रविवार, 22 अप्रैल 2018

सामाजिक मानसिकता और दैनंदिन चेतना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक मानसिकता और दैनंदिन चेतना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।


सामाजिक मानसिकता और दैनंदिन चेतना
(social psychology and everyday consciousness)

वैचारिकी (ideology) का विकास समाज के सारे सदस्यों द्वारा नहीं, बल्कि लोगों के, विचारकों के एक समूह के द्वारा होता है, जो एक विशेष वर्ग (class) का ‘हितसाधन’ करते हैं। किंतु ये विचारक अपनी कच्ची सामग्री कहां से खोद निकालते हैं और समाज तथा मनुष्य, आदि के बारे में अपनी प्रारंभिक संकल्पनाएं (concepts) और धारणाएं (notions) कहां से लाते हैं ? वे अपनी सामग्री, सामाजिक मानसिकता (social psychology) तथा दैनंदिन यानी आम चेतना (ordinary consciousness) से हासिल करते हैं। आधुनिक समाज में विज्ञान और, सर्वोपरि, समाज को जानने से संबंधित शास्त्र, वैचारिकी के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। इसलिए ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन के लिए विज्ञान तथा वैचारिकी का अंतर्संबंध विशेष दिलचस्पी का विषय है।

सामाजिक मानसिकता विभिन्न सामाजिक समूहों की जीवन क्रिया के, यानी काम, राजनीतिक संघर्ष, पारस्परिक संसर्ग, आदि के दौरान उत्पन्न उनके अनुभवों, भावावेगों और दृष्टिकोणों की समग्रता (aggregate) है। यह सामाजिक सत्व (social being) के स्वतःस्फूर्त परावर्तन (spontaneous reflection) का एक प्रत्यक्ष रूप है।

समाज का प्रत्येक सदस्य, एक ही समय में कई सामाजिक समूहों का सदस्य भी होता है, मसलन, परिवार, उत्पादन श्रम समष्टि, ट्रेड-यूनियन, पार्टी शाखा, खेल क्लब या टीम, आदि का। सामूहिक क्रियाकलाप के सारे रूपों में लोग एक दूसरे के साथ विभिन्न प्रकार के संबंध क़ायम करते हैं। इसके फलस्वरूप एक पेचीदा ‘समामेल’(amalgam) , सामाजिक मनोदशाओं तथा मूल्यों का एक अंतर्ग्रथन (interweaving) बन जाता है। उनमें, कुछ फुटबाल प्रेमियों की मनोदशा की तरह सापेक्षतः अस्थायी होते हैं, और कुछ अन्य अधिक स्थायी (stable) होते हैं।

उनके अलावा, कुछ सकारात्मक सामाजिक मनोदशाएं (moods) तथा रुख़ (attitudes) भी होते हैं। उदाहरण के लिए, क्रांतिकारी उत्साह की मनोदशा, जैसे फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति के विजेताओं या राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों तथा कई देशों के जनगण द्वारा चलाये जा रहे उपनिवेशवादविरोधी संघर्ष के विजयी सहभागियों के बीच पैदा होती है। ऐसे सामाजिक रुख़, सामाजिक सत्व में परिवर्तनों को प्रत्यक्षतः परावर्तित (directly reflect) करते हैं। सामाजिक मानसिकता एक राष्ट्र के ऐतिहासिक अतीत पर भी बहुत निर्भर करती है। यह बात राष्ट्रीय मानसिकता में देखी जाती है, जो एक राष्ट्र या जनगण (people) के विकास तथा निर्माण के विशिष्ट पथ का सापेक्षतः स्थायी परावर्तन है। राष्ट्रीय मानसिकता की विशिष्टता देश विदेश की आत्मिक संस्कृति, भाषा, ललित कलाओं (fine arts), दैनिक जीवन के संगठन, राष्ट्रीय परंपराओं, आदतों, रुचियों, आदि में सर्वाधिक स्पष्टता से दिखायी देती है। लेकिन सामाजिक मानसिकता के राष्ट्रीय तत्वों को अतिरंजित (exaggerate) तथा पृथक्कीकृत (isolate) नहीं किया जाना चाहिए।

जनता का मानसिक छविचित्र (psychological portrait), उसके राष्ट्रीय चरित्र की विशेषताएं और उसका संपूर्ण आत्मिक और बौद्धिक जीवन, अंततः, सामाजिक विकास की विशेषताओं पर, देश की स्थिति पर तथा जनगण की जीवन क्रियाओं की स्थायी प्रवृत्तियों पर निर्भर होता है। जब एक निश्चित राष्ट्रीय संस्कृति व मानसिकता में अंतर्निहित कुछ निश्चित विशेषताएं विद्यमान होती हैं, तो उनका अंततः निर्धारण ऐतिहासिक प्रक्रिया की वस्तुगत अंतर्वस्तु (objective content), समाज के जीवन की दशाओं और राष्ट्रों के इतिहास को प्रभावित करनेवाली प्रमुख घटनाओं से होता है। इससे यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि सामाजिक मानसिकता की अंतर्वस्तु सामाजिक सत्व के विकास के साथ बदलती है

जिसे सामान्य या दैनंदिन चेतना या ‘सहज बुद्धि’ (common sense) कहते हैं, वह सामाजिक चेतना का निम्नतम स्तर होता है। यह सामान्य जीवन में व्यक्ति के सामने पड़नेवाली घटनाओं पर उसकी पारंगति (mastery) के दौरान बनती है। यह इन घटनाओं का स्पष्टीकरण कभी-कभार ही देती है और कुछ निश्चित दैनिक अनुभवों के संचय तक ही सीमित होती है। लोगों के दैनिक व्यवहार तथा संसर्ग के क़ायदे इसी सामान्य चेतना के स्तर पर बनते हैं। किंतु यह सामाजिक घटना का गहन वैज्ञानिक स्पष्टीकरण तथा बोध (understanding) नहीं दे सकती है। यह सापेक्षतः संरक्षी (conservative) स्वभाव की होती है और सामाजिक चेतना की ‘उच्चतर’ अवस्थाओं की तुलना में अधिक मंद गति से परिवर्तित होती है। यह सामान्य चेतना तथा वैचारिक स्तर पर विकसित होने वाली सामाजिक सत्व की सैद्धांतिक समझ (theoretical comprehension) के बीच एक सबसे महत्वपूर्ण अंतर है।

ऐतिहासिक विकास के दौरान वैचारिकी तथा सामाजिक मानसिकता के विभिन्न स्तरों और दैनंदिन चेतना के बीच एक जटिल अंतर्क्रिया (interaction) होती है। एक तरफ़ तो वैचारिकी अपने तथ्य उनसे हासिल करती है और दूसरी तरफ़, वह सामूहिक संचार साधनों के ज़रिये प्रचार से उन्हें प्रभावित करती है। सामाजिक मानसिकता तथा सामान्य चेतना में परिवर्तन बहुत हद तक इस पर निर्भर है कि कौनसी वैचारिकी उन पर प्रमुख रूप से प्रभाव डालती है। वैचारिकी और सामाजिक मानसिकता विभिन्न रूपों में व्यक्त होते हैं और सामाजिक चेतना की विशिष्टताओं पर विचार करते समय इस पर लगातार ध्यान रखना ज़रूरी है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 15 अप्रैल 2018

सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना और समाज का विकास के अंतर्संबंधों से शुरुआत की थी, इस बार हम सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक चेतना की प्रणाली में वैचारिकी
( ideology in the system of social consciousness )

वैचारिकी (ideology) समाज के निश्चित वर्गों (classes) के हितों को व्यक्त करती है और उनके वर्गीय लक्ष्यों से निर्धारित होती है। यह चेतना का एक विशेष स्तर है। चूंकि वर्ग समाज (class society) में प्रभावी वैचारिकी, प्रभुताशाली शासक वर्गों की वैचारिकी होती है, यह सामाजिक चेतना के सारे रूपों में पैठी हुई होती है और उनकी अंतर्वस्तु (content) को निर्धारित करती है। इसलिए यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि प्रभावी वर्गों की वैचारिकी, कम्युनिज़्म से पहले की सारी विरचनाओं (formations) में हमेशा सामाजिक सत्व (social being) का विरूपित परावर्तन (distorted reflection) देती है। ऐसा इसलिए होता है कि शोषक वर्गों को अपनी अवस्थिति (position) बनाये रखने में दिलचस्पी होती है। वे उसे अवश्यंभावी, ईश्वर द्वारा स्थापित तथा स्वयं मनुष्य की प्रकृति के अनुरूप दिखलाने की कोशिश करते हैं। वे धर्म, नैतिकता, कला और राजनीति को उसी के अधीनस्थ रखते हैं।

