रविवार, 18 मार्च 2018

साम्यवादी विरचना - २

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत साम्यवादी विरचना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समाहार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



साम्यवादी विरचना - २
(The Communist Formation - 2)

समाजवाद (socialism) के निर्माण के दौरान आत्मगत कारक (subjective factor) की, यानी समाजवादी चेतना, वैचारिकी और शैक्षिक कार्य की भूमिका में बहुत तेज़ी से बढ़ती होती है। समाजवाद एक ऐसा समाज है जहां :

(१) उत्पादन के साधन (means of production) जनता की संपत्ति होते हैं और आर्थिक व सामाजिक उत्पीड़न (oppression) और असमानता (inequality) का उन्मूलन कर दिया जाता है।

(२) उत्पादक शक्तियों (production forces) के द्रुत (rapid) विकास का कार्य-क्षेत्र खुल जाता है और वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति, सारे जनगण की ख़ुशहाली में लगातार बढ़ती को सुनिश्चित बनाती है।

(३) काम का समान अधिकार तथा उसके लिए न्यायोचित पारिश्रमिक सुनिश्चित होते हैं।

(४) मज़दूर वर्ग, मेहनतकश किसानों और बुद्धिजीवियों का एक घनिष्ठ गठबंधन स्थापित हो जाता है।

(५) सारी राष्ट्रीयताओं तथा जनगण की, पुरुषों तथा नारियों की, समानता की तथा युवा पीढ़ी को एक विश्वसनीय और आशाप्रद भविष्य की गारंटी होती है जबकि वृद्ध श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की जाती है।

(६) वास्तविक लोकतंत्र (real democracy) का विकास होता है; औद्योगिक, सामाजिक और सार्वजनिक मामलों के प्रबंध व प्रशासन में नागरिकों की व्यापक सहभागिता की गारंटी की जाती है।

(७) मानवाधिकार पूर्णतः वास्तवीकृत (realised) होते हैं; प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक ही नियम तथा नैतिकता और अनुशासन होता है।

(८) एक सच्ची मानवतावादी वैचारिकी का बोलबाला होता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण सर्वोपरि होता है। प्रगतिशील संस्कृति और विज्ञान की रचना तथा विकास किया जाता है।

(९) सामाजिक न्याय, सामूहिकतावाद तथा साथियों जैसी पारस्परिक सहायता पर आधारित समाजवादी जीवन पद्धति की रचना की जाती है।

वैश्विक अनुभव दर्शाते हैं समाजवादोन्मुख समाज, पिछड़ेपन को ऐतिहासिक दॄष्टि से अल्पकाल में ही दूर कर सकता है, शक्तिशाली औद्योगिक और तकनीकी आधार तथा आधुनिक विज्ञान की रचना कर सकता है

साम्यवादी विरचना की दूसरी अवस्था केवल तभी आयेगी जब कम्युनिज़्म की भौतिक-तकनीकी बुनियाद डल चुकेगी और उसके उपयुक्त सामाजिक जीवन और चेतना के संगठन के रूपों की रचना हो चुकेगी। साम्यवाद एक ऐसी वर्गहीन सामाजिक प्रणाली (classless social system) होगी, जिसमें उत्पादन के साधनों पर एक ही, सार्वजनिक स्वामित्व होगा और समाज के सदस्यों को पूर्ण समानता प्राप्त होगी; यह स्वतंत्र, सचेत श्रमिकों का ऐसा अतिसंगठित (highly organised) समाज होगा, जिसमें सामाजिक स्वशासन (social self-government) की स्थापना होगी और समाज के भले के लिए श्रम, प्रत्येक व्यक्ति की प्रमुख जीवंत आवश्यकता बन जायेगा। यह ऐसी उत्पादक शक्तियों की अपेक्षा करता है, जो समाज और व्यक्ति दोनों की तर्कबुद्धिसम्मत (rational) आवश्यकताओं की पूर्ण तुष्टि के अवसर मुहैया करेगा।

