे यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि सामाजिक मानसिकता की अंतर्वस्तु सामाजिक सत्व के विकास के साथ बदलती है

जिसे सामान्य या दैनंदिन चेतना या ‘सहज बुद्धि’ (common sense) कहते हैं, वह सामाजिक चेतना का निम्नतम स्तर होता है। यह सामान्य जीवन में व्यक्ति के सामने पड़नेवाली घटनाओं पर उसकी पारंगति (mastery) के दौरान बनती है। यह इन घटनाओं का स्पष्टीकरण कभी-कभार ही देती है और कुछ निश्चित दैनिक अनुभवों के संचय तक ही सीमित होती है। लोगों के दैनिक व्यवहार तथा संसर्ग के क़ायदे इसी सामान्य चेतना के स्तर पर बनते हैं। किंतु यह सामाजिक घटना का गहन वैज्ञानिक स्पष्टीकरण तथा बोध (understanding) नहीं दे सकती है। यह सापेक्षतः संरक्षी (conservative) स्वभाव की होती है और सामाजिक चेतना की ‘उच्चतर’ अवस्थाओं की तुलना में अधिक मंद गति से परिवर्तित होती है। यह सामान्य चेतना तथा वैचारिक स्तर पर विकसित होने वाली सामाजिक सत्व की सैद्धांतिक समझ (theoretical comprehension) के बीच एक सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।

ऐतिहासिक विकास के दौरान वैचारिकी तथा सामाजिक मानसिकता के विभिन्न स्तरों और दैनंदिन चेतना के बीच एक जटिल अंतर्क्रिया (interaction) होती है। एक तरफ़ तो वैचारिकी अपने तथ्य उनसे हासिल करती है और दूसरी तरफ़, वह सामूहिक संचार साधनों के ज़रिये प्रचार से उन्हें प्रभावित करती है। सामाजिक मानसिकता तथा सामान्य चेतना में परिवर्तन बहुत हद तक इस पर निर्भर है कि कौनसी वैचारिकी उन पर प्रमुख रूप से प्रभाव डालती है। वैचारिकी और सामाजिक मानसिकता विभिन्न रूपों में व्यक्त होते हैं और सामाजिक चेतना की विशिष्टताओं पर विचार करते समय इस पर लगातार ध्यान रखना ज़रूरी है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 15 अप्रैल 2018

सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना और समाज का विकास के अंतर्संबंधों से शुरुआत की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी
( ideology in the system of social consciousness )

वैचारिकी (ideology) समाज के निश्चित वर्गों (classes) के हितों को व्यक्त करती है और उनके वर्गीय लक्ष्यों से निर्धारित होती है। यह चेतना का एक विशेष स्तर है। चूंकि वर्ग समाज (class society) में प्रभावी वैचारिकी, प्रभुताशाली शासक वर्गों की वैचारिकी होती है, यह सामाजिक चेतना के सारे रूपों में पैठी हुई होती है और उनकी अंतर्वस्तु (content) को निर्धारित करती है। इसलिए यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि प्रभावी वर्गों की वैचारिकी, कम्युनिज़्म से पहले की सारी विरचनाओं (formations) में हमेशा सामाजिक सत्व (social being) का विरूपित परावर्तन (distorted reflection) देती है। ऐसा इसलिए होता है कि शोषक वर्गों को अपनी अवस्थिति (position) बनाये रखने में दिलचस्पी होती है। वे उसे अवश्यंभावी, ईश्वर द्वारा स्थापित तथा स्वयं मनुष्य की प्रकृति के अनुरूप दिखलाने की कोशिश करते हैं। वे धर्म, नैतिकता, कला और राजनीति को उसी के अधीनस्थ रखते हैं।

समाज के शोषित (exploited) वर्ग, वर्ग संघर्ष (class struggle) के दौरान स्वयं भी अपनी ही वर्ग चेतना, अपनी ही वैचारिकी, मूल्यों की प्रणाली तथा सामाजिक विकास की संकल्पना (conception) का विकास करते हैं। किंतु औद्योगिक सर्वहारा ( industrial proletariat) के उद्‍भव से पहले मेहनतकश अवाम (working people) स्वयं अपनी वैज्ञानिक वैचारिकी और समाज की सही तथा गहरी समझ का विकास करने में अक्षम थे। उनकी वैचारिकी, संगत रूप से क्रांतिकारी नहीं थी। अपने आप को शोषण के किसी रूप से ( मसलन, दासता व भूदासत्व ) मुक्त कराने की कोशिश करते हुए वे मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को पूर्णतः ख़त्म करने का प्रयास नहीं करते थे। उसके लिए वस्तुगत (objective) ऐतिहासिक दशाओं की ज़रूरत थी। इसलिए उनकी वैचारिकी ने जीवन के बारे में अनेक असत्य, विरूपित, अतिकाल्पनिक विचारों को जन्म दिया और इस प्रकार अपनी इच्छा के बावजूद मौजूदा वस्तुस्थिति को और सुदृढ़ बना दिया।