समाज के शोषित (exploited) वर्ग, वर्ग संघर्ष (class struggle) के दौरान स्वयं भी अपनी ही वर्ग चेतना, अपनी ही वैचारिकी, मूल्यों की प्रणाली तथा सामाजिक विकास की संकल्पना (conception) का विकास करते हैं। किंतु औद्योगिक सर्वहारा ( industrial proletariat) के उद्‍भव से पहले मेहनतकश अवाम (working people) स्वयं अपनी वैज्ञानिक वैचारिकी और समाज की सही तथा गहरी समझ का विकास करने में अक्षम थे। उनकी वैचारिकी, संगत रूप से क्रांतिकारी नहीं थी। अपने आप को शोषण के किसी रूप से ( मसलन, दासता व भूदासत्व ) मुक्त कराने की कोशिश करते हुए वे मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण को पूर्णतः ख़त्म करने का प्रयास नहीं करते थे। उसके लिए वस्तुगत (objective) ऐतिहासिक दशाओं की ज़रूरत थी। इसलिए उनकी वैचारिकी ने जीवन के बारे में अनेक असत्य, विरूपित, अतिकाल्पनिक विचारों को जन्म दिया और इस प्रकार अपनी इच्छा के बावजूद मौजूदा वस्तुस्थिति को और सुदृढ़ बना दिया।

वस्तुस्थिति में आमूल (radical) परिवर्तन मज़दूर वर्ग के उद्‍भव के बाद ही हुआ। सारे इतिहास में शोषण के सारे रूपों को ख़त्म करने, उनका पूर्ण उन्मूलन करने और मौजूदा वस्तुस्थिति को बनाये रखने की चाह न रखनेवाला पहला वर्ग होने के नाते सर्वहारा को ऐतिहासिक विकास की सटीक (correct) समझ में दिलचस्पी थी। इसलिए इसके विचारकों ने इतिहास में पहली बार एक वैज्ञानिक यानी सटीक वैचारिकी तैयार की तथा उसका विकास किया। चूंकि मज़दूर वर्ग तथा अधिकांश मानवजाति के हितों को व्यक्त करनेवाली कम्युनिस्ट वैचारिकी, पूंजीवादी वैचारिकी से मूलतः और सिद्धांततः असंगत (incompatible) होती है, इसलिए उनके बीच अशाम्य (irreconcilable) वैचारिक संघर्ष वस्तुगत है और यह सामाजिक चेतना के समस्त रूपों में व्यक्त होता है।

आधुनिक पूंजीपति वर्ग के विचारक विविध सिद्धांत पेश करते हैं और उनकी मदद से वैज्ञानिक कम्युनिस्ट वैचारिकी तथा अवैज्ञानिक बुर्जुआ वैचारिकी के पारस्परिक विरोध को नज़रअंदाज़ करने की कोशिश करते हैं। निर्वैचारिकीकरण (de-ideologisation) के पक्षपोषक यह दावा करते हैं कि आधुनिक समाज में सामान्यतः किसी वैचारिकी की कोई ज़रूरत नहीं है, यानी निर्वैचारिकी (no ideology) हो सकती है। वे दावा करते हैं कि वैचारिकी ने विज्ञान तथा तकनीकी ज्ञान के लिए रास्ता छोड़ दिया है, जिनके द्वारा मनुष्यजाति की सारी समस्याओं से निबटा जा सकता है तथा उन्हें हल किया जा सकता है।

किंतु वास्तविकता ऐसे दावों का खंडन करती है। विभिन्न सामाजिक प्रणालियों में एक ही तकनीकी उपलब्धि के भिन्न-भिन्न परिणाम होते हैं। स्वयं विज्ञान का अनुप्रयोग (application) तथा समाज में उसकी भूमिका (role) का निर्धारण काफ़ी हद तक विभिन्न वैचारिक समादेशों (precepts) से होता है। निर्वैचारिकीकरण के सिद्धांत के पतन के बाद पूंजीवादी/बुर्जुआ विचारक एक और सिद्धांत पेश करने को मजबूर हो गये, यह है पुनर्वैचारिकीकरण (re-ideologisation) का सिद्धांत। इसके पक्षपोषक समस्त मानवजाति के लिए एक ही एकल (single) वैचारिकी की रचना करने की ज़रूरत पर हर तरीक़े से बल देते हैं। परंतु वास्तव में वे एक ऐसी एक एकल बुर्जुआ वैचारिकी तैयार करने का प्रयत्न करते हैं, जो वैचारिकी के दायरे में विद्यमान अनेकों भिन्न-भिन्न प्रतिस्पर्धी प्रवृत्तियों का स्थान ग्रहण करेंगी। निर्वैचारिकीकरण की तरह, पुनर्वैचारिकीकरण का अंतिम उद्देश्य भी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट वैचारिकी का, यानी आधुनिक युग की सर्वाधिक उन्नत और एकमात्र वैज्ञानिक वैचारिकी का विरोध करना है।

इसलिए सामाजिक चेतना के किसी भी रूप (form) का विश्लेषण करते समय इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि यह प्रचंड वैचारिक संघर्ष का अखाड़ा है। इस संघर्ष में, ऐतिहासिक भौतिकवादी दर्शन (historical materialistic philosophy) का उद्देश्य बुर्जुआ वैचारिकी का, चाहे वह किसी भी रूप में क्यों न हो, मुखौटा उघाड़ना तथा उसका असली रूप दिखाना है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 8 अप्रैल 2018

सामाजिक चेतना और समाज का विकास

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग को ऐतिहासिक वास्तविकता की आपत्तियों के संदर्भ में देखा था, इस बार हम ‘सामाजिक चेतना के कार्य और रूप’ के अंतर्गत सामाजिक चेतना और समाज का विकास के अंतर्संबंधों से शुरुआत करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामाजिक चेतना के कार्य और रूप
(functions and forms of social consciousness)
सामाजिक चेतना और समाज का विकास
(social consciousness and the development of society)

सामाजिक चेतना, केवल सामाजिक सत्व (social being) से निर्धारित ही नहीं होती, बल्कि स्वयं भी समाज के जीवन पर सक्रिय प्रभाव डालती है। सामाजिक चेतना की सक्रियता भिन्न-भिन्न ऐतिहासिक युगों में भिन्न-भिन्न होती है और समाज के विकास के साथ बढ़ती है। ऐसा किस कारण से होता है? बात यह है कि सामाजिक सत्व और जीवन की दशाओं में परिवर्तन सामाजिक चेतना में परिवर्तनों से भी संबद्ध होते हैं : ज्ञान का परिमाण बढ़ता है, विश्वदृष्टिकोण जटिल बनता है, विभिन्न सामाजिक समस्याओं से निबटने के लिए ज्ञान का अनुप्रयोग (applying) करने के वास्ते सूचना और कुशलताओं का विराट परिमाण संचित (accumulated) होता है और मनुष्यजाति का ऐतिहासिक अनुभव गहरा होता जाता है।

समाजवादी समाज के उद्‍भव (rise) के साथ सामाजिक चेतना की भूमिका (role) और भी बड़ी हो जाती है। समाज का नियोजित रूपांतरण (planned transformation) निष्पादित करने और उत्पादन संबंधों तथा उत्पादक शक्तियों के बीच पूर्ण अनुरूपता लाने के लिए एवं समाजवादी अधिरचना (socialistic superstructure) को निर्दोष बनाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति की, और संपूर्ण समाजवादी समाज की चेतना के स्तर को ऊंचा उठाना ज़रूरी होता है। परंतु चेतना में परिवर्तन एक अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। वैयक्तिक (individual) और सामाजिक चेतना किंचित स्थायित्व (stability) तथा रूढ़िवादिता (conservatism) से युक्त जटिल संरचनाएं (complex structures) हैं। उनमें बदलाव होने में कभी-कभी दशक नहीं, बल्कि सदियां लग जाती हैं।

जब आमूल क्रांतिकारी पुनर्चिंतन (radical revolutionary rethinking) तथा मौजूदा स्थिति के पुनर्मूल्यन (re-evaluation) की दरकार होती है, तो इतिहास के ऐसे तीव्र मोड़ (sharp turning points) पर चेतना के अंदर नैतिक, सामाजिक व सौंदर्यात्मक मूल्यों का परिवर्तन, विशेषतः जनमानस में, विकट अंतर्विरोधों (acute contradictions) को, रूढ़िपंथी तथा क्रांतिकारी कार्यविधियों के टकराव (clash) को जन्म देता है। लोग, पेचीदा (complicated) और उभयभावी (ambiguous) सत्व हैं। उनका व्यवहार केवल तर्कबुद्धिसम्मत (rational) लक्ष्यों तथा मानकों (standards) से ही नियंत्रित नहीं होता, बल्कि विविध प्रच्छन्न आवेगों (hidden passions), कामनाओं (desires), उपदेशों, पूर्वाग्रहों से तथा ऐसी जटिल मानसिक अवस्थाओं से भी होता है जो अंतर्विरोधी भावावेगों तथा मनोदशाओं (contradictory emotions and moods) , भय व उल्लास, उत्साह व निराशा, विश्वास व अविश्वास, हतोत्साहिता (despair) व शांतचित्तता (serenity) को पैदा करते हैं।