सारे उत्पादक क्रियाकलाप, उच्च कारगर प्रविधियों तथा तकनीक पर आधारित होंगे और मनुष्य तथा प्रकृति के सामंजस्यपूर्ण अंतर्क्रिया (harmonious interaction) को सुनिश्चित बनायेंगे। तब क्रियाकलाप तथा भौतिक संपदा के उत्पादन और वितरण का बुनियादी उसूल होगा ‘प्रत्येक से उसकी योग्यतानुसार, प्रत्येक को उसकी आवश्यकतानुसार’। कम्युनिज़्म में संक्रमण (transition) एक जटिल, लंबी प्रक्रिया है, जिसके दौरान पूंजीवाद के मुक़ाबले कहीं अधिक ऊंची उत्पादकता हासिल करना, सामाजिक दृष्टि से समरूप (socially uniform) समाज की रचना करना, समाज की सामाजिक संरचना में और प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक, सांस्कृतिक छवि तथा संपूर्ण समाज में गहरे परिवर्तन लाना जरूरी हैं।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम

रविवार, 11 मार्च 2018

साम्यवादी विरचना - १

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत पूंजीवादी विरचना पर चर्चा की थी, इस बार हम साम्यवादी विरचना को समझने की कोशिश करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



साम्यवादी विरचना - १
(The Communist Formation - 1)

प्रत्येक नयी सामाजिक-आर्थिक विरचना (socio-economic formation) वस्तुगत ऐतिहासिक नियमों का परिणाम होती है। इस अर्थ में साम्यवादी विरचना का आना वैसे ही अनिवार्य और आवश्यक है जैसे की पूर्ववर्ती विरचनाएं। किंतु इसकी उत्पत्ति की विशेषता उसका यह महत्वपूर्ण विभेदक लक्षण (distinguish feature) है कि यह एक सचेत प्रक्रिया (conscious process) होती है। इसका यह मतलब नहीं है कि इसमें सामाजिक सत्व (social being) अपनी निर्धारक भूमिका गंवा देता है। नये समाज के स्वभाव तथा पूर्ववर्ती समाजों से उसके मौलिक अंतर की वजह से इसकी रचना की एक महत्वपूर्ण शर्त वैज्ञानिक समाजवाद को (जो समाज के विकास के वस्तुगत नियमों तथा उसे रूपांतरित करने के तरीक़ों को उद्‍घाटित करता है) मज़दूर वर्ग तथा आम मेहनतकशों के क्रांतिकारी संघर्ष के साथ जोड़ना है। इस शर्त की पूर्ति कम्यूनिस्ट और मज़दूर पार्टियों के काम की अंतर्वस्तु (content) है।

साम्यवादी विरचना कैसे उत्पन्न तथा विकसित होती है? वैज्ञानिक समाजवाद के संस्थापकों ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यह प्रमाणित किया है कि यह विरचना दो मुख्य क्रमावस्थाओं से होकर गुजरती है।

पहली क्रमावस्था है समाजवाद (socialism)। यह पूंजीवादी विरचना से साम्यवादी विरचना के संक्रमण (transition) की अवस्था है। यह सामाजिक क्रांति के फलस्वरूप उत्पन्न होता तथा रूप ग्रहण करता है। सामाजिक क्रांति की विजय के साथ मेहनतकशों का राज्य, सर्वहारा का अधियानकत्व (dictatorship of the proletariat) स्थापित किया जाता है। पदच्युत शोषकों का दमन करते हुए, सर्वहारा अधियानकत्व अपने मुख्य प्रयत्नों को, नियोजन (planning) तथा समाजवादी आधार और अधिरचना (superstructure) के सोद्देश्य निर्माण पर संकेन्द्रित करता है।

साम्यवादी विरचना की यह पहली क्रमावस्था अपने विकास की कई अवस्थाओं से होकर गुज़रती है। इन अवस्थाओं का निर्धारण, विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों, देश के अंदर तथा बाहर वर्ग शक्तियों के संतुलन और राष्ट्रीय व सांस्कृतिक परंपराओं से होता है। इसलिए विभिन्न प्रदेशों तथा अलग-अलग देशों में समाजवाद के निर्माण के भिन्न-भिन्न मार्ग तथा रूप हो सकते हैं। हालांकि इन विशिष्टताओं तथा व्यष्टिक (individual) लक्षणों के अलावा इस प्रक्रिया की कुछ सामान्य (general) नियमितताएं होती हैं।