वस्तुस्थिति में आमूल (radical) परिवर्तन मज़दूर वर्ग के उद्‍भव के बाद ही हुआ। सारे इतिहास में शोषण के सारे रूपों को ख़त्म करने, उनका पूर्ण उन्मूलन करने और मौजूदा वस्तुस्थिति को बनाये रखने की चाह न रखनेवाला पहला वर्ग होने के नाते सर्वहारा को ऐतिहासिक विकास की सटीक (correct) समझ में दिलचस्पी थी। इसलिए इसके विचारकों ने इतिहास में पहली बार एक वैज्ञानिक यानी सटीक वैचारिकी तैयार की तथा उसका विकास किया। चूंकि मज़दूर वर्ग तथा अधिकांश मानवजाति के हितों को व्यक्त करनेवाली कम्युनिस्ट वैचारिकी, पूंजीवादी वैचारिकी से मूलतः और सिद्धांततः असंगत (incompatible) होती है, इसलिए उनके बीच अशाम्य (irreconcilable) वैचारिक संघर्ष वस्तुगत है और यह सामाजिक चेतना के समस्त रूपों में व्यक्त होता है।

आधुनिक पूंजीपति वर्ग के विचारक विविध सिद्धांत पेश करते हैं और उनकी मदद से वैज्ञानिक कम्युनिस्ट वैचारिकी तथा अवैज्ञानिक बुर्जुआ वैचारिकी के पारस्परिक विरोध को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करते हैं। निर्वैचारिकीकरण (de-ideologisation) के पक्षपोषक यह दावा करते हैं कि आधुनिक समाज में सामान्यतः किसी वैचारिकी की कोई ज़रूरत नहीं है, यानी निर्वैचारिकी (no ideology) हो सकती है। वे दावा करते हैं कि वैचारिकी ने विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान के लिए रास्ता छोड़ दिया है, जिनके द्वारा मनुष्यजाति की सारी समस्याओं से निबटा जा सकता है तथा उन्हें हल किया जा सकता है।

किंतु वास्तविकता ऐसे दावों का खंडन करती है। विभिन्न सामाजिक प्रणालियों में एक ही तकनीकी उपलब्धि के भिन्न-भिन्न परिणाम होते हैं। स्वयं विज्ञान का अनुप्रयोग (application) तथा समाज में उसकी भूमिका (role) का निर्धारण काफ़ी हद तक विभिन्न वैचारिक समादेशों (precepts) से होता है। निर्वैचारिकीकरण के सिद्धांत के पतन के बाद पूंजीवादी/बुर्जुआ विचारक एक और सिद्धांत पेश करने को मजबूर हो गये, यह है पुनर्वैचारिकीकरण (re-ideologisation) का सिद्धांत। इसके पक्षपोषक समस्त मानवजाति के लिए एक ही एकल (single) वैचारिकी की रचना करने की ज़रूरत पर हर तरीक़े से बल देते हैं। परंतु वास्तव में वे एक ऐसी एक एकल बुर्जुआ वैचारिकी तैयार करने का प्रयत्न करते हैं, जो वैचारिकी के दायरे में विद्यमान अनेकों भिन्न-भिन्न प्रतिस्पर्धी प्रवृत्तियों का स्थान ग्रहण करेंगी। निर्वैचारिकीकरण की तरह, पुनर्वैचारिकीकरण का अंतिम उद्देश्य भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट वैचारिकी का, यानी आधुनिक युग की सर्वाधिक उन्नत और एकमात्र वैज्ञानिक वैचारिकी का विरोध करना है।