सामाजिक चेतना में सोद्देश्य परिवर्तन लाने के लिए, कठिन सामाजिक समस्याओं के प्रति सचेत, सक्रिय रुख़ (conscious, active attitude) को तथा उन्हें समाज के हित में हल करने की कामना को पैदा करने तथा प्रोत्साहन देने के लिए हमें सामाजिक चेतना के सार (essence) व संरचना का और सामाजिक चेतना के कार्यों व वैयक्तिक चेतना के साथ उसके संबंध का गहन दार्शनिक विश्लेषण करने की ज़रूरत है।

सामाजिक चेतना, विभिन्न ऐतिहासिक अवधियों में स्वयं को भिन्न-भिन्न ढंग से विकसित और व्यक्त करती है। मानव इतिहास पर नज़र डालने पर हमें धार्मिक मतों, राजनीतिक व कलात्मक क्रियाकलाप के रूपों की, क़ानूनी तथा नैतिक मानदंडों तथा मानकों की विराट विविधता (immense variety) दिखायी पड़ती है। प्रत्ययवादी/भाववादी (idealists) उनका हवाला देते हुए यह दावा करते हैं कि जनगण की सामाजिक चेतना और बौद्धिक क्रियाकलाप किन्हीं सामान्य नियमों और नियमसंगतियों (general laws and regularities) से संचालित नहीं होते और वस्तुगत अध्ययन (objective study) के अधीन नहीं रखे जा सकते। वे ज़ोर देते हैं कि सामाजिक सत्व के विकास तथा सामाजिक चेतना की अभिव्यक्तियों की विविधता के बीच कोई संबंध तथा वस्तुगत आश्रितता (objective dependence) नहीं है।

किंतु इससे संबंधित उनकी दलीलें वास्तविकता से मेल नहीं खाती और इसीलिए आलोचना के सम्मुख नहीं टिक पातीं। सामान्य/सार्विक, विशेष और व्यष्टिक (general, particular and individual) की द्वंद्वात्मकता (dialectic) हमें इस मामले में भी प्रत्ययवाद/भाववाद का खंडन करने में मदद देती है। यह दर्शाती है कि सामाजिक चेतना की ठोस अभिव्यक्तियों ( concrete manifestations) की सारी विविधता के बावजूद उसके प्रमुख रूपों (forms) को पृथक किया जा सकता है और समाज के जीवन में उनकी भूमिका तथा कार्यों को समझा जा सकता है। सामाजिक चेतना के सबसे सामान्य (सार्विक) और महत्वपूर्ण रूप निम्नांकित हैं : राजनीतिक, नैतिक, क़ानूनी, कलात्मक, धार्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक। हम यहां दार्शनिक चेतना और वैज्ञानिक चेतना को छोड़कर बाक़ी सब पर विचार करेंगे। सामाजिक चेतना की संरचना तथा उसके कार्यों व विविध रूपों की समुचित समझ के लिए हमें वैचारिकी (ideology) तथा सामाजिक मनोविज्ञान (social psychology) के साथ उनके संबंधों को स्पष्ट करना होगा।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 1 अप्रैल 2018

‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग और ऐतिहासिक वास्तविकता

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत साम्यवादी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग को ऐतिहासिक वास्तविकता की आपत्तियों के संदर्भ में देखेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



‘सामाजिक-आर्थिक विरचना’ प्रवर्ग और ऐतिहासिक वास्तविकता
(the category `socio-economic formation' and historical reality)

सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं तथा उनकी उत्पत्ति, विकास और अनुक्रमण (succession) तथा सामाजिक क्रांतियों (revolution) के द्वारा प्रतिस्थापन (replacement) के सिद्धांत पर ऐतिहासिक भौतिकवाद के विरोधियों द्वारा बहुधा कई आक्षेप किये जाते हैं। वे दावा करते हैं कि विश्व में ऐसी कई सामाजिक और राजकीय प्रणालियां रही हैं, जिन्हें एक के बाद एक अनुक्रमण करती हुई विरचनाओं की प्रणाली में नहीं रखा जा सकता है। उनकी दृष्टि से, ऐतिहासिक भौतिकवाद का सिद्धांत, विविधतापूर्ण और जटिल ऐतिहासिक वास्तविकता का सरलीकरण कर देता है, और उससे मेल नहीं खाता। वे कहते हैं कि सारे समाज, देश, राष्ट्र, विरचना के विकास की प्रत्येक अवस्था से अनुक्रमिक ढंग से नहीं गुजरते और इसीलिए उनकी राय में इसका मतलब यह है कि अनुक्रमिक परिवर्तन का नियम ऐतिहासिक आवश्यकता को परावर्तित (reflect) नहीं करता और इसका अधिक से अधिक चंद विकसित देशों के लिए ही सीमित महत्व है।

इस तरह की आपत्तियां सार्विक/सामान्य (general), विशेष (particular) तथा व्यष्टिक (individual) के बीच द्वंद्वात्मक संयोजन (dialectical connection) की पूर्णतः ग़लत समझ पर आधारित होती हैं। यथार्थता में सामान्य, विशेष तथा व्यष्टिक के बीच गहरा द्वंद्वात्मक संयोजन होता है। सार्विक/सामान्य और विशेष व्यष्टिक में विद्यमान तथा उसके द्वारा व्यक्त होते हैं और विलोमतः कोई भी व्यष्टिक वस्तु तथा प्रक्रिया में कुछ विशेष और सार्विक विद्यमान होता है। इसके साथ ही साथ सार्विक और विशेष, व्यष्टिक के बग़ैर तथा उससे पृथक रूप में विद्यमान नहीं होते हैं। इस संयोजन की स्पष्ट समझ यह आसानी से व्याख्यायित कर सकती है कि विशेष नियमों से संचालित होने वाली विशिष्ट परिस्थितियां भी अंततः कुछ सार्विक/सामान्य नियमों के अंतर्गत ही परवान चढ़ा करती हैं। और इसी तरह हर सार्विक/सामान्य परिघटना अपने भीतर अपनी विशेष लाक्षणिक विशिष्टता भी समेटे होती है। परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण सभी तरह की विशिष्टताओं और उनमें अंतर्निहित सामान्यताओं का सटीक स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर सकता है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद किसी भी हालत में यह नहीं समझता है कि सारे देशों और राष्ट्रों को विरचनाओं के परिवर्तन तथा उत्पत्ति की सारी अनुक्रमिक अवस्थाओं से गुज़रना ही होता है। ऐसा कथन केवल मताग्रहियों के माफ़िक़ (suitable) है और मार्क्सवादी द्वंद्ववाद के लिए असंगत (incompatible) है। ऐतिहासिक भौतिकवाद यही दावा करता है कि व्यापक फ़लक पर विश्व इतिहास, यानी मनुष्यजाति का विकास एक अनुक्रमिक नियम-संचालित परिवर्तन या आदिम सामुदायिक, दास-प्रथात्मक, सामंती, पूंजीवादी और समाजवादी-कम्युनिस्ट विरचनाओं के सिलसिलेवार प्रतिस्थापन के ज़रिये होता है। जब अधिक विकसित जनगण और राष्ट्र अपने सामाजिक क्रियाकलाप में एक विरचना को मूर्त बना चुके होते हैं और अगली, उच्चतर अवस्था में संक्रमण (transition) कर चुकते हैं, तो अपने विकास में पिछड़े हुए जनगण, अधिक विकसित राज्यों के प्रभाव और सहायता से कुछ अवस्थाओं को ‘लांघकर’ पार कर सकते हैं और विकसित राज्यों के स्तर के अनुरूप होने की प्रक्रियाओं में हो सकते हैं।

इस प्रक्रिया की क्रियाविधि (mechanism) क्या है ? बात यह है कि विभिन्न जनगण और राष्ट्र तथा उनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपराएं, बंद व अलग-थलग प्रणालियां (isolated systems) नहीं है। वे अधिक विकसित देशों सहित अन्य सभी के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, तकनीकी, सांस्कृतिक तथा अन्य संबंधों के द्वारा जुड़ी हैं। इसकी वजह से वे अधिक विकसित देशों के अनुभव और उनकी तकनीकी, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों को उपयोग में लाने में समर्थ हो जाते हैं तथा समुचित सहायता से स्वयं अपने ऐतिहासिक विकास की रफ़्तार को तेज़ करने में कामयाब हो जाते हैं। इस तरह के कई उदाहरण विश्व इतिहास में मौज़ूद हैं। विकास का ऐसा रास्ता उन अपविकसित (underdeveloped) देशों के लिए भी संभव हुआ है, जो कुछ समय पहले ही उपनिवेशी उत्पीड़न तथा शोषण से मुक्त हुए हैं। इस तरह सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं का सिद्धांत इन देशों के मार्ग में बाधक पिछड़ेपन तथा कठिनाइयों पर क़ाबू पाने के लिए एक सैद्धांतिक आधार का काम करता है।

सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं की उत्पत्ति, विकास, कार्यकारिता तथा परिवर्तन की सामान्य नियमितताओं पर विचार कर चुकने के बाद अब हम सामाजिक चेतना (social consciousness) के मुख्य कार्यों तथा रूपों का अध्ययन कर सकते हैं। यह अगली बार से।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 18 मार्च 2018

साम्यवादी विरचना - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत साम्यवादी विरचना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समाहार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



साम्यवादी विरचना - २
(The Communist Formation - 2)

समाजवाद (socialism) के निर्माण के दौरान आत्मगत कारक (subjective factor) की, यानी समाजवादी चेतना, वैचारिकी और शैक्षिक कार्य की भूमिका में बहुत तेज़ी से बढ़ती होती है। समाजवाद एक ऐसा समाज है जहां :

(१) उत्पादन के साधन (means of production) जनता की संपत्ति होते हैं और आर्थिक व सामाजिक उत्पीड़न (oppression) और असमानता (inequality) का उन्मूलन कर दिया जाता है।

(२) उत्पादक शक्तियों (production forces) के द्रुत (rapid) विकास का कार्य-क्षेत्र खुल जाता है और वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति, सारे जनगण की ख़ुशहाली में लगातार बढ़ती को सुनिश्चित बनाती है।

(३) काम का समान अधिकार तथा उसके लिए न्यायोचित पारिश्रमिक सुनिश्चित होते हैं।

(४) मज़दूर वर्ग, मेहनतकश किसानों और बुद्धिजीवियों का एक घनिष्ठ गठबंधन स्थापित हो जाता है।

(५) सारी राष्ट्रीयताओं तथा जनगण की, पुरुषों तथा नारियों की, समानता की तथा युवा पीढ़ी को एक विश्वसनीय और आशाप्रद भविष्य की गारंटी होती है जबकि वृद्ध श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की जाती है।

(६) वास्तविक लोकतंत्र (real democracy) का विकास होता है; औद्योगिक, सामाजिक और सार्वजनिक मामलों के प्रबंध व प्रशासन में नागरिकों की व्यापक सहभागिता की गारंटी की जाती है।

(७) मानवाधिकार पूर्णतः वास्तवीकृत (realised) होते हैं; प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक ही नियम तथा नैतिकता और अनुशासन होता है।

(८) एक सच्ची मानवतावादी वैचारिकी का बोलबाला होता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण सर्वोपरि होता है। प्रगतिशील संस्कृति और विज्ञान की रचना तथा विकास किया जाता है।

(९) सामाजिक न्याय, सामूहिकतावाद तथा साथियों जैसी पारस्परिक सहायता पर आधारित समाजवादी जीवन पद्धति की रचना की जाती है।

वैश्विक अनुभव दर्शाते हैं समाजवादोन्मुख समाज, पिछड़ेपन को ऐतिहासिक दॄष्टि से अल्पकाल में ही दूर कर सकता है, शक्तिशाली औद्योगिक और तकनीकी आधार तथा आधुनिक विज्ञान की रचना कर सकता है

साम्यवादी विरचना की दूसरी अवस्था केवल तभी आयेगी जब कम्युनिज़्म की भौतिक-तकनीकी बुनियाद डल चुकेगी और उसके उपयुक्त सामाजिक जीवन और चेतना के संगठन के रूपों की रचना हो चुकेगी। साम्यवाद एक ऐसी वर्गहीन सामाजिक प्रणाली (classless social system) होगी, जिसमें उत्पादन के साधनों पर एक ही, सार्वजनिक स्वामित्व होगा और समाज के सदस्यों को पूर्ण समानता प्राप्त होगी; यह स्वतंत्र, सचेत श्रमिकों का ऐसा अतिसंगठित (highly organised) समाज होगा, जिसमें सामाजिक स्वशासन (social self-government) की स्थापना होगी और समाज के भले के लिए श्रम, प्रत्येक व्यक्ति की प्रमुख जीवंत आवश्यकता बन जायेगा। यह ऐसी उत्पादक शक्तियों की अपेक्षा करता है, जो समाज और व्यक्ति दोनों की तर्कबुद्धिसम्मत (rational) आवश्यकताओं की पूर्ण तुष्टि के अवसर मुहैया करेगा।

सारे उत्पादक क्रियाकलाप, उच्च कारगर प्रविधियों तथा तकनीक पर आधारित होंगे और मनुष्य तथा प्रकृति के सामंजस्यपूर्ण अंतर्क्रिया (harmonious interaction) को सुनिश्चित बनायेंगे। तब क्रियाकलाप तथा भौतिक संपदा के उत्पादन और वितरण का बुनियादी उसूल होगा ‘प्रत्येक से उसकी योग्यतानुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार’। कम्युनिज़्म में संक्रमण (transition) एक जटिल, लंबी प्रक्रिया है, जिसके दौरान पूंजीवाद के मुक़ाबले कहीं अधिक ऊंची उत्पादकता हासिल करना, सामाजिक दृष्टि से समरूप (socially uniform) समाज की रचना करना, समाज की सामाजिक संरचना में और प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक, सांस्कृतिक छवि तथा संपूर्ण समाज में गहरे परिवर्तन लाना जरूरी हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 11 मार्च 2018

साम्यवादी विरचना - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत पूंजीवादी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम साम्यवादी विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



साम्यवादी विरचना - १
(The Communist Formation - 1)

प्रत्येक नयी सामाजिक-आर्थिक विरचना (socio-economic formation) वस्तुगत ऐतिहासिक नियमों का परिणाम होती है। इस अर्थ में साम्यवादी विरचना का आना वैसे ही अनिवार्य और आवश्यक है जैसे की पूर्ववर्ती विरचनाएं। किंतु इसकी उत्पत्ति की विशेषता उसका यह महत्वपूर्ण विभेदक लक्षण (distinguish feature) है कि यह एक सचेत प्रक्रिया (conscious process) होती है। इसका यह मतलब नहीं है कि इसमें सामाजिक सत्व (social being) अपनी निर्धारक भूमिका गंवा देता है। नये समाज के स्वभाव तथा पूर्ववर्ती समाजों से उसके मौलिक अंतर की वजह से इसकी रचना की एक महत्वपूर्ण शर्त वैज्ञानिक समाजवाद को (जो समाज के विकास के वस्तुगत नियमों तथा उसे रूपांतरित करने के तरीक़ों को उद्‍घाटित करता है) मज़दूर वर्ग तथा आम मेहनतकशों के क्रांतिकारी संघर्ष के साथ जोड़ना है। इस शर्त की पूर्ति कम्यूनिस्ट और मज़दूर पार्टियों के काम की अंतर्वस्तु (content) है।

साम्यवादी विरचना कैसे उत्पन्न तथा विकसित होती है? वैज्ञानिक समाजवाद के संस्थापकों ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यह प्रमाणित किया है कि यह विरचना दो मुख्य क्रमावस्थाओं से होकर गुजरती है।

पहली क्रमावस्था है समाजवाद (socialism)। यह पूंजीवादी विरचना से साम्यवादी विरचना के संक्रमण (transition) की अवस्था है। यह सामाजिक क्रांति के फलस्वरूप उत्पन्न होता तथा रूप ग्रहण करता है। सामाजिक क्रांति की विजय के साथ मेहनतकशों का राज्य, सर्वहारा का अधियानकत्व (dictatorship of the proletariat) स्थापित किया जाता है। पदच्युत शोषकों का दमन करते हुए, सर्वहारा अधियानकत्व अपने मुख्य प्रयत्नों को, नियोजन (planning) तथा समाजवादी आधार और अधिरचना (superstructure) के सोद्देश्य निर्माण पर संकेन्द्रित करता है।

साम्यवादी विरचना की यह पहली क्रमावस्था अपने विकास की कई अवस्थाओं से होकर गुज़रती है। इन अवस्थाओं का निर्धारण, विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों, देश के अंदर तथा बाहर वर्ग शक्तियों के संतुलन और राष्ट्रीय व सांस्कृतिक परंपराओं से होता है। इसलिए विभिन्न प्रदेशों तथा अलग-अलग देशों में समाजवाद के निर्माण के भिन्न-भिन्न मार्ग तथा रूप हो सकते हैं। हालांकि इन विशिष्टताओं तथा व्यष्टिक (individual) लक्षणों के अलावा इस प्रक्रिया की कुछ सामान्य (general) नियमितताएं होती हैं।