उनमें शामिल हैं : मज़दूर वर्ग की प्रमुख भूमिका सहित मेहनतकशों की सत्ता की स्थापना ; समाज के विकास में कम्युनिस्ट और मज़दूर पार्टियों की नेतृत्वकारी भूमिका ; उत्पादन के प्रमुख साधनों पर सामाजिक स्वामित्व (social ownership) की स्थापना और जनगण के हित में अर्थव्यवस्था का विकास ; ‘प्रत्येक से उसकी योग्यतानुसार, और प्रत्येक को उसके श्रम के अनुसार’ उसूल (principle) का कार्यान्वयन ; समाजवादी जनवाद (socialist democracy) का विकास ; राष्ट्रीयताओं तथा उपराष्ट्रीयताओं की समानता और मैत्री ; वर्ग शत्रुओं से समाजवादी विरचना की रक्षा। समाजवाद के निर्माण के दौरान आत्मगत कारक (subjective factor) की, यानी समाजवादी चेतना, वैचारिकी और शैक्षिक कार्य की भूमिका में बहुत तेज़ी से बढ़ती होती है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।
समय अविराम

रविवार, 4 मार्च 2018

पूंजीवादी विरचना -२

हे मानवश्रेष्ठों,

यहां पर ऐतिहासिक भौतिकवाद पर कुछ सामग्री एक शृंखला के रूप में प्रस्तुत की जा रही है। पिछली बार हमने यहां सामाजिक-आर्थिक विरचनाओं के सिद्धांत के अंतर्गत पूंजीवादी विरचना पर चर्चा शुरू की थी, इस बार हम उसी चर्चा का समाहार करेंगे।

यह ध्यान में रहे ही कि यहां इस शृंखला में, उपलब्ध ज्ञान का सिर्फ़ समेकन मात्र किया जा रहा है, जिसमें समय अपनी पच्चीकारी के निमित्त मात्र उपस्थित है।



पूंजीवादी विरचना -२
(The Capitalist Formation - 2)

साम्राज्यवाद (imperialism) की लाक्षणिक विशेषताएं हैं: इजारेदारियों (monopolies) का प्रभुत्व, औद्योगिक-वित्तीय अल्पतंत्र (industrial-financial oligarchy) का सत्ता में आना, उपनिवेशों के पुनर्वितरण के लिए संघर्ष, वर्ग संघर्ष (class struggle) का तीव्रीकरण, मेहनतकशों के शोषण का गहनीकरण, आर्थिक तथा सामाजिक विकास की विषमता, आदि। जैसा कि पहले विश्वयुद्ध (१९१४-१९१८) से प्रदर्शित हुआ, साम्राज्यवाद की अवस्था में पूंजीवाद मनुष्यजाति के शांतिपूर्ण प्रगतिशील विकास को सुनिश्चित बनाने में अक्षम है। उसके सामाजिक अंतर्विरोध पराकाष्ठा तक तीव्र हो गये। रूस में, जो साम्राज्यवाद की प्रणाली में दुर्बलतम कड़ी साबित हुआ, १९१७ में एक समाजवादी क्रांति हुई और समाजवाद का निर्माण शुरू हुआ। यह पूंजीवाद के आम संकट की, विश्व पूंजीवादी प्रणाली के ध्वस्त होने की पहली मंज़िल थी।

दूसरे विश्वयुद्ध (१९३९-१९४५) के बाद, जिसे सबसे आक्रामक साम्राज्यवादी राज्यों ( फ़ासिस्ट जर्मनी, इटली और सैन्यवादी जापान ) द्वारा भड़काया गया था, पूंजीवाद के आम संकट की दूसरी अवस्था शुरू हुई। समाजवाद एक अकेले देश की सीमाओं से बाहर आ गया; एक ऐसी समाजवादी प्रणाली का विकास हुआ जिसमें यूरोप, एशिया और लैटिन अमरीका के कई देश शामिल हो गये। उपनिवेशी प्रणाली के ध्वस्त होने के फलस्वरूप कई आज़ाद देश अस्तित्व में आये, जिनमें से कई समाजवादी विकास के रास्ते पर चले।