इसलिए सामाजिक चेतना के किसी भी रूप (form) का विश्लेषण करते समय इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि यह प्रचंड वैचारिक संघर्ष का अखाड़ा है। इस संघर्ष में, ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन (historical materialistic philosophy) का उद्देश्य बुर्जुआ वैचारिकी का, चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो, मुखौटा उघाड़ना तथा उसका असली रूप दिखाना है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 8 अप्रैल 2018

सामाजिक चेतना और समाज का विकास

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग को ऐतिहासिक वास्तविकता की आपत्तियों के संदर्भ में देखा था, इस बार हम ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना और समाज का विकास के अंतर्संबंधों से शुरुआत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक चेतना के कार्य और रूप
(functions and forms of social consciousness)
सामाजिक चेतना और समाज का विकास
(social consciousness and the development of society)

सामाजिक चेतना, केवल सामाजिक सत्व (social being) से निर्धारित ही नहीं होती, बल्कि स्वयं भी समाज के जीवन पर सक्रिय प्रभाव डालती है। सामाजिक चेतना की सक्रियता भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक युगों में भिन्न-भिन्न होती है और समाज के विकास के साथ बढ़ती है। ऐसा किस कारण से होता है? बात यह है कि सामाजिक सत्व और जीवन की दशाओं में परिवर्तन सामाजिक चेतना में परिवर्तनों से भी संबद्ध होते हैं : ज्ञान का परिमाण बढ़ता है, विश्वदृष्टिकोण जटिल बनता है, विभिन्न सामाजिक समस्याओं से निबटने के लिए ज्ञान का अनुप्रयोग (applying) करने के वास्ते सूचना और कुशलताओं का विराट परिमाण संचित (accumulated) होता है और मनुष्यजाति का ऐतिहासिक अनुभव गहरा होता जाता है।

समाजवादी समाज के उद्‍भव (rise) के साथ सामाजिक चेतना की भूमिका (role) और भी बड़ी हो जाती है। समाज का नियोजित रूपांतरण (planned transformation) निष्पादित करने और उत्पादन संबंधों तथा उत्पादक शक्तियों के बीच पूर्ण अनुरूपता लाने के लिए एवं समाजवादी अधिरचना (socialistic superstructure) को निर्दोष बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति की, और संपूर्ण समाजवादी समाज की चेतना के स्तर को ऊंचा उठाना ज़रूरी होता है। परंतु चेतना में परिवर्तन एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। वैयक्तिक (individual) और सामाजिक चेतना किंचित स्थायित्व (stability) तथा रूढ़िवादिता (conservatism) से युक्त जटिल संरचनाएं (complex structures) हैं। उनमें बदलाव होने में कभी-कभी दशक नहीं, बल्कि सदियां लग जाती हैं।

जब आमूल क्रांतिकारी पुनर्चिंतन (radical revolutionary rethinking) तथा मौजूदा स्थिति के पुनर्मूल्यन (re-evaluation) की दरकार होती है, तो इतिहास के ऐसे तीव्र मोड़ (sharp turning points) पर चेतना के अंदर नैतिक, सामाजिक व सौंदर्यात्मक मूल्यों का परिवर्तन, विशेषतः जनमानस में, विकट अंतर्विरोधों (acute contradictions) को, रूढ़िपंथी तथा क्रांतिकारी कार्यविधियों के टकराव (clash) को जन्म देता है। लोग, पेचीदा (complicated) और उभयभावी (ambiguous) सत्व हैं। उनका व्यवहार केवल तर्कबुद्धिसम्मत (rational) लक्ष्यों तथा मानकों (standards) से ही नियंत्रित नहीं होता, बल्कि विविध प्रच्छन्न आवेगों (hidden passions), कामनाओं (desires), उपदेशों, पूर्वाग्रहों से तथा ऐसी जटिल मानसिक अवस्थाओं से भी होता है जो अंतर्विरोधी भावावेगों तथा मनोदशाओं (contradictory emotions and moods) , भय व उल्लास, उत्साह व निराशा, विश्वास व अविश्वास, हतोत्साहिता (despair) व शांतचित्तता (serenity) को पैदा करते हैं।

सामाजिक चेतना में सोद्देश्य परिवर्तन लाने के लिए, कठिन सामाजिक समस्याओं के प्रति सचेत, सक्रिय रुख़ (conscious, active attitude) को तथा उन्हें समाज के हित में हल करने की कामना को पैदा करने तथा प्रोत्साहन देने के लिए हमें सामाजिक चेतना के सार (essence) व संरचना का और सामाजिक चेतना के कार्यों व वैयक्तिक चेतना के साथ उसके संबंध का गहन दार्शनिक विश्लेषण करने की ज़रूरत है।

सामाजिक चेतना, विभिन्न ऐतिहासिक अवधियों में स्वयं को भिन्न-भिन्न ढंग से विकसित और व्यक्त करती है। मानव इतिहास पर नज़र डालने पर हमें धार्मिक मतों, राजनीतिक व कलात्मक क्रियाकलाप के रूपों की, क़ानूनी तथा नैतिक मानदंडों तथा मानकों की विराट विविधता (immense variety) दिखायी पड़ती है। प्रत्ययवादी/भाववादी (idealists) उनका हवाला देते हुए यह दावा करते हैं कि जनगण की सामाजिक चेतना और बौद्धिक क्रियाकलाप किन्हीं सामान्य नियमों और नियमसंगतियों (general laws and regularities) से संचालित नहीं होते और वस्तुगत अध्ययन (objective study) के अधीन नहीं रखे जा सकते। वे ज़ोर देते हैं कि सामाजिक सत्व के विकास तथा सामाजिक चेतना की अभिव्यक्तियों की विविधता के बीच कोई संबंध तथा वस्तुगत आश्रितता (objective dependence) नहीं है।

किंतु इससे संबंधित उनकी दलीलें वास्तविकता से मेल नहीं खाती और इसीलिए आलोचना के सम्मुख नहीं टिक पातीं। सामान्य/सार्विक, विशेष और व्यष्टिक (general, particular and individual) की द्वंद्वात्मकता (dialectic) हमें इस मामले में भी प्रत्ययवाद/भाववाद का खंडन करने में मदद देती है। यह दर्शाती है कि सामाजिक चेतना की ठोस अभिव्यक्तियों ( concrete manifestations) की सारी विविधता के बावजूद उसके प्रमुख रूपों (forms) को पृथक किया जा सकता है और समाज के जीवन में उनकी भूमिका तथा कार्यों को समझा जा सकता है। सामाजिक चेतना के सबसे सामान्य (सार्विक) और महत्वपूर्ण रूप निम्नांकित हैं : राजनीतिक, नैतिक, क़ानूनी, कलात्मक, धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक। हम यहां दार्शनिक चेतना और वैज्ञानिक चेतना को छोड़कर बाक़ी सब पर विचार करेंगे। सामाजिक चेतना की संरचना तथा उसके कार्यों व विविध रूपों की समुचित समझ के लिए हमें वैचारिकी (ideology) तथा सामाजिक मनोविज्ञान (social psychology) के साथ उनके संबंधों को स्पष्ट करना होगा।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 1 अप्रैल 2018

‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग और ऐतिहासिक वास्तविकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत साम्यवादी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग को ऐतिहासिक वास्तविकता की आपत्तियों के संदर्भ में देखेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग और ऐतिहासिक वास्तविकता
(the category `socio-economic formation' and historical reality)

सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं तथा उनकी उत्पत्ति, विकास और अनुक्रमण (succession) तथा सामाजिक क्रांतियों (revolution) के द्वारा प्रतिस्थापन (replacement) के सिद्धांत पर ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरोधियों द्वारा बहुधा कई आक्षेप किये जाते हैं। वे दावा करते हैं कि विश्व में ऐसी कई सामाजिक और राजकीय प्रणालियां रही हैं, जिन्हें एक के बाद एक अनुक्रमण करती हुई विरचनाओं की प्रणाली में नहीं रखा जा सकता है। उनकी दृष्टि से, ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धांत, विविधतापूर्ण और जटिल ऐतिहासिक वास्तविकता का सरलीकरण कर देता है, और उससे मेल नहीं खाता। वे कहते हैं कि सारे समाज, देश, राष्ट्र, विरचना के विकास की प्रत्येक अवस्था से अनुक्रमिक ढंग से नहीं गुजरते और इसीलिए उनकी राय में इसका मतलब यह है कि अनुक्रमिक परिवर्तन का नियम ऐतिहासिक आवश्यकता को परावर्तित (reflect) नहीं करता और इसका अधिक से अधिक चंद विकसित देशों के लिए ही सीमित महत्व है।

इस तरह की आपत्तियां सार्विक/सामान्य (general), विशेष (particular) तथा व्यष्टिक (individual) के बीच द्वंद्वात्मक संयोजन (dialectical connection) की पूर्णतः ग़लत समझ पर आधारित होती हैं। यथार्थता में सामान्य, विशेष तथा व्यष्टिक के बीच गहरा द्वंद्वात्मक संयोजन होता है। सार्विक/सामान्य और विशेष व्यष्टिक में विद्यमान तथा उसके द्वारा व्यक्त होते हैं और विलोमतः कोई भी व्यष्टिक वस्तु तथा प्रक्रिया में कुछ विशेष और सार्विक विद्यमान होता है। इसके साथ ही साथ सार्विक और विशेष, व्यष्टिक के बग़ैर तथा उससे पृथक रूप में विद्यमान नहीं होते हैं। इस संयोजन की स्पष्ट समझ यह आसानी से व्याख्यायित कर सकती है कि विशेष नियमों से संचालित होने वाली विशिष्ट परिस्थितियां भी अंततः कुछ सार्विक/सामान्य नियमों के अंतर्गत ही परवान चढ़ा करती हैं। और इसी तरह हर सार्विक/सामान्य परिघटना अपने भीतर अपनी विशेष लाक्षणिक विशिष्टता भी समेटे होती है। परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण सभी तरह की विशिष्टताओं और उनमें अंतर्निहित सामान्यताओं का सटीक स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर सकता है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद किसी भी हालत में यह नहीं समझता है कि सारे देशों और राष्ट्रों को विरचनाओं के परिवर्तन तथा उत्पत्ति की सारी अनुक्रमिक अवस्थाओं से गुज़रना ही होता है। ऐसा कथन केवल मताग्रहियों के माफ़िक़ (suitable) है और मार्क्सवादी द्वंद्ववाद के लिए असंगत (incompatible) है। ऐतिहासिक भौतिकवाद यही दावा करता है कि व्यापक फ़लक पर विश्व इतिहास, यानी मनुष्यजाति का विकास एक अनुक्रमिक नियम-संचालित परिवर्तन या आदिम सामुदायिक, दास-प्रथात्मक, सामंती, पूंजीवादी और समाजवादी-कम्युनिस्ट विरचनाओं के सिलसिलेवार प्रतिस्थापन के ज़रिये होता है। जब अधिक विकसित जनगण और राष्ट्र अपने सामाजिक क्रियाकलाप में एक विरचना को मूर्त बना चुके होते हैं और अगली, उच्चतर अवस्था में संक्रमण (transition) कर चुकते हैं, तो अपने विकास में पिछड़े हुए जनगण, अधिक विकसित राज्यों के प्रभाव और सहायता से कुछ अवस्थाओं को ‘लांघकर’ पार कर सकते हैं और विकसित राज्यों के स्तर के अनुरूप होने की प्रक्रियाओं में हो सकते हैं।

इस प्रक्रिया की क्रियाविधि (mechanism) क्या है ? बात यह है कि विभिन्न जनगण और राष्ट्र तथा उनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराएं, बंद व अलग-थलग प्रणालियां (isolated systems) नहीं है। वे अधिक विकसित देशों सहित अन्य सभी के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी, सांस्कृतिक तथा अन्य संबंधों के द्वारा जुड़ी हैं। इसकी वजह से वे अधिक विकसित देशों के अनुभव और उनकी तकनीकी, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों को उपयोग में लाने में समर्थ हो जाते हैं तथा समुचित सहायता से स्वयं अपने ऐतिहासिक विकास की रफ़्तार को तेज़ करने में कामयाब हो जाते हैं। इस तरह के कई उदाहरण विश्व इतिहास में मौज़ूद हैं। विकास का ऐसा रास्ता उन अपविकसित (underdeveloped) देशों के लिए भी संभव हुआ है, जो कुछ समय पहले ही उपनिवेशी उत्पीड़न तथा शोषण से मुक्त हुए हैं। इस तरह सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं का सिद्धांत इन देशों के मार्ग में बाधक पिछड़ेपन तथा कठिनाइयों पर क़ाबू पाने के लिए एक सैद्धांतिक आधार का काम करता है।

सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं की उत्पत्ति, विकास, कार्यकारिता तथा परिवर्तन की सामान्य नियमितताओं पर विचार कर चुकने के बाद अब हम सामाजिक चेतना (social consciousness) के मुख्य कार्यों तथा रूपों का अध्ययन कर सकते हैं। यह अगली बार से।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम
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