उनमें शामिल हैं : मज़दूर वर्ग की प्रमुख भूमिका सहित मेहनतकशों की सत्ता की स्थापना ; समाज के विकास में कम्युनिस्ट और मज़दूर पार्टियों की नेतृत्वकारी भूमिका ; उत्पादन के प्रमुख साधनों पर सामाजिक स्वामित्व (social ownership) की स्थापना और जनगण के हित में अर्थव्यवस्था का विकास ; ‘प्रत्येक से उसकी योग्यतानुसार, और प्रत्येक को उसके श्रम के अनुसार’ उसूल (principle) का कार्यान्वयन ; समाजवादी जनवाद (socialist democracy) का विकास ; राष्ट्रीयताओं तथा उपराष्ट्रीयताओं की समानता और मैत्री ; वर्ग शत्रुओं से समाजवादी विरचना की रक्षा। समाजवाद के निर्माण के दौरान आत्मगत कारक (subjective factor) की, यानी समाजवादी चेतना, वैचारिकी और शैक्षिक कार्य की भूमिका में बहुत तेज़ी से बढ़ती होती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 4 मार्च 2018

पूंजीवादी विरचना -२

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत पूंजीवादी विरचना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समाहार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



पूंजीवादी विरचना -२
(The Capitalist Formation - 2)

साम्राज्यवाद (imperialism) की लाक्षणिक विशेषताएं हैं: इजारेदारियों (monopolies) का प्रभुत्व, औद्योगिक-वित्तीय अल्पतंत्र (industrial-financial oligarchy) का सत्ता में आना, उपनिवेशों के पुनर्वितरण के लिए संघर्ष, वर्ग संघर्ष (class struggle) का तीव्रीकरण, मेहनतकशों के शोषण का गहनीकरण, आर्थिक तथा सामाजिक विकास की विषमता, आदि। जैसा कि पहले विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) से प्रदर्शित हुआ, साम्राज्यवाद की अवस्था में पूंजीवाद मनुष्यजाति के शांतिपूर्ण प्रगतिशील विकास को सुनिश्चित बनाने में अक्षम है। उसके सामाजिक अंतर्विरोध पराकाष्ठा तक तीव्र हो गये। रूस में, जो साम्राज्यवाद की प्रणाली में दुर्बलतम कड़ी साबित हुआ, १९१७ में एक समाजवादी क्रांति हुई और समाजवाद का निर्माण शुरू हुआ। यह पूंजीवाद के आम संकट की, विश्व पूंजीवादी प्रणाली के ध्वस्त होने की पहली मंज़िल थी।

दूसरे विश्वयुद्ध (१९३९-१९४५) के बाद, जिसे सबसे आक्रामक साम्राज्यवादी राज्यों ( फ़ासिस्ट जर्मनी, इटली और सैन्यवादी जापान ) द्वारा भड़काया गया था, पूंजीवाद के आम संकट की दूसरी अवस्था शुरू हुई। समाजवाद एक अकेले देश की सीमाओं से बाहर आ गया; एक ऐसी समाजवादी प्रणाली का विकास हुआ जिसमें यूरोप, एशिया और लैटिन अमरीका के कई देश शामिल हो गये। उपनिवेशी प्रणाली के ध्वस्त होने के फलस्वरूप कई आज़ाद देश अस्तित्व में आये, जिनमें से कई समाजवादी विकास के रास्ते पर चले।

आधुनिक पूंजीवाद, उस पूंजीवाद से मूलतः भिन्न है, जो २०वीं सदी के प्रारंभ तथा मध्य में था। राजकीय इजारेदार पूंजीवाद (state-monopoly capitalism) के अंतर्गत विराट पैमाने पर विकसित उत्पादक शक्तियों (production forces) और पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के बीच अंतर्विरोध अधिकाधिक तीव्र होता जा रहा है। बेशक, इसका मतलब यह नहीं है कि उत्पादक शक्तियों और विशेषतः नवीनतम प्रविधि तथा टेक्नोलॉजी का विकास बंद हो गया है। इसके विपरीत जैव-तकनीक, इलैक्ट्रोनिकी, अंतरिक्ष व सूचना तकनीक पर्याप्त तेज़ी से विकसित हो रही हैं। तो प्रश्न उठता है कि यह अंतर्विरोध किसमें है? इसके नकारात्मक परिणाम स्वयं को कैसे व्यक्त करते हैं?

मुद्दा यह है कि बड़े पूंजीपति मुख्यतः उन उद्योगों का विकास कर रहे हैं, जिनसे अधिकतम मुनाफ़ा (profit), ऊंची प्रतियोगिता क्षमता और घरेलू व विश्व बाज़ार में प्रभुता (dominance) हासिल होती है। और उनमें, मुख्यतः वे सब शामिल हैं, जो समाज के सैन्यीकरण (militarisation) को बढ़ावा देते हैं और पूंजीवादी राज्यों की सैनिक शक्ति को बढ़ाते हैं। बड़ी इजारेदारियां स्वयं अपने देशों के और इससे भी अधिक विकासशील देशों के मेहनतकशों के हितों पर कोई ध्यान नहीं देती है। पूंजीवाद की दशाओं में कंप्यूटरीकरण तथा रोबोटीकरण से बेरोजगारी में अभूतपूर्व बढ़ती हो जाती है। पश्चिम के प्रमुख विशेषज्ञों के पूर्वानुमान ठीक इसी बात का संकेत देते हैं।

एक नकारात्मक परिणाम और भी है। पूंजीवादी समाजों में विकास की दरें उससे कहीं नीची होती हैं, जो सामाजिक स्वामित्व (social ownership) पर आधारित उत्पादन संबंधों के अंतर्गत हो सकती हैं। पूंजीवादी विकास में बढ़ती हुई मंदियां (slumps), चक्रिक (cyclic) और संरचनात्मक संकट, बढ़ते हुए राजकीय ऋण, बजट के घाटे तथा बेलगाम मुद्रास्फीति (inflation) शामिल होती है। इसके साथ ही पूंजी, संकेन्द्रित और अंतर्राष्ट्रीयकृत होती जा रही है तथा विश्वभर के जनगण का शोषण करने तथा विकासशील और विकसित पूंजीवादी देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी नियंत्रण रखनेवाले बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेशन अधिकाधिक शक्तिशाली होते जा रहे हैं। आधुनिक समाज की विराट संपदा तथा वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों को सामाजिक न्याय की उपलब्धि, ग़रीबी का उन्मूलन करने तथा विभिन्न ऐतिहासिक कारणों से अपने विकास में पिछड़े हुआ देशों और जातियों को सहायता देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, परंतु पूंजीवाद के अंतर्गत ऐसा करना असंभव है

समसामयिक पूंजीवादी समाज के नेतागण इन अंतर्विरोधों की तीक्ष्णता को घटाने और उनके प्रतिकूल प्रभावों को मिटाने के प्रयत्न में विभिन्न आर्थिक तथा राजनीतिक तिकड़मों का सहारा लेते हैं। किंतु आधुनिक पूंजीवाद के गहरे प्रतिरोधी अंतर्विरोधों (antagonistic contradictions) से निबटने के लिए समाज में आमूल सामाजिक सुधारों की ज़रूरत है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 25 फ़रवरी 2018

पूंजीवादी विरचना - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत सामंतवादी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम पूंजीवादी विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



पूंजीवादी विरचना - १
(The Capitalist Formation - 1)

पूंजीवादी उत्पादन पद्धति मूलतः सामंतवाद के अंदर ही एक विशिष्ट संरचना (structure) या रूप (form) की तरह उत्पन हुई। जब यह एक नयी सामाजिक-आर्थिक विरचना (socio-economic formation) का आधार बनी, तो उसने सारे सामाजिक संबंधों के आमूल पुनर्निर्माण (radical restructuring)  तथा पुनर्संगठन (reorganisation) को प्रेरित किया। पूंजीवाद के अंतर्गत समाज का वर्गीय ढांचा बदल गया। सामंत और भूदास की जगह पूंजीपति और मज़दूर ने ले ली। उजरती मज़दूर (hired or waged labour) वर्ग और बुर्जुआ (bourgeoisie) वर्ग, प्रमुख वर्ग (classes) बन गये। पूर्णतः अधिकारहीन दास और सीमित अधिकारों वाले भूदास की तुलना में मज़दूर क़ानूनन स्वतंत्र होता है। किंतु पूंजीपति पर उसकी निर्भरता किसी तरह कम नहीं है, हालांकि इस निर्भरता का रूप ज़रूर भिन्न होता है। मज़दूर उत्पादन साधनों से वंचित होता है, उसके पास अपना कहने के लिए केवल उसकी श्रमशक्ति होती है, जिसे बेचकर ही वह जीवननिर्वाह कर सकता है। पूंजीवादी समाज में पूंजीपति ही श्रमशक्ति को ख़रीद सकता है और इस्तेमाल कर सकता है। अतः मज़दूर को मजबूर होकर उसके चंगुल में फंसना पड़ता है।

पूंजीवाद की स्थापना के साथ उत्पादक शक्तियां (productive forces) तेज़ी से बढ़ने लगीं। यह तीव्र विकास नये, पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के कारण हुआ। ये संबंध उत्पादन के साधनों (means of production) पर बुर्जुआ वर्ग के निजी स्वामित्व (private ownership) और उत्पादन साधनों से वंचित तथा अपनी श्रम शक्ति बेचने को विवश उज़रती मज़दूरों के श्रम के शोषण पर आधारित होते हैं। पूंजीपति, बेशी (surplus) मूल्य ( यानी वह मूल्य जिसे मज़दूर अपनी श्रम शक्ति के मूल्य के अतिरिक्त निर्मित करता है ) मुफ़्त में हस्तगत कर लेता है। इस तरह पूंजीवादी विरचना में वर्गों के बीच संबंध वैरभावपूर्ण होते हैं, क्योंकि वे अमीरों द्वारा ग़रीबों के शोषण पर आधारित होते हैं।

परंतु विकसित होती हुई उत्पादक शक्तियां अपने स्वभाव बदलती थीं। मशीनी उत्पादन सामूहिक, संयुक्त श्रम की अपेक्षा करता था। पूंजीवादी विकास के साथ-साथ, उत्पादन अधिकाधिक सामाजिक स्वरूप ग्रहण करता जाता है। उत्पादक शक्तियों का सामाजिक स्वरूप और उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व के बीच बढ़ता हुआ तीव्र अंतर्विरोध पैदा हो गया। यह अंतर्विरोध, वर्ग संघर्ष की बढ़ती तीव्रता में व्यक्त हुआ।

पूंजीवाद के विकास के फलस्वरूप मज़दूर वर्ग में तेज़ी से वृद्धि हुई और समाज के जीवन में उसका सापेक्ष महत्व बढ़ गया। मज़दूर वर्ग की वर्ग चेतना भी बढ़ी। औद्योगिक उत्पादन, सर्वहारा (proletariat) से महती एकजुटता, संगठन, क्रियाकलाप के समन्वय (co-ordination) तथा उच्चस्तरीय व्यवसायिक प्रशिक्षण और ज्ञान की अपेक्षा करता था। पूंजीवाद ने सामंती फूट का, समाज के जटिल सोपानक्रमिक (hierarchical) संगठन, क़ानूनों की विभिन्नता का उन्मूलन कर दिया और श्रम तथा पूंजी के एक अविभक्त बाज़ार (market) की रचना की। इन सब बातों से मज़दूर वर्ग के लिए यह समझना अधिक आसान हो गया कि उसके हित पूंजीपतियों के हितों के आमूलतः विरोधी हैं। मार्क्स और एंगेल्स द्वारा विकसित वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांत, यानी मौजूदा प्रणाली के क्रांतिकारी रूपांतरण (transformation) तथा एक वर्गहीन (classless) समाज के निर्माण के सिद्धांत ने सर्वहारा की वर्ग चेतना में वृद्धि को प्रोत्साहित किया। वैज्ञानिक समाजवाद, मज़दूर वर्ग की पार्टियों के ज़रिये मज़दूर आंदोलन के साथ जुड़ गया। इस तरह वैज्ञानिक समाजवाद ने सर्वसाधारण की क्रांतिकारी चेतना की बढ़ती में मदद की और फलतः वर्ग संघर्ष को विस्तृततर तथा गहनतर बनाया।

१९वीं सदी के अंत तथा २०वीं सदी के प्रारंभ में पूंजीवाद, प्रगतिशील तथा द्रुत गति से विकासमान विरचना नहीं रहा। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों और सामाजिक स्वरूप की उत्पादक शक्तियों के बीच गहरे अंतर्विरोधों के कारण उत्पादक शक्तियों का विकास उससे कहीं ज़्यादा मंद गति से होने लगा, जो निजी पूंजीवादी स्वामित्व के उन्मूलन के बाद होता। पूंजीवाद के विकास में एक नयी अवस्था, साम्राज्यवाद (imperialism) की अवस्था चालू हो गयी।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

सामंतवादी विरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत दास-स्वामी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम सामंतवादी विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



सामंतवादी विरचना
(The Feudal Formation)

सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्पादन साधनों (means of production), मुख्यतः भूमि (land) पर पूर्ण निजी स्वामित्व (full private ownership) और उत्पादक पर, यानी किसान पर अपूर्ण स्वामित्व, सामंतवादी उत्पादन संबंधों (feudal relations of production) का आधार था।

इस प्रकार का स्वामित्व रोम के तथा पूर्व के कुछ दास-प्रथागत राज्यों के समाज में धीरे-धीरे उत्पन्न होने भी लगा था। दास केवल भौडे औज़ारों (rough tools) से ही काम कर सकते थे और नीची उत्पादकता (low productivity) के आदिम काम ही पूरे कर सकते थे। वे ग़ुलामी के जबरिया श्रम (forced labour) से नफ़रत करते थे और उन्हें अपने काम के परिणामों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उत्पादन के साधनों में सुधार के बाद ग़ुलामों के बजाय, आश्रित उत्पादकों (dependent producers) के श्रम का उपयोग लाभदायी हो गया। उत्पादन के ऐसे नये संबंध बनने शुरू हो गये, जिनमें भूमि तथा उपकरणों के स्वामी ने उन्हें उत्पादक के उपयोग के लिए दे दिया और इस तरह, उत्पादक को अपने पर आश्रित बना दिया। इस प्रकार का क़ानूनन आश्रित कामगार पूर्णतः अपने मालिक की संपत्ति नहीं था और उत्पाद के कुछ अंश को स्वयं विनियोजित कर सकता था, अतः उसे अपने काम में दासों के बजाय अधिक दिलचस्पी थी।

यूरोप में तीसरी से पांचवीं सदियों के दौरान नये उत्पादन संबंधों के विकास को एशिया से आने वाले बर्बर क़बीलों के हमलों से बढ़ावा मिला। इन लोगों ने रोम के दास साम्राज्य को भंग करके उसके ध्वंसावशेषों पर कई नये राज्यों की स्थापना की, जिनके अध्यक्ष सैन्याधिकारी ( राजा, ड्यूक, बैरन ) होते थे। वे एक दूसरे पर निर्भर थे, वरिष्ठ अवस्थिति (senior position) के लोगों ने भूमि की जोतों को अपने योद्धाओं और सैनिकों के बीच बांट दिया। जोतदार (holders of fiefs) असामी, जागीरदार (vassals) बन गये और उन पर सैनिक सेवा की अनिवार्यता थोप दी गयी। निर्भरता की यह प्रणाली बड़ी जटिल और सोपानक्रमिक (hierarchical) थी। सबसे ऊपर थे सम्राट और राजा, उनके असामी थे ड्यूक और उनके नीचे के असामियों के रूप में थे काउंट, बैरन, आदि। सबसे नीचे के स्तर पर मेहनतकश, भूदास थे। कृषि सामंतवाद का आधार था, किंतु नगरों में भी सामंती संबंधों को सुदृढ़ बनाया गया, जिसके फलस्वरूप मध्ययुगीन दस्तकारी (craft) संगठनों ( गिल्डों, guilds ) का गठन हुआ। उनके भी अपने ही जटिल सोपानक्रमिक संबंध थे।

सारी श्रेणियों के सामंतों ने एक नये शासकीय प्रभावी वर्ग का गठन कर लिया, जबकि भूदास किसान तथा बहुत निर्धन दस्तकार शोषित वर्ग बन गये। भूदासों तथा दस्तकारों ने सामंती प्रभुओं के ख़िलाफ़ ज़ोरदार संघर्ष चलाया और अक्सर सशस्त्र विद्रोह भी किये। ये विद्रोह मेहनतकशों की पराजय में समाप्त हुए, क्योंकि उनकी जीत के लिए आवश्यक समुचित दशाओं का अस्तित्व नहीं था।

राज्य में घोर फूट और एकता के अभाव का होना सामंती समाज की लाक्षणिकता थी। प्रत्येक सामंत राजनीतिक स्वाधीनता पाने का प्रयास करता था। सामंतों के बीच अंतहीन युद्ध होते थे, जिनके कारण उत्पादक शक्तियों के विकास और उत्पादन संबंधों में सुधार में रुकावटें पैदा हो जाती थीं। सामंती समाज घोर रूढ़ीवादी (conservative), गतिरुद्ध (stagnant) था और उसके विकास की रफ़्तार बहुत धीमी थी। किंतु पूर्ण गतिरोध तथा सामाजिक विकास का पूर्ण-रोधन कभी नहीं हुआ।

यह बात मुख्यतः औज़ारों, उपकरणों तथा हस्तकला के मंद, किंतु अनवरत परिष्करण में प्रकट होती थी, इसका एक परिणाम था राज्यों के अंदर तथा राज्यों के बीच व्यापार का विस्तार। सामंती फूट, एक एकल मुद्रा प्रणाली (single monetary system) तथा संचार व्यवस्था का अभाव, क़ानूनों की विभिन्नता, आदि धीरे-धीरे उद्योग तथा व्यापार के विकास की बाधाएं बन गये। उत्पादक शक्तियों के और अधिक विकास तथा नयी उत्पादन पद्धति की रचना का तक़ाज़ा था कि समाज के आधार (basis) तथा अधिरचना (superstructure) का आमूल पुनर्संगठन तथा पुनर्निर्माण किया जाये।

१५वीं-१७वीं सदियों में पश्चिमी यूरोप के राज्यों में एक नयी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति (capitalist mode of production) ने रूप ग्रहण करना शुरू कर दिया। विविध यांत्रिक विधियों और मशीनों के आविष्कार, औज़ारों व उपकरणों के परिष्करण, आदि के कारण भूदासों तथा गिल्ड दस्तकारों का श्रम अलाभकर हो गया। सामंती सामाजिक संबंध, समाज के विकास में बाधक बन गये। एक नया शोषक वर्ग, बुर्जुआ वर्ग (bourgeoisie, पूंजीपति वर्ग) सामंतवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष का नेता बन गया ; इस वर्ग को किराये के श्रम (hired labour) तथा उजरती मज़दूरों (wage workers) के शोषण तथा नयी पूंजीवादी उत्पादन पद्धति के विकास में दिलचस्पी थी।

१७वीं-१८वीं सदियों में कई बुर्जुआ क्रांतियों के, जिनमें सर्वसाधारण ने सक्रिय रूप से भाग लिया, फलस्वरूप यूरोप और अमरीका के अनेक देशों में सामंती प्रणाली ध्वस्त हो गयी और सामंती राज्य ने बुर्जुआ राज्य के लिए रास्ता छोड़ दिया। उत्पादन की प्रणाली में, निजी स्वामित्व के पूंजीवादी रूप पर आधारित उत्पादन संबंध प्रभावी बन गये।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
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समय अविराम

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

दास-स्वामी विरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत आदिम-सामुदायिक विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम दास-स्वामी विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



दास-स्वामी विरचना
(The Slave-Owning Formation)

जिस पहली सामाजिक-आर्थिक विरचना (socio-economic formation) में निजी संपत्ति (private property) के संबंध प्रभावी थे वह दासों पर स्वामित्व वाली विरचना थी। ऐसी सबसे पुरातन विरचनाएं ईसापूर्व तीसरी से दूसरी सहस्त्राब्दियों में प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया, भारत तथा चीन में और ईसापूर्व दूसरी सहस्त्राब्दी के अंत में यूनान में और पहली सहस्त्राब्दी में प्राचीन रोम में विकसित हुई। दासों के स्रोत थे युद्ध और ऋण। जहां आदिम समाज में युद्ध बंदियों को या तो क़बीले का सदस्य बना लिया जाता या क़त्ल कर दिया जाता, अथवा उनके लिए फिरौती मांगी जाती, वहीं दासों पर स्वामित्व वाले समाज में उन्हें दास बनाना लाभप्रद हो गया, क्योंकि उत्पादकता के उस स्तर पर दासों का श्रम, श्रम के बेशी उत्पादों (surplus products) की रचना के काम में लाया जा सकता था।

दासों पर स्वामित्व वाली उत्पादन पद्धति (mode of production) के उद्‍भव से समाज दो सर्वथा अनमेल वर्गों (classes) - दास तथा उनके स्वामी - में बंट गया। अपनी बारी में उनके बीच संघर्ष के फलस्वरूप एक विशेष सामाजिक संस्थान (social institution), दासों के स्वामियों के राज्य ( दास-प्रथागत राज्य ) की स्थापना हुई। यह राज्य दासों के प्रभुताशाली (dominant) स्वामियों के वर्ग की आर्थिक व राजनीतिक सत्ता को बनाये रखने के लिए शोषितों (exploited), सर्वोपरि दासों के राजनीतिक दमन (oppression) का एक अस्त्र था

दास-स्वामी प्रथा की प्रारंभिक अवस्थाओं में ही इस विरचना के सामान्य लक्षण, ठोस ऐतिहासिक दशाओं के अनुरूप, विशिष्ट रूप प्रदर्शित करने लगे थे। मिस्र, बेबीलोन, असीरिया व अन्य राज्यों में, जहां कॄषि के लिए आवश्यक विशाल सिंचाई तथा निकास नहरों का निर्माण किया गया था, दासों पर राजकीय स्वामित्व का बोलबाला था। प्राचीन पूर्व के देशों मे निर्मित सामाजिक-आर्थिक प्रणाली को मार्क्स ने ‘उत्पादन की एशियाई पद्धति’ कहा था। 

इसका सबसे विशिष्ट लक्षण था एक ही तरह के उत्पादन संबंधों तथा रख-रखाव के पुनरुत्पादन की क्षमता, जिसमें उत्पादक शक्तियों (productive forces) का नीचा स्तर लगभग अपरिवर्तित रहता था। एक तरफ़, उससे समाज का निश्चित स्थायित्व (certain stability) तथा अपरिवर्तनीयता (immutability) सुरक्षित रहती थी, जो बाहरी शक्तियों के आक्रमण से ही ध्वस्त हो सकती थीं। दूसरी तरफ़, उत्पादन की एशियाई पद्धति संपूर्ण सामाजिक-आर्थिक प्रणाली के गतिरोध (stagnation) को बढ़ावा देती थी, जो व्यक्ति की पहलक़दमी (initiative) तथा आत्मिक व सामाजिक स्वतंत्रता की उसकी आवश्यकता को घटाकर न्यूनतम बनाते हुए, निराशावादी विश्वदृष्टिकोण (pessimistic world outlook) तथा पलायनवाद (escapism) को सुदृढ़ बनाते और वस्तुगत सामाजिक अन्याय (objective social injustice)  की दुनिया से भागकर आंतरिक अनुभवों तथा आत्मगत स्वसुधार (subjective self-improvement) एवं धार्मिक मनन-चिंतन और सन्यास-वैराग्य (asceticism) की दुनिया में जाने के प्रयत्नों को बढ़ावा देते हुए समाज के संपूर्ण आत्मिक जीवन पर भी प्रभाव डालती थी। 

गतिरुद्ध एशियाई उत्पादन पद्धति, दास-स्वामी विरचना के बाद भी जीवित रही और एशिया के बहुत-से देशों में संपूर्ण मध्ययुग में भी जारी रही, जिसके फलस्वरूप उच्च कोटि की आत्मिक संस्कृति की रचना करने वाले ये देश आर्थिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में यूरोप और उत्तरी अमरीका के अधिक गतिशील देशों की तुलना में पिछड़ गये। पूरब के निरंकुश राजा, संपूर्ण प्रभुत्वशाली वर्ग के हितों की अकेले रक्षा करते थे। साथ ही पारिवारिक, पितृसत्तात्मक (patriarchal) दासता का अस्तित्व भी था। इसके विपरीत प्राचीन यूनान तथा रोम में दासों पर व्यक्तिगत स्वामित्व की प्रमुखता थी। दासों से कार्यशालाओं (ergasteria), पत्थर की खदानों, खानों, सड़कें बनाने तथा निर्माण के कार्यों, आदि में काम लिया जाता था। यूनान में तथा रोम में कुछ अवस्थाओं में लोकतांत्रिक दास-प्रथात्मक गणतंत्रों (slave republic) का प्रसार हुआ। किंतु उनमें लोकतंत्र (democracy) तथा राजनीतिक समानता (political equality) दासों के लिए नहीं, केवल स्वतंत्र नागरिकों के लिए थी।

एशियाई और यूरोपी राज्यों के बीच कुछ अंतरों के बावजूद दास-स्वामी विरचना के सामान्य लक्षण (general features) प्राचीन जगत के सारे राज्यों के लिए एक-से थे।

दासों की मेहनत ने दासों के स्वामियों को भारी दैनिक उत्पादक श्रम से मुक्त कर दिया। इसने शासकीय प्रभावी वर्ग के सदस्यों को कला, साहित्य, दर्शन, विज्ञान, आदि के विकास की तरफ़ काफ़ी ध्यान देने में समर्थ बना दिया। प्रभावी वैचारिकी (dominant ideology) दासत्व को उचित ठहराती थी। अरस्तू ने कहा था कि दास, बोलनेवाले उपकरण मात्र हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक सत्व (social being), युग की चेतना (consciousness of epoch) को कैसे निर्धारित (determine) करता है।

दास-प्रथागत समाज में बौद्धिक क्रियाकलाप और शासन, शासक वर्ग (ruling class) का विशेषाधिकार था और दैहिक श्रम, दासों और निर्धनों की नियति थी। इसलिए दैहिक श्रम (physical labour) से नफ़रत की जाती थी ; केवल बौद्धिक, मानसिक क्रियाकलाप ही स्वतंत्र व्यक्ति के योग्य माने जाते थे। इस तरह दैहिक श्रम के प्रति घृणा, शोषक व शोषितों में समाज के ऐतिहासिक विभाजन का परिणाम थी।

दास और समाज के निर्धनतम संस्तर अपने उत्पीड़कों के ख़िलाफ़ अक्सर विद्रोह कर देते थे। उन विद्रोहों का क्रूरतापूर्वक दमन कर दिया जाता था। कुछ दुर्लभ मामलों में दास वर्ग विजयी हो जाता था, तो भी उसका मतलब दासता का ख़ात्मा नहीं था। विजेता स्वयं प्रभु बन जाते और विरोधियों को दस बना लेते थे। उस काल में विद्यमान उत्पादक शक्तियों के विकास तथा स्वभाव के स्तर पर इसके सिवा कोई और संभावना थी ही नहीं।

उत्पादन के साधनों (means of production) के अत्यंत मंद सुधार के दौरान एक नये, सामंती (feudal) सामाजिक-आर्थिक विरचना की उत्पत्ति के लिए वस्तुगत अवस्थाओं का निर्माण भी धीरे-धीरे ही हुआ।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

आदिम-सामुदायिक विरचना

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत मानव समाज की रचना पर चर्चा की थी, इस बार हम आदिम-सामुदायिक विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



आदिम-सामुदायिक विरचना
(the primitive communal formation)

आदिम सामुदायिक विरचना का आधार, उत्पादन के औज़ारों पर सामुदायिक स्वामित्व (ownership) था। पत्थरों के सरलतम औज़ारों ( कुल्हाड़ियां, छुरे, बाण, भाले आदि ), हड्डियों के उपकरणों, लकड़ी के तीरों तथा बल्लमों (javelins) ने मनुष्य को जंतु जगत से विलग (differentiated, separated) होने में समर्थ बनाया। साथ ही उनसे श्रम की नीची उत्पादकता हासिल होती थी। उनका उपयोग लोगों के संयुक्त क्रियाकलाप में ही कारगर (effective) होता था। उत्पादक शक्तियों (productive forces) के इस स्वभाव ने, उत्पादक शक्तियों के प्रकार (type) का भी पूर्वनिर्धारण किया। सारे औज़ार और अस्त्र आदिम समूह के सदस्यों के साझे स्वामित्व में थे। इस समूह का केंद्रक गोत्र (clan) था, जिसके सारे सदस्य रक्त संबंधों से परस्पर जुड़े थे। कालांतर में गोत्र समुदायों से जनजातियों ( क़बीलों ) तथा जनजातीय संघों (tribal unions) की रचना हुई।

प्रागऐतिहासिक (prehistoric) मानव प्राकृतिक शक्तियों के सामने निस्सहाय था। लोग मिलजुलकर ही उनका मुक़ाबला कर सकते थे। संयुक्त श्रम से प्राप्त भोजन गोत्र या जनजाति (क़बीले) के सारे सदस्यों के बीच वितरित किया जाता था। उत्पादन संबंधों के सारे तत्व, यानी स्वामित्व, कार्यकलाप का सीधा विनिमय और वितरण, उत्पादक शक्तियों के स्वभाव तथा विकास के स्तर के अनुरूप थे। आदिम-सामुदायिक विरचना की अधिरचना (superstructure) इन उत्पादन संबंधों के अनुरूप थी। गोत्र और क़बीलों का नेतृत्व मुखियों के हाथ में था, जो अपने बल, अनुभव और बुद्धिमता में विशिष्ट होते थे। सत्ता इन्हीं आधारों पर चयन के द्वारा प्राप्त होती थी। कभी-कभी और कहीं-कहीं यह पिता से पुत्र को वंशानुगत क्रम में भी मिलती थी। समुदाय के सारे सदस्य काम, कंद-मूलों के संचयन, शिकार, आदि में अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार भाग लेते थे। साथ ही सारे वयस्क, शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ पुरुष योद्धा भी होते थे। इसलिए आदिम समूह के सदस्यों के बीच कोई आंतरिक सामाजिक अंतर्विरोध (contradictions) नहीं थे। उनकी चेतना कठोर प्रकृति के विरुद्ध संघर्ष में बनी थी।

प्राकृतिक घटनाओं ( वज्र घोष, तडित्छटा, प्रबल ताप, शीत, बाढ़, आदि ) के स्पष्टीकरण ने मिथकों का (mythological) रूप ग्रहण किया। विश्व के बारे में इन्ही स्पष्टीकरणों पर ही शुरुआती आदिम धर्म का उदय हुआ। साथ ही व्यवहार के लिए अनिवार्य सरलतम मानक (standards) तथा नियम, सामाजिक चेतना के अंग बने। वे आदिम नैतिकता और आचार के प्रारंभिक रूप थे। उनको भंग करने पर कठोर दंड दिया जाता था। उसी काल में आदिम कला का जन्म भी हुआ। चट्टानों तथा गुफ़ाओं की दीवारों में उस काल की रंगचित्रकला तथा रेखाचित्रों के अनेक नमूने हमारे युग तक सलामत रह गये। उनमें आखेट, लड़ाई, धार्मिक पंथों के तत्व, आदि प्रदर्शित किये गये हैं।

संपूर्ण आदिम प्रविधि (technique) तथा उत्पादन के विकास की एक बहुत बड़ी घटना आग का उपयोग था। इसके द्वारा लोगों ने खाना पकाना ही नहीं, बल्कि शरण स्थलों को गर्म रखना, चिकनी मिट्टी के बर्तन बनाना भी सीखा और बाद में धातुओं को गलाना और कांसे तथा लोहे के औज़ार तथा हथियार बनाना ही सीखा। उत्पादक शक्तियों के विकास में एक विराट छलांग इसका परिणाम थी। इसका एक नतीजा था लोगों का उष्णकटिबंधों में अपने मूल निवास स्थान से निकल कर तेज़ी के साथ दूसरी जगहों को फैलाव जिससे वे दुनिया के कठोर इलाक़ों तथा दुर्गम स्थानों में भी पहुंच गये।

उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही साथ श्रम विभाजन भी चलता रहा। ऐसे क़बीले बन गये, जो मुख्यतः शिकार खेलते या पेड़-पौधों से खाद्य बटोरते थे। पशुपालकों तथा ज़मीन पर काम करनेवालों के बीच विभाजन हो गया। दस्तकारियां (crafts) विविधीकृत हो गयीं : अस्त्र निर्माता, कुम्हार, मोची, आदि। इसके फलस्वरूप विभिन्न आदिम समुदायों के बीच श्रम के उत्पादों का विनिमय (exchange) होने लगा।

लगभग ६००० साल पहले उत्पादक शक्तियों का विकास ऐसे स्तर पर पहुंच गया कि लोगों ने पहली बार अपनी खाद्य, वस्त्र तथा शरण की प्रत्यक्ष ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक उत्पाद से अधिक का उत्पादन शुरू कर दिया। इन बेशी (surplus) उत्पादों को भंडारित करना तथा जमा करना संभव हो गया। वे गोत्र और क़बीलों के मुखियों के हाथों में संकेंद्रित थे। इसके फलस्वरूप संपदा (wealth) के संचय तथा संपत्ति की असमानता के पूर्वाधार बन गये। उत्पादन के बेशी साधनों को दूसरों के श्रम का शोषण करने के लिए उपयोग में लाया जाने लगा। इसका यह मतलब था कि नये उत्पादन संबंधों के ऐसे प्रारंभिक रूप उत्पन्न हो गये, जो अब सामूहिक स्वामित्व पर नहीं, निजी स्वामित्व पर आधारित थे। एक नयी उत्पादन पद्धति रूप ग्रहण करने लगी। पुरानी सामुदायिक समाज की संभावनाएं ख़त्म हो गयीं और इतिहास के वस्तुगत क्रम ने मानवजाति को नयी सीमा रेखा पर पहुंचा दिया। समाज का वर्गों में विभाजन हो गया और वर्ग समाज (class society) की रचना हो गयी।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम
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