आधुनिक पूंजीवाद, उस पूंजीवाद से मूलतः भिन्न है, जो २०वीं सदी के प्रारंभ तथा मध्य में था। राजकीय इजारेदार पूंजीवाद (state-monopoly capitalism) के अंतर्गत विराट पैमाने पर विकसित उत्पादक शक्तियों (production forces) और पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के बीच अंतर्विरोध अधिकाधिक तीव्र होता जा रहा है। बेशक, इसका मतलब यह नहीं है कि उत्पादक शक्तियों और विशेषतः नवीनतम प्रविधि तथा टेक्नोलॉजी का विकास बंद हो गया है। इसके विपरीत जैव-तकनीक, इलैक्ट्रोनिकी, अंतरिक्ष व सूचना तकनीक पर्याप्त तेज़ी से विकसित हो रही हैं। तो प्रश्न उठता है कि यह अंतर्विरोध किसमें है? इसके नकारात्मक परिणाम स्वयं को कैसे व्यक्त करते हैं?

मुद्दा यह है कि बड़े पूंजीपति मुख्यतः उन उद्योगों का विकास कर रहे हैं, जिनसे अधिकतम मुनाफ़ा (profit), ऊंची प्रतियोगिता क्षमता और घरेलू व विश्व बाज़ार में प्रभुता (dominance) हासिल होती है। और उनमें, मुख्यतः वे सब शामिल हैं, जो समाज के सैन्यीकरण (militarisation) को बढ़ावा देते हैं और पूंजीवादी राज्यों की सैनिक शक्ति को बढ़ाते हैं। बड़ी इजारेदारियां स्वयं अपने देशों के और इससे भी अधिक विकासशील देशों के मेहनतकशों के हितों पर कोई ध्यान नहीं देती है। पूंजीवाद की दशाओं में कंप्यूटरीकरण तथा रोबोटीकरण से बेरोजगारी में अभूतपूर्व बढ़ती हो जाती है। पश्चिम के प्रमुख विशेषज्ञों के पूर्वानुमान ठीक इसी बात का संकेत देते हैं।

एक नकारात्मक परिणाम और भी है। पूंजीवादी समाजों में विकास की दरें उससे कहीं नीची होती हैं, जो सामाजिक स्वामित्व (social ownership) पर आधारित उत्पादन संबंधों के अंतर्गत हो सकती हैं। पूंजीवादी विकास में बढ़ती हुई मंदियां (slumps), चक्रिक (cyclic) और संरचनात्मक संकट, बढ़ते हुए राजकीय ऋण, बजट के घाटे तथा बेलगाम मुद्रास्फीति (inflation) शामिल होती है। इसके साथ ही पूंजी, संकेन्द्रित और अंतर्राष्ट्रीयकृत होती जा रही है तथा विश्वभर के जनगण का शोषण करने तथा विकासशील और विकसित पूंजीवादी देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी नियंत्रण रखनेवाले बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेशन अधिकाधिक शक्तिशाली होते जा रहे हैं। आधुनिक समाज की विराट संपदा तथा वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों को सामाजिक न्याय की उपलब्धि, ग़रीबी का उन्मूलन करने तथा विभिन्न ऐतिहासिक कारणों से अपने विकास में पिछड़े हुआ देशों और जातियों को सहायता देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, परंतु पूंजीवाद के अंतर्गत ऐसा करना असंभव है

समसामयिक पूंजीवादी समाज के नेतागण इन अंतर्विरोधों की तीक्ष्णता को घटाने और उनके प्रतिकूल प्रभावों को मिटाने के प्रयत्न में विभिन्न आर्थिक तथा राजनीतिक तिकड़मों का सहारा लेते हैं। किंतु आधुनिक पूंजीवाद के गहरे प्रतिरोधी अंतर्विरोधों (antagonistic contradictions) से निबटने के लिए समाज में आमूल सामाजिक सुधारों की ज़रूरत है।



इस बार इतना ही।
जाहिर है, एक वस्तुपरक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गुजरना हमारे लिए संभावनाओं के कई द्वार खोल सकता है, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने में हमारी मदद कर सकता है।
शुक्रिया।

समय अविराम